नजरिया आपका डर से डरते हो या डर को भगाते हों ?

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नजरिया-

हमारा नजरिया ही हमे सफल एवं निडर बनाता है | क्योंकि सफलता हेतु साधन के रुप में महत्वपूर्ण तो सोचना, फिर चुनना तथा पूर्णतया समर्पण ही है | लेकिन ये साधन काम कैसे करते है ? “विचार भावनाओ की ओर, भावनाए कार्य की ओर तथा कार्य परिणामों की ओर ” ले जाते है| चूँकि सफलता अथवा अमीर बनने के लिए करोड़ो लोग विचार करते है |और “हजारो लोग”सफलता को प्राप्त करते है| क्योकि ?……

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नजरिया

क्योकि “विचार एवं भावनाए हमारे”अंदरूनी जगत का तथा परिणाम हमारे बाहरी जगत का हिस्सा है| और इन्ही की तरह अति महत्वपूर्ण है| “काम ” work अर्थात हमारा काम करने का नजरिया| और यही “अंदरूनी एवं बाहरी ” जगत के बीच “पुल” का काम करता है | तथा इसे सबसे ज्यादा  “डर,शंका,अथवा चिंता ” रोकने अथवा प्रभावित करते है| इसलिए कहते है ,नजरिया आपका डर से डरते हो या डर को भगाते हों |

नजरिया

चूँकि यह अति महत्वपूर्ण बिंदु है”वे लोग जो “डर के बावजूद ” भी काम को करते है| वे  लोग  निश्चित ही  सफलता के रास्ते को अपना रहे है| और जो लोग “डर” अथवा भय के कारण अपना विचार या संकल्प को त्याग दिया है ,वही से उन्होंने सफलता के रास्ते ‘ को  छोड़  दिया  है |   अतः भय या डर से  सफलता में आने वाली अड़चनों की बजाय लक्ष्य पर अपनी निगाह जमाए रखो और भय के शेर को भी “पालतु शेर” बना डालो इसके आगे (डर के ) जीत है|

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चिंता डर का अहसास सभी लोगो को होता है| वे चाहे अमीर,गरीब,असफल अथवा सफल कोई भी हो इससे पूर्णत मुक्त कोई नही होता| लेकिन सोचने का नजरिया (अलग) इस प्रकार होता है| “कि सफल या अमीर लोग ‘डर’ चिंता के बावजूद काम करते है| बाधाओ से रुकते नही|

वही असफल आदमी डर, शंकाए, चिंताए के कारण रुक जाते है|और यही से सफलता की राह से भटकने लगते है ……

अतः “संक्षेप में डर से मुक्ति पाना जरुरी ( compulsory)नही, अपितु हमें डर, शंका, चिंता, असुविधा और अनिश्चितता के बावजूद भी काम करने की आदत डालना जरुरी है चाहे हमारा काम करने का मूड हो या न हो “|  डर के बावजूद “न रुकने के लिए” ही खुद को प्रशिक्षित करना होगा|

इस प्रकार  “जब डर के बावजूद काम करेंगे तो “जिन्दगी आसान”  तथा समस्याओं का आकार  “गौण “हो जायेगा तथा आसान काम करने के इच्छुक रहेंगे तो समस्याओं का आकार बड़ा नजर आएगा| किसे अपनाते हो”|  नजरिया आपका डर से डरते हो या डर को भगाते हों |

सोच आपकी | ………जीवन में ऊचाइयों को छूना चाहते हो या प्राप्त करना चाहते हो तो सुविधाजनक “आराम देह” दायरा (comfortzone) से बाहर थोड़ा “मुश्किल दायरे ”  में आगे बढ़ जाते हो ,तो वह मुश्किल भरा दायरा भी “आराम देह ” दायरा हो जायेगा | मतलब समस्याएं छोटी और आप “ज्यादा बड़े” व्यक्ति बन जायेंगे|

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