द्रौपदी चीरहरण ~ महाभारत

द्रौपदी चीरहरण ~ महाभारत

दुर्योधन द्वारा विदुर को आज्ञा दी गई वह द्रौपदी को ले आये। इस पर विदुर ने कहा कि- “अपने-अपको दाँव पर हारने के बाद युधिष्ठिर द्रौपदी को दाँव पर लगाने के अधिकारी नहीं रह जाते।” किंतु धृतराष्ट्र ने प्रतिकामी नामक सेवक को द्रौपदी को वहाँ ले आने के लिए भेजा।

द्रौपदी ने उससे प्रश्न किया कि- “धर्मपुत्र ने पहले कौन-सा दाँव हारा है, स्वयं अपना अथवा द्रौपदी का।” दुर्योंधन ने क्रुद्ध होकर दु:शासन से कहा कि वह द्रौपदी को सभाभवन में लेकर आये।

युधिष्ठिर ने गुप्त रूप से एक विश्वस्त सेवक को द्रौपदी के पास भेजा कि यद्यपि वह रजस्वला है तथा एक वस्त्र में है, वह वैसी ही उठ कर चली आये। सभा में पूज्य वर्ग के सामने उसका उस दशा में कलपते हुए पहुँचना दुर्योधन आदि के पापों को व्यक्त करने के लिए पर्याप्त होगा।

महाभारत की सम्पूर्ण कथा पढ़ें :

महाभारत की सम्पूर्ण कथा! Complete Mahabharata Story In Hindi

द्रौपदी सभा में पहुँची तो दु:शासन ने उसे स्त्री वर्ग की ओर नहीं जाने दिया तथा उसके बाल खींचकर कहा- “हमने तुझे जुए में जीता है। अत: तुझे अपनी दासियों में रखेंगे।”

द्रौपदी ने समस्त कुरुवंशियों के शौर्य, धर्म तथा नीति को ललकारा और श्रीकृष्ण को मन-ही-मन स्मरण कर अपनी लज्जा की रक्षा के लिए प्रार्थना की। सब मौन रहे, किंतु दुर्योधन के छोटे भाई विकर्ण ने द्रौपदी का पक्ष लेते हुए कहा कि- “हारा हुआ युधिष्ठिर उसे दाँव पर नहीं रख सकता था।”

किंतु किसी ने उसकी बात नहीं सुनी। कर्ण के उकसाने से दु:शासन ने द्रौपदी को निर्वस्त्र करने की चेष्टा की। उधर विलाप करती हुई द्रौपदी ने पांडवों की ओर देखा तो भीम ने युधिष्ठिर से कहा कि- “वह उनके हाथ जला देना चाहता है, जिनसे उन्होंने जुआ खेला था।” अर्जुन ने उसे शांत किया। भीम ने शपथ ली कि वह दु:शासन की छाती का ख़ून पियेगा तथा दुर्योधन की जंघा को अपनी गदा से नष्ट कर डालेगा।

द्रौपदी ने इस विकट विपत्ति में श्रीकृष्ण का स्मरण किया। श्रीकृष्ण की कृपा से अनेक वस्त्र वहाँ प्रकट हुए, जिनसे द्रौपदी आच्छादित रही, फलत: उसके वस्त्र खींचकर उतारते हुए भी दु:शासन उसे नग्न नहीं कर पाया।

सभा में बार-बार कार्य के अनौचित्य अथवा औचित्य पर विवाद छिड़ जाता था। दुर्योधन ने पांडवों को मौन देखकर ‘द्रौपदी को दाँव में हारे जाने की बात’, उचित है अथवा अनुचित, इसका निर्णय भीम, अर्जुन, नकुल तथा सहदेव पर छोड़ दिया। अर्जुन तथा भीम ने कहा कि- “जो व्यक्ति स्वयं को दांव में हार चुका है, वह किसी अन्य वस्तु को दाँव पर रख ही नहीं सकता था।”

धृतराष्ट्र ने सभा की रग पहचानकर दुर्योधन को फटकारा तथा द्रौपदी से तीन वर मांगने के लिए कहा। द्रौपदी ने पहले वर से युधिष्ठिर की दासभाव से मुक्ति मांगी ताकि भविष्य में उसका पुत्र प्रतिविंध्य दास पुत्र न कहलाए।

