श्री रामजी, लक्ष्मणजी, सीताजी का महाराज दशरथ के पास विदा माँगने जाना, दशरथजी का सीताजी को समझाना

 श्री रामजी, लक्ष्मणजी, सीताजी का महाराज दशरथ के पास विदा माँगने जाना, दशरथजी का सीताजी को समझाना

* सचिवँ उठाइ राउ बैठारे। कहि प्रिय बचन रामु पगु धारे॥
सिय समेत दोउ तनय निहारी। ब्याकुल भयउ भूमिपति भारी॥4॥
भावार्थ:-‘श्री रामजी पधारे हैं’, ये प्रिय वचन कहकर मंत्री ने राजा को उठाकर बैठाया। सीता सहित दोनों पुत्रों को (वन के लिए तैयार) देखकर राजा बहुत व्याकुल हुए॥4॥
दोहा :
* सीय सहित सुत सुभग दोउ देखि देखि अकुलाइ।
बारहिं बार सनेह बस राउ लेइ उर लाइ॥76॥
भावार्थ:-सीता सहित दोनों सुंदर पुत्रों को देख-देखकर राजा अकुलाते हैं और स्नेह वश बारंबार उन्हें हृदय से लगा लेते हैं॥76॥
चौपाई :
* सकइ न बोलि बिकल नरनाहू। सोक जनित उर दारुन दाहू॥
नाइ सीसु पद अति अनुरागा। उठि रघुबीर बिदा तब मागा॥1॥
भावार्थ:-राजा व्याकुल हैं, बोल नहीं सकते। हृदय में शोक से उत्पन्न हुआ भयानक सन्ताप है। तब रघुकुल के वीर श्री रामचन्द्रजी ने अत्यन्त प्रेम से चरणों में सिर नवाकर उठकर विदा माँगी-॥1॥
* पितु असीस आयसु मोहि दीजै। हरष समय बिसमउ कत कीजै॥
तात किएँ प्रिय प्रेम प्रमादू। जसु जग जाइ होइ अपबादू॥2॥
भावार्थ:-हे पिताजी! मुझे आशीर्वाद और आज्ञा दीजिए। हर्ष के समय आप शोक क्यों कर रहे हैं? हे तात! प्रिय के प्रेमवश प्रमाद (कर्तव्यकर्म में त्रुटि) करने से जगत में यश जाता रहेगा और निंदा होगी॥2॥
* सुनि सनेह बस उठि नरनाहाँ। बैठारे रघुपति गहि बाहाँ॥
सुनहु तात तुम्ह कहुँ मुनि कहहीं। रामु चराचर नायक अहहीं॥3॥
भावार्थ:-यह सुनकर स्नेहवश राजा ने उठकर श्री रघुनाथजी की बाँह पकड़कर उन्हें बैठा लिया और कहा- हे तात! सुनो, तुम्हारे लिए मुनि लोग कहते हैं कि श्री राम चराचर के स्वामी हैं॥3॥

