अवतार के हेतु (रामचरितमानस)

अवतार के हेतु

सोरठा :

* सुनु सुभ कथा भवानि रामचरितमानस बिमल।
कहा भुसुंडि बखानि सुना बिहग नायक गरुड़॥120 ख॥

भावार्थ:-हे पार्वती! निर्मल रामचरितमानस की वह मंगलमयी कथा सुनो जिसे काकभुशुण्डि ने विस्तार से कहा और पक्षियों के राजा गरुड़जी ने सुना था॥120 (ख)॥

* सो संबाद उदार जेहि बिधि भा आगें कहब।
सुनहु राम अवतार चरति परम सुंदर अनघ॥120 ग॥
भावार्थ:-वह श्रेष्ठ संवाद जिस प्रकार हुआ, वह मैं आगे कहूँगा। अभी तुम श्री रामचन्द्रजी के अवतार का परम सुंदर और पवित्र (पापनाशक) चरित्र सुनो॥120(ग)॥
* हरि गुन नाम अपार कथा रूप अगनित अमित।
मैं निज मति अनुसार कहउँ उमा सादर सुनहु॥120 घ॥
भावार्थ:-श्री हरि के गुण, मान, कथा और रूप सभी अपार, अगणित और असीम हैं। फिर भी हे पार्वती! मैं अपनी बुद्धि के अनुसार कहता हूँ, तुम आदरपूर्वक सुनो॥120 (घ)॥
चौपाई :
* सुनु गिरिजा हरिचरित सुहाए। बिपुल बिसद निगमागम गाए॥
हरि अवतार हेतु जेहि होई। इदमित्थं कहि जाइ न सोई॥1॥
भावार्थ:-हे पार्वती! सुनो, वेद-शास्त्रों ने श्री हरि के सुंदर, विस्तृत और निर्मल चरित्रों का गान किया है। हरि का अवतार जिस कारण से होता है, वह कारण ‘बस यही है’ ऐसा नहीं कहा जा सकता (अनेकों कारण हो सकते हैं और ऐसे भी हो सकते हैं, जिन्हें कोई जान ही नहीं सकता)॥1॥
* राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी। मत हमार अस सुनहि सयानी॥
तदपि संत मुनि बेद पुराना। जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना॥2॥
भावार्थ:-हे सयानी! सुनो, हमारा मत तो यह है कि बुद्धि, मन और वाणी से श्री रामचन्द्रजी की तर्कना नहीं की जा सकती। तथापि संत, मुनि, वेद और पुराण अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार जैसा कुछ कहते हैं॥2॥
* तस मैं सुमुखि सुनावउँ तोही। समुझि परइ जस कारन मोही॥
जब जब होई धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी॥3॥
भावार्थ:-और जैसा कुछ मेरी समझ में आता है, हे सुमुखि! वही कारण मैं तुमको सुनाता हूँ। जब-जब धर्म का ह्रास होता है और नीच अभिमानी राक्षस बढ़ जाते हैं॥3॥
चौपाई :
* करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी॥
तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥4॥
भावार्थ:-और वे ऐसा अन्याय करते हैं कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता तथा ब्राह्मण, गो, देवता और पृथ्वी कष्ट पाते हैं, तब-तब वे कृपानिधान प्रभु भाँति-भाँति के (दिव्य) शरीर धारण कर सज्जनों की पीड़ा हरते हैं॥4॥
दोहा :
* असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु।
जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर हेतु॥121॥
भावार्थ:-वे असुरों को मारकर देवताओं को स्थापित करते हैं, अपने (श्वास रूप) वेदों की मर्यादा की रक्षा करते हैं और जगत में अपना निर्मल यश फैलाते हैं। श्री रामचन्द्रजी के अवतार का यह कारण है॥121॥
