शिवजी का विवाह बालकाण्ड रामचरितमानस

शिवजी का विवाह

दोहा :
* मुनि अनुसासन गनपतिहि पूजेउ संभु भवानि।
कोउ सुनि संसय करै जनि सुर अनादि जियँ जानि॥100॥
भावार्थ:-मुनियों की आज्ञा से शिवजी और पार्वतीजी ने गणेशजी का पूजन किया। मन में देवताओं को अनादि समझकर कोई इस बात को सुनकर शंका न करे (कि गणेशजी तो शिव-पार्वती की संतान हैं, अभी विवाह से पूर्व ही वे कहाँ से आ गए?)॥100॥
चौपाई :
* जसि बिबाह कै बिधि श्रुति गाई। महामुनिन्ह सो सब करवाई॥
गहि गिरीस कुस कन्या पानी। भवहि समरपीं जानि भवानी॥1॥
भावार्थ:-वेदों में विवाह की जैसी रीति कही गई है, महामुनियों ने वह सभी रीति करवाई। पर्वतराज हिमाचल ने हाथ में कुश लेकर तथा कन्या का हाथ पकड़कर उन्हें भवानी (शिवपत्नी) जानकर शिवजी को समर्पण किया॥1॥
* पानिग्रहन जब कीन्ह महेसा। हियँ हरषे तब सकल सुरेसा॥
बेदमन्त्र मुनिबर उच्चरहीं। जय जय जय संकर सुर करहीं॥2॥
भावार्थ:-जब महेश्वर (शिवजी) ने पार्वती का पाणिग्रहण किया, तब (इन्द्रादि) सब देवता हृदय में बड़े ही हर्षित हुए। श्रेष्ठ मुनिगण वेदमंत्रों का उच्चारण करने लगे और देवगण शिवजी का जय-जयकार करने लगे॥2॥
* बाजहिं बाजन बिबिध बिधाना। सुमनबृष्टि नभ भै बिधि नाना॥
हर गिरिजा कर भयउ बिबाहू। सकल भुवन भरि रहा उछाहू॥3॥
भावार्थ:-अनेकों प्रकार के बाजे बजने लगे। आकाश से नाना प्रकार के फूलों की वर्षा हुई। शिव-पार्वती का विवाह हो गया। सारे ब्राह्माण्ड में आनंद भर गया॥3॥
* दासीं दास तुरग रथ नागा। धेनु बसन मनि बस्तु बिभागा॥
अन्न कनकभाजन भरि जाना। दाइज दीन्ह न जाइ बखाना॥4॥
भावार्थ:-दासी, दास, रथ, घोड़े, हाथी, गायें, वस्त्र और मणि आदि अनेक प्रकार की चीजें, अन्न तथा सोने के बर्तन गाड़ियों में लदवाकर दहेज में दिए, जिनका वर्णन नहीं हो सकता॥4॥
छन्द :
* दाइज दियो बहु भाँति पुनि कर जोरि हिमभूधर कह्यो।
का देउँ पूरनकाम संकर चरन पंकज गहि रह्यो॥
सिवँ कृपासागर ससुर कर संतोषु सब भाँतिहिं कियो।
पुनि गहे पद पाथोज मयनाँ प्रेम परिपूरन हियो॥
भावार्थ:-बहुत प्रकार का दहेज देकर, फिर हाथ जोड़कर हिमाचल ने कहा- हे शंकर! आप पूर्णकाम हैं, मैं आपको क्या दे सकता हूँ? (इतना कहकर) वे शिवजी के चरणकमल पकड़कर रह गए। तब कृपा के सागर शिवजी ने अपने ससुर का सभी प्रकार से समाधान किया। फिर प्रेम से परिपूर्ण हृदय मैनाजी ने शिवजी के चरण कमल पकड़े (और कहा-)।
दोहा :
* नाथ उमा मम प्रान सम गृहकिंकरी करेहु।
छमेहु सकल अपराध अब होइ प्रसन्न बरु देहु॥101॥
भावार्थ:-हे नाथ! यह उमा मुझे मेरे प्राणों के समान (प्यारी) है। आप इसे अपने घर की टहलनी बनाइएगा और इसके सब अपराधों को क्षमा करते रहिएगा। अब प्रसन्न होकर मुझे यही वर दीजिए॥101॥
चौपाई :
* बहु बिधि संभु सासु समुझाई। गवनी भवन चरन सिरु नाई॥
जननीं उमा बोलि तब लीन्ही। लै उछंग सुंदर सिख दीन्ही॥1॥
भावार्थ:-शिवजी ने बहुत तरह से अपनी सास को समझाया। तब वे शिवजी के चरणों में सिर नवाकर घर गईं। फिर माता ने पार्वती को बुला लिया और गोद में बिठाकर यह सुंदर सीख दी-॥1॥
* करेहु सदा संकर पद पूजा। नारिधरमु पति देउ न दूजा॥
बचन कहत भरे लोचन बारी। बहुरि लाइ उर लीन्हि कुमारी॥2॥
भावार्थ:-हे पार्वती! तू सदाशिवजी के चरणों की पूजा करना, नारियों का यही धर्म है। उनके लिए पति ही देवता है और कोई देवता नहीं है। इस प्रकार की बातें कहते-कहते उनकी आँखों में आँसू भर आए और उन्होंने कन्या को छाती से चिपटा लिया॥2॥
* कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहूँ सुखु नाहीं॥
भै अति प्रेम बिकल महतारी। धीरजु कीन्ह कुसमय बिचारी॥3॥
भावार्थ:-(फिर बोलीं कि) विधाता ने जगत में स्त्री जाति को क्यों पैदा किया? पराधीन को सपने में भी सुख नहीं मिलता। यों कहती हुई माता प्रेम में अत्यन्त विकल हो गईं, परन्तु कुसमय जानकर (दुःख करने का अवसर न जानकर) उन्होंने धीरज धरा॥3॥
* पुनि पुनि मिलति परति गहि चरना। परम प्रेमु कछु जाइ न बरना॥
सब नारिन्ह मिलि भेंटि भवानी। जाइ जननि उर पुनि लपटानी॥4॥
भावार्थ:-मैना बार-बार मिलती हैं और (पार्वती के) चरणों को पकड़कर गिर पड़ती हैं। बड़ा ही प्रेम है, कुछ वर्णन नहीं किया जाता। भवानी सब स्त्रियों से मिल-भेंटकर फिर अपनी माता के हृदय से जा लिपटीं॥4॥
छन्द :
* जननिहि बहुरि मिलि चली उचित असीस सब काहूँ दईं।
फिरि फिरि बिलोकति मातु तन तब सखीं लै सिव पहिं गईं॥
जाचक सकल संतोषि संकरु उमा सहित भवन चले।
सब अमर हरषे सुमन बरषि निसान नभ बाजे भले॥
भावार्थ:-पार्वतीजी माता से फिर मिलकर चलीं, सब किसी ने उन्हें योग्य आशीर्वाद दिए। पार्वतीजी फिर-फिरकर माता की ओर देखती जाती थीं। तब सखियाँ उन्हें शिवजी के पास ले गईं। महादेवजी सब याचकों को संतुष्ट कर पार्वती के साथ घर (कैलास) को चले। सब देवता प्रसन्न होकर फूलों की वर्षा करने लगे और आकाश में सुंदर नगाड़े बजाने लगे।
दोहा :
* चले संग हिमवंतु तब पहुँचावन अति हेतु।
बिबिध भाँति परितोषु करि बिदा कीन्ह बृषकेतु॥102॥
भावार्थ:-तब हिमवान्‌ अत्यन्त प्रेम से शिवजी को पहुँचाने के लिए साथ चले। वृषकेतु (शिवजी) ने बहुत तरह से उन्हें संतोष कराकर विदा किया॥102॥
चौपाई :
* तुरत भवन आए गिरिराई। सकल सैल सर लिए बोलाई॥
आदर दान बिनय बहुमाना। सब कर बिदा कीन्ह हिमवाना॥1॥
भावार्थ:-पर्वतराज हिमाचल तुरंत घर आए और उन्होंने सब पर्वतों और सरोवरों को बुलाया। हिमवान ने आदर, दान, विनय और बहुत सम्मानपूर्वक सबकी विदाई की॥1॥
* जबहिं संभु कैलासहिं आए। सुर सब निज निज लोक सिधाए॥
जगत मातु पितु संभु भवानी। तेहिं सिंगारु न कहउँ बखानी॥2॥
भावार्थ:-जब शिवजी कैलास पर्वत पर पहुँचे, तब सब देवता अपने-अपने लोकों को चले गए। (तुलसीदासजी कहते हैं कि) पार्वतीजी और शिवजी जगत के माता-पिता हैं, इसलिए मैं उनके श्रृंगार का वर्णन नहीं करता॥2॥
* करहिं बिबिध बिधि भोग बिलासा। गनन्ह समेत बसहिं कैलासा॥
हर गिरिजा बिहार नित नयऊ। एहि बिधि बिपुल काल चलि गयऊ॥3॥
भावार्थ:-शिव-पार्वती विविध प्रकार के भोग-विलास करते हुए अपने गणों सहित कैलास पर रहने लगे। वे नित्य नए विहार करते थे। इस प्रकार बहुत समय बीत गया॥3॥
* जब जनमेउ षटबदन कुमारा। तारकु असुरु समर जेहिं मारा॥
आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। षन्मुख जन्मु सकल जग जाना॥4॥
भावार्थ:-तब छ: मुखवाले पुत्र (स्वामिकार्तिक) का जन्म हुआ, जिन्होंने (बड़े होने पर) युद्ध में तारकासुर को मारा। वेद, शास्त्र और पुराणों में स्वामिकार्तिक के जन्म की कथा प्रसिद्ध है और सारा जगत उसे जानता है॥4॥
छन्द :
* जगु जान षन्मुख जन्मु कर्मु प्रतापु पुरुषारथु महा।
तेहि हेतु मैं बृषकेतु सुत कर चरित संछेपहिं कहा॥
यह उमा संभु बिबाहु जे नर नारि कहहिं जे गावहीं।
कल्यान काज बिबाह मंगल सर्बदा सुखु पावहीं॥
भावार्थ:-षडानन (स्वामिकार्तिक) के जन्म, कर्म, प्रताप और महान पुरुषार्थ को सारा जगत जानता है, इसलिए मैंने वृषकेतु (शिवजी) के पुत्र का चरित्र संक्षेप में ही कहा है। शिव-पार्वती के विवाह की इस कथा को जो स्त्री-पुरुष कहेंगे और गाएँगे, वे कल्याण के कार्यों और विवाहादि मंगलों में सदा सुख पाएँगे।
दोहा :
* चरित सिंधु गिरिजा रमन बेद न पावहिं पारु।
बरनै तुलसीदासु किमि अति मतिमंद गवाँरु॥103॥
भावार्थ:-गिरिजापति महादेवजी का चरित्र समुद्र के समान (अपार) है, उसका पार वेद भी नहीं पाते। तब अत्यन्त मन्दबुद्धि और गँवार तुलसीदास उसका वर्णन कैसे कर सकता है? ॥103॥
चौपाई :
* संभु चरित सुनि सरस सुहावा। भरद्वाज मुनि अति सुखु पावा॥
बहु लालसा कथा पर बाढ़ी। नयनन्हि नीरु रोमावलि ठाढ़ी॥1॥
भावार्थ:-शिवजी के रसीले और सुहावने चरित्र को सुनकर मुनि भरद्वाजजी ने बहुत ही सुख पाया। कथा सुनने की उनकी लालसा बहुत बढ़ गई। नेत्रों में जल भर आया तथा रोमावली खड़ी हो गई॥1॥
* प्रेम बिबस मुख आव न बानी। दसा देखि हरषे मुनि ग्यानी॥
अहो धन्य तब जन्मु मुनीसा। तुम्हहि प्रान सम प्रिय गौरीसा॥2॥
भावार्थ:-वे प्रेम में मुग्ध हो गए, मुख से वाणी नहीं निकलती। उनकी यह दशा देखकर ज्ञानी मुनि याज्ञवल्क्य बहुत प्रसन्न हुए (और बोले-) हे मुनीश! अहा हा! तुम्हारा जन्म धन्य है, तुमको गौरीपति शिवजी प्राणों के समान प्रिय हैं॥2॥
* सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं। रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं॥
बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू। राम भगत कर लच्छन एहू॥3॥
भावार्थ:-शिवजी के चरण कमलों में जिनकी प्रीति नहीं है, वे श्री रामचन्द्रजी को स्वप्न में भी अच्छे नहीं लगते। विश्वनाथ श्री शिवजी के चरणों में निष्कपट (विशुद्ध) प्रेम होना यही रामभक्त का लक्षण है॥3॥
* सिव सम को रघुपति ब्रतधारी। बिनु अघ तजी सती असि नारी॥
पनु करि रघुपति भगति देखाई। को सिव सम रामहि प्रिय भाई॥4॥
भावार्थ:-शिवजी के समान रघुनाथजी (की भक्ति) का व्रत धारण करने वाला कौन है? जिन्होंने बिना ही पाप के सती जैसी स्त्री को त्याग दिया और प्रतिज्ञा करके श्री रघुनाथजी की भक्ति को दिखा दिया। हे भाई! श्री रामचन्द्रजी को शिवजी के समान और कौन प्यारा है?॥4॥
दोहा :
* प्रथमहिं मैं कहि सिव चरित बूझा मरमु तुम्हार।
सुचि सेवक तुम्ह राम के रहित समस्त बिकार॥104॥
भावार्थ:-मैंने पहले ही शिवजी का चरित्र कहकर तुम्हारा भेद समझ लिया। तुम श्री रामचन्द्रजी के पवित्र सेवक हो और समस्त दोषों से रहित हो॥104॥
चौपाई :
*मैं जाना तुम्हार गुन सीला। कहउँ सुनहु अब रघुपति लीला॥
सुनु मुनि आजु समागम तोरें। कहि न जाइ जस सुखु मन मोरें॥1॥
भावार्थ:-मैंने तुम्हारा गुण और शील जान लिया। अब मैं श्री रघुनाथजी की लीला कहता हूँ, सुनो। हे मुनि! सुनो, आज तुम्हारे मिलने से मेरे मन में जो आनंद हुआ है, वह कहा नहीं जा सकता॥1॥
*राम चरित अति अमित मुनीसा। कहि न सकहिं सत कोटि अहीसा॥
तदपि जथाश्रुत कहउँ बखानी। सुमिरि गिरापति प्रभु धनुपानी॥2॥
भावार्थ:-हे मुनीश्वर! रामचरित्र अत्यन्त अपार है। सौ करोड़ शेषजी भी उसे नहीं कह सकते। तथापि जैसा मैंने सुना है, वैसा वाणी के स्वामी (प्रेरक) और हाथ में धनुष लिए हुए प्रभु श्री रामचन्द्रजी का स्मरण करके कहता हूँ॥2॥
*सारद दारुनारि सम स्वामी। रामु सूत्रधर अंतरजामी॥
जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कबि उर अजिर नचावहिं बानी॥3॥
भावार्थ:-सरस्वतीजी कठपुतली के समान हैं और अन्तर्यामी स्वामी श्री रामचन्द्रजी (सूत पकड़कर कठपुतली को नचाने वाले) सूत्रधार हैं। अपना भक्त जानकर जिस कवि पर वे कृपा करते हैं, उसके हृदय रूपी आँगन में सरस्वती को वे नचाया करते हैं॥3॥
* प्रनवउँ सोइ कृपाल रघुनाथा। बरनउँ बिसद तासु गुन गाथा॥
परम रम्य गिरिबरु कैलासू। सदा जहाँ सिव उमा निवासू॥4॥
भावार्थ:-उन्हीं कृपालु श्री रघुनाथजी को मैं प्रणाम करता हूँ और उन्हीं के निर्मल गुणों की कथा कहता हूँ। कैलास पर्वतों में श्रेष्ठ और बहुत ही रमणीय है, जहाँ शिव-पार्वतीजी सदा निवास करते हैं॥4॥
दोहा :
* सिद्ध तपोधन जोगिजन सुर किंनर मुनिबृंद।
बसहिं तहाँ सुकृती सकल सेवहिं सिव सुखकंद॥105॥
भावार्थ:-सिद्ध, तपस्वी, योगीगण, देवता, किन्नर और मुनियों के समूह उस पर्वत पर रहते हैं। वे सब बड़े पुण्यात्मा हैं और आनंदकन्द श्री महादेवजी की सेवा करते हैं॥105॥
चौपाई :
* हरि हर बिमुख धर्म रति नाहीं। ते नर तहँ सपनेहुँ नहिं जाहीं॥
तेहि गिरि पर बट बिटप बिसाला। नित नूतन सुंदर सब काला॥1॥
भावार्थ:-जो भगवान विष्णु और महादेवजी से विमुख हैं और जिनकी धर्म में प्रीति नहीं है, वे लोग स्वप्न में भी वहाँ नहीं जा सकते। उस पर्वत पर एक विशाल बरगद का पेड़ है, जो नित्य नवीन और सब काल (छहों ऋतुओं) में सुंदर रहता है॥1॥
* त्रिबिध समीर सुसीतलि छाया। सिव बिश्राम बिटप श्रुति गाया॥
एक बार तेहि तर प्रभु गयऊ। तरु बिलोकि उर अति सुखु भयऊ॥2॥
भावार्थ:-वहाँ तीनों प्रकार की (शीतल, मंद और सुगंध) वायु बहती रहती है और उसकी छाया बड़ी ठंडी रहती है। वह शिवजी के विश्राम करने का वृक्ष है, जिसे वेदों ने गाया है। एक बार प्रभु श्री शिवजी उस वृक्ष के नीचे गए और उसे देखकर उनके हृदय में बहुत आनंद हुआ॥2॥
*निज कर डासि नागरिपु छाला। बैठे सहजहिं संभु कृपाला॥
कुंद इंदु दर गौर सरीरा। भुज प्रलंब परिधन मुनिचीरा॥3॥
भावार्थ:-अपने हाथ से बाघम्बर बिछाकर कृपालु शिवजी स्वभाव से ही (बिना किसी खास प्रयोजन के) वहाँ बैठ गए। कुंद के पुष्प, चन्द्रमा और शंख के समान उनका गौर शरीर था। बड़ी लंबी भुजाएँ थीं और वे मुनियों के से (वल्कल) वस्त्र धारण किए हुए थे॥3॥
* तरुन अरुन अंबुज सम चरना। नख दुति भगत हृदय तम हरना॥
भुजग भूति भूषन त्रिपुरारी। आननु सरद चंद छबि हारी॥4॥
भावार्थ:-उनके चरण नए (पूर्ण रूप से खिले हुए) लाल कमल के समान थे, नखों की ज्योति भक्तों के हृदय का अंधकार हरने वाली थी। साँप और भस्म ही उनके भूषण थे और उन त्रिपुरासुर के शत्रु शिवजी का मुख शरद (पूर्णिमा) के चन्द्रमा की शोभा को भी हरने वाला (फीकी करने वाला) था॥4॥

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रति को वरदान (रामचरित मानस)


Marriage of shivji
Doha:
* Muni Anusasan Ganapathi Poojeu Sambhu Bhawani.
Kou Suni Sansa Jani Sura Anadi Jiya Jani ॥100॥
Spirituality: – Shiva and Parvatiji worshiped Ganesha on the orders of the Munis. In the mind, considering the gods to be eternal, one should not doubt hearing this (that Ganesha is a child of Shiva-Parvati, where did he come from before he was married?)॥ 100॥.
Bunk:
* Jasi Bibah Kai Bidhi Shruti sang. Let all the superiors get it done
Ghi Giris Kus Kanya Pani. Bhavi Samarpeen Jani Bhavani ॥1॥
Connotation: – In Vedas, the manner of marriage is said, the nobles did all that. Mountaineer Himachal took Kusha in his hand and holding the girl’s hand, knowing him as Bhavani (Shiv wife), surrendered to Shiva.
* Panigrahan when Keenh Mahesa. Hare hares then gross surasa
Badmantra Munibar High Jai Jai Jai Sankar Sur Karhi ॥2॥
Meaning: When Maheshwar (Shiva) penetrated Parvati, then (Indradi) all the gods were very happy in the heart. The best monks started chanting Vedamantras and the gods started shouting Shivji ॥2॥.
* Bajhin Bajan Bibidh Bidhana. Sumanbrishti Nabh Bhai Bidhi Nana॥
Bhairau Bibahu is doing every church Gross Bhuvan Bharhi Bhukahu ॥3॥
Meaning: – Many types of instruments started playing. Many kinds of flowers showered from the sky. Shiva-Parvati got married. The whole universe was full of joy ॥3॥
* Dasin Das Turag Rath Naga. Dhenu Basan Mani Bastu Bibhaga
To fill food grains. Daiz Dinh Na Jai ​​Bakhana ॥4॥
Sense: Many kinds of things like maids, slaves, chariots, horses, elephants, cows, clothes and gem etc., grains and gold utensils were loaded into trains and given in dowry, which cannot be described. ॥4॥
Verse:
* Did you do it again and again and again and again, say Himbhudhar.
Ka Deon Purankam Sankar Charan Pankaj
Just like Santosh, father-in-law, Santhoshu, like everyone.
Puni ghe padha pathos mayanam prem pariporan
Meaning: Giving a lot of dowry, then with folded hands, Himachal said – O Shankar! You are complete work, what can I give you? (Having said this much) they were left holding the feet of Shiva. Then Shiva, the ocean of grace, resolved his father-in-law in all ways. Then the heart full of love Mainaji held (and said -) the lotus feet of Shiva.
Doha:
* Nath Uma mam pran sam gharkinkari karehu.
Chhamehu gross crime is now pleasing Baru dehu ॥101॥
Meaning: O O Nath! This uma is like (dear) to me. You will make it a walk in your house and keep forgiving all its crimes. Now be happy and give me this groom ॥101॥
Bunk:
* Multi Bidhi Sambhu Sasu Samuzhai. Gawani Bhavan Charan Siru Barber॥
Janani Uma said, then Lehi. Lai Ungang Beautiful Sikh Dinhi ॥1॥
Bhaartarth: -Shivji explained his mother-in-law in many ways. Then she nodded at Shivji’s feet and went home. Then Mother called Parvati and made her learn beautiful by sitting on her lap – ॥1॥.
* Karehu is always a hybrid term worship. Naridharamu pati deu na duja॥
Bachan kahan filled filled Lochan Bari. Bahuri Lai ur Leenhi Kumari ॥2॥
Bhartarth: O Parvati! You worship the feet of Sadashivji, this is the religion of the women. For them, the husband is the deity and there is no deity. Saying such things, tears came to his eyes and he caught the girl from the chest ॥2॥
* Kata bidhi srijan nari jag mahe Subdued dreams are not Sukhu
Brother, love is very important. Dhiraju Keenh Kusmay Bichari ॥3॥
Meaning: – (Then said that) Why did the creator create a female caste in the world? Even the dreamer does not get pleasure in dreams. Saying this, the mother became very upset in love, but knowing the times (not knowing the opportunity to grieve), she endured ॥3॥.
* Puni puni militi parati grah. Param Premu Kachhoo ji na barna॥
All Narinh meet Bhavani. Jai Jannani ur punipatani ॥4॥
Bhartharth: -Maina meets again and again and falls by holding the feet (of Parvati). Love is great, nothing is described. Bhavani, after meeting with all the women, then clung to her mother’s heart ॥4॥
Verse:
* Jananihi Bahuri Mili Chali proper Asis all Kahun Dahi
Then Fir Fili Bilokati Matu Tan then went on to live
Zachak went to the building with the gross saint Sankru Uma.
All immortal Hershe Suman Barshi Nissan Nabh Baje Bhale॥
Meaning: – Parvatiji went to meet Mother again, all of whom gave him worthy blessings. Parvatiji used to look at mother again and again. Then Sakhi took him to Shivji. Mahadevji satisfied all the petitioners and went to the house (Kailas) with Parvati. All the gods were happy and started showering flowers and playing beautiful drums in the sky.
Doha:
* Go with the snow, but then to reach the extreme.
Biddetha, like a bridegroom दा102॥
Meaning: Then the snowmen went with great love to bring Shiva. Vrishketu (Shiva) gave him satisfaction in many ways वि102॥
Bunk:
Girirai came to the building immediately. Said for gross sales head.
Respect Dan Binay Bahumana. All things go well
Meaning: Parvatraj Himachal immediately came home and called all the mountains and ponds. Himwan honored, donated, humbled and farewell everyone respectfully ॥1॥
* When Sambhu Kailas came. Sur sub personal private folk
Jagat Matu Pitu Sambhu Bhavani. Tehin Singaru Na Kahoon Bakhani ॥2॥
Meaning: When Shivaji reached Mount Kailas, then all the gods went to their respective worlds. (Tulsidasji says that) Parvatiji and Shivji are the parents of Jagat, so I do not describe their makeup. ॥2॥
* Karhin Bibidh Bidhi Bhoga Bilasa. Basahin Kailasa with gunna
Every Girija Bihar Nit Nayu. Ehi Bidhi Bipul Kaal Chali Gayu ॥3॥
Spiritualism: – Shiv-Parvati started living on Kailas with her ganas while doing various types of enjoyment. He used to frequent new viharas. Thus a lot of time passed ॥3॥
* When Janmeau Shatbadan Kumara. Taraku Asura Samar Jehin Mara॥
Agam Nigam Famous Old. Happy birth of the whole world ॥4॥
Bhaartarth: – Then six-faced son (Swamikartik) was born, who (when growing up) killed Tarakasura in battle. In Vedas, scriptures and Puranas, the story of the birth of Swamikarthik is famous and the whole world knows it.
Verse:
* Jagu Jaan Shanmukh Janmu Karmu Pratapu Purusharathu Maha.
For the sake of me, I told Brisketu and called Charcha Sancheh.
This is Uma Sambhu Bibahu ji Nar Nari Kahin ja Village.
Kalyan Kaj Bibah Mangal Sarbada Sukhu Pavhi
Bhaartarth: – The whole world knows the birth, deeds, greatness and great effort of Shdanan (Swamikartik), so I have only briefly mentioned the character of the son of Vrishketu (Shivji). The men and women who will say and sing this story of Shiva-Parvati’s marriage, will always find happiness in the works of welfare and in the Mangal Mangalas.
Doha:
* Charit Sindhu Girija Raman Bedaan Pa Pavhin Paru.
Barnai tulsidasu kim ati matimand gawanru ॥103॥
Meaning: – The character of Girijapati Mahadevji is similar to the sea (immense), even the Vedas are not available to him. Then how can Tulsidas describe with great mind and clairvoyance? ॥103॥
Bunk:
* Sambhar Charit Suni Saras Suhawa. Bharadwaj muni ati sukhu pawa
Thought about a longing story. Nayananhi Neeru Romavali Thadi ॥1॥
Senseless: – Muni Bharadwajji found great pleasure after listening to the juicy and pleasant character of Shivji. His desire to listen to the story increased greatly. Water flooded into the eyes and the oval was erected ॥1॥
* Prem Bibus Mukh Bawan Bani See this, Harshe muni gyani
So blessed is the birth munisa. Thank you dear dear Gaurisa ॥2॥
Connotation: – They are infatuated with love, speech does not come out of their mouth. On seeing his condition, the learned sage Yajnavalkya was very pleased (and said-) O Munish! Aha ha! Blessed is your birth, you are loved like Gauripati Shivji Pran. ॥2॥
* Sew Pad Kamal Jinhi Rati Naa. Ramhi te saphenun na soha no
Binu Chhal Biswanath post Nehru. Ram Bhagat Kar Lachchan Ehu ॥3॥
Spirituality: Those who do not have love in the lotus feet of Shivji, they do not like Shri Ram Chandraji even in their dreams. It is a symptom of the devotee to have genuine (pure) love at the feet of Vishwanath Shri Shivji.
* Rigupati Bratdhari to Siv Sama. Binu aghaji sati asi nari॥
Panu Kari Raghupati saw Bhagati. Ko Siva Sama Ramhi Dear Brother ॥4॥
Bhaarthar: Who is observing the fast of Raghunathji (devotion) like Shivji? Who gave up a woman like Sati without sin and showed her devotion to Shri Raghunathji by making a pledge. Hey brother! Who else is loving Shri Ramchandraji like Shivji? ॥4॥
Doha:
* I am the first person, I am alone with you.
