भगवान विष्णु के 24 अवतार कौन से हैं, जानिए | Lord Vishnu avatars

भगवान विष्णु के 24 अवतार कौन से हैं, जानिए

जब-जब पृथ्वी पर कोई संकट आता है तो भगवान अवतार लेकर उस संकट को दूर करते हैं। भगवान शिव और भगवान विष्णु ने कई बार पृथ्वी पर अवतार लिया है। भगवान विष्णु के 24 वें अवतार के बारे में कहा जाता है कि‘कल्कि अवतार’के रूप में उनका आना सुनिश्चित है।
उनके 23 अवतार अब तक पृथ्वी पर अवतरित हो चुके हैं।
इन 24 अवतार में से 10 अवतार विष्णु जी के मुख्य अवतार माने जाते हैं। यह है मत्स्य अवतार, कूर्म अवतार, वराह अवतार, नृसिंह अवतार, वामन अवतार, परशुराम अवतार, राम अवतार. कृष्ण अवतार, बुद्ध अवतार, कल्कि अवतार। आइए जानें विस्तार से….

1- श्री सनकादि मुनि
:
धर्म ग्रंथों के अनुसार सृष्टि के आरंभ में लोक पितामह ब्रह्मा ने अनेक लोकों की रचना करने की इच्छा से घोर तपस्या की। उनके तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने तप अर्थ वाले सन नाम से युक्त होकर सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार नाम के चार मुनियों के रूप में अवतार लिया। ये चारों प्राकट्य काल से ही मोक्ष मार्ग परायण, ध्यान में तल्लीन रहने वाले, नित्यसिद्ध एवं नित्य विरक्त थे। ये भगवान विष्णु के सर्वप्रथम अवतार माने जाते हैं।

2- वराह अवतार :

धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु ने दूसरा अवतार वराह रूप में लिया था। वराह अवतार से जुड़ी कथा इस प्रकार है- पुरातन समय में दैत्य हिरण्याक्ष ने जब पृथ्वी को ले जाकर समुद्र में छिपा दिया तब ब्रह्मा की नाक से भगवान विष्णु वराह रूप में प्रकट हुए। भगवान विष्णु के इस रूप को देखकर सभी देवताओं व ऋषि-मुनियों ने उनकी स्तुति की। सबके आग्रह पर भगवान वराह ने पृथ्वी को ढूंढना प्रारंभ किया। अपनी थूथनी की सहायता से उन्होंने पृथ्वी का पता लगा लिया और समुद्र के अंदर जाकर अपने दांतों पर रखकर वे पृथ्वी को बाहर ले आए।

जब हिरण्याक्ष दैत्य ने यह देखा तो उसने भगवान विष्णु के वराह रूप को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों में भीषण युद्ध हुआ। अंत में भगवान वराह ने हिरण्याक्ष का वध कर दिया। इसके बाद भगवान वराह ने अपने खुरों से जल को स्तंभित कर उस पर पृथ्वी को स्थापित कर दिया।

3- नारद अवतार
:
धर्म ग्रंथों के अनुसार देवर्षि नारद भी भगवान विष्णु के ही अवतार हैं। शास्त्रों के अनुसार नारद मुनि, ब्रह्मा के सात मानस पुत्रों में से एक हैं। उन्होंने कठिन तपस्या से देवर्षि पद प्राप्त किया है। वे भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों में से एक माने जाते हैं। देवर्षि नारद धर्म के प्रचार तथा लोक-कल्याण के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहते हैं। शास्त्रों में देवर्षि नारद को भगवान का मन भी कहा गया है। श्रीमद्भागवतगीता के दशम अध्याय के 26वें श्लोक में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने इनकी महत्ता को स्वीकार करते हुए कहा है- देवर्षीणाम्चनारद:। अर्थात देवर्षियों में मैं नारद हूं।

4- नर-नारायण
:
सृष्टि के आरंभ में भगवान विष्णु ने धर्म की स्थापना के लिए दो रूपों में अवतार लिया। इस अवतार में वे अपने मस्तक पर जटा धारण किए हुए थे। उनके हाथों में हंस, चरणों में चक्र एवं वक्ष:स्थल में श्रीवत्स के चिन्ह थे। उनका संपूर्ण वेष तपस्वियों के समान था। धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु ने नर-नारायण के रूप में यह अवतार लिया था।

5- कपिल मुनि
:
भगवान विष्णु ने पांचवा अवतार कपिल मुनि के रूप में लिया। इनके पिता का नाम महर्षि कर्दम व माता का नाम देवहूति था। शरशय्या पर पड़े हुए भीष्म पितामह के शरीर त्याग के समय वेदज्ञ व्यास आदि ऋषियों के साथ भगवा कपिल भी वहां उपस्थित थे। भगवान कपिल के क्रोध से ही राजा सगर के साठ हजार पुत्र भस्म हो गए थे। भगवान कपिल सांख्य दर्शन के प्रवर्तक हैं। कपिल मुनि भागवत धर्म के प्रमुख बारह आचार्यों में से एक हैं।

6- दत्तात्रेय अवतार
:
धर्म ग्रंथों के अनुसार दत्तात्रेय भी भगवान विष्णु के अवतार हैं। इनकी उत्पत्ति की कथा इस प्रकार है-
एक बार माता लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती को अपने पातिव्रत्य पर अत्यंत गर्व हो गया। भगवान ने इनका अंहकार नष्ट करने के लिए लीला रची। उसके अनुसार एक दिन नारदजी घूमते-घूमते देवलोक पहुंचे और तीनों देवियों को बारी-बारी जाकर कहा कि ऋषि अत्रि की पत्नी अनुसूइया के सामने आपका सतीत्व कुछ भी नहीं। तीनों देवियों ने यह बात अपने स्वामियों को बताई और उनसे कहा कि वे अनुसूइया के पातिव्रत्य की परीक्षा लें।