श्री राम कौसल्या-सीता संवाद

* सुभ अरु असुभ करम अनुहारी। ईसु देइ फलु हृदयँ बिचारी॥
करइ जो करम पाव फल सोई। निगम नीति असि कह सबु कोई॥4॥
भावार्थ:-शुभ और अशुभ कर्मों के अनुसार ईश्वर हृदय में विचारकर फल देता है, जो कर्म करता है, वही फल पाता है। ऐसी वेद की नीति है, यह सब कोई कहते हैं॥4॥
दोहा :
*औरु करै अपराधु कोउ और पाव फल भोगु।
अति बिचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु॥77॥
भावार्थ:-(किन्तु इस अवसर पर तो इसके विपरीत हो रहा है,) अपराध तो कोई और ही करे और उसके फल का भोग कोई और ही पावे। भगवान की लीला बड़ी ही विचित्र है, उसे जानने योग्य जगत में कौन है?॥77॥
चौपाई :
* रायँ राम राखन हित लागी। बहुत उपाय किए छलु त्यागी॥
लखी राम रुख रहत न जाने। धरम धुरंधर धीर सयाने॥1॥
भावार्थ:-राजा ने इस प्रकार श्री रामचन्द्रजी को रखने के लिए छल छोड़कर बहुत से उपाय किए, पर जब उन्होंने धर्मधुरंधर, धीर और बुद्धिमान श्री रामजी का रुख देख लिया और वे रहते हुए न जान पड़े,॥1॥
* तब नृप सीय लाइ उर लीन्ही। अति हित बहुत भाँति सिख दीन्ही॥
कहि बन के दुख दुसह सुनाए। सासु ससुर पितु सुख समुझाए॥2॥
भावार्थ:-तब राजा ने सीताजी को हृदय से लगा लिया और बड़े प्रेम से बहुत प्रकार की शिक्षा दी। वन के दुःसह दुःख कहकर सुनाए। फिर सास, ससुर तथा पिता के (पास रहने के) सुखों को समझाया॥2॥
* सिय मनु राम चरन अनुरागा। घरुन सुगमु बनु बिषमु न लागा॥
औरउ सबहिं सीय समुझाई। कहि कहि बिपिन बिपति अधिकाई॥3॥
भावार्थ:-परन्तु सीताजी का मन श्री रामचन्द्रजी के चरणों में अनुरक्त था, इसलिए उन्हें घर अच्छा नहीं लगा और न वन भयानक लगा। फिर और सब लोगों ने भी वन में विपत्तियों की अधिकता बता-बताकर सीताजी को समझाया॥3॥
* सचिव नारि गुर नारि सयानी। सहित सनेह कहहिं मृदु बानी॥
तुम्ह कहुँ तौ न दीन्ह बनबासू। करहु जो कहहिं ससुर गुर सासू॥4॥
भावार्थ:-मंत्री सुमंत्रजी की पत्नी और गुरु वशिष्ठजी की स्त्री अरुंधतीजी तथा और भी चतुर स्त्रियाँ स्नेह के साथ कोमल वाणी से कहती हैं कि तुमको तो (राजा ने) वनवास दिया नहीं है, इसलिए जो ससुर, गुरु और सास कहें, तुम तो वही करो॥4॥
दोहा :
* सिख सीतलि हित मधुर मृदु सुनि सीतहि न सोहानि।
सरद चंद चंदिनि लगत जनु चकई अकुलानि॥78॥
भावार्थ:-यह शीतल, हितकारी, मधुर और कोमल सीख सुनने पर सीताजी को अच्छी नहीं लगी। (वे इस प्रकार व्याकुल हो गईं) मानो शरद ऋतु के चन्द्रमा की चाँदनी लगते ही चकई व्याकुल हो उठी हो॥78॥
चौपाई :
* सीय सकुच बस उतरु न देई। सो सुनि तमकि उठी कैकेई॥
मुनि पट भूषन भाजन आनी। आगें धरि बोली मृदु बानी॥1॥
भावार्थ:-सीताजी संकोचवश उत्तर नहीं देतीं। इन बातों को सुनकर कैकेयी तमककर उठी। उसने मुनियों के वस्त्र, आभूषण (माला, मेखला आदि) और बर्तन (कमण्डलु आदि) लाकर श्री रामचन्द्रजी के आगे रख दिए और कोमल वाणी से कहा-॥1॥
* नृपहि प्रानप्रिय तुम्ह रघुबीरा। सील सनेह न छाड़िहि भीरा॥
सुकृतु सुजसु परलोकु नसाऊ। तुम्हहि जान बन कहिहि न काऊ॥2॥
भावार्थ:-हे रघुवीर! राजा को तुम प्राणों के समान प्रिय हो। भीरु (प्रेमवश दुर्बल हृदय के) राजा शील और स्नेह नहीं छोड़ेंगे! पुण्य, सुंदर यश और परलोक चाहे नष्ट हे जाए, पर तुम्हें वन जाने को वे कभी न कहेंगे॥2॥
* अस बिचारि सोइ करहु जो भावा। राम जननि सिख सुनि सुखु पावा॥
भूपहि बचन बानसम लागे। करहिं न प्रान पयान अभागे॥3॥
भावार्थ:-ऐसा विचारकर जो तुम्हें अच्छा लगे वही करो। माता की सीख सुनकर श्री रामचन्द्रजी ने (बड़ा) सुख पाया, परन्तु राजा को ये वचन बाण के समान लगे। (वे सोचने लगे) अब भी अभागे प्राण (क्यों) नहीं निकलते!॥3॥
* लोग बिकल मुरुछित नरनाहू। काह करिअ कछु सूझ न काहू॥
रामु तुरत मुनि बेषु बनाई। चले जनक जननिहि सिरु नाई॥4॥
भावार्थ:-राजा मूर्छित हो गए, लोग व्याकुल हैं। किसी को कुछ सूझ नहीं पड़ता कि क्या करें। श्री रामचन्द्रजी तुरंत मुनि का वेष बनाकर और माता-पिता को सिर नवाकर चल दिए॥4॥

श्री लक्ष्मण-सुमित्रा संवाद

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Shri Ramji, Laxmanji, Sitaji go to ask goodbye to Maharaj Dasharatha, Dasharathaji to convince Sitaji

Saying ‘Dear Ramji hai’, the minister picked up the king and made him sit. On seeing both the sons (ready for the forest) including Sita, the king was very distraught.

So On seeing the two beautiful sons, including Sita, the king leaves Akula and affectionately puts them on his heart.

The king is distraught, cannot speak. There is terrible grief in the heart from mourning. Then the hero of Raghukul, Shri Ramchandraji with great love turned his head and woke up and asked for farewell.

Because Hey daddy Bless and command me Why are you mourning at the time of joy? Hey Tat Due to the love of the beloved, doing pramad (error in duty) will continue to gain fame and condemnation in the world.

Because Hearing this, the king got up with affection and grabbed the arm of Shri Raghunathji and seated him and said – O Tat! So Listen, for you sages say that Shri Ram is the owner of the pasture.

So According to auspicious and inauspicious deeds, God gives thought in the heart and gives fruit, he who performs the work gets the same fruit. Because Such is the policy of Vedas, all of them say it.

(But the opposite is happening on this occasion,) If someone else commits the crime, and someone else suffers its fruits. Because God’s Leela is very strange, who is there in the world to know that?

The king thus took a lot of measures to keep Sri Ramachandra, leaving a trick, but when he saw the attitude of the religious, patient, and wise Shri Ramji and he did not know while he was living.

Then the king engaged Sitaji with his heart and gave a lot of education with great love. Because Saying the sadness of the forest as sorrow. Then explained the pleasures of the mother-in-law, father-in-law, and father (to be near).

But the mind of Sitaji was attached to the feet of Shri Ramchandraji, so he did not like the house, and neither did the forest feel terrible. Then all the people also explained the abundance of plagues in the forest and explained to Sitaji.

The wife of Minister Sumantraji and Arundhatiji, the lady of Guru Vashistha, and more clever women, with affection, says to the gentle voice that you (the king) have not given exile, so whatever father-in-law, guru, and mother-in-law say, you do the same.

Because Sitaji did not like hearing this soft, benevolent, sweet, and soft learning.Because (She became distraught in this way) As if the moon of the autumn moon had started to become confused.

So Sitaji hesitantly does not answer. Because After hearing these things Kaikeyi blushed. So He brought the clothes, jewelery (garland, mekhala, etc.) and utensils (kamandalu, etc.) of the sages and placed them in front of Shri Ramchandraji and said to the gentle voice-॥

Because Hey Raghuveer! So The king loves you like a life. So Bheeru (a lovingly weak heart) King will not leave modesty and affection! Virtue, beautiful fame, and the hereafter may be destroyed, but they will never tell you to go to the forest.

So Think of what you like and do it. Hearing the mother’s teachings, Shri Ramchandraji found (great) happiness, but the king felt these words as arrows. (They started thinking) Still, the unfortunate soul (why) did not come out!

So The king fainted, people are distraught. Because Nobody seems to know what to do. So Shri Ramchandraji immediately made a disguise for the Muni and left the parents with their heads.

 

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