कवि वंदना राम चरित मानस बालकाण्ड तुलसीदास जी द्वारा

कवि वंदना

कवि वंदना- चरन कमल बंदउँ तिन्ह केरे। पुरवहुँ सकल मनोरथ मेरे॥
कलि के कबिन्ह करउँ परनामा। जिन्ह बरने रघुपति गुन ग्रामा॥2॥
भावार्थ:-मैं उन सब (श्रेष्ठ कवियों) के चरणकमलों में प्रणाम करता हूँ, वे मेरे सब मनोरथों को पूरा करें। कलियुग के भी उन कवियों को मैं प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने श्री रघुनाथजी के गुण समूहों का वर्णन किया है॥2॥
* जे प्राकृत कबि परम सयाने। भाषाँ जिन्ह हरि चरित बखाने॥
भए जे अहहिं जे होइहहिं आगें। प्रनवउँ सबहि कपट सब त्यागें॥3॥

खल वंदना राम चरित मानस बालकाण्ड पढ़े विस्तार से

भावार्थ:-जो बड़े बुद्धिमान प्राकृत कवि हैं, जिन्होंने भाषा में हरि चरित्रों का वर्णन किया है, जो ऐसे कवि पहले हो चुके हैं, जो इस समय वर्तमान हैं और जो आगे होंगे, उन सबको मैं सारा कपट त्यागकर प्रणाम करता हूँ॥3॥
* होहु प्रसन्न देहु बरदानू। साधु समाज भनिति सनमानू॥
जो प्रबंध बुध नहिं आदरहीं। सो श्रम बादि बाल कबि करहीं॥4॥
भावार्थ:-आप सब प्रसन्न होकर यह वरदान दीजिए कि साधु समाज में मेरी कविता का सम्मान हो, क्योंकि बुद्धिमान लोग जिस कविता का आदर नहीं करते, मूर्ख कवि ही उसकी रचना का व्यर्थ परिश्रम करते हैं॥4॥

–  तुलसीदासजी की दीनता और राम भक्तिमयी कविता की महिमा

* कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई॥
राम सुकीरति भनिति भदेसा। असमंजस अस मोहि अँदेसा॥5॥
भावार्थ:-कीर्ति, कविता और सम्पत्ति वही उत्तम है, जो गंगाजी की तरह सबका हित करने वाली हो। श्री रामचन्द्रजी की कीर्ति तो बड़ी सुंदर (सबका अनन्त कल्याण करने वाली ही) है, परन्तु मेरी कविता भद्दी है। यह असामंजस्य है (अर्थात इन दोनों का मेल नहीं मिलता), इसी की मुझे चिन्ता है॥5॥
* तुम्हरी कृपाँ सुलभ सोउ मोरे। सिअनि सुहावनि टाट पटोरे॥6॥
भावार्थ:-परन्तु हे कवियों! आपकी कृपा से यह बात भी मेरे लिए सुलभ हो सकती है। रेशम की सिलाई टाट पर भी सुहावनी लगती है॥6॥
दोहा :
* सरल कबित कीरति बिमल सोइ आदरहिं सुजान।
सहज बयर बिसराइ रिपु जो सुनि करहिं बखान॥14 क॥

–  रामरूप से जीवमात्र की वंदना रामचरितमानस

भावार्थ:-चतुर पुरुष उसी कविता का आदर करते हैं, जो सरल हो और जिसमें निर्मल चरित्र का वर्णन हो तथा जिसे सुनकर शत्रु भी स्वाभाविक बैर को भूलकर सराहना करने लगें॥14 (क)॥
सो न होई बिनु बिमल मति मोहि मति बल अति थोर।
करहु कृपा हरि जस कहउँ पुनि पुनि करउँ निहोर॥14 ख॥
भावार्थ:-ऐसी कविता बिना निर्मल बुद्धि के होती नहीं और मेरी बुद्धि का बल बहुत ही थोड़ा है, इसलिए बार-बार निहोरा करता हूँ कि हे कवियों! आप कृपा करें, जिससे मैं हरि यश का वर्णन कर सकूँ॥14 (ख)॥
* कबि कोबिद रघुबर चरित मानस मंजु मराल।
बालबिनय सुनि सुरुचि लखि मो पर होहु कृपाल॥14 ग॥
भावार्थ:-कवि और पण्डितगण! आप जो रामचरित्र रूपी मानसरोवर के सुंदर हंस हैं, मुझ बालक की विनती सुनकर और सुंदर रुचि देखकर मुझ पर कृपा करें॥14 (ग)॥

Poet vandana

* Charan Kamal Bandoon My perfect desire
I should do the deeds of Kali Those whom Raghupati Gunam Gramma ॥2॥

Sense: I salute all of them (great poets) at their feet, they fulfill all my wishes. I salute those poets of Kali Yuga who have described the virtues of Shri Raghunathji. ॥2॥

* J Prakrit Kabi Param Sayan. Languages ​​that have been written
Brother, please fire Proudly renounce all fraud ॥3॥

Bharath: – I am a very intelligent Prakrit poet who has described Hari characters in the language, those poets who have been present, who are present at this time, and those who will be ahead, I salute all the hypocrisy. ॥3॥

* Hohu Prasad Dehu Bardanu. Sadhu Samaj Bhaniti Sanmanu॥
Which is not the arrangement for Mercury. Therefore, do not spend time without labor ॥4॥

Meaning: Give me a boon that you are happy, that my poetry should be respected in the Sadhu Samaj, because wise people do not respect the poem, only foolish poets work in vain for its creation.

* Kirti Bhaniti Bhuti Bhali Bhai Soi. Where is everything like happiness?
Ram Sukirati Bhaniti Bhadesa. Confusion as Mohi Andesa ॥5॥

Connotation: – Kirti, poetry and wealth are the best, which will benefit everyone like Gangaji. Shri Ramachandraji’s fame is very beautiful (for the eternal welfare of all), but my poem is ugly. This is incompatible (ie these two do not match), that is why I worry ॥5॥

* Your kindness Sulabh Soo More. Sian Suhavni Tate Patore ॥6॥
Meaning: – But O poets! By your grace this thing can also be accessible to me. Silk stitching also looks beautiful ॥6॥
Doha:
* Saral Kabit Kirti Bimal Soi Aadharhin Sujan.
Sahaj Byar Bisrai Ripu Jo Sunni Karhin Bakhan ॥14

Connotation: -Such men respect the same poem, which is simple and which describes the serene character, and listening to which the enemy also forgets the natural hatred and begins to appreciate ॥14 (a)॥

So Hoi Binu Bimal Mati Mohi Mati Bal Ator Thor.
Oh God, please tell me how I will do it again.

Meaning: – Such a poem is not without pure intellect and the strength of my intellect is very little, so I repeatedly stare those O poets! May you please, so that I can describe Harishya. ॥14 (b)॥

* Kabi Kobid Raghubar Charit Manas Manju Maral.
Balbini Suni Suruchi Lakhi Mo on Hohu Kripal ॥14 c

Meaning: – Poets and Pundits! You who are the beautiful Hans of Ramasritra as Manasarovar, please be kind to me after listening to my child’s plea and seeing a beautiful interest (14 (c)॥

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