तब भगवान शंकर, विष्णु व ब्रह्मा साधु वेश बनाकर अत्रि मुनि के आश्रम आए। महर्षि अत्रि उस समय आश्रम में नहीं थे। तीनों ने देवी अनुसूइया से भिक्षा मांगी मगर यह भी कहा कि आपको निर्वस्त्र होकर हमें भिक्षा देनी होगी। अनुसूइया पहले तो यह सुनकर चौंक गई, लेकिन फिर साधुओं का अपमान न हो इस डर से उन्होंने अपने पति का स्मरण किया और बोला कि यदि मेरा पातिव्रत्य धर्म सत्य है तो ये तीनों साधु छ:-छ: मास के शिशु हो जाएं।

ऐसा बोलते ही त्रिदेव शिशु होकर रोने लगे। तब अनुसूइया ने माता बनकर उन्हें गोद में लेकर स्तनपान कराया और पालने में झूलाने लगीं। जब तीनों देव अपने स्थान पर नहीं लौटे तो देवियां व्याकुल हो गईं। तब नारद ने वहां आकर सारी बात बताई। तीनों देवियां अनुसूइया के पास आईं और क्षमा मांगी। तब देवी अनुसूइया ने त्रिदेव को अपने पूर्व रूप में कर दिया। प्रसन्न होकर त्रिदेव ने उन्हें वरदान दिया कि हम तीनों अपने अंश से तुम्हारे गर्भ से पुत्र रूप में जन्म लेंगे। तब ब्रह्मा के अंश से चंद्रमा, शंकर के अंश से दुर्वासा और विष्णु के अंश से दत्तात्रेय का जन्म हुआ।

7- यज्ञ :

भगवान विष्णु के सातवें अवतार का नाम यज्ञ है। धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान यज्ञ का जन्म स्वायम्भुव मन्वन्तर में हुआ था। स्वायम्भुव मनु की पत्नी शतरूपा के गर्भ से आकूति का जन्म हुआ। वे रूचि प्रजापति की पत्नी हुई। इन्हीं आकूति के यहां भगवान विष्णु यज्ञ नाम से अवतरित हुए। भगवान यज्ञ के उनकी धर्मपत्नी दक्षिणा से अत्यंत तेजस्वी बारह पुत्र उत्पन्न हुए। वे ही स्वायम्भुव मन्वन्तर में याम नामक बारह देवता कहलाए।

8- भगवान ऋषभदेव
:
भगवान विष्णु ने ऋषभदेव के रूप में आठवांं अवतार लिया। धर्म ग्रंथों के अनुसार महाराज नाभि की कोई संतान नहीं थी। इस कारण उन्होंने अपनी धर्मपत्नी मेरुदेवी के साथ पुत्र की कामना से यज्ञ किया। यज्ञ से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु स्वयं प्रकट हुए और उन्होंने महाराज नाभि को वरदान दिया कि मैं ही तुम्हारे यहां पुत्र रूप में जन्म लूंगा।

वरदान स्वरूप कुछ समय बाद भगवान विष्णु महाराज नाभि के यहां पुत्र रूप में जन्मे। पुत्र के अत्यंत सुंदर सुगठित शरीर, कीर्ति, तेल, बल, ऐश्वर्य, यश, पराक्रम और शूरवीरता आदि गुणों को देखकर महाराज नाभि ने उसका नाम ऋषभ (श्रेष्ठ) रखा।

9- आदिराज पृथु
:
भगवान विष्णु के एक अवतार का नाम आदिराज पृथु है। धर्म ग्रंथों के अनुसार स्वायम्भुव मनु के वंश में अंग नामक प्रजापति का विवाह मृत्यु की मानसिक पुत्री सुनीथा के साथ हुआ। उनके यहां वेन नामक पुत्र हुआ। उसने भगवान को मानने से इंकार कर दिया और स्वयं की पूजा करने के लिए कहा।

तब महर्षियों ने मंत्र पूत कुशों से उसका वध कर दिया। तब महर्षियों ने पुत्रहीन राजा वेन की भुजाओं का मंथन किया, जिससे पृथु नाम पुत्र उत्पन्न हुआ। पृथु के दाहिने हाथ में चक्र और चरणों में कमल का चिह्न देखकर ऋषियों ने बताया कि पृथु के वेष में स्वयं श्रीहरि का अंश अवतरित हुआ है।

10- मत्स्य अवतार
:
पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु ने सृष्टि को प्रलय से बचाने के लिए मत्स्यावतार लिया था। इसकी कथा इस प्रकार है- कृतयुग के आदि में राजा सत्यव्रत हुए। राजा सत्यव्रत एक दिन नदी में स्नान कर जलांजलि दे रहे थे। अचानक उनकी अंजलि में एक छोटी सी मछली आई। उन्होंने देखा तो सोचा वापस सागर में डाल दूं, लेकिन उस मछली ने बोला- आप मुझे सागर में मत डालिए अन्यथा बड़ी मछलियां मुझे खा जाएंगी। तब राजा सत्यव्रत ने मछली को अपने कमंडल में रख लिया। मछली और बड़ी हो गई तो राजा ने उसे अपने सरोवर में रखा, तब देखते ही देखते मछली और बड़ी हो गई।

राजा को समझ आ गया कि यह कोई साधारण जीव नहीं है। राजा ने मछली से वास्तविक स्वरूप में आने की प्रार्थना की। राजा की प्रार्थना सुन साक्षात चारभुजाधारी भगवान विष्णु प्रकट हो गए और उन्होंने कहा कि ये मेरा मत्स्यावतार है। भगवान ने सत्यव्रत से कहा- सुनो राजा सत्यव्रत! आज से सात दिन बाद प्रलय होगी। तब मेरी प्रेरणा से एक विशाल नाव तुम्हारे पास आएगी। तुम सप्त ऋषियों, औषधियों, बीजों व प्राणियों के सूक्ष्म शरीर को लेकर उसमें बैठ जाना, जब तुम्हारी नाव डगमगाने लगेगी, तब मैं मत्स्य के रूप में तुम्हारे पास आऊंगा।

उस समय तुम वासुकि नाग के द्वारा उस नाव को मेरे सींग से बांध देना। उस समय प्रश्न पूछने पर मैं तुम्हें उत्तर दूंगा, जिससे मेरी महिमा जो परब्रह्म नाम से विख्यात है, तुम्हारे ह्रदय में प्रकट हो जाएगी। तब समय आने पर मत्स्यरूपधारी भगवान विष्णु ने राजा सत्यव्रत को तत्वज्ञान का उपदेश दिया, जो मत्स्यपुराण नाम से प्रसिद्ध है।
11- कूर्म अवतार :
धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु ने कूर्म (कछुए) का अवतार लेकर समुद्र मंथन में सहायता की थी। भगवान विष्णु के कूर्म अवतार को कच्छप अवतार भी कहते हैं। इसकी कथा इस प्रकार है- एक बार महर्षि दुर्वासा ने देवताओं के राजा इंद्र को श्राप देकर श्रीहीन कर दिया। इंद्र जब  भगवान विष्णु के पास गए तो उन्होंने समुद्र मंथन करने के लिए कहा। तब इंद्र भगवान विष्णु के कहे अनुसार दैत्यों व देवताओं के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने के लिए तैयार हो गए।

समुद्र मंथन करने के लिए मंदराचल पर्वत को मथानी एवं नागराज वासुकि को नेती बनाया गया। देवताओं और दैत्यों ने अपना मतभेद भुलाकर मंदराचल को उखाड़ा और उसे समुद्र की ओर ले चले, लेकिन वे उसे अधिक दूर तक नहीं ले जा सके। तब भगवान विष्णु ने मंदराचल को समुद्र तट पर रख दिया। देवता और दैत्यों ने मंदराचल को समुद्र में डालकर नागराज वासुकि को नेती बनाया।

किंतु मंदराचल के नीचे कोई आधार नहीं होने के कारण वह समुद्र में डूबने लगा। यह देखकर भगवान विष्णु विशाल कूर्म (कछुए) का रूप धारण कर समुद्र में मंदराचल के आधार बन गए। भगवान कूर्म  की विशाल पीठ पर मंदराचल तेजी से घुमने लगा और इस प्रकार समुद्र मंथन संपन्न हुआ।

12- भगवान धन्वन्तरि  :
धर्म ग्रंथों के अनुसार जब देवताओं व दैत्यों ने मिलकर समुद्र मंथन किया तो उसमें से सबसे पहले भयंकर विष निकला जिसे भगवान शिव ने पी लिया। इसके बाद समुद्र मंथन से उच्चैश्रवा घोड़ा, देवी लक्ष्मी, ऐरावत हाथी, कल्प वृक्ष, अप्सराएं और भी बहुत से रत्न निकले। सबसे अंत में भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। यही धन्वन्तरि भगवान विष्णु के अवतार माने गए हैं। इन्हें औषधियों का स्वामी भी माना गया है।

13- मोहिनी अवतार  :
धर्म ग्रंथों के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान सबसे अंत में धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर निकले। जैसे ही अमृत मिला अनुशासन भंग हुआ। देवताओं ने कहा हम ले लें, दैत्यों ने कहा हम ले लें। इसी खींचातानी में इंद्र का पुत्र जयंत अमृत कुंभ लेकर भाग गया। सारे दैत्य व देवता भी उसके पीछे भागे। असुरों व देवताओं में भयंकर मार-काट मच गई।

देवता परेशान होकर भगवान विष्णु के पास गए। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लिया। भगवान ने मोहिनी रूप में सबको मोहित कर दिया किया। मोहिनी ने देवता व असुर की बात सुनी और कहा कि यह अमृत कलश मुझे दे दीजिए तो मैं बारी-बारी से देवता व असुर को अमृत का पान करा दूंगी। दोनों मान गए। देवता एक तरफ  तथा असुर दूसरी तरफ  बैठ गए।

फिर मोहिनी रूप धरे भगवान विष्णु ने मधुर गान गाते हुए तथा नृत्य करते हुए देवता व असुरों को अमृत पान कराना प्रारंभ किया । वास्तविकता में मोहिनी अमृत पान तो सिर्फ देवताओं को ही करा रही थी, जबकि असुर समझ रहे थे कि वे भी अमृत पी रहे हैं। इस प्रकार भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लेकर देवताओं का भला किया।

14- भगवान नृसिंह  :
भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध किया था। इस अवतार की कथा इस प्रकार है- धर्म ग्रंथों के अनुसार दैत्यों का राजा हिरण्यकशिपु स्वयं को भगवान से भी अधिक बलवान मानता था। उसे मनुष्य, देवता, पक्षी, पशु, न दिन में, न रात में, न धरती पर, न आकाश में, न अस्त्र से, न शस्त्र से मरने का वरदान प्राप्त था। उसके राज में जो भी भगवान विष्णु की पूजा करता था उसको दंड दिया जाता था। उसके पुत्र का नाम प्रह्लाद था। प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु का परम भक्त था। यह बात जब हिरण्यकशिपु का पता चली तो वह बहुत क्रोधित हुआ और प्रह्लाद को समझाने का प्रयास किया, लेकिन फिर भी जब प्रह्लाद नहीं माना तो हिरण्यकशिपु ने उसे मृत्युदंड दे दिया।

हर बार भगवान विष्णु के चमत्कार से वह बच गया। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था, वह प्रह्लाद को लेकर धधकती हुई अग्नि में बैठ गई। तब भी भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद बच गया और होलिका जल गई। जब हिरण्यकशिपु स्वयं प्रह्लाद को मारने ही वाला था तब भगवान विष्णु नृसिंह का अवतार लेकर खंबे से प्रकट हुए और उन्होंने अपने नाखूनों से हिरण्यकशिपु का वध कर दिया।

15- वामन अवतार :
सत्ययुग में प्रह्लाद के पौत्र दैत्यराज बलि ने स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया। सभी देवता इस विपत्ति से बचने के लिए भगवान विष्णु के पास गए। तब भगवान विष्णु ने कहा कि मैं स्वयं देवमाता अदिति के गर्भ से उत्पन्न होकर तुम्हें स्वर्ग का राज्य दिलाऊंगा। कुछ समय पश्चात भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया।

एक बार जब बलि महान यज्ञ कर रहा था तब भगवान वामन बलि की यज्ञशाला में गए और राजा बलि से तीन पग धरती दान में मांगी। राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य भगवान की लीला समझ गए और उन्होंने बलि को दान देने से मना कर दिया। लेकिन बलि ने फिर भी भगवान वामन को तीन पग धरती दान देने का संकल्प ले लिया। भगवान वामन ने विशाल रूप धारण कर एक पग में धरती और दूसरे पग में स्वर्ग लोक नाप लिया। जब तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा तो बलि ने भगवान वामन को अपने सिर पर पग रखने को कहा। बलि के सिर पर पग रखने से वह सुतललोक पहुंच गया। बलि की दानवीरता देखकर भगवान ने उसे सुतललोक का स्वामी भी बना दिया। इस तरह भगवान वामन ने देवताओं की सहायता कर उन्हें स्वर्ग पुन: लौटाया।

16- हयग्रीव अवतार :
धर्म ग्रंथों के अनुसार एक बार मधु और कैटभ नाम के दो शक्तिशाली राक्षस ब्रह्माजी से वेदों का हरण कर रसातल में पहुंच गए। वेदों का हरण हो जाने से ब्रह्माजी बहुत दु:खी हुए और भगवान विष्णु के पास पहुंचे। तब भगवान ने हयग्रीव अवतार लिया। इस अवतार में भगवान विष्णु की गर्दन और मुख घोड़े के समान थी। तब भगवान हयग्रीव रसातल में पहुंचे और मधु-कैटभ का वध कर वेद पुन: भगवान ब्रह्मा को दे दिए।

17- श्रीहरि अवतार :
धर्म ग्रंथों के अनुसार प्राचीन समय में त्रिकूट नामक पर्वत की तराई में एक शक्तिशाली गजेंद्र अपनी हथिनियों के साथ रहता था। एक बार वह अपनी हथिनियों के साथ तालाब में स्नान करने गया। वहां एक मगरमच्छ ने उसका पैर पकड़ लिया और पानी के अंदर खींचने लगा। गजेंद्र और मगरमच्छ का संघर्ष एक हजार साल तक चलता रहा। अंत में गजेंद्र शिथिल पड़ गया और उसने भगवान श्रीहरि का ध्यान किया। गजेंद्र की स्तुति सुनकर भगवान श्रीहरि प्रकट हुए और उन्होंने अपने चक्र से मगरमच्छ का वध कर दिया। भगवान श्रीहरि ने गजेंद्र का उद्धार कर उसे अपना पार्षद बना लिया।

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18- परशुराम अवतार  :
हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार परशुराम भगवान विष्णु के  प्रमुख अवतारों में से एक थे। भगवान परशुराम के जन्म के संबंध में दो कथाएं प्रचलित हैं। हरिवंशपुराण के अनुसार उन्हीं में से एक कथा इस प्रकार है-

प्राचीन समय में महिष्मती नगरी पर शक्तिशाली हैययवंशी क्षत्रिय कार्तवीर्य अर्जुन(सहस्त्रबाहु) का शासन था। वह बहुत अभिमानी था और अत्याचारी भी। एक बार अग्निदेव ने उससे भोजन कराने का आग्रह किया। तब सहस्त्रबाहु ने घमंड में आकर कहा कि आप जहां से चाहें, भोजन प्राप्त कर सकते हैं, सभी ओर मेरा ही राज है। तब अग्निदेव ने वनों को जलाना शुरु किया। एक वन में ऋषि आपव तपस्या कर रहे थे। अग्नि ने उनके आश्रम को भी जला डाला। इससे क्रोधित होकर ऋषि ने सहस्त्रबाहु को श्राप दिया कि भगवान विष्णु, परशुराम के रूप में जन्म लेंगे और न सिर्फ सहस्त्रबाहु का नहीं बल्कि समस्त क्षत्रियों का सर्वनाश करेंगे। इस प्रकार भगवान विष्णु ने भार्गव कुल में महर्षि जमदग्रि के पांचवें पुत्र के रूप में जन्म लिया।

19- महर्षि वेदव्यास  :
पुराणों में महर्षि वेदव्यास को भी भगवान विष्णु का ही अंश माना गया है। भगवान व्यास नारायण के कलावतार थे। वे महाज्ञानी महर्षि पराशर के पुत्र रूप में प्रकट हुए थे। उनका जन्म कैवर्तराज की पोष्यपुत्री सत्यवती के गर्भ से यमुना के द्वीप पर हुआ था। उनके शरीर का रंग काला था। इसलिए उनका एक नाम कृष्णद्वैपायन भी था। इन्होंने ही मनुष्यों की आयु और शक्ति को देखते हुए वेदों के विभाग किए। इसलिए इन्हें वेदव्यास भी कहा जाता है। इन्होंने ही महाभारत ग्रंथ की रचना भी की।