दूसरे वर से भीम, अर्जुन, नकुल तथा सहदेव की, शस्त्रों तथा रथ सहित दासभाव से मुक्ति मांगी। तीसरा वर मांगने के लिए वह तैयार ही नहीं हुई, क्योंकि उसके अनुसार क्षत्रिय स्त्रियाँ दो वर मांगने की ही अधिकारिणी होती हैं।

धृतराष्ट्र ने उनसे संपूर्ण विगत को भूलकर अपना स्नेह बनाए रखने के लिए कहा। साथ ही उन्हें खांडव वन में जाकर अपना राज्य भोगने की अनुमति दी। धृतराष्ट्र ने उनके खांडव वन जाने से पूर्व, दुर्योधन की प्रेरणा से, उन्हें एक बार फिर से जुआ खेलने की आज्ञा दी। यह तय हुआ कि एक ही दाँव रखा जायेगा। पांडव अथवा धृतराष्ट्र पुत्रों में से जो भी हार जायेंगे, वे मृगचर्म धारण कर बारह वर्ष वनवास करेंगे और एक वर्ष अज्ञातवास में रहेंगे। उस एक वर्ष में यदि उन्हें पहचान लिया गया तो फिर से बारह वर्ष का वनवास ग्रहण करेंगे।

भीष्म, विदुर, द्रोणाचार्य आदि के रोकने पर भी द्यूतक्रीड़ा हुई, जिसमें पांडव हार गये। शकुनि द्वारा कपटपूर्वक खेलने से कौरव विजयी हुए। वनगमन से पूर्व पांडवों ने शपथ ली कि वे समस्त शत्रुओं का नाश करके ही चैन की सांस लेंगे।

श्रीधौम्य के नेतृत्व में पांडवों ने द्रौपदी को साथ लेकर वन के लिए प्रस्थान किया। श्रीधौम्य साम मन्त्रों का गान करते हुए आगे की ओर बढ़े। वे कहकर गये थे कि युद्ध में कौरवों के मारे जाने पर उनके पुरोहित भी इसी प्रकार साम गान करेंगे। युधिष्ठिर ने अपना मुंह ढका हुआ था। भीम अपने बाहु की ओर देख रहा था। अर्जुन रेत बिखेरता जा रहा था। सहदेव ने मुंह पर मिट्टी मली हुई थी। नकुल ने बदन पर मिट्टी मल रखी थी। द्रौपदी ने बाल खोले हुए थे, उन्हीं से मुंह ढककर विलाप कर रही थी।

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Draupadi Chiraharan ~ Mahabharata

Vidur was ordered by Duryodhana to bring Draupadi. Vidur said on this – “Yudhishthira Draupadi is no longer able to stake himself after losing himself at stake.” But Dhritarashtra sent a servant named Pratami to bring Draupadi there.

Draupadi questioned him, “Which bet has Dharmaputra lost first, his own or that of Draupadi.” Duryodhan got angry and told the government that he brought Draupadi to the synagogue.

Yudhishthira secretly sent a trusted servant to Draupadi saying that although he is a menstruator and in a robe, he got up and left. His arrival in front of the revered class in the gathering in that condition would be sufficient to express the sins of Duryodhana etc.

Read the complete story of Mahabharata:

Complete story of Mahabharata! Complete Mahabharata Story In Hindi

When Draupadi reached the assembly, the misery did not let her go towards the female class and pulled her hair and said – “We have won you in gambling. Therefore, will keep you in your maids.”

Draupadi defied the valor, religion and policy of all the Kuruvanshis and prayed to Krishna to save his shame after remembering him. All remained silent, but Duryodhana’s younger brother Vikarna took the side of Draupadi, saying that “The defeated Yudhishthira could not keep him at stake.”

But nobody listened to him. Due to Karna’s instigation, the misgovernance tried to strip Draupadi. While Draupadi looked at the Pandavas while mourning, Bhima told Yudhishthira that “he wants to burn his hands with whom he gambled.” Arjuna pacified him. Bhima swore that he would drink the chest of sorrow and destroy Duryodhana’s thigh with his mace.

Draupadi remembered Sri Krishna in this terrible calamity. By the grace of Sri Krishna, many clothes appeared there, which kept Draupadi covered, consequently, while pulling her clothes off, the misery did not make her naked.

In the assembly, there were frequent disputes over the impