Thursday, May 23, 2024
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Ramdhari singh dinkar (राष्ट्रकवि) जी की best कविता

(राष्ट्रकवि) जी की best कविता-मैथिलीशरण गुप्त हिंदी खड़ बोली के महत्वपूर्ण और प्रसिद्धि कवि थे। उनकी कला और राष्ट्र प्रेम के कारण उन्हें राष्ट्र कवि का दर्जा प्राप्त है। उनकी कविताओं की विशेष बात ये भी थी वे खड़ी बोली में लिखने वाले पहले कवि थे जिसकी वजह से कवियों में उनका एक अलग स्थान रहा। मैथिलीशरण गुप्त की कविताओं ने स्वतंत्रा में बहुत बड़ा योगदान दिया है उनका देश के प्रति इसी अपार प्रेम के कारण उनके जन्म दिवस को राष्ट्र कवि दिवस के रूप मनाया जाता है। आज हम इस ब्लॉग के माध्यम से मैथिलीशरण गुप्त के जीवन परिचय , उनकी साहित्यिक और काव्यगत विशेषताएँ , मैथिलीशरण गुप्त कविताएं और उनकी रचनाओं के बारे में जानेंगे। मैथिलीशरण गुप्त बारे में यह सभी बातें जानने के लिए हमारे ब्लॉग को आखिर तक पढ़ें।

(राष्ट्रकवि) जी की best कविता

मैं इस अंग्रेजी नववर्ष का विरोध नहीं कर रहा हूं तो इसका सपोर्ट भी नहीं कर रहा हूं। चूंकि अंगेजो ( ईसाइयों ) ने किसी समय विश्व के अधिकांश भाग को अपना उपनिवेश ( आधीन ) बनाया था इस कारण लगभग सारे विश्व का एक मानक समय और एक दिनांक एक जैसा हो गया है और इसी के कारण अंग्रेजी महीने और वर्ष पूरे विश्व में एक जैसा मानकर हर वर्ष एक बदलते अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार नववर्ष मनाया जाता है। चूंकि आज हमारे सारे दैनिक कार्यक्रम अंग्रेजी दिवस के अनुसार ही चलते हैं फिर भी मैं इस तरह के नववर्ष मनाए जाने को लेकर बाध्य नहीं हूं इसलिए मेरी तरफ से किसी को अंग्रेजी नववर्ष की बधाई वाली पहल नहीं होगी। मैं सनातनी हिंदू हूं और मेरा नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को शुरू होता है और अपने सनातन धर्म का अस्तित्व बनाए रखना मेरा दायित्व है।

Ramdhari singh dinkar

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Ramdhari singh dinkar की यह best कविता जरूर पढे।

ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं,
है अपना ये त्यौहार नहीं।
है अपनी ये तो रीत नहीं,
है अपना ये व्यवहार नहीं।

धरा ठिठुरती है सर्दी से,
आकाश में कोहरा गहरा है।
बाग़ बाज़ारों की सरहद पर,
सर्द हवा का पहरा है।

सूना है प्रकृति का आँगन,
कुछ रंग नहीं , उमंग नहीं।
हर कोई है घर में दुबका हुआ,
नव वर्ष का ये कोई ढंग नहीं।

ऐसी सोच बदल देगी जीवन

चंद मास अभी इंतज़ार करो,
निज मन में तनिक विचार करो।
नये साल नया कुछ हो तो सही,
क्यों नक़ल में सारी अक्ल बही।

उल्लास मंद है जन -मन का,
आयी है अभी बहार नहीं।
ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं,
है अपना ये त्यौहार नहीं।

ये धुंध कुहासा छंटने दो,
रातों का राज्य सिमटने दो।
प्रकृति का रूप निखरने दो,
फागुन का रंग बिखरने दो।

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प्रकृति दुल्हन का रूप धार,
जब स्नेह – सुधा बरसायेगी।
शस्य – श्यामला धरती माता,
घर -घर खुशहाली लायेगी।

तब “चैत्र शुक्ल की प्रथम तिथि”,
नव वर्ष मनाया जायेगा।
आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर,
जय गान सुनाया जायेगा।

युक्ति – प्रमाण से स्वयंसिद्ध,
नव वर्ष हमारा हो प्रसिद्ध।
आर्यों की कीर्ति सदा -सदा,
नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा।

इस पथ पर चलोगे तो अवसर ही अवसर है

अनमोल विरासत के धनिकों को,
चाहिये कोई उधार नहीं।

ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं,
है अपना ये त्यौहार नहीं।
है अपनी ये तो रीत नहीं,
है अपना ये त्यौहार नहीं।

1. रामधारी सिंह दिनकर की कविता “आशा का दीपक”

वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नहीं है;
थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नहीं है।
चिन्गारी बन गयी लहू की बून्द गिरी जो पग से;
चमक रहे पीछे मुड़ देखो चरण-चिह्न जगमग से।
बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नहीं है;
थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नहीं है।
अपनी हड्डी की मशाल से हृदय चीरते तम का;
सारी रात चले तुम दुख झेलते कुलिश का।
एक खेय है शेष, किसी विध पार उसे कर जाओ;
वह देखो, उस पार चमकता है मन्दिर प्रियतम का।
आकर इतना पास फिरे, वह सच्चा शूर नहीं है;
थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।
दिशा दीप्त हो उठी प्राप्त कर पुण्य-प्रकाश तुम्हारा;
लिखा जा चुका अनल-अक्षरों में इतिहास तुम्हारा।
जिस मिट्टी ने लहू पिया, वह फूल खिलाएगी ही;
अम्बर पर घन बन छाएगा ही उच्छ्वास तुम्हारा।
और अधिक ले जाँच, देवता इतना क्रूर नहीं है;
थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।

2. रामधारी सिंह दिनकर की बाल कविता “चांद का कुर्ता”

हठ कर बैठा चांद एक दिन, माता से यह बोला,
सिलवा दो मां, मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला।
सन-सन चलती हवा रात भर, जाड़े से मरता हूं,
ठिठुर-ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूं।
आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का,
न हो अगर तो ला दो, कुर्ता ही कोई भाड़े का।”
बच्चे की सुन बात कहा माता ने, ” अरे सलोने,
कुशल करें भगवान, लगें मत तुझको जादू-टोने।
जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूं,
एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूं।
कभी एक अंगुल भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा,
बड़ा किसी दिन हो जाता है और किसी दिन छोटा।
घटता बढ़ता रोज, किसी दिन ऐसा भी करता है,
नहीं किसी की आंखों को दिखलाई पड़ता है।
अब तू ही तो बता, नाप तेरा किस रोज लिवायें,
सीं दें एक झिंगोला जो हर दिन बदन में आये।

3. रामधारी सिंह दिनकर की चांद पर कविता “रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद”

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।
जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?
मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते;
और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी
चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।
आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का;
आज उठता और कल फिर फूट जाता है;
किन्तु, फिर भी धन्य; ठहरा आदमी ही तो?
बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है।
मैं न बोला, किन्तु, मेरी रागिनी बोली,
देख फिर से, चाँद! मुझको जानता है तू?
स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी?
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?
मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,
आग में उसको गला लोहा बनाती हूँ,
और उस पर नींव रखती हूँ नये घर की,
इस तरह दीवार फ़ौलादी उठाती हूँ।
मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी
कल्पना की जीभ में भी धार होती है,
बाण ही होते विचारों के नहीं केवल,
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।
स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे,
“रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे,
रोकिये, जैसे बने इन स्वप्न वालों को,
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।

4. खुला आसमान पर निराला की हिन्दी कविता

बहुत दिनों बाद खुला आसमान!
निकली है धूप, खुश हुआ जहान!
दिखी दिशाएँ, झलके पेड़,
चरने को चले ढोर – गाय – भैंस – भेड़,
खेलने लगे लड़के छेड़ – छेड़ –
लड़कियाँ घरों को कर भासमान!
लोग गाँव-गाँव को चले,
कोई बाज़ार, कोई बरगद के पेड़ के तले
जाँघिया – लँगोटा ले, सँभले,
तगड़े – तगड़े सीधे नौजवान!
पनघट में बड़ी भीड़ हो रही,
नहीं ख़्याल आज कि भीगेगी चुनरी,
बातें करती हैं वे सब खड़ी,
चलते हैं नयनों के सधे बाण!

 5. कुंजी (चाभी) पर कविता – रामधारी सिंह दिनकर

घेरे था मुझे तुम्हारी साँसों का पवन,
जब मैं बालक अबोध अनजान था।
यह पवन तुम्हारी साँस का,
सौरभ लाता था।
उसके कंधों पर चढ़ा,
मैं जाने कहाँ-कहाँ,
आकाश में घूम आता था।
सृष्टि शायद तब भी रहस्य थी।
मगर कोई परी मेरे साथ में थी;
मुझे मालूम तो न था,
मगर ताले की कुंजी मेरे हाथ में थी।
जवान हो कर मैं आदमी न रहा,
खेत की घास हो गया।
तुम्हारा पवन आज भी आता है
और घास के साथ अठखेलियाँ करता है,
उसके कानों में चुपके चुपके
कोई संदेश भरता है।
घास उड़ना चाहती है
और अकुलाती है,
मगर उसकी जड़ें धरती में
बेतरह गड़ी हुईं हैं।
इसलिए हवा के साथ
वह उड़ नहीं पाती है।
शक्ति जो चेतन थी,
अब जड़ हो गयी है।
बचपन में जो कुंजी मेरे पास थी,
उम्र बढ़ते बढ़ते
वह कहीं खो गयी है।

 6. सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला कविता “प्रपात के प्रति”

अंचल के चंचल क्षुद्र प्रपात !
मचलते हुए निकल आते हो;
उज्ज्वल! घन-वन-अंधकार के साथ
खेलते हो क्यों? क्या पाते हो
अंधकार पर इतना प्यार,
क्या जाने यह बालक का अविचार
बुद्ध का या कि साम्य-व्यवहार ।
तुम्हारा करता है गतिरोध
पिता का कोई दूत अबोध
किसी पत्थर से टकराते हो
फिरकर ज़रा ठहर जाते हो
उसे जब लेते हो पहचान
समझ जाते हो उस जड़ का सारा अज्ञान,
फूट पड़ती है ओंठों पर तब मृदु मुस्कान;
बस अजान की ओर इशारा करके चल देते हो,
भर जाते हो उसके अन्तर में तुम अपनी तान।

7. वर दे वीणावादिनी वर दे कविता – सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

वर दे, वीणावादिनि वर दे !
प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव
भारत में भर दे !
काट अंध-उर के बंधन-स्तर
बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर;
कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे !
नव गति, नव लय, ताल-छंद नव
नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव;
नव नभ के नव विहग-वृंद को
नव पर, नव स्वर दे !
वर दे, वीणावादिनि वर दे।

8. “वे किसान की नयी बहू की आँखें कविता” -सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

नहीं जानती जो अपने को खिली हुई
विश्व-विभव से मिली हुई,
नहीं जानती सम्राज्ञी अपने को,
नहीं कर सकीं सत्य कभी सपने को,
वे किसान की नयी बहू की आँखें
ज्यों हरीतिमा में बैठे दो विहग बन्द कर पाँखें;
वे केवल निर्जन के दिशाकाश की,
प्रियतम के प्राणों के पास-हास की,
भीरु पकड़ जाने को हैं दुनिया के कर से
बढ़े क्यों न वह पुलकित हो कैसे भी वर से।
 9. छोटी कविता “मुक्ति” – सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला
तोड़ो, तोड़ो, तोड़ो कारा
 पत्थर, की निकलो फिर,
 गंगा-जल-धारा!
 गृह-गृह की पार्वती!
पुनः सत्य-सुन्दर-शिव को सँवारती
 उर-उर की बनो आरती!–
 भ्रान्तों की निश्चल ध्रुवतारा!–
 तोड़ो, तोड़ो, तोड़ो कारा!

10. प्राप्ति कविता हिन्दी -सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

तुम्हें खोजता था मैं, पा नहीं सका,
हवा बन बहीं तुम, जब मैं थका, रुका।
मुझे भर लिया तुमने गोद में,
कितने चुम्बन दिये, मेरे मानव-
मनोविनोद में नैसर्गिकता लिये;
सूखे श्रम-सीकर वे
छबि के निर्झर झरे नयनों से,
शक्त शिरा‌एँ हु‌ईं रक्त-वाह ले,
मिलीं – तुम मिलीं, अन्तर कह उठा
जब थका, रुका।

11. मरा हूँ हज़ार मरण कविता – सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

मरा हूँ हज़ार मरण, पाई तब चरण-शरण ।
फैला जो तिमिर जाल कट-कटकर रहा काल,
आँसुओं के अंशुमाल, पड़े अमित सिताभरण ।
जल-कलकल-नाद बढ़ा अन्तर्हित हर्ष कढ़ा,
विश्व उसी को उमड़ा, हुए चारु-करण सरण ।

12.भेद कुल खुल जाए कविता -सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

भेद कुल खुल जाए वह सूरत हमारे दिल में है।
देश को मिल जाए जो पूँजी तुम्हारी मिल में है॥
हार होंगे हृदय के खुलकर तभी गाने नये।
हाथ में आ जायेगा, वह राज जो महफिल में है॥
तरस है ये देर से आँखे गड़ी शृंगार में।
और दिखलाई पड़ेगी जो गुराई तिल में है॥
पेड़ टूटेंगे, हिलेंगे, ज़ोर से आँधी चली।
हाथ मत डालो, हटाओ पैर, बिच्छू बिल में है॥
ताक पर है नमक मिर्च लोग बिगड़े या बनें।
सीख क्या होगी पराई जब पसाई सिल में है॥

13. केशर की कलि की पिचकारी कविता – सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

केशर की, कलि की पिचकारी;
पात-पात की गात सँवारी।
राग-पराग-कपोल किए हैं,
लाल-गुलाल अमोल लिए हैं,
तरू-तरू के तन खोल दिए हैं,
आरती जोत-उदोत उतारी,
गन्ध-पवन की धूप धवारी।
गाए खग-कुल-कण्ठ गीत शत,
संग मृदंग तरंग-तीर-हत,
भजन-मनोरंजन-रत अविरत,
राग-राग को फलित किया री-
विकल-अंग कल गगन विहारी ।

14. गहन है यह अंधकार -सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

गहन है यह अंधकार;
स्वार्थ के अवगुंठनों से,
हुआ है लुंठन हमारा।
खड़ी है दीवार जड़ की घेरकर,
बोलते है लोग ज्यों मुँह फेरकर
इस गगन में नहीं दिनकर;
नही शशधर, नहीं तारा।
कल्पना का ही अपार समुद्र यह,
गरजता है घेरकर तनु, रुद्र यह,
कुछ नहीं आता समझ में,
कहाँ है श्यामल किनारा।
प्रिय मुझे वह चेतना दो देह की,
याद जिससे रहे वंचित गेह की,
खोजता फिरता न पाता हुआ,
मेरा हृदय हारा।

15. आज प्रथम गाई पिक कविता -सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

आज प्रथम गाई पिक पञ्चम।
गूंजा है मरु विपिन मनोरम।
मरुत-प्रवाह, कुसुम-तरु फूले,
बौर-बौर पर भौंरे झूले,
पात-पात के प्रमुदित झूले,
छाय सुरभि चतुर्दिक उत्तम।
आंखों से बरसे ज्योति-कण,
परसें उन्मन – उन्मन उपवन,
खुला धरा का पराकृष्ट तन
फूटा ज्ञान गीतमय सत्तम।
प्रथम वर्ष की पांख खुली है,
शाख-शाख किसलयों तुली है,
एक और माधुरी चली है,
गीतम-गन्ध-रस-वर्णों अनुपम।

16. ख़ून की होली जो खेली कविता -सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

युवकजनों की है जान;
ख़ून की होली जो खेली।
पाया है लोगों में मान,
ख़ून की होली जो खेली।
रँग गये जैसे पलाश;
कुसुम किंशुक के, सुहाए,
कोकनद के पाए प्राण,
ख़ून की होली जो खेली।
निकले क्या कोंपल लाल,
फाग की आग लगी है,
फागुन की टेढ़ी तान,
ख़ून की होली जो खेली।
खुल गई गीतों की रात,
किरन उतरी है प्रात: की;-
हाथ कुसुम-वरदान,
ख़ून की होली जो खेली।
आई सुवेश बहार,
आम-लीची की मंजरी;
कटहल की अरघान,
ख़ून की होली जो खेली।
विकच हुए कचनार,
हार पड़े अमलतास के;
पाटल-होठों मुसकान,
ख़ून की होली जो खेली।

17. दलित जन पर करो करुणा कविता -सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

दलित जन पर करो करुणा।
दीनता पर उतर आये
प्रभु, तुम्हारी शक्ति वरुणा।
हरे तन मन प्रीति पावन,
मधुर हो मुख मनोभावन,
सहज चितवन पर तरंगित
हो तुम्हारी किरण तरुणा
देख वैभव न हो नत सिर,
समुद्धत मन सदा हो स्थिर,
पार कर जीवन निरंतर
रहे बहती भक्ति वरूणा

18. रँग गई पग-पग धन्य धरा काव्य -सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

रँग गई पग-पग धन्य धरा,
हुई जग जगमग मनोहरा ।
वर्ण गन्ध धर, मधु मकरन्द भर,
तरु-उर की अरुणिमा तरुणतर
खुली रूप – कलियों में पर भर
स्तर स्तर सुपरिसरा ।
गूँज उठा पिक-पावन पंचम
खग-कुल-कलरव मृदुल मनोरम,
सुख के भय काँपती प्रणय-क्लम
वन श्री चारुतरा ।

19. भारती वन्दना गीत -सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

भारती, जय, विजय करे
कनक – शस्य – कमल धरे!
लंका पदतल – शतदल
गर्जितोर्मि सागर – जल
धोता शुचि चरण – युगल
स्तव कर बहु अर्थ भरे!
तरु-तण वन – लता – वसन
अंचल में संचित सुमन,
गंगा ज्योतिर्जल – कण
धवल – धार हार लगे!
मुकुट शुभ्र हिम – तुषार
प्राण प्रणव ओंकार,
ध्वनित दिशाएँ उदार,
शतमुख – शतरव – मुखरे!

20. निराशावादी -रामधारी सिंह दिनकर

पर्वत पर, शायद, वृक्ष न कोई शेष बचा
धरती पर, शायद, शेष बची है नहीं घास,
उड़ गया भाप बनकर सरिताओं का पानी,
बाकी न सितारे बचे चाँद के आस-पास ।
क्या कहा कि मैं घनघोर निराशावादी हूँ?
तब तुम्हीं टटोलो हृदय देश का, और कहो,
लोगों के दिल में कहीं अश्रु क्या बाकी है?
बोलो, बोलो, विस्मय में यों मत मौन रहो ।

21. जब आग लगे कविता -रामधारी सिंह दिनकर

सीखो नित नूतन ज्ञान, नई परिभाषाएं,
जब आग लगे, गहरी समाधि में रम जाओ;
या सिर के बल हो खड़े परिक्रमा में घूमो।
ढब और कौन हैं चतुर बुद्धि – बाजीगर के?
गांधी को उल्‍टा घिसो और जो धूल झरे,
उसके प्रलेप से अपनी कुण्‍ठा के मुख पर,
ऐसी नक्‍काशी गढ़ो कि जो देखे, बोले,
आखिर, बापू भी और बात क्‍या कहते थे?
डगमगा रहे हों पांव लोग जब हंसते हों,
मत चिढ़ो, ध्‍यान मत दो इन छोटी बातों पर
कल्‍पना जगदगुरु की हो जिसके सिर पर,
वह भला कहां तक ठोस क़दम धर सकता है?
औ; गिर भी जो तुम गये किसी गहराई में,
तब भी तो इतनी बात शेष रह जाएगी
यह पतन नहीं, है एक देश पाताल गया,
प्‍यासी धरती के लिए अमृतघट लाने को।

22. रामधारी सिंह दिनकर की कविता करघा

हर ज़िन्दगी कहीं न कहीं,
दूसरी ज़िन्दगी से टकराती है।
हर ज़िन्दगी किसी न किसी,
ज़िन्दगी से मिल कर एक हो जाती है।
ज़िन्दगी ज़िन्दगी से
इतनी जगहों पर मिलती है,
कि हम कुछ समझ नहीं पाते
और कह बैठते हैं यह भारी झमेला है।
संसार संसार नहीं,
बेवकूफ़ियों का मेला है।
 हर ज़िन्दगी एक सूत है
 और दुनिया उलझे सूतों का जाल है।
 इस उलझन का सुलझाना
 हमारे लिये मुहाल है।
मगर जो बुनकर करघे पर बैठा है,
वह हर सूत की किस्मत को
पहचानता है।
सूत के टेढ़े या सीधे चलने का
क्या रहस्य है,
बुनकर इसे खूब जानता है।

23. गाँधी पर रामधारी सिंह दिनकर की कविता

देश में जिधर भी जाता हूँ,
उधर ही एक आह्वान सुनता हूँ।
जडता को तोडने के लिए भूकम्प लाओ।
घुप्प अँधेरे में फिर अपनी मशाल जलाओ।
पूरे पहाड हथेली पर उठाकर पवनकुमार के समान तरजो।
कोई तूफ़ान उठाने को कवि, गरजो, गरजो, गरजो!’
सोचता हूँ, मैं कब गरजा था?
जिसे लोग मेरा गर्जन समझते हैं,
वह असल में गाँधी का था,
उस गाँधी का था, जिसने हमें जन्म दिया था।
 तब भी हमने गाँधी के
 तूफ़ान को ही देखा, गाँधी को नहीं।
 वे तूफ़ान और गर्जन के पीछे बसते थे।
 सच तो यह है कि अपनी लीला में,
तूफ़ान और गर्जन को शामिल होते देख
 वे हँसते थे।
तूफ़ान मोटी नहीं, महीन आवाज़ से उठता है।
वह आवाज़ जो मोम के दीप के समान,
एकान्त में जलती है और बाज नहीं,
कबूतर के चाल से चलती है।
गाँधी तूफ़ान के पिता और बाजों के भी बाज थे,
क्योंकि वे नीरवता की आवाज़ थे।

24. स्नेह-निर्झर बह गया है कविता – सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

स्नेह-निर्झर बह गया है!
रेत ज्यों तन रह गया है।
आम की यह डाल जो सूखी दिखी,
कह रही है – “अब यहाँ पिक या शिखी
नहीं आते; पंक्ति मैं वह हूँ लिखी
नहीं जिसका अर्थ-
जीवन दह गया है।”
दिये हैं मैने जगत को फूल-फल,
किया है अपनी प्रतिभा से चकित-चल;
पर अनश्वर था सकल पल्लवित पल–
ठाट जीवन का वही
जो ढह गया है।
अब नहीं आती पुलिन पर प्रियतमा,
श्याम तृण पर बैठने को निरुपमा।
बह रही है हृदय पर केवल अमा;
मै अलक्षित हूँ; यही
कवि कह गया है।

25. नयनों के डोरे लाल-गुलाल भरे कविता – सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

नयनों के डोरे लाल-गुलाल भरे, खेली होली !
जागी रात सेज प्रिय पति सँग रति सनेह-रँग घोली,
दीपित दीप, कंज छवि मंजु-मंजु हँस खोली-
 मली मुख-चुम्बन-रोली ।
प्रिय-कर-कठिन-उरोज-परस कस कसक मसक गई चोली,
एक-वसन रह गई मन्द हँस अधर-दशन अनबोली-
कली-सी काँटे की तोली ।
मधु-ऋतु-रात,मधुर अधरों की पी मधु सुध-बुध खोली,
खुले अलक, मुँद गए पलक-दल, श्रम-सुख की हद हो ली- बनी रति की छवि भोली ।
बीती रात सुखद बातों में प्रात पवन प्रिय डोली,
उठी सँभाल बाल, मुख-लट,पट, दीप बुझा,
हँस बोली रही यह एक ठिठोली ।
parmender yadav
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