Suchi Sevak Tum All Biker Without Ram ॥104॥
Meaning: – I have already understood your distinction by saying the character of Shiva. You are the holy servant of Shri Ramchandraji and be free from all faults.
Bunk:
* I want to see your gun sila. Kahun Sunhu now Raghupati Leela
Listen Sunu Muni Azu Samagam Say nothing like Sukhu Man Morne ॥1॥
Meaning: – I have known your virtue and modesty. Now I say the leela of Shri Raghunathji, listen. Hey monkey! Listen, the joy that has come to my mind since meeting you today cannot be said.
* Ram Charit Ati Amit Munisa. Where can I find the right grade Ahisa
However, let me say as soon as possible. Sumiri Girapati Prabhu Dhanupani ॥2॥
Sense: O Munishvara! Ramcharitra is immense. Hundred crore Sesha ji also cannot say that. However, as I have heard, I remember the lord of Vani (Motivator) and Lord Ramchandraji with a bow in his hand ॥2॥
* Sarad Darunari Sama Swami. Ramu Sutradhar Interim 4
I am happy to know my life. Kabi ur ajir nachavahinbani ॥3॥
Connotation: -Saraswatiji is like a puppet and Antaryami Swami Shri Ramchandraji (holding a thread and dancing a puppet) is a narrator. Knowing his devotee, he poets Saraswati in the courtyard of the heart of the poet whom he favors, ॥3॥.
* Pranavon Soi Kripal Raghunatha. Barnaun Bisad Tasu Gun Saga था
Param Ramya Giribaru Kailasu. Sada Jahan Sew Uma Nivasu ॥4॥
Sense: I bow to the kind hearted Shri Raghunathji and tell the story of his pure qualities. Kailas is superior and very delightful in the mountains, where Shiva-Parvatiji always resides ॥4॥.
Doha:
* Siddha Tapodhan Jogijan Sur Kinner Munibrind.
Just here Sukriti Gross Se wherein Sew Sukhkand ॥105॥
Meaning: Siddhas, ascetics, yogis, gods, eunuchs and groups of sages live on that mountain. They are all great saints and serve Anandkand Shri Mahadevji ॥105॥
Bunk:
* Not Hari Har Bimukh Dharma Rati. Te male teh sapnehun nahin jahan
But bit by bit on the Giri Eternal new beautiful all black ॥1॥
Spirituality: Those who are alienated from Lord Vishnu and Mahadevji and who do not have love in religion, they cannot go there even in their dreams. There is a huge banyan tree on that mountain, which is always new and beautiful in all times (six seasons).
* Tribidh Sameer Susitali Chhaya. Siv bishram bitp shruti sang॥
Once you become Lord Taru billi ur aur sukhu awe ॥2॥
Meaning: – There are three types of air (cool, dim and fragrant) flowing and its shade is very cold. It is the resting tree of Shiva, sung by the Vedas. Once Lord Shiva went under that tree and seeing it, there was great joy in his heart.
* Privately Dasi Nagripu blister. Seated Sahajhin Sambhu Kripla
Kund Indu Dar Gaur Sarira. Bhuj Flap Extraction Munichira ॥3॥
By laying tigambar with his hand, Kripalu Shivaji by nature (without any special purpose) sat there. He had a keen body like a blossom flower, moon and conch. There were very long arms and they were wearing (vulcan) clothes from the sages. ॥3॥
* Tarun Arun Ambuj Sama Charna. Nakh Duti Bhagat Heart Heart
Bhujag Bhuti Bhushan Tripurari. Ananu Sard Chand Chhabi Hari ॥4॥
Sense: Their feet were like a new (fully blossomed) red lotus, the light of the nails was going to defeat the darkness of the devotees’ heart. Snake and Bhasma were his Bhushans and the enemy of those Tripurasura, Shiva’s face was also going to defeat (fade) the beauty of the moon of Sharad (full moon) ॥4॥.

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