चौपाई :
* सोइ जस गाइ भगत भव तरहीं। कृपासिंधु जन हित तनु धरहीं॥
राम जनम के हेतु अनेका। परम बिचित्र एक तें एका॥1॥
भावार्थ:-उसी यश को गा-गाकर भक्तजन भवसागर से तर जाते हैं। कृपासागर भगवान भक्तों के हित के लिए शरीर धारण करते हैं। श्री रामचन्द्रजी के जन्म लेने के अनेक कारण हैं, जो एक से एक बढ़कर विचित्र हैं॥1॥
* जनम एक दुइ कहउँ बखानी। सावधान सुनु सुमति भवानी॥
द्वारपाल हरि के प्रिय दोऊ। जय अरु बिजय जान सब कोऊ॥2॥
भावार्थ:-हे सुंदर बुद्धि वाली भवानी! मैं उनके दो-एक जन्मों का विस्तार से वर्णन करता हूँ, तुम सावधान होकर सुनो। श्री हरि के जय और विजय दो प्यारे द्वारपाल हैं, जिनको सब कोई जानते हैं॥2॥
* बिप्र श्राप तें दूनउ भाई। तामस असुर देह तिन्ह पाई॥
कनककसिपु अरु हाटकलोचन। जगत बिदित सुरपति मद मोचन॥3॥
भावार्थ:-उन दोनों भाइयों ने ब्राह्मण (सनकादि) के शाप से असुरों का तामसी शरीर पाया। एक का नाम था हिरण्यकशिपु और दूसरे का हिरण्याक्ष। ये देवराज इन्द्र के गर्व को छुड़ाने वाले सारे जगत में प्रसिद्ध हुए॥3॥
* बिजई समर बीर बिख्याता। धरि बराह बपु एक निपाता॥
होइ नरहरि दूसर पुनि मारा। जन प्रहलाद सुजस बिस्तारा॥4॥
भावार्थ:-वे युद्ध में विजय पाने वाले विख्यात वीर थे। इनमें से एक (हिरण्याक्ष) को भगवान ने वराह (सूअर) का शरीर धारण करके मारा, फिर दूसरे (हिरण्यकशिपु) का नरसिंह रूप धारण करके वध किया और अपने भक्त प्रह्लाद का सुंदर यश फैलाया॥4॥
दोहा :
* भए निसाचर जाइ तेइ महाबीर बलवान।
कुंभकरन रावन सुभट सुर बिजई जग जान॥122॥
भावार्थ:-वे ही (दोनों) जाकर देवताओं को जीतने वाले तथा बड़े योद्धा, रावण और कुम्भकर्ण नामक बड़े बलवान और महावीर राक्षस हुए, जिन्हें सारा जगत जानता है॥122॥
चौपाई :
* मुकुत न भए हते भगवाना। तीनि जनम द्विज बचन प्रवाना॥
एक बार तिन्ह के हित लागी। धरेउ सरीर भगत अनुरागी॥1॥
भावार्थ:-भगवान के द्वारा मारे जाने पर भी वे (हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु) इसीलिए मुक्त नहीं हुए कि ब्राह्मण के वचन (शाप) का प्रमाण तीन जन्म के लिए था। अतः एक बार उनके कल्याण के लिए भक्तप्रेमी भगवान ने फिर अवतार लिया॥1॥
* कस्यप अदिति तहाँ पितु माता। दसरथ कौसल्या बिख्याता॥
एक कलप एहि बिधि अवतारा। चरित पवित्र किए संसारा॥2॥
भावार्थ:-वहाँ (उस अवतार में) कश्यप और अदिति उनके माता-पिता हुए, जो दशरथ और कौसल्या के नाम से प्रसिद्ध थे। एक कल्प में इस प्रकार अवतार लेकर उन्होंने संसार में पवित्र लीलाएँ कीं॥2॥
* एक कलप सुर देखि दुखारे। समर जलंधर सन सब हारे॥
संभु कीन्ह संग्राम अपारा। दनुज महाबल मरइ न मारा॥3॥
भावार्थ:-एक कल्प में सब देवताओं को जलन्धर दैत्य से युद्ध में हार जाने के कारण दुःखी देखकर शिवजी ने उसके साथ बड़ा घोर युद्ध किया, पर वह महाबली दैत्य मारे नहीं मरता था॥3॥
* परम सती असुराधिप नारी। तेहिं बल ताहि न जितहिं पुरारी॥4॥
भावार्थ:-उस दैत्यराज की स्त्री परम सती (बड़ी ही पतिव्रता) थी। उसी के प्रताप से त्रिपुरासुर (जैसे अजेय शत्रु) का विनाश करने वाले शिवजी भी उस दैत्य को नहीं जीत सके॥4॥
दोहा :
* छल करि टारेउ तासु ब्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह।
जब तेहिं जानेउ मरम तब श्राप कोप करि दीन्ह॥123॥
भावार्थ:-प्रभु ने छल से उस स्त्री का व्रत भंग कर देवताओं का काम किया। जब उस स्त्री ने यह भेद जाना, तब उसने क्रोध करके भगवान को शाप दिया॥123॥
चौपाई :
* तासु श्राप हरि दीन्ह प्रमाना। कौतुकनिधि कृपाल भगवाना॥
तहाँ जलंधर रावन भयऊ। रन हति राम परम पद दयऊ॥1॥
भावार्थ:-लीलाओं के भंडार कृपालु हरि ने उस स्त्री के शाप को प्रामाण्य दिया (स्वीकार किया)। वही जलन्धर उस कल्प में रावण हुआ, जिसे श्री रामचन्द्रजी ने युद्ध में मारकर परमपद दिया॥1॥
* एक जनम कर कारन एहा। जेहि लगि राम धरी नरदेहा॥
प्रति अवतार कथा प्रभु केरी। सुनु मुनि बरनी कबिन्ह घनेरी॥2॥
भावार्थ:-एक जन्म का कारण यह था, जिससे श्री रामचन्द्रजी ने मनुष्य देह धारण किया। हे भरद्वाज मुनि! सुनो, प्रभु के प्रत्येक अवतार की कथा का कवियों ने नाना प्रकार से वर्णन किया है॥2॥
* नारद श्राप दीन्ह एक बारा। कलप एक तेहि लगि अवतारा॥
गिरिजा चकित भईं सुनि बानी। नारद बिष्नुभगत पुनि ग्यानी॥3॥
भावार्थ:-एक बार नारदजी ने शाप दिया, अतः एक कल्प में उसके लिए अवतार हुआ। यह बात सुनकर पार्वतीजी बड़ी चकित हुईं (और बोलीं कि) नारदजी तो विष्णु भक्त और ज्ञानी हैं॥3॥
* कारन कवन श्राप मुनि दीन्हा। का अपराध रमापति कीन्हा॥
यह प्रसंग मोहि कहहु पुरारी। मुनि मन मोह आचरज भारी॥4॥
भावार्थ:-मुनि ने भगवान को शाप किस कारण से दिया। लक्ष्मीपति भगवान ने उनका क्या अपराध किया था? हे पुरारि (शंकरजी)! यह कथा मुझसे कहिए। मुनि नारद के मन में मोह होना बड़े आश्चर्य की बात है॥4॥
दोहा :
* बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोइ।
जेहि जस रघुपति करहिं जब सो तस तेहि छन होइ॥124 क॥
भावार्थ:-तब महादेवजी ने हँसकर कहा- न कोई ज्ञानी है न मूर्ख। श्री रघुनाथजी जब जिसको जैसा करते हैं, वह उसी क्षण वैसा ही हो जाता है॥124 (क)॥
सोरठा :
* कहउँ राम गुन गाथ भरद्वाज सादर सुनहु।
भव भंजन रघुनाथ भजु तुलसी तजि मान मद॥124 ख॥
भावार्थ:-(याज्ञवल्क्यजी कहते हैं-) हे भरद्वाज! मैं श्री रामचन्द्रजी के गुणों की कथा कहता हूँ, तुम आदर से सुनो। तुलसीदासजी कहते हैं- मान और मद को छोड़कर आवागमन का नाश करने वाले रघुनाथजी को भजो॥124 (ख)॥
चौपाई :
*हिमगिरि गुहा एक अति पावनि। बह समीप सुरसरी सुहावनि॥
आश्रम परम पुनीत सुहावा। देखि देवरिषि मन अति भावा॥1॥
भावार्थ:-हिमालय पर्वत में एक बड़ी पवित्र गुफा थी। उसके समीप ही सुंदर गंगाजी बहती थीं। वह परम पवित्र सुंदर आश्रम देखने पर नारदजी के मन को बहुत ही सुहावना लगा॥1॥
* निरखि सैल सरि बिपिन बिभागा। भयउ रमापति पद अनुरागा॥
सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी। सहज बिमल मन लागि समाधी॥2॥
भावार्थ:-पर्वत, नदी और वन के (सुंदर) विभागों को देखकर नादरजी का लक्ष्मीकांत भगवान के चरणों में प्रेम हो गया। भगवान का स्मरण करते ही उन (नारद मुनि) के शाप की (जो शाप उन्हें दक्ष प्रजापति ने दिया था और जिसके कारण वे एक स्थान पर नहीं ठहर सकते थे) गति रुक गई और मन के स्वाभाविक ही निर्मल होने से उनकी समाधि लग गई॥2॥
* मुनि गति देखि सुरेस डेराना। कामहि बोलि कीन्ह सनमाना॥
सहित सहाय जाहु मम हेतू। चलेउ हरषि हियँ जलचरकेतू॥3॥
भावार्थ:-नारद मुनि की (यह तपोमयी) स्थिति देखकर देवराज इंद्र डर गया। उसने कामदेव को बुलाकर उसका आदर-सत्कार किया (और कहा कि) मेरे (हित के) लिए तुम अपने सहायकों सहित (नारद की समाधि भंग करने को) जाओ। (यह सुनकर) मीनध्वज कामदेव मन में प्रसन्न होकर चला॥3॥
* सुनासीर मन महुँ असि त्रासा। चहत देवरिषि मम पुर बासा॥
जे कामी लोलुप जग माहीं। कुटिल काक इव सबहि डेराहीं॥4॥
भावार्थ:-इन्द्र के मन में यह डर हुआ कि देवर्षि नारद मेरी पुरी (अमरावती) का निवास (राज्य) चाहते हैं। जगत में जो कामी और लोभी होते हैं, वे कुटिल कौए की तरह सबसे डरते हैं॥4॥
दोहा :
* सूख हाड़ लै भाग सठ स्वान निरखि मृगराज।
छीनि लेइ जनि जान जड़ तिमि सुरपतिहि न लाज॥125॥
भावार्थ:-जैसे मूर्ख कुत्ता सिंह को देखकर सूखी हड्डी लेकर भागे और वह मूर्ख यह समझे कि कहीं उस हड्डी को सिंह छीन न ले, वैसे ही इन्द्र को (नारदजी मेरा राज्य छीन लेंगे, ऐसा सोचते) लाज नहीं आई॥125॥
चौपाई :
* तेहि आश्रमहिं मदन जब गयऊ। निज मायाँ बसंत निरमयऊ॥
कुसुमित बिबिध बिटप बहुरंगा। कूजहिं कोकिल गुंजहिं भृंगा॥1॥
भावार्थ:-जब कामदेव उस आश्रम में गया, तब उसने अपनी माया से वहाँ वसन्त ऋतु को उत्पन्न किया। तरह-तरह के वृक्षों पर रंग-बिरंगे फूल खिल गए, उन पर कोयलें कूकने लगीं और भौंरे गुंजार करने लगे॥1॥
* चली सुहावनि त्रिबिध बयारी। काम कृसानु बढ़ावनिहारी॥
रंभादिक सुर नारि नबीना। सकल असमसर कला प्रबीना॥2॥
भावार्थ:-कामाग्नि को भड़काने वाली तीन प्रकार की (शीतल, मंद और सुगंध) सुहावनी हवा चलने लगी। रम्भा आदि नवयुवती देवांगनाएँ, जो सब की सब कामकला में निपुण थीं,॥2॥
* करहिं गान बहु तान तरंगा। बहुबिधि क्रीड़हिं पानि पतंगा॥
देखि सहाय मदन हरषाना। कीन्हेसि पुनि प्रपंच बिधि नाना॥3॥
भावार्थ:-वे बहुत प्रकार की तानों की तरंग के साथ गाने लगीं और हाथ में गेंद लेकर नाना प्रकार के खेल खेलने लगीं। कामदेव अपने इन सहायकों को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और फिर उसने नाना प्रकार के मायाजाल किए॥3॥
