श्री राम-लक्ष्मण का जनकपुर निरीक्षण

श्री राम-लक्ष्मण का जनकपुर निरीक्षण

दोहा :
* जाइ देखि आवहु नगरु सुख निधान दोउ भाइ।
करहु सुफल सब के नयन सुंदर बदन देखाइ॥218॥
भावार्थ:-सुख के निधान दोनों भाई जाकर नगर देख आओ। अपने सुंदर मुख दिखलाकर सब (नगर निवासियों) के नेत्रों को सफल करो॥218॥
चौपाई :
* मुनि पद कमल बंदि दोउ भ्राता। चले लोक लोचन सुख दाता॥
बालक बृंद देखि अति सोभा। लगे संग लोचन मनु लोभा॥1॥
भावार्थ:-सब लोकों के नेत्रों को सुख देने वाले दोनों भाई मुनि के चरणकमलों की वंदना करके चले। बालकों के झुंड इन (के सौंदर्य) की अत्यन्त शोभा देखकर साथ लग गए। उनके नेत्र और मन (इनकी माधुरी पर) लुभा गए॥1॥
* पीत बसन परिकर कटि भाथा। चारु चाप सर सोहत हाथा॥
तन अनुहरत सुचंदन खोरी। स्यामल गौर मनोहर जोरी॥2॥
भावार्थ:-(दोनों भाइयों के) पीले रंग के वस्त्र हैं, कमर के (पीले) दुपट्टों में तरकस बँधे हैं। हाथों में सुंदर धनुष-बाण सुशोभित हैं। (श्याम और गौर वर्ण के) शरीरों के अनुकूल (अर्थात्‌ जिस पर जिस रंग का चंदन अधिक फबे उस पर उसी रंग के) सुंदर चंदन की खौर लगी है। साँवरे और गोरे (रंग) की मनोहर जोड़ी है॥2॥
* केहरि कंधर बाहु बिसाला। उर अति रुचिर नागमनि माला॥
सुभग सोन सरसीरुह लोचन। बदन मयंक तापत्रय मोचन॥3॥
भावार्थ:-सिंह के समान (पुष्ट) गर्दन (गले का पिछला भाग) है, विशाल भुजाएँ हैं। (चौड़ी) छाती पर अत्यन्त सुंदर गजमुक्ता की माला है। सुंदर लाल कमल के समान नेत्र हैं। तीनों तापों से छुड़ाने वाला चन्द्रमा के समान मुख है॥3॥
* कानन्हि कनक फूल छबि देहीं। चितवत चितहि चोरि जनु लेहीं॥
चितवनि चारु भृकुटि बर बाँकी। तिलक रेख सोभा जनु चाँकी॥4॥
भावार्थ:-कानों में सोने के कर्णफूल (अत्यन्त) शोभा दे रहे हैं और देखते ही (देखने वाले के) चित्त को मानो चुरा लेते हैं। उनकी चितवन (दृष्टि) बड़ी मनोहर है और भौंहें तिरछी एवं सुंदर हैं। (माथे पर) तिलक की रेखाएँ ऐसी सुंदर हैं, मानो (मूर्तिमती) शोभा पर मुहर लगा दी गई है॥4॥
दोहा :
* रुचिर चौतनीं सुभग सिर मेचक कुंचित केस।
नख सिख सुंदर बंधु दोउ सोभा सकल सुदेस॥219॥
भावार्थ:-सिर पर सुंदर चौकोनी टोपियाँ (दिए) हैं, काले और घुँघराले बाल हैं। दोनों भाई नख से लेकर शिखा तक (एड़ी से चोटी तक) सुंदर हैं और सारी शोभा जहाँ जैसी चाहिए वैसी ही है॥219॥
चौपाई :
* देखन नगरु भूपसुत आए। समाचार पुरबासिन्ह पाए॥
धाए धाम काम सब त्यागी। मनहुँ रंक निधि लूटन लागी॥1॥
भावार्थ:-जब पुरवासियों ने यह समाचार पाया कि दोनों राजकुमार नगर देखने के लिए आए हैं, तब वे सब घर-बार और सब काम-काज छोड़कर ऐसे दौड़े मानो दरिद्री (धन का) खजाना लूटने दौड़े हों॥1॥
* निरखि सहज सुंदर दोउ भाई। होहिं सुखी लोचन फल पाई॥
जुबतीं भवन झरोखन्हि लागीं। निरखहिं राम रूप अनुरागीं॥2॥
भावार्थ:-स्वभाव ही से सुंदर दोनों भाइयों को देखकर वे लोग नेत्रों का फल पाकर सुखी हो रहे हैं। युवती स्त्रियाँ घर के झरोखों से लगी हुई प्रेम सहित श्री रामचन्द्रजी के रूप को देख रही हैं॥2॥
* कहहिं परसपर बचन सप्रीती। सखि इन्ह कोटि काम छबि जीती॥
सुर नर असुर नाग मुनि माहीं। सोभा असि कहुँ सुनिअति नाहीं॥3॥