20- हंस अवतार  :
एक बार भगवान ब्रह्मा अपनी सभा में बैठे थे। तभी वहां उनके मानस पुत्र सनकादि पहुंचे और भगवान ब्रह्मा से मनुष्यों के मोक्ष के संबंध में चर्चा करने लगे। तभी वहां भगवान विष्णु महाहंस के रूप में प्रकट हुए और उन्होंने सनकादि मुनियों के संदेह का निवारण किया। इसके बाद सभी ने भगवान हंस की पूजा की। इसके बाद महाहंसरूपधारी श्रीभगवान अदृश्य होकर अपने पवित्र धाम चले गए।

21- श्रीराम अवतार :
त्रेतायुग में राक्षसराज रावण का बहुत आतंक था। उससे देवता भी डरते थे। उसके वध के लिए भगवान विष्णु ने राजा दशरथ के यहां माता कौशल्या के गर्भ से पुत्र रूप में जन्म लिया। इस अवतार में भगवान विष्णु ने अनेक राक्षसों का वध किया और मर्यादा का पालन करते हुए अपना जीवन यापन किया।

श्रीराम अवतार :

पिता के कहने पर वनवास गए। वनवास भोगते समय राक्षसराज रावण उनकी पत्नी सीता का हरण कर ले गया। सीता की खोज में भगवान लंका पहुंचे, वहां भगवान श्रीराम और रावण का घोर युद्ध जिसमें रावण मारा गया। इस प्रकार भगवान विष्णु ने राम अवतार लेकर देवताओं को भय मुक्त किया।

22- श्रीकृष्ण अवतार  :
द्वापरयुग में भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण अवतार लेकर अधर्मियों का नाश किया।   भगवान श्रीकृष्ण का जन्म कारागार में हुआ था। इनके पिता का नाम वसुदेव और माता का नाम देवकी था। भगवान श्रीकृष्ण ने इस अवतार में अनेक चमत्कार किए और दुष्टों का सर्वनाश किया।

श्रीकृष्ण अवतार  :

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

कंस का वध भी भगवान श्रीकृष्ण ने ही किया। महाभारत के युद्ध में अर्जुन के सारथि बने और दुनिया को गीता का ज्ञान दिया। धर्मराज युधिष्ठिर को राजा बना कर धर्म की स्थापना की। भगवान विष्णु का ये अवतार सभी अवतारों में सबसे श्रेष्ठ माना जाता है।

23- बुद्ध अवतार  :
धर्म ग्रंथों के अनुसार बौद्धधर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध भी भगवान विष्णु के ही अवतार थे परंतु पुराणों में वर्णित भगवान बुद्धदेव का जन्म गया के समीप कीकट में हुआ बताया गया है और उनके पिता का नाम अजन बताया गया है। यह प्रसंग पुराण वर्णित बुद्धावतार का ही है।

एक समय दैत्यों की शक्ति बहुत बढ़ गई। देवता भी उनके भय से भागने लगे। राज्य की कामना से दैत्यों ने देवराज इंद्र से पूछा कि हमारा साम्राज्य स्थिर रहे, इसका उपाय क्या है। तब इंद्र ने शुद्ध भाव से बताया कि सुस्थिर शासन के लिए यज्ञ एवं वेदविहित आचरण आवश्यक है। तब दैत्य वैदिक आचरण एवं महायज्ञ करने लगे, जिससे उनकी शक्ति और बढऩे लगी। तब सभी देवता भगवान विष्णु के पास गए। तब भगवान विष्णु ने देवताओं के हित के लिए बुद्ध का रूप धारण किया। उनके हाथ में मार्जनी थी और वे मार्ग को बुहारते हुए चलते थे।

इस प्रकार भगवान बुद्ध दैत्यों के पास पहुंचे और उन्हें उपदेश दिया कि यज्ञ करना पाप है। यज्ञ से जीव हिंसा होती है। यज्ञ की अग्नि से कितने ही प्राणी भस्म हो जाते हैं। भगवान बुद्ध के उपदेश से दैत्य प्रभावित हुए। उन्होंने यज्ञ व वैदिक आचरण करना छोड़ दिया। इसके कारण उनकी शक्ति कम हो गई और देवताओं ने उन पर हमला कर अपना राज्य पुन: प्राप्त कर लिया।

24- कल्कि अवतार  :

धर्म ग्रंथों के अनुसार कलयुग में भगवान विष्णु कल्कि रूप में अवतार लेंगे। कल्कि अवतार कलियुग व सतयुग के संधिकाल में होगा। यह अवतार 64 कलाओं से युक्त होगा। पुराणों के अनुसार उत्तरप्रदेश के मुरादाबाद जिले के शंभल नामक स्थान पर विष्णुयशा नामक तपस्वी ब्राह्मण के घर भगवान कल्कि पुत्र रूप में जन्म लेंगे। कल्कि देवदत्त नामक घोड़े पर सवार होकर संसार से पापियों का विनाश करेंगे और धर्म की पुन:स्थापना करेंगे।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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Know which are the 24 avatars of Lord Vishnu

Whenever there is a crisis on the earth, God takes an avatar to overcome that crisis. Lord Shiva and Lord Vishnu have incarnated on Earth many times. It is said that the 24th incarnation of Lord Vishnu is sure to come in the form of ‘Kalki Avatar’.

 

His 23 avatars have so far incarnated on Earth.

Out of these 24 avatars, 10 avatars are considered to be the main incarnations of Vishnu. This is Matsya avatar, Kurma avatar, Varaha avatar, Narasimha avatar, Vamana avatar, Parashuram avatar, Rama avatar. Krishna avatar, Buddha avatar, Kalki avatar. Let’s know in detail…

1- Sri Sanakadi Muni
:
According to religious texts, at the beginning of creation, Lok Pitamaha Brahma did austerities with the desire to create many worlds. Pleased with his tenacity, Lord Vishnu incarnated as the four sages named Sanak, Sanandan, Sanatan, and Sanatkumar, bearing the name of Sun meaning tenacity. All these four were from the time of pre-natal times to the path of salvation, those who were engrossed in meditation, routine, and routine. He is considered to be the first incarnation of Lord Vishnu.

2- Varaha Avatar:

According to religious texts, Lord Vishnu took the second incarnation as Varaha. The story related to the Varaha avatar is as follows – In ancient times when Lord Hiranyaksha took the earth and hid it in the sea, Lord Vishnu appeared in the form of Varaha from the nose of Brahma. Seeing this form of Lord Vishnu, all the gods and sages praised him. On the insistence of everyone, Lord Varaha started searching for the earth. With the help of his snout, he found the earth and by going inside the sea and placing it on his teeth, he brought the earth out.

When the Hiranyaksha demon saw this, he challenged the Varaha form of Lord Vishnu to battle. A fierce battle ensued in both. Finally, Lord Varaha killed Hiranyaksha. After this, Lord Varaha pillaged the water with his hooves and set the earth on it.

3- Narada Avatar
:
According to religious texts, Devarshi Narada is also an incarnation of Lord Vishnu. According to the scriptures, Narada Muni is one of the seven Manas sons of Brahma. He has attained the rank of Devarshi by hard penance. He is considered one of the exclusive devotees of Lord Vishnu. Devarshi Narada is always striving for the promotion of religion and public welfare. In the scriptures, Devarshi Narada is also called the mind of God. In the 26th verse of the tenth chapter of Shrimad Bhagwatgita, Lord Shri Krishna himself, while acknowledging their importance, has said- Devarshimachanarada:. That means I am Narada among the devarshi.

4- Narayana
:
At the beginning of creation, Lord Vishnu incarnated in two forms to establish Dharma. In this avatar, he was wearing a jata on his forehead. The swan in his hands, the chakra at the feet, and the thorax: there were signs of Shrivatsa in the site. His entire attire was like that of the ascetics. According to religious texts, Lord Vishnu took this incarnation as Nara-Narayana.

5- Kapil Muni
:
Lord Vishnu took the fifth avatar as Kapil Muni. His father’s name was Maharishi Kardam and his mother’s name was Devahuti. At the time of sacrificing the body of Bhishma Pitamah lying on the Sharya, the saffron Kapil was also present there along with the sages Vedas Vyas and Vyas. Sixty thousand sons of King Sagara were consumed by the anger of Lord Kapil. Lord Kapil is the originator of Sankhya philosophy. Kapil Muni is one of the major twelve masters of the Bhagavata religion.

6- Dattatreya avatar
:
According to religious texts, Dattatreya is also an incarnation of Lord Vishnu. The story of their origin is as follows-
Once, Goddess Lakshmi, Parvati, and Saraswati became extremely proud of their ancestors. God created Leela to destroy their ego. According to him, one-day Naradji reached Devlok while wandering around and told the three ladies in turn that your saintliness was nothing in front of Anusiya, the wife of sage Atri. The three goddesses told this thing to their owners and asked them to test the ritual of Anusia.

Then Lord Shankar, Vishnu, and Brahma came to the ashram of Atri Muni dressed as a monk. Maharishi Atri was not in the ashram at that time. The three asked for alms from the goddess Anusuiya but also said that you have to give alms to us without getting naked. At first, Anusiya was shocked to hear this, but then fearing that the sadhus should not be insulted, she remembered her husband and said that if my religious religion is true, then these three sadhus should be children of six months.

As soon as he said this, Tridev started crying like an infant. Then Anusiya became a mother, took her, breastfed her and breastfeed her, and started swinging in the cradle. When the three gods did not return to their places, the ladies were distraught. Then Narada came there and told the whole thing. The three goddesses came to Anusaiya and apologized. Then the goddess Anusaiya made Trideva in her former firm. Pleased, Tridev gave him a boon that all three of us would be born as sons from your womb. Then Moon was born from the part of Brahma, Durvasa from the part of Shankara, and Dattatreya from the part of Vishnu.

7- Yajna:

The seventh incarnation of Lord Vishnu is named Yajna. According to religious texts, Lord Yagya was born in Swayambhuva Manvantara. Aakuti was born from the womb of Shatrupa, the wife of Swayambhuva Manu. She became the wife of Ruchi Prajapati. Lord Vishnu incarnated in the name of Yajna here. His wife Dakshina of Lord Yajna produced twelve sons of glory. He is the twelve deities called Yam in the Swayambhuva Manvantara.

8- Lord Rishabhdev
:
Lord Vishnu took the eighth avatar in the form of Rishabhdev. According to religious texts, Maharaja Naveli had no children. For this reason, he performed a yajna with his wife Merudevi, wishing for a son. Pleased with the sacrifice, Lord Vishnu himself appeared and gave a boon to Maharaj Nabhi that I will be born here as a son.

After some time, Lord Vishnu Maharaj was born as son as a boon. Seeing the son’s exceedingly well-composed body, fame, oil, strength, opulence, fame, might, and valor, etc., Maharaj Nabhi named him Rishabh (superior).

9- Adiraj Prithu
:
The name of one incarnation of Lord Vishnu is Adiraj Prithu. According to religious texts, Prajapati named Anga was married to Sunitha, the mental daughter of death, in the lineage of Swayambhuva Manu. He had a son named Wayne. He refused to believe in God and asked him to worship himself.

Then the Maharishis killed him with the mantra pot. Then the Maharishi churned the arms of the sonless King Ven, from which a son named Prithu was born. Seeing the lotus sign in the circle and steps in the right hand of Prithu, the sages told that the fraction of Shrihari himself has descended in the guise of Prithu.

10- Matsya Avatar
:
According to the Puranas, Lord Vishnu had taken a Matsya avatar to save the world from the Holocaust. Its story is as follows – At the beginning of the Kritayuga, King Satyavrat. King Satyavrat was giving Jalanjali a bath in the river one day. Suddenly a small fish came to his Anjali. When he saw, I thought I would put it back in the ocean, but that fish said – you don’t put me in the ocean, otherwise big fish will eat me. Then King Satyavrat kept the fish in his kamandal. When the fish became bigger, the king kept it in his lake, then on seeing it, the fish became bigger.

The king understood that this is not an ordinary creature. The king pleaded with the fish to come in real form. Hearing the King’s prayer, the Lord Vishnu appeared and said that he is my mermaid. God told Satyavrat – listen King Satyavrat! There will be a catastrophe seven days from today. Then a huge boat will come to you with my inspiration. Take the subtle body of sapta sages, medicines, seeds, and creatures and sit in it, when your boat starts to waver, then I will come to you as a fish.

At that time you tie that boat with my horn by Vasuki Nag. At that time, I will answer you by asking questions, so that my glory which is known by the name of Parabrahma will be revealed in your heart. Then, when the time came, the fishery god Vishnu preached philosophy to King Satyavrat, who is famous as Matsya Purana.

11- Kurma Avatar:
According to religious texts, Lord Vishnu had helped in churning the sea by taking the avatar of Kurma (turtle). The Kurma avatar of Lord Vishnu is also called the Kachhap avatar. The story goes like this: Once Maharishi Durvasa cursed Indra, the king of the gods, to dehumanize him. When Indra went to Lord Vishnu, he asked him to churn the ocean. Then Indra agreed to churn the ocean in association with the demons and gods, as told by Lord Vishnu.

To churn the sea, the Mandarachal mountain was made a churner and Nagraj Vasuki was netted. The gods and the demons, forgetting their differences, uprooted Mandarachal and took him towards the sea, but they could not take him far. Then Lord Vishnu placed Mandarachal on the beach. The gods and demons made Mandarachal into the sea and made Nagaraja Vasuki a leader.

But with no base below Mandarachal, he started drowning in the sea. Seeing this, Lord Vishnu took the form of a giant kurma (turtle) and became the basis of Mandarachal in the sea. Mandarachal started moving fast on the huge back of Lord Kurma and thus the sea churning was completed.

12- Lord Dhanvantari:
According to religious texts, when the gods and the demons together churned the ocean, the first poisonous substance came out of it, which was consumed by Lord Shiva. After this, high churning horse, Goddess Lakshmi, Airavat elephant, Kalpa tree, Apsaras, and many other gems came out of the ocean churning. In the end, Lord Dhanvantari appeared with the nectar urn. This Dhanvantari is considered an incarnation of Lord Vishnu. He is also considered the master of medicines.

13- Mohini Avatar:
According to religious texts, Dhanvantari came out with the nectar urn at the end of the sea churning. Discipline dissolved as soon as Amrit was found. The Gods said we should take it, the demons said that we should take it. In this pull, Indra’s son Jayant ran away with Amrit Kumbh. All the demons and gods also ran after him. There was a fierce attack between Asuras and Gods.

The Gods got upset and went to Lord Vishnu. Then Lord Vishnu incarnated Mohini. God fascinated everyone in the form of a siren. Mohini listened to the deity and the asura and said that if I give this nectar to the urn, I will in turn make the deity and the asura drink Amrit. Both agreed. The gods sat on one side and the demons on the other.

Then Lord Vishnu, who was in the form of Mohini, started making nectar to the gods and demons while singing sweet songs and dancing. In reality, Mohini Amrit was drinking only the gods, while the demons were thinking that they were also drinking nectar. In this way, Lord Vishnu did well to the gods by taking a Mohini avatar.

14- Lord Narsingh:
Lord Vishnu had killed Narasimha incarnation as King Hiranyakashipu of the demons. The story of this incarnation is as follows- According to religious texts, Hiranyakashipu, the king of the demons, considered himself stronger than God. He had the gift of dying from man, god, bird, animal, neither in the day, nor at night, nor on earth, nor in the sky, nor by weapon, nor by a weapon. Whoever worshiped Lord Vishnu during his reign was punished. His son’s name was Prahlad. Prahlada was an ardent devotee of Lord Vishnu since childhood. When Hiranyakashipu came to know about this, he became very angry and tried to convince Prahlada, but even when Prahlad did not believe Hiranyakashipu gave him the death penalty.

Every time he survived the miracle of Lord Vishnu. Hiranyakashipu’s sister Holika, who had the boon of not burning with fire, sat in blazing fire with Prahlada. Even then by the grace of Lord Vishnu Prahlad survived and Holika was burnt. When Hiranyakashipu was about to kill Prahlad himself, Lord Vishnu appeared from the pillar with the incarnation of Narasimha and killed Hiranyakashipu with his nails.

15- Vamana Avatar:
In Satyayuga, Prahlada’s grandson Daityaraj Bali took control of heaven. All the gods went to Lord Vishnu to avoid this calamity. Then Lord Vishnu said that I myself will be born from the womb of Devmata Aditi and will give you the kingdom of heaven. After some time Lord Vishnu incarnated Vamana.

Once, when Bali was performing a great yajna, Lord Vaman went to the sacrificial fire and asked for three feet of land from King Bali. King Bali’s mentor Shukracharya understood the Lila of God and refused to donate to Bali. But Bali still pledged to donate three feet of land to Lord Vamana. Lord Vamana took a huge form and measured the earth in one step and heaven in the second step. When there was no place left to keep the third step, Bali asked Lord Vamana to keep the step on his head. He reached Suthalok by placing a pug on Bali’s head. Seeing the greatness of the sacrifice, God also made him the lord of Suthaloka. In this way, Lord Vamana helped the gods and returned them to heaven.

16- Hayagreeva Avatar:
According to the religious texts, once two powerful demons named Madhu and Kaitabh reached the abyss after killing the Vedas from Brahma. After the demise of the Vedas, Brahmaji became very sad and reached Lord Vishnu. Then God incarnated Hayagreeva. In this incarnation, the neck and face of Lord Vishnu were like a horse. Then Lord Hayagreeva reached the abyss and killed Madhu-Catabh and gave Vedas again to Lord Brahma.

17- Srihari avatar:
According to religious texts, in ancient times a powerful Gajendra lived with his arms in the valley of the mountain called Trikoot. Once he went to bathe in the pond with his arms. There a crocodile grabbed his leg and started pulling it underwater. The struggle of Gajendra and crocodile continued for a thousand years. Finally, Gajendra collapsed and he meditated on Lord Srihari. Hearing the praise of Gajendra, Lord Srihari appeared and killed the crocodile with his chakra. Lord Srihari saved Gajendra and made him his councilor.

18- Parashurama Avatar:
According to Hinduism texts, Parashurama was one of the major incarnations of Lord Vishnu. There are two stories regarding the birth of Lord Parashurama. According to Harivanshpuran, one of those stories is as follows:

In ancient times, the city of Mahishmati was ruled by the powerful Haiyavanshi Kshatriya Kartavirya Arjuna (Sahastrabahu). He was very arrogant and also tyrannical. Once Agnidev requested him to take food. Then Sahastrabahu came in arrogance and said that you can get food from wherever you want, everywhere is my rule. Then Agnidev started burning forests. In a forest, the sage Aapava was doing penance. Agni also burnt his ashram. Enraged by this, the sage cursed Sahastrabahu that Lord Vishnu would be born as Parashurama and destroy not only Sahastrabahu but all the Kshatriyas. Thus Lord Vishnu was born as the fifth son of Maharishi Jamadagri in the Bhargava clan.

19- Maharishi Ved Vyas:
In the Puranas, Maharishi Ved Vyasa is also considered as part of Lord Vishnu. Lord Vyasa was the Kalavatar of Narayana. He appeared as the son of the great sage Maharishi Parashar. He was born on the island of Yamuna from the womb of Satyavati, the pupil of Kaivartaraja. His body color was black. Therefore, he was also named Krishnadvapayan. Seeing the age and power of humans, they did the portions of the Vedas. Therefore they are also called Ved Vyas. He also composed the Mahabharata text.

20- Swan Avatar:
Once Lord Brahma was sitting in his assembly. Then his psyche son Sanakadi arrived there and started discussing the salvation of humans with Lord Brahma. Then Lord Vishnu appeared there as Mahahansa and he removed the doubts of Sunkadi Munis. After this everyone worshiped Lord Hans. After this Mahasanupdhari Shri Bhagavan went invisible and went to his holy abode.

21- Shri Ram avatar:
The demon king Ravana had great terror in Tretayuga. Gods were also afraid of him. For his slaughter, Lord Vishnu was born as a son from the womb of Mother Kaushalya at King Dasharatha. In this incarnation, Lord Vishnu slaughtered many demons and lived his life by following Maryada.

Went to exile at father’s behest. While suffering from exile, Raksharaj Raja took away his wife Sita. In search of Sita, Lord reached Lanka, where there was a fierce battle between Lord Rama and Ravana in which Ravana was killed. Thus Lord Vishnu took the Rama avatar to free the fear of the gods.

22- Sri Krishna Avatar:
In Dwaparyug, Lord Vishnu took the Shri Krishna incarnation and destroyed the unrighteous. Lord Krishna was born in a prison. His father’s name was Vasudev and his mother’s name was Devaki. Lord Krishna performed many miracles in this incarnation and annihilated the wicked.

Lord Krishna also killed Kansa. In the war of Mahabharata, became the charioteer of Arjuna and gave the knowledge of Gita to the world. Dharmaraja established Dharma by making Yudhishthira king. This incarnation of Lord Vishnu is considered the best of all incarnations.

23- Buddha avatar:
According to religious texts, Gautama Buddha, the originator of Buddhism, was also an incarnation of Lord Vishnu, but Lord Buddha, described in the Puranas, is said to have been born in Kikat near Gaya and his father’s name is said to be Ajna. This passage is of the Buddhavatar mentioned in the Puranas.

At one time the power of the demons increased greatly. The gods also started running away from their fear. Desiring the kingdom, the demons asked Devraj Indra that our empire should remain stable, what is the solution for this. Indra then stated with a pure sense that Yajna and Vedic conduct is necessary for stable governance. Then the demons started performing Vedic conduct and Mahayagya, which further increased their power. Then all the gods went to Lord Vishnu. Then Lord Vishnu took the form of Buddha for the benefit of the gods. They had a market in their hands and they walked along the path.

Thus Lord Buddha approached the demons and preached to them that sacrificing yagna is a sin. Yajna causes life violence. Many beings are consumed by the fire of sacrifice. The demons were impressed by the teachings of Lord Buddha. He stopped performing Yajna and Vedic conduct. This reduced his power and the gods attacked him and regained his kingdom.

24- Kalki avatar:

According to religious texts, Lord Vishnu will incarnate in Kalki form in Kali Yuga. Kalki’s avatar will be in the jurisdiction of Kali Yuga and Satyuga. This avatar will consist of 64 arts. According to the Puranas, Lord Kalki will be born as a son of an ascetic Brahmin named Vishnusisha at a place called Shambhal in Moradabad district of Uttar Pradesh. Kalki, riding a horse named Devadatta, will destroy the sinners from the world and re-establish religion.

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