* काम कला कछु मुनिहि न ब्यापी। निज भयँ डरेउ मनोभव पापी॥
सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासू। बड़ रखवार रमापति जासू॥4॥
भावार्थ:-परन्तु कामदेव की कोई भी कला मुनि पर असर न कर सकी। तब तो पापी कामदेव अपने ही (नाश के) भय से डर गया। लक्ष्मीपति भगवान जिसके बड़े रक्षक हों, भला, उसकी सीमा (मर्यादा) को कोई दबा सकता है? ॥4॥
दोहा :
* सहित सहाय सभीत अति मानि हारि मन मैन।
गहेसि जाइ मुनि चरन तब कहि सुठि आरत बैन॥126॥
भावार्थ:-तब अपने सहायकों समेत कामदेव ने बहुत डरकर और अपने मन में हार मानकर बहुत ही आर्त (दीन) वचन कहते हुए मुनि के चरणों को जा पकड़ा॥126॥
चौपाई :
* भयउ न नारद मन कछु रोषा। कहि प्रिय बचन काम परितोषा॥
नाइ चरन सिरु आयसु पाई। गयउ मदन तब सहित सहाई॥1॥
भावार्थ:-नारदजी के मन में कुछ भी क्रोध न आया। उन्होंने प्रिय वचन कहकर कामदेव का समाधान किया। तब मुनि के चरणों में सिर नवाकर और उनकी आज्ञा पाकर कामदेव अपने सहायकों सहित लौट गया॥1॥
दोहा :
* मुनि सुसीलता आपनि करनी। सुरपति सभाँ जाइ सब बरनी॥
सुनि सब कें मन अचरजु आवा। मुनिहि प्रसंसि हरिहि सिरु नावा॥2॥
भावार्थ:-देवराज इन्द्र की सभा में जाकर उसने मुनि की सुशीलता और अपनी करतूत सब कही, जिसे सुनकर सबके मन में आश्चर्य हुआ और उन्होंने मुनि की बड़ाई करके श्री हरि को सिर नवाया॥2॥
* तब नारद गवने सिव पाहीं। जिता काम अहमिति मन माहीं॥
मार चरति संकरहि सुनाए। अतिप्रिय जानि महेस सिखाए॥3॥
भावार्थ:- तब नारदजी शिवजी के पास गए। उनके मन में इस बात का अहंकार हो गया कि हमने कामदेव को जीत लिया। उन्होंने कामदेव के चरित्र शिवजी को सुनाए और महादेवजी ने उन (नारदजी) को अत्यन्त प्रिय जानकर (इस प्रकार) शिक्षा दी-॥3॥
* बार बार बिनवउँ मुनि तोही। जिमि यह कथा सुनायहु मोही॥
तिमि जनि हरिहि सुनावहु कबहूँ। चलेहुँ प्रसंग दुराएहु तबहूँ॥4॥
भावार्थ:-हे मुनि! मैं तुमसे बार-बार विनती करता हूँ कि जिस तरह यह कथा तुमने मुझे सुनाई है, उस तरह भगवान श्री हरि को कभी मत सुनाना। चर्चा भी चले तब भी इसको छिपा जाना॥4॥

Soratha:
* Sunu Subha Katha Bhawani Ramcharitmanas Bimal.
Said Bhusundi Bakhani Suna Bihag Nayak Garuda ॥120b॥
Sense: O Parvati! Listen to that Mangalmayi story of Nirmal Ramcharitmanas which Kakabhusundi told in detail and was heard by King of Birds Garudji ॥120 (b)॥
* So thank you generous kind of fire.
Sunhu Ram Avatar Charati Param Sundar Anagh ॥120 c
Sense: I will say the way the best dialogue happened. Now you hear the ultimate beautiful and holy (sinful) character of the incarnation of Shri Ramachandraji ग120 (c)॥
* Hari Gun Naam Apar Katha Roop Agnit Amit.
According to my personal opinion, I should say Uma Regards Sunhu ॥120 d
Bhartharth: – The qualities, values, stories and forms of Shri Hari are all immense, numberless and limitless. Still, Parvati! I say according to my wisdom, listen respectfully ॥120 (d)॥
Bunk:
* Sunu Girija Haricharit Suha. Bipul Bisad Nigmagam Sing॥
Hari became the incarnation for the incarnation. Idmitthi kahan ji na soi ॥1॥
Sense: O Parvati! Listen, the Vedas and scriptures have sung the beautiful, elaborate and serene character of Shri Hari. The reason for which the incarnation of Hari occurs is that ‘it is just that’ (it can be said that there are many reasons and there are others which one cannot know) ॥1॥
* Ram became irresistible in his mind. Mat Hamar as Sunhi Sayani
However, Saint Muni Bed Old. Jas kachhu kahin self-estimate अनुमान2॥
Meaning: O Sayani! Listen, our view is that Shri Ramchandraji cannot be reasoned with wisdom, mind and speech. However, as the saints, monks, Vedas and Puranas say according to their intelligence कुछ2॥
* Yes, I will listen to you Samuzhi parai jas karan mohi॥
Jab jab hoi dharam kai hani. Floodhin asura arrogant arrogant ॥3॥
Meaning: – And as I understand, O Sumukhi! I tell you the same reason. Whenever religion deteriorates and low arrogant demons increase ॥3॥
Bunk:
* Karhin Aniti Jai Nahin Barni. Sidhin Bipra Dhenu Sur Dharni॥
Then then Prabhu Dhari Bibidh Sarira. Harhin Kripanidhi Sajjan Peera ॥4॥
Bhartharth: – And they do injustice that cannot be described and the Brahmin, the cow, the deity and the earth suffer, then and then they suffer the suffering of the gentlemen by wearing the (divine) body of the obligatory Lord ॥4. 4
Doha:
* Asura Mari Thapahin Surnh Rakhin Nija Shruti Setu.
Jag Bistarahin Bisad like Ram to be born ॥121॥
Connotation: – They kill the Asuras and establish the Gods, protect the dignity of their (breathing form) Vedas and spread their pure fame in the world. This is the reason for the incarnation of Shri Ramchandraji ॥121॥
Bunk:
* Soi jis gai bhagat be there. Kripasindhu public interest diluted
Many for Ram Janam. The ultimate image is one ॥1॥
Meaning: – By singing the same fame, devotees get rid of Bhavsagar. Kripasagar bears a body for the benefit of the devotees. There are many reasons for taking birth of Shri Ramchandraji, which are more strange than one.
* Birth should be called a duo. Careful Sunu Sumati Bhavani
Dear dau of the gatekeeper Hari. Jai Aru Bijay Jaan Sab Kou ॥2॥
Sense: O beautiful Bhavani! I describe his two births in detail, listen carefully. Shri Hari’s Jai and Vijay are two lovely gatekeepers, whom everyone knows. ॥2॥
* Bipra curse, brother-in-law. Tamas Asura Deh Tinh Pai॥
Kanakkasipu Aru Hatkalochan. Jagit Bidit Surpati item redemption ॥3॥
Charity: – Both of these brothers got the ascetic body of the Asuras by the curse of the Brahmin (Sanakadi). One was named Hiranyakashipu and the other was Hiranyaksha. He became famous in the whole world, who redeemed the pride of Devraj Indra.
* Bijai Summer Bir Bichyata. Dhari Barah Bapu Ek Nipata॥
Hoi Narahari hit another shot. Jan Prahlada Sujas Bistara ॥4॥
Meaning: – He was a noted hero who won the war. One of these (Hiranyaksha) was killed by God wearing the body of Varaha (boar), then killed as the Narasimha form of the other (Hiranyakashipu) and spread the beautiful fame of his devotee Prahlada ॥4॥.
Doha:
* Brother Nisachar jai tei mahabir balwan.
Kumbhakaran Ravan Subhat Sur Bijai Jag Jaan ॥122॥
Spirituality: – They (both) went to conquer the gods and became great warriors, big powerful and great demons named Ravana and Kumbhakarna, whom the whole world knows. ॥122॥
Bunk:
* Mukut unafraid Teen janam dvij bachaana pravana॥
Once Tinh was interested. Dhareu Sarir Bhagat Anuragi ॥1॥
Bhaartarth: – Even after being killed by God, he (Hiranyaksha and Hiranyakashipu) was not liberated because the evidence of the Brahmin’s word (curse) was for three births. So once the devotee God incarnated again for his welfare अवतार1॥
* Kasyapa Aditi Taha Pitu Mata. Dasaratha kausalya bhakitya॥
A Kalap ehi Bidhi Avtara. The world sanctified ॥2॥
Bhavarth: – There (in that incarnation) Kashyapa and Aditi were his parents, who were known as Dasaratha and Kausalya. In one eon, he took holy incarnations in the world in such an incarnation. ॥2॥
* See a sad tone Summer Jalandhar sun all lost
Sambhu Keenh Sangram Apara. Danuj mahabal mari na mara ॥3॥
Spirituality: Seeing the grief of all the gods lost in battle in a battle to Jalandhar monster, Shivji fought a great battle with him, but he did not die due to Mahabali monster ॥3॥.
* Param Sati Asuradhip Nari. Tehin bal tahin jithin purari ॥4॥
Meaning: – The lady of that demon king was Param Sati (very pity). Even Shiva, who destroyed Tripurasura (like an invincible enemy) by his majesty, could not conquer that monster.
Doha:
* Trick kari tareu tasu brat prabhu sur karaj kineh.
When tehin janeu maram then curse curse dinh ॥123॥
Sense: Prabhu has done the deed by dissolving the woman’s fast with deceit.Soratha:
* Sunu Subha Katha Bhawani Ramcharitmanas Bimal.
Said Bhusundi Bakhani Suna Bihag Nayak Garuda ॥120b॥
Sense: O Parvati! Listen to that Mangalmayi story of Nirmal Ramcharitmanas which Kakabhusundi told in detail and was heard by King of Birds Garudji ॥120 (b)॥
* So thank you generous kind of fire.
Sunhu Ram Avatar Charati Param Sundar Anagh ॥120 c
Sense: I will say the way the best dialogue happened. Now you hear the ultimate beautiful and holy (sinful) character of the incarnation of Shri Ramachandraji ग120 (c)॥
* Hari Gun Naam Apar Katha Roop Agnit Amit.
According to my personal opinion, I should say Uma Regards Sunhu ॥120 d
Bhartharth: – The qualities, values, stories and forms of Shri Hari are all immense, numberless and limitless. Still, Parvati! I say according to my wisdom, listen respectfully ॥120 (d)॥
Bunk:
* Sunu Girija Haricharit Suha. Bipul Bisad Nigmagam Sing॥
Hari became the incarnation for the incarnation. Idmitthi kahan ji na soi ॥1॥
Sense: O Parvati! Listen, the Vedas and scriptures have sung the beautiful, elaborate and serene character of Shri Hari. The reason for which the incarnation of Hari occurs is that ‘it is just that’ (it can be said that there are many reasons and there are others which one cannot know) ॥1॥
* Ram became irresistible in his mind. Mat Hamar as Sunhi Sayani
However, Saint Muni Bed Old. Jas kachhu kahin self-estimate अनुमान2॥
Meaning: O Sayani! Listen, our view is that Shri Ramchandraji cannot be reasoned with wisdom, mind and speech. However, as the saints, monks, Vedas and Puranas say according to their intelligence कुछ2॥
* Yes, I will listen to you Samuzhi parai jas karan mohi॥
Jab jab hoi dharam kai hani. Floodhin asura arrogant arrogant ॥3॥
Meaning: – And as I understand, O Sumukhi! I tell you the same reason. Whenever religion deteriorates and low arrogant demons increase ॥3॥
Bunk:
* Karhin Aniti Jai Nahin Barni. Sidhin Bipra Dhenu Sur Dharni॥
Then then Prabhu Dhari Bibidh Sarira. Harhin Kripanidhi Sajjan Peera ॥4॥
Bhartharth: – And they do injustice that cannot be described and the Brahmin, the cow, the deity and the earth suffer, then and then they suffer the suffering of the gentlemen by wearing the (divine) body of the obligatory Lord ॥4. 4
Doha:
* Asura Mari Thapahin Surnh Rakhin Nija Shruti Setu.
Jag Bistarahin Bisad like Ram to be born ॥121॥
Connotation: – They kill the Asuras and establish the Gods, protect the dignity of their (breathing form) Vedas and spread their pure fame in the world. This is the reason for the incarnation of Shri Ramchandraji ॥121॥
Bunk:
* Soi jis gai bhagat be there. Kripasindhu public interest diluted
Many for Ram Janam. The ultimate image is one ॥1॥
Meaning: – By singing the same fame, devotees get rid of Bhavsagar. Kripasagar bears a body for the benefit of the devotees. There are many reasons for taking birth of Shri Ramchandraji, which are more strange than one.