भावार्थ:-वे आपस में बड़े प्रेम से बातें कर रही हैं- हे सखी! इन्होंने करोड़ों कामदेवों की छबि को जीत लिया है। देवता, मनुष्य, असुर, नाग और मुनियों में ऐसी शोभा तो कहीं सुनने में भी नहीं आती॥3॥
* बिष्नु चारि भुज बिधि मुख चारी। बिकट बेष मुख पंच पुरारी॥
अपर देउ अस कोउ ना आही। यह छबि सखी पटतरिअ जाही॥4॥
भावार्थ:-भगवान विष्णु के चार भुजाएँ हैं, ब्रह्माजी के चार मुख हैं, शिवजी का विकट (भयानक) वेष है और उनके पाँच मुँह हैं। हे सखी! दूसरा देवता भी कोई ऐसा नहीं है, जिसके साथ इस छबि की उपमा दी जाए॥4॥
दोहा :
* बय किसोर सुषमा सदन स्याम गौर सुख धाम।
अंग अंग पर वारिअहिं कोटि कोटि सत काम॥220॥
भावार्थ:-इनकी किशोर अवस्था है, ये सुंदरता के घर, साँवले और गोरे रंग के तथा सुख के धाम हैं। इनके अंग-अंग पर करोड़ों-अरबों कामदेवों को निछावर कर देना चाहिए॥220॥
चौपाई :
* कहहु सखी अस को तनु धारी। जो न मोह यह रूप निहारी॥
कोउ सप्रेम बोली मृदु बानी। जो मैं सुना सो सुनहु सयानी॥1॥
भावार्थ:-हे सखी! (भला) कहो तो ऐसा कौन शरीरधारी होगा, जो इस रूप को देखकर मोहित न हो जाए (अर्थात यह रूप जड़-चेतन सबको मोहित करने वाला है)। (तब) कोई दूसरी सखी प्रेम सहित कोमल वाणी से बोली- हे सयानी! मैंने जो सुना है उसे सुनो-॥1॥
* ए दोऊ दसरथ के ढोटा। बाल मरालन्हि के कल जोटा॥
मुनि कौसिक मख के रखवारे। जिन्ह रन अजिर निसाचर मारे॥2॥
भावार्थ:-ये दोनों (राजकुमार) महाराज दशरथजी के पुत्र हैं! बाल राजहंसों का सा सुंदर जोड़ा है। ये मुनि विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा करने वाले हैं, इन्होंने युद्ध के मैदान में राक्षसों को मारा है॥2॥
* स्याम गात कल कंज बिलोचन। जो मारीच सुभुज मदु मोचन॥
कौसल्या सुत सो सुख खानी। नामु रामु धनु सायक पानी॥3॥
भावार्थ:-जिनका श्याम शरीर और सुंदर कमल जैसे नेत्र हैं, जो मारीच और सुबाहु के मद को चूर करने वाले और सुख की खान हैं और जो हाथ में धनुष-बाण लिए हुए हैं, वे कौसल्याजी के पुत्र हैं, इनका नाम राम है॥3॥
* गौर किसोर बेषु बर काछें। कर सर चाप राम के पाछें॥
लछिमनु नामु राम लघु भ्राता। सुनु सखि तासु सुमित्रा माता॥4॥
भावार्थ:-जिनका रंग गोरा और किशोर अवस्था है और जो सुंदर वेष बनाए और हाथ में धनुष-बाण लिए श्री रामजी के पीछे-पीछे चल रहे हैं, वे इनके छोटे भाई हैं, उनका नाम लक्ष्मण है। हे सखी! सुनो, उनकी माता सुमित्रा हैं॥4॥
दोहा :
* बिप्रकाजु करि बंधु दोउ मग मुनिबधू उधारि।
आए देखन चापमख सुनि हरषीं सब नारि॥221॥
भावार्थ:-दोनों भाई ब्राह्मण विश्वामित्र का काम करके और रास्ते में मुनि गौतम की स्त्री अहल्या का उद्धार करके यहाँ धनुषयज्ञ देखने आए हैं। यह सुनकर सब स्त्रियाँ प्रसन्न हुईं॥221॥
चौपाई :
* देखि राम छबि कोउ एक कहई। जोगु जानकिहि यह बरु अहई॥
जौं सखि इन्हहि देख नरनाहू। पन परिहरि हठि करइ बिबाहू॥1॥
भावार्थ:-श्री रामचन्द्रजी की छबि देखकर कोई एक (दूसरी सखी) कहने लगी- यह वर जानकी के योग्य है। हे सखी! यदि कहीं राजा इन्हें देख ले, तो प्रतिज्ञा छोड़कर हठपूर्वक इन्हीं से विवाह कर देगा॥1॥
* कोउ कह ए भूपति पहिचाने। मुनि समेत सादर सनमाने॥
सखि परंतु पनु राउ न तजई। बिधि बस हठि अबिबेकहि भजई॥2॥
भावार्थ:-किसी ने कहा- राजा ने इन्हें पहचान लिया है और मुनि के सहित इनका आदरपूर्वक सम्मान किया है, परंतु हे सखी! राजा अपना प्रण नहीं छोड़ता। वह होनहार के वशीभूत होकर हठपूर्वक अविवेक का ही आश्रय लिए हुए हैं (प्रण पर अड़े रहने की मूर्खता नहीं छोड़ता)॥2॥
* कोउ कह जौं भल अहइ बिधाता। सब कहँ सुनिअ उचित फल दाता॥
तौ जानकिहि मिलिहि बरु एहू। नाहिन आलि इहाँ संदेहू॥3॥
भावार्थ:-कोई कहती है- यदि विधाता भले हैं और सुना जाता है कि वे सबको उचित फल देते हैं, तो जानकीजी को यही वर मिलेगा। हे सखी! इसमें संदेह नहीं है॥3॥
* जौं बिधि बस अस बनै सँजोगू। तौ कृतकृत्य होइ सब लोगू॥
सखि हमरें आरति अति तातें। कबहुँक ए आवहिं एहि नातें॥4॥
भावार्थ:-जो दैवयोग से ऐसा संयोग बन जाए, तो हम सब लोग कृतार्थ हो जाएँ। हे सखी! मेरे तो इसी से इतनी अधिक आतुरता हो रही है कि इसी नाते कभी ये यहाँ आवेंगे॥4॥
दोहा :
* नाहिं त हम कहुँ सुनहु सखि इन्ह कर दरसनु दूरि।
यह संघटु तब होइ जब पुन्य पुराकृत भूरि॥222॥
भावार्थ:-नहीं तो (विवाह न हुआ तो) हे सखी! सुनो, हमको इनके दर्शन दुर्लभ हैं। यह संयोग तभी हो सकता है, जब हमारे पूर्वजन्मों के बहुत पुण्य हों॥222॥
चौपाई :
* बोली अपर कहेहु सखि नीका। एहिं बिआह अति हित सबही का।
कोउ कह संकर चाप कठोरा। ए स्यामल मृदु गात किसोरा॥1॥
भावार्थ:-दूसरी ने कहा- हे सखी! तुमने बहुत अच्छा कहा। इस विवाह से सभी का परम हित है। किसी ने कहा- शंकरजी का धनुष कठोर है और ये साँवले राजकुमार कोमल शरीर के बालक हैं॥1॥
* सबु असमंजस अहइ सयानी। यह सुनि अपर कहइ मृदु बानी॥
सखि इन्ह कहँ कोउ कोउ अस कहहीं। बड़ प्रभाउ देखत लघु अहहीं॥2॥
भावार्थ:-हे सयानी! सब असमंजस ही है। यह सुनकर दूसरी सखी कोमल वाणी से कहने लगी- हे सखी! इनके संबंध में कोई-कोई ऐसा कहते हैं कि ये देखने में तो छोटे हैं, पर इनका प्रभाव बहुत बड़ा है॥2॥
* परसि जासु पद पंकज धूरी। तरी अहल्या कृत अघ भूरी॥
सो कि रहिहि बिनु सिव धनु तोरें। यह प्रतीति परिहरिअ न भोरें॥3॥
भावार्थ:-जिनके चरणकमलों की धूलि का स्पर्श पाकर अहल्या तर गई, जिसने बड़ा भारी पाप किया था, वे क्या शिवजी का धनुष बिना तोड़े रहेंगे। इस विश्वास को भूलकर भी नहीं छोड़ना चाहिए॥3॥
* जेहिं बिरंचि रचि सीय सँवारी। तेहिं स्यामल बरु रचेउ बिचारी॥
तासु बचन सुनि सब हरषानीं। ऐसेइ होउ कहहिं मृदु बानीं॥4॥
भावार्थ:-जिस ब्रह्मा ने सीता को सँवारकर (बड़ी चतुराई से) रचा है, उसी ने विचार कर साँवला वर भी रच रखा है। उसके ये वचन सुनकर सब हर्षित हुईं और कोमल वाणी से कहने लगीं- ऐसा ही हो॥4॥
दोहा :वाली स्त्रियाँ समूह की समूह हृदय में हर्षित होकर फूल बरसा रही हैं। जहाँ-जहाँ दोनों भाई जाते हैं, वहाँ-वहाँ परम आनंद छा जाता है॥223॥
चौपाई :
* पुर पूरब दिसि गे दोउ भाई। जहँ धनुमख हित भूमि बनाई॥
अति बिस्तार चारु गच ढारी। बिमल बेदिका रुचिर सँवारी॥1॥
भावार्थ:-दोनों भाई नगर के पूरब ओर गए, जहाँ धनुषयज्ञ के लिए (रंग) भूमि बनाई गई थी। बहुत लंबा-चौड़ा सुंदर ढाला हुआ पक्का आँगन था, जिस पर सुंदर और निर्मल वेदी सजाई गई थी॥1॥
* चहुँ दिसि कंचन मंच बिसाला। रचे जहाँ बैठहिं महिपाला॥
तेहि पाछें समीप चहुँ पासा। अपर मंच मंडली बिलासा॥2॥
भावार्थ:-चारों ओर सोने के बड़े-बड़े मंच बने थे, जिन पर राजा लोग बैठेंगे। उनके पीछे समीप ही चारों ओर दूसरे मचानों का मंडलाकार घेरा सुशोभित था॥2॥
* कछुक ऊँचि सब भाँति सुहाई। बैठहिं नगर लोग जहँ जाई॥
तिन्ह के निकट बिसाल सुहाए। धवल धाम बहुबरन बनाए॥3॥
भावार्थ:-वह कुछ ऊँचा था और सब प्रकार से सुंदर था, जहाँ जाकर नगर के लोग बैठेंगे। उन्हीं के पास विशाल एवं सुंदर सफेद मकान अनेक रंगों के बनाए गए हैं॥3॥
* जहँ बैठें देखहिं सब नारी। जथाजोगु निज कुल अनुहारी॥
पुर बालक कहि कहि मृदु बचना। सादर प्रभुहि देखावहिं रचना॥4॥
भावार्थ:-जहाँ अपने-अपने कुल के अनुसार सब स्त्रियाँ यथायोग्य (जिसको जहाँ बैठना उचित है) बैठकर देखेंगी। नगर के बालक कोमल वचन कह-कहकर आदरपूर्वक प्रभु श्री रामचन्द्रजी को (यज्ञशाला की) रचना दिखला रहे हैं॥4॥
दोहा :
* सब सिसु एहि मिस प्रेमबस परसि मनोहर गात।
तन पुलकहिं अति हरषु हियँ देखि देखि दोउ भ्रात॥224॥
भावार्थ:-सब बालक इसी बहाने प्रेम के वश में होकर श्री रामजी के मनोहर अंगों को छूकर शरीर से पुलकित हो रहे हैं और दोनों भाइयों को देख-देखकर उनके हृदय में अत्यन्त हर्ष हो रहा है॥224॥
चौपाई :
* सिसु सब राम प्रेमबस जाने। प्रीति समेत निकेत बखाने॥
निज निज रुचि सब लेहिं बोलाई। सहित सनेह जाहिं दोउ भाई॥1॥
भावार्थ:-श्री रामचन्द्रजी ने सब बालकों को प्रेम के वश जानकर (यज्ञभूमि के) स्थानों की प्रेमपूर्वक प्रशंसा की। (इससे बालकों का उत्साह, आनंद और प्रेम और भी बढ़ गया, जिससे) वे सब अपनी-अपनी रुचि के अनुसार उन्हें बुला लेते हैं और (प्रत्येक के बुलाने पर) दोनों भाई प्रेम सहित उनके पास चले जाते हैं॥1॥
* राम देखावहिं अनुजहि रचना। कहि मृदु मधुर मनोहर बचना॥
लव निमेष महुँ भुवन निकाया। रचइ जासु अनुसासन माया॥2॥
भावार्थ:-कोमल, मधुर और मनोहर वचन कहकर श्री रामजी अपने छोटे भाई लक्ष्मण को (यज्ञभूमि की) रचना दिखलाते हैं। जिनकी आज्ञा पाकर माया लव निमेष (पलक गिरने के चौथाई समय) में ब्रह्माण्डों के समूह रच डालती है,॥2॥
*भगति हेतु सोइ दीनदयाला। चितवत चकित धनुष मखसाला॥
कौतुक देखि चले गुरु पाहीं। जानि बिलंबु त्रास मन माहीं॥3॥
भावार्थ:-वही दीनों पर दया करने वाले श्री रामजी भक्ति के कारण धनुष यज्ञ शाला को चकित होकर (आश्चर्य के साथ) देख रहे हैं। इस प्रकार सब कौतुक (विचित्र रचना) देखकर वे गुरु के पास चले। देर हुई जानकर उनके मन में डर है॥3॥
* जासु त्रास डर कहुँ डर होई। भजन प्रभाउ देखावत सोई॥
कहि बातें मृदु मधुर सुहाईं। किए बिदा बालक बरिआईं॥4॥
भावार्थ:-जिनके भय से डर को भी डर लगता है, वही प्रभु भजन का प्रभाव (जिसके कारण ऐसे महान प्रभु भी भय का नाट्य करते हैं) दिखला रहे हैं। उन्होंने कोमल, मधुर और सुंदर बातें कहकर बालकों को जबर्दस्ती विदा किया॥4॥
दोहा :
* सभय सप्रेम बिनीत अति सकुच सहित दोउ भाइ।
गुर पद पंकज नाइ सिर बैठे आयसु पाइ॥225॥
भावार्थ:-फिर भय, प्रेम, विनय और बड़े संकोच के साथ दोनों भाई गुरु के चरण कमलों में सिर नवाकर आज्ञा पाकर बैठे॥225॥
चौपाई :
* निसि प्रबेस मुनि आयसु दीन्हा। सबहीं संध्याबंदनु कीन्हा॥
कहत कथा इतिहास पुरानी। रुचिर रजनि जुग जाम सिरानी॥1॥
भावार्थ:-रात्रि का प्रवेश होते ही (संध्या के समय) मुनि ने आज्ञा दी, तब सबने संध्यावंदन किया। फिर प्राचीन कथाएँ तथा इतिहास कहते-कहते सुंदर रात्रि दो पहर बीत गई॥1॥
* मुनिबर सयन कीन्हि तब जाई। लगे चरन चापन दोउ भाई॥
जिन्ह के चरन सरोरुह लागी। करत बिबिध जप जोग बिरागी॥2॥
भावार्थ:-तब श्रेष्ठ मुनि ने जाकर शयन किया। दोनों भाई उनके चरण दबाने लगे, जिनके चरण कमलों के (दर्शन एवं स्पर्श के) लिए वैराग्यवान्‌ पुरुष भी भाँति-भाँति के जप और योग करते हैं॥2॥
*तेइ दोउ बंधु प्रेम जनु जीते। गुर पद कमल पलोटत प्रीते॥
बार बार मुनि अग्या दीन्ही। रघुबर जाइ सयन तब कीन्ही॥3॥
भावार्थ:-वे ही दोनों भाई मानो प्रेम से जीते हुए प्रेमपूर्वक गुरुजी के चरण कमलों को दबा रहे हैं। मुनि ने बार-बार आज्ञा दी, तब श्री रघुनाथजी ने जाकर शयन किया॥3॥
* चापत चरन लखनु उर लाएँ। सभय सप्रेम परम सचु पाएँ॥
पुनि पुनि प्रभु कह सोवहु ताता। पौढ़े धरि उर पद जलजाता॥4॥
भावार्थ:-श्री रामजी के चरणों को हृदय से लगाकर भय और प्रेम सहित परम सुख का अनुभव करते हुए लक्ष्मणजी उनको दबा रहे हैं। प्रभु श्री रामचन्द्रजी ने बार-बार कहा- हे तात! (अब) सो जाओ। तब वे उन चरण कमलों को हृदय में धरकर लेटे रहे॥4॥

अहल्या उद्धार | श्री रामचरितमानस बालकाण्ड

भगवान्‌ का वरदान श्री रामचरितमानस बालकाण्ड

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Janakpur inspection of Shri Ram-Laxman

Doha:
* Look, you look like a happy city
Karhu Sufal Sab Ke Nayan Sundar Badan Dekhi ॥218॥
Meaning: Sukh’s brothers and brothers go to see the city. Make the eyes of all (city dwellers) successful by showing your beautiful face ॥218॥
Bunk:
* Muni padam kamali bandi do bhrata. Chale lok lochan pleasures donor
Watching the child grow very well. Lage Sang Lochan Manu Lobha ॥1॥
Sense: Both the brothers who gave happiness to the eyes of all the people went to worship the monk’s feet. The flocks of children came together seeing the great beauty of these (beauty of). His eye and mind (on his madhuri) wooed ॥1॥
* Peet Basan Parikar Kati Bhatha. Charu chap sir sohat hatha
Tan Anurat Suchandan Khoury. Syamal Gaur Manohar Jori ॥2॥
Meaning: – (of both brothers) are yellow clothes, tied in waist (yellow) scarves. Beautiful bow and arrow in the hands are adorned. (Shyam and Gaur varna) friendly to the bodies (ie, the color of which the sandalwood is more full, the color of that color) has beautiful sandalwood hoof. A beautiful pair of amber and white (color) is ॥2॥
* Kehari Kandhar Bahu Bisala. Ur very dainty Nagmani Mala॥
Subhag Son Sarsiruh Lochan. Badan Mayank Tapatray Redemption ॥3॥
Sense: Has the same (athletic) neck (the back part of the neck), has huge arms. There is a very beautiful gajmukta garland on the (wide) chest. They have eyes similar to the beautiful red lotus. One who is free from all three temperatures is like a moon ॥3॥.
* Kanhi Kanak Phool Chhabhi Chitwat Chiti Chori Janu Lehi॥
Chitwani Charu Bhrkuti Bari. Tilak Rekha Sobha Janu Chanki ॥4॥
Sense: In the ears, gold earrings are very (very) beautiful and as soon as they see (the viewer) steals the mind. His Chitwan (vision) is very beautiful and eyebrows are oblique and beautiful. The lines of tilak (on the forehead) are such beautiful, as if the (idolatry) beauty has been sealed ॥4॥
Doha:
* Ruchir Chautin Subhabh head mechak malnourished case.
Nakh Sikh Sundar Bandhu Dow Sobha Sakal Sudes ॥219॥
Sense: There are beautiful square hats (lamps) on the head, black and curly hair. Both brothers are beautiful from fingernail to shikha (from heel to peak) and all the beauty is the way they want ॥219॥
Bunk:
* Dekhan Nagaru came to Bhupasut. Get news stories
Dhame dham kam sab tyagi. Manu Ranchi fund looting took place ॥1॥
Meaning: When the priests found the news that both the princes had come to see the city, then they all left the house and all the work, as if they had run to rob the treasury (of wealth) 1॥.
* Absolutely comfortable beautiful brother. Hohhi Dry Lochan Fruit Pie॥
Zubati Bhawan came to Jharokhanhi. Nirkhhin Ram Roop Anuragi ं2॥
Sense: Looking at both the beautiful brothers by nature, they are happy with the fruit of their eyes. Young women looking at the form of Shri Ramchandraji with love attached to the windows of the house ॥2॥
* Say Bachpan Sapriti on the other side. It won a lot of work
Sur male asura nag muni mahe Sobha Asi Kahun Suniyati na ॥3॥
Meaning: – They are talking with each other with great love- O friend! He has won the image of crores of Cupids. God, humans, asuras, serpents and sages do not have such beauty in hearing anywhere.
* Bishnu Chari Bhuj Bidhi Mukh Chari. Biket Baish Mukh Pancha Purari
Upper deus as kou na ahi. This image is going to be तर4॥
Connotation: – Lord Vishnu has four arms, Brahmaji has four faces, Shiva has a terrible (terrible) rash and has five faces. Hey friend! There is also no other god with whom this image is given. ॥4॥
Doha:
* By Kisor Sushma Sadan Syam Gaur Sukh Dham.
Warrior class quality work on organ part ॥220॥
Meaning: It is a teenage age, it is a house of beauty, of dark and white, and a place of happiness. Millions and billions of Cupids should be thrown on their parts अंग220॥
Bunk:
* Kahhu sakhi asa to tanu. Jo na na moh roop nihari॥
Kou felt love spoken softly. Whatever I heard, Sunhu Sayani ॥1॥
Meaning: O friend! (Good), then who would be a bodily being who would not be fascinated by seeing this form (that is, this form is going to fascinate everyone – consciously). (Then) someone said with a gentle voice, with some kind of love, O Sayani! Listen to what i heard -1॥
* A Dhow Dhota of Dasaratha. Pluck up tomorrow of Bal Maralanhi
Maintenance of Muni Kausik Makh. Whom runs Ajir Nisachar killed ॥2॥
Bhaartarth: -They are both (prince) sons of Maharaj Dasarathaji! Hair is a beautiful pair of flamingos. These munis are the protectors of Vishwamitra’s yajna, they have killed the demons in the battlefield ॥2॥
* Syam Gat Kal Kanj Bilochan. Joe Marich Subhujun Madu Mochan
Kausalya Sut So pleasures Namu Ramu Dhanu Saik Pani ॥3॥
Bhartharth: – who has eyes like Shyam body and beautiful lotus, who crushes the items of Maricha and Subahu and is a mine of happiness and those who hold a bow and arrow in hand, are the sons of Kausalyaji, his name is Ram. 3॥
* Gaur Kisor Beshu Barh Kaanchon. Kar sir chap ram ki pichha
Lachhimanu Namu Ram Short Brother. Sunu Sakhi Tasu Sumitra Mata ॥4॥
Meaning: – The color is fair and juvenile and those who make beautiful clothes and are following Sri Ramji with bow and arrow in their hands are their younger brothers, their name is Laxman. Hey friend! Listen, his mother is Sumitra ॥4॥
Doha:
* Biprakaju Karri Bandhu Dow Mag Munibadhu Lending.
Aaye dekhan chapmakh suni harshiin sub nari ॥221॥
Meaning: – Both brothers have come here to see Dhanushagya by performing the work of Brahmin Vishwamitra and rescuing Ahalya, the wife of Muni Gautama on the way. Hearing this, all the women were happy ॥221॥
Bunk:
* See, Ram, Chhabi Kou is a story. Jogu Janakihi Ye Baru Ahai
Narnahu looked at them as soon as possible. Panahri Hathi Biabahu ू1॥
Meaning: Mr. RamchandSeeing the image of Raji, one (second friend) started saying – This groom is worthy of Janaki. Hey friend! If the king sees them, he will leave the vow and stubbornly marry them.
* Kou kah e Bhupathi Pahichene. Regards, including the Muni
Sakhi but panu rau tajai Bidhi Bus Hathi Abibhekhi Bhajai ॥2॥
Meaning: Someone said – The king has recognized them and respected them respectfully, including the sage, but hey friend! The king does not give up his vow. He has taken the shelter of unintentional obstinacy by subjugating the promising (does not leave the foolishness to remain firm on the pran) ॥2॥
* Kau kahan jaun bhal ahi bidata All you have to do is give proper fruits.
Tou janakihi milihi baru ehu. Nahin aali ihan shakuu ॥3॥
Meaning: Someone says – If the creator is good and it is heard that they give proper results to everyone, then Janaki ji will get this groom. Hey friend! There is no doubt ॥3॥
* Jawan Bidhi is just like Banjogu. Everyone is grateful to you.
Very few of our friends. Qabhunk e aawah eh nahin naan ॥4॥
Meaning: If we become such a coincidence with divine help, then we all become grateful. Hey friend! I am getting so much anger from this, that is why they will come here sometime ॥4॥
Doha:
* Naahinit hum kahun suhhu sakhi inh kar darsnu duri.
This issue occurred when the Punya Puranic Bhuri ॥222॥
Sense: No (if not married) O friend! Listen, we have rare sightings of them. This coincidence can only happen when our past lives are very virtuous ॥222॥
Bunk:
* Boli apar kahehu sakhi nika. This is the best interest of all
Kou saying hybrid arc Kathora. A Syamal soft Gata Kisora ​​॥1॥
Meaning: – The second said – O friend! You said very well Everyone has the ultimate interest in this marriage. Somebody said- Shankarji’s bow is hard and these dark prince are children of soft body. ॥1॥
* Sabu Asmanjas Ahai Sayani. This Suni Upper said softly
Say these, kou kou ko ase Bad Prabhau see miniature 2॥
Meaning: O Sayani! Everything is confusing. Hearing this, another friend started saying with a soft voice – O friend! In relation to them, some say that they are small in appearance, but their influence is very big. ॥2॥
* Parsi Jasu Pad Pankaj Dhuri. Tari ahalya
So that Rhihi binu siv dhoon Do not forget this belief ॥3॥
Meaning: – Those whose feet touched the dust of the feet, Ahalya sat down, who had committed a great sin, will they keep Shivaji’s bow without breaking it. Do not forget this belief and leave it ॥3॥
* Jahin Biranchi Siya Sanwari. Tehin Syamal Baru Racheu Bichari
Tasu bachan suni sabhi harshani Aisse Ho Ho Kahin Bani Bani ॥4॥
Meaning: – The one who Brahma has created (cleverly) by grooming Sita, he has also thoughtfully created a dark bride. Hearing his words, everyone was delighted and started saying with a soft voice – let it be so.
Doha:
* Hi Harshahin Barshahin Suman Sumukhi Sulochani Brind.
Jahin Jahan Jahan Bandhu Dow Tah Tah Tah Bliss ॥223॥
Meaning: – Women with beautiful faces and beautiful eyes are blossoming flowers in the group’s heart. Wherever both brothers go, there is absolute joy everywhere ॥223॥
Bunk:
* Puri, this is the former brother. Where Sagittarius is a land of interest.
Extreme bed Charu Gach Dhari Bimal Bedika Ruchir Sanwari ॥1॥
Meaning: – Both brothers went to the east of the city, where the (color) land was made for Dhanushyagya. There was a very long, beautiful, paved courtyard, on which the beautiful and serene altar was decorated ॥1॥
* All this Kanchan Manch Bisala. Create a place where Mahipala sits
There is a lot of dice near you. Upper Stage Circle Bilasa ॥2॥
Sense: There were big platforms of gold on which four people would sit. A circle of other scaffolds was adorned around them ॥2॥
* Tortoise high People sit in the city wherever they go.
Besal swell near Tinh. Dhawal Dham Bahubaran Created ॥3॥
Sense: It was high and beautiful in every way, where the people of the city would sit. Near them, huge and beautiful white houses are made of many colors ॥3॥.
* Sit where all women are. Jathajogu nij kul anuhari॥
Poor child, say, avoid being soft. Best regards Prabhuhi Dekhwahin Creation ॥4॥
Sense: Wherever according to their clan, all women will sit and watch as appropriate (where it is appropriate to sit). The children of the city are showing respectfully to Lord Shri Ramchandraji (of the sacrificial fire) by saying soft words ॥4॥.
Doha:
* Sab sisu ehi miss premab parsi manohar gaat.
Tan Pulkahin is very passionate.
Meaning: All the children are being seduced by the body on the pretext of love by touching the beautiful organs of Shri Ramji and seeing both brothers, they are very happy in their heart.
Bunk:
* Sisu sab rama prembas jane. Niket Bakhane with Preity
Everyone said his personal interest. Including Sneh Jahin Dow Bhai ॥1॥
Meaning: Shri Ramchandraji lovingly praised the places (of the yagya bhoomi) knowing all the children under the control of love. (This increases the enthusiasm, joy and love of the boys even more, by which they all call them according to their own interest and (on the call of each one) both brothers turn to them with love ॥1॥
* Ram Dekhavahi Anujahi composition. Say soft, sweet and pleasant escape
Love Nimesh Mahu Bhuvan Jassu Anusasan Maya ॥2॥
Meaning: Saying soft, sweet and pleasant words, Shri Ramji shows his younger brother Lakshman (of Yajna Bhoomi) creation. On whose orders Maya creates groups of universes in Love Nimesh (quarter time of eyelid fall), ॥2॥.
* Soi Deendayala for Bhagi. Chitwat amazed Dhanush Makhsala॥
Seeing the curiosity, the master could not get there Jani Bilambu Tragedy Man हीं3॥
Meaning: – Shocked to Dhanush Yagya school due to devotion to Shri Ramji, who had pity on the same dayWith) watching. Seeing all the Kautukas (strange creation), they went to the Guru. Fear in their mind knowing that it is late ॥3॥
* Jaasu Tragedy Afraid I am afraid Bhajan Prabhau Dekhwat Soi॥
Sayed soft things softly. Bida Bada Baani Baariyan ॥4॥
Connotation: – The fear of which fear is also afraid, the effect of the Lord’s Bhajan (due to which such great God also plays the fear) is showing. He forced the children to say good, sweet and beautiful things. ॥4॥
Doha:
* Brother brother, with all the sympathy, Bineet very confident.
Gur Pad Pankaj Nai head sitting Ayasu Pi ॥225॥
Meaning: – Then, with fear, love, humility and great hesitation, both the brothers sat in the Guru’s feet lotus and sat with their permission ॥225॥.
Bunk:
* Nisi Prabas Muni Ayasu Dinha. All the evening evening
Kahat Katha history is old. Ruchir Rajni Jug Jam Sirani ॥1॥
Sense: At the time of entering the night (at dusk), the monk gave orders, then everyone did the ceremony. Then ancient stories and history say – beautiful night passed at two o’clock ॥1॥
* Munibar Sayan Kainhi went then. Lage Charan Chapan Doo Bhai 4
Those of whom Charan Saroruh Karat Bibidh Chanting Jog Biragi ॥2॥
Meaning: Then the superior sage went and slept. Both brothers started pressing their feet, whose feet for their lotus (vision and touch), even the disinterested men chant and yoga like ॥2॥.
* Tei Dow brothers win Prem Janu. Gur Pad Kamal Palotat Preet 4
Repeatedly Muni Agya Dinhi. Raghubar ji sion then what was ॥3॥
Meaning: Both of them, as if living with love, are lovingly suppressing the lotus feet of Guruji. Muni repeatedly gave orders, then Shri Raghunathji went and slept.
* Bring Chapat Charan Lakhanu Ur. May the true love be the ultimate truth.
Puni puni lord ka sowohu taata4॥
Meaning: Laxmanji is suppressing Shri Ramji’s feet with heart and feeling the ultimate happiness with fear and love. Lord Shri Ramchandraji repeatedly said – O Tat! (Now go to sleep. Then he kept those step lotuses in the heart and kept them ॥4॥.

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