नर और नारायण की दुर्लभ कथा आपको अचरज में डाल देगी

नर और नारायण द्वारा सहस्र कवच का दमन-

सती जी के पिता “दक्ष प्रजापति” ने अपनी पुत्री “मूर्ति” का विवाह ब्रह्मा जी के मानस पुत्र “धर्म” से किया।और मूर्ति ने दो जुड़वां पुत्रों नर और नारायण को जन्म दिया। अब नर और नारायण की दुर्लभ कथा पढ़िए विस्तार से……..

एक असुर था.. दम्बोद्भव|

उसने सूर्यदेव की बड़ी तपस्या की। सूर्य देव जब प्रसन्न हो कर प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा तो उसने “अमरत्व” का वरदान माँगा।

सूर्यदेव ने कहा यह असंभव है।

तब उसने वरदान में माँगा कि, उसे एक हज़ार दिव्य कवचों की सुरक्षा मिले। इनमे से एक भी कवच सिर्फ वही तोड़ सके जिसने एक हज़ार वर्ष तपस्या की हो..

और जैसे ही कोई एक भी कवच को तोड़े, वह तुरंत मृत्यु को प्राप्त हो।

सूर्यदेवता बड़े चिंतित हुए। वे इतना तो समझ ही पा रहे थे कि यह असुर इस वरदान का दुरुपयोग करेगा…

किन्तु उसकी तपस्या के आगे वे मजबूर थे।उन्हे उसे यह वरदान देना ही पड़ा।

इन कवचों से सुरक्षित होने के बाद वही हुआ जिसका सूर्यदेव को डर था।

दम्बोद्भव अपने सहस्र कवचों की शक्ति से अपने आप को अमर मान कर मनचाहे अत्याचार करने लगा।
वह “सहस्र कवच” नाम से जाना जाने लगा।

उधर सती जी के पिता “दक्ष प्रजापति” ने अपनी पुत्री “मूर्ति” का विवाह ब्रह्मा जी के मानस पुत्र “धर्म” से किया।

मूर्ति ने सहस्र्कवच के बारे में सुना हुआ था.. और उन्होंने श्री विष्णु से प्रार्थना की कि इसे ख़त्म करने के लिए वे आयें।

विष्णु जी ने उसे आश्वासन दिया कि वे ऐसा करेंगे।

समयक्रम में मूर्ति ने दो जुड़वां पुत्रों नर और नारायण को जन्म दिया।

दोनों दो शरीरों में होते हुए भी एक थे – दो शरीरों में एक आत्मा। विष्णु जी ने एक साथ दो शरीरों में नर और नारायण के रूप में अवतरण किया था|

दोनों भाई बड़े हुए| एक बार दम्बोध्भव इस वन पर चढ़ आया | तब उसने एक तेजस्वी मनुष्य को अपनी ओर आते देखा और भय का अनुभव किया |

उस व्यक्ति ने कहा कि मैं “नर” हूँ, और तुम से युद्ध करने आया हूँ |

भय होते भी दम्बोद्भव (सहस्र कवच) ने हंस कर कहा.. तुम मेरे बारे में जानते ही क्या हो ?

मेरा कवच सिर्फ वही तोड़ सकता है जिसने हज़ार वर्षों तक तप किया हो |

नर ने हंस कर कहा कि मैं और मेरा भाई नारायण एक ही हैं – वह मेरे बदले तप कर रहे हैं, और मैं उनके बदले युद्ध कर रहा हूँ |

युद्ध शुरू हुआ, और सहस्र कवच को आश्चर्य होता रहा कि सच ही में नारायण के तप से नर की शक्ति बढती चली जा रही थी |

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जैसे ही हज़ार वर्ष का समय पूर्ण हुआ, नर ने सहस्र कवच का एक कवच तोड़ दिया |
लेकिन सूर्य के वरदान के अनुसार जैसे ही कवच टूटा नर मृत हो कर गिर पड़े |

सहस्र कवच ने सोचा, कि चलो एक कवच गया ही सही किन्तु यह तो मर गया |

तभी उसने देखा की नर उसकी और दौड़े आ रहा है और वह चकित हो गया |

अभी ही तो उसके सामने नर की मृत्यु हुई थी और अभी ही यही जीवित हो मेरी और कैसे दौड़ा आ रहा है ???

लेकिन फिर उसने देखा कि नर तो मृत पड़े हुए थे, यह तो हुबहु नर जैसे प्रतीत होते उनके भाई नारायण थे..

जो दम्बोद्भव की तरफ नहीं, बल्कि अपने भाई नर की तरफ दौड़ रहे थे |

दम्बोद्भव (सहस्र कवच) ने अट्टहास करते हुए नारायण से कहा कि तुम्हे अपने भाई को समझाना चाहिए था.. इसने अपने प्राण व्यर्थ ही गँवा दिए |

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नारायण शांतिपूर्वक मुस्कुराए | उन्होंने नर के पास बैठ कर कोई मंत्र पढ़ा और चमत्कारिक रूप से नर उठ बैठे |

तब दम्बोद्भव की समझ में आया कि हज़ार वर्ष तक शिवजी की तपस्या करने से नारायण को मृत्युंजय मंत्र की सिद्धि हुई है..

जिससे वे अपने भाई को पुनर्जीवित कर सकते हैं |

अब इस बार नारायण ने दम्बोद्भव को ललकारा और नर तपस्या में बैठ गये |

हज़ार साल के युद्ध और तपस्या के बाद फिर एक कवच टूटा और नारायण की मृत्यु हो गयी |

फिर नर ने आकर नारायण को पुनर्जीवित कर दिया, और यह चक्र फिर फिर चलता रहा |

इस तरह 999 बार युद्ध हुआ | एक भाई युद्ध करता दूसरा तपस्या करता | हर बार पहले की मृत्यु पर दूसरा उसे पुनर्जीवित कर देता।

जब 999
कवच टूट गए तो सहस्र्कवच समझ गया कि अब मेरी मृत्यु हो जाएगी |

तब वह युद्ध त्याग कर सूर्यलोक भाग कर सूर्यदेव के शरणागत हुआ |

नर और नारायण उसका पीछा करते वहां आये और सूर्यदेव से उसे सौंपने को कहा |
किन्तु अपने भक्त को सौंपने पर सूर्यदेव राजी न हुए।

तब नारायण ने अपने कमंडल से जल लेकर सूर्यदेव को श्राप दिया कि आप इस असुर को उसके कर्मफल से बचाने का प्रयास कर रहे हैं..

जिसके लिए आप भी इसके पापों के भागीदार हुए और आप भी इसके साथ जन्म लेंगे इसका कर्मफल भोगने के लिए |

इसके साथ ही त्रेतायुग समाप्त हुआ और द्वापर का प्रारम्भ हुआ |

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समय बाद कुंती जी ने अपने वरदान को जांचते हुए सूर्यदेव का आवाहन किया, और कर्ण का जन्म हुआ।

लेकिन यह आम तौर पर ज्ञात नहीं है, कि, कर्ण सिर्फ सूर्यपुत्र ही नहीं है, बल्कि उसके भीतर सूर्य और दम्बोद्भव दोनों हैं |

जैसे नर और नारायण में दो शरीरों में एक आत्मा थी, उसी तरह कर्ण के एक शरीर में दो आत्माओं का वास है.. सूर्य और सहस्रकवच |

दूसरी ओर नर और नारायण इस बार अर्जुन और कृष्ण के रूप में आये |

कर्ण के भीतर जो सूर्य का अंश है, वही उसे तेजस्वी वीर बनाता है | जबकि उसके भीतर दम्बोद्भव भी होने से उसके कर्मफल उसे अनेकानेक अन्याय और अपमान मिलते है और उसे द्रौपदी का अपमान और ऐसे ही अनेक अपकर्म करने को प्रेरित करता है |यदि अर्जुन कर्ण का कवच तोड़ता, तो तुरंत ही उसकी मृत्यु हो जाती। इसीलिये इंद्र उससे उसका कवच पहले ही मांग ले गए थे।

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Suppression of Sahasra armor by Nara and Narayan-

Sati ji’s father “Daksha Prajapati” married his daughter “Murthy” to Brahma Ji’s psyche son “Dharma”. And Murthy gave birth to two twin sons, Nar and Narayan. Now read the rare story of Nar and Narayan in detail ……..

There was an asura .. Dambodbhava.

He did great penance of Suryadev. When the Sun God appeared pleased and asked for a boon, he asked for the boon of “immortality”.

Suryadev said that it is impossible.

Then he asked for a boon, to give him the protection of a thousand divine armor. Only one of them could break the armor that had done a thousand years of penance ..

And as soon as one breaks any armor, it dies instantly.

Suryadevata became very worried. They were able to understand so much that this asura would misuse this boon …

But in front of his penance he was compelled. He had to give this boon to him.

After being protected by these armor, that is what Suryadev was afraid of.

Dambodbhava considered himself immortal with the power of his thousand armor and started torturing as he wished.

He came to be known as “Sahasra Kavach”.

On the other hand, Sati’s father “Daksha Prajapati” married his daughter “Murthy” to Brahma’s psyche son “Dharma”.

Murthy had heard about Sahasrakavacha .. and he prayed to Shri Vishnu that he come to finish it.

Vishnu assured him that they would do so.

In due course, the idol gave birth to two twin sons, Nar and Narayan.

Both were one in two bodies – one soul in two bodies. Vishnu had descended into two bodies simultaneously as male and Narayan.

Both brothers grew up. Once Dambodhbhav climbed this forest. Then he saw a stunning man coming towards him and felt fear.

The man said that I am “male” and have come to fight with you.

Even in fear, Dambodbhavab (Sahasra Kavach) laughed and said .. What do you know about me?

My armor can only be broken by those who have meditated for a thousand years.

The male laughed and said that I and my brother Narayan are one and the same – Because he is doing penance in my place, and I am fighting against him.

The war started, and Sahasra Kavach was surprised that in fact, the power of male was increasing with the tenacity of Narayana.

As soon as the time of the thousand years was over, the male broke a shield of the sahasra armor.
But according to the boon of the sun, as soon as the armor broke, the male fell dead.

Sahasra Kavach thought, let’s go to an armor, but it died.

Then he saw that the male was running towards him and he was surprised.

Just now the male had died in front of him and this is still alive, how else have I come running ???

But then he saw that the male was lying dead, it looked like his brother was Narayan.

Who was running towards his brother male, not towards Dambodbhava.

Dambodbhava (Sahasra Kavach) said to Narayana that he should have explained to his brother .. He lost his life in vain.

Narayan smiled peacefully. He recited a mantra sitting near the male and miraculously the male sat up.

Then Dambodbhav understood that Narayana had accomplished the death mantra by performing austerities of Shiva for a thousand years ..

By which they can revive their brother.

Now this time Narayan challenged Dambodbhava and sat in male penance.

After thousands of years of war and penance, one armor was broken again and Narayan died.

Then the male came and revived Narayan, and this cycle continued again.

So This is how the war took place 999 times. Because One brother would do battle and the other would do penance. Every time the first died the second would revive him.

When 999
When the armor broke, Sahasrakvach understood that now I will die.

Then he gave up the war and fled to Suryaloka and took shelter of Suryadev.

Nara and Narayan followed him and asked Suryadev to hand him over.

But Suryadev did not agree on handing it to his devotee.

Then Narayana cursed Suryadev by taking water from his kamandala, that you are trying to save this asura from his karma.

So For which you too became a partaker of its sins and you too will be born with it to enjoy its fruits.

With this, the Tretayuga ended and Dwapara started.

Time later, Kunti called upon Suryadev, examining his boon, and Karna was born.

But it is not generally known that Karna is not just Suryaputra, but he has both Surya and Dambodbhav.

Just as there was one soul in two bodies in Nar and Narayana, similarly two bodies reside in one body of Karna .. Surya and Sahasrakavacha.

On the other hand, Nara and Narayan came this time as Arjuna and Krishna.

So The part of the Sun inside Karna makes him a magnificent hero. While his dambodabhav is also within him, his actions cause him many injustice and humiliation and motivate him to insult Draupadi and do many similar abuses. So If Arjuna breaks the armor of Karna, he would have died instantly. That is why Indra had already demanded his armor from him.

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