* Birth should be called a duo. Careful Sunu Sumati Bhavani
Dear dau of the gatekeeper Hari. Jai Aru Bijay Jaan Sab Kou ॥2॥
Sense: O beautiful Bhavani! I describe his two births in detail, listen carefully. Shri Hari’s Jai and Vijay are two lovely gatekeepers, whom everyone knows. ॥2॥
* Bipra curse, brother-in-law. Tamas Asura Deh Tinh Pai॥
Kanakkasipu Aru Hatkalochan. Jagit Bidit Surpati item redemption ॥3॥
Charity: – Both of these brothers got the ascetic body of the Asuras by the curse of the Brahmin (Sanakadi). One was named Hiranyakashipu and the other was Hiranyaksha. He became famous in the whole world, who redeemed the pride of Devraj Indra.
* Bijai Summer Bir Bichyata. Dhari Barah Bapu Ek Nipata॥
Hoi Narahari hit another shot. Jan Prahlada Sujas Bistara ॥4॥
Meaning: – He was a noted hero who won the war. One of these (Hiranyaksha) was killed by God wearing the body of Varaha (boar), then killed as the Narasimha form of the other (Hiranyakashipu) and spread the beautiful fame of his devotee Prahlada ॥4॥.
Doha:
* Brother Nisachar jai tei mahabir balwan.
Kumbhakaran Ravan Subhat Sur Bijai Jag Jaan ॥122॥
Spirituality: – They (both) went to conquer the gods and became great warriors, big powerful and great demons named Ravana and Kumbhakarna, whom the whole world knows. ॥122॥
Bunk:
* Mukut unafraid Teen janam dvij bachaana pravana॥
Once Tinh was interested. Dhareu Sarir Bhagat Anuragi ॥1॥
Bhaartarth: – Even after being killed by God, he (Hiranyaksha and Hiranyakashipu) was not liberated because the evidence of the Brahmin’s word (curse) was for three births. So once the devotee God incarnated again for his welfare अवतार1॥
* Kasyapa Aditi Taha Pitu Mata. Dasaratha kausalya bhakitya॥
A Kalap ehi Bidhi Avtara. The world sanctified ॥2॥
Bhavarth: – There (in that incarnation) Kashyapa and Aditi were his parents, who were known as Dasaratha and Kausalya. In one eon, he took holy incarnations in the world in such an incarnation. ॥2॥
* See a sad tone Summer Jalandhar sun all lost
Sambhu Keenh Sangram Apara. Danuj mahabal mari na mara ॥3॥
Spirituality: Seeing the grief of all the gods lost in battle in a battle to Jalandhar monster, Shivji fought a great battle with him, but he did not die due to Mahabali monster ॥3॥.
* Param Sati Asuradhip Nari. Tehin bal tahin jithin purari ॥4॥
Meaning: – The lady of that demon king was Param Sati (very pity). Even Shiva, who destroyed Tripurasura (like an invincible enemy) by his majesty, could not conquer that monster.
Doha:
* Trick kari tareu tasu brat prabhu sur karaj kineh.
When tehin janeu maram then curse curse dinh ॥123॥
Sense: Prabhu has done the deed by dissolving the woman’s fast with deceit….After getting the orders, Kamadev returned with his helpers.
Doha:
* Performing monoliths. Go to Surpati Sabha
Sun is the heart of all Munihi Prasansi Harihi Siru Nava ॥2॥
Meaning: Going to the assembly of Devraj Indra, he said the goodness of Muni and all his actions, which was astonishing in everyone’s mind and he praised Muni and gave Shri Hari a head ॥2॥
* Then Narada lost his seat. Jita kaam ahmiti man mahan॥
Mara charati narrated Teach the beloved John Mahes ॥3॥
Bhaartarth: – Then Naradji went to Shiva. He had an ego in his mind that we had conquered Cupid. He narrated the character of Kamdev to Shiva and Mahadevji taught him (Naradji) very dearly (thus).
* Again and again I am a monk. Jimi narrated this story
Timi ji harihi sunaavhu kahbuh Chalehun Durayehu Tabu ॥4॥
Sense: O monk! I plead with you again and again that never tell the story to Lord Shri Hari as you have told me this story. Even if the discussion goes on, it should be hidden ॥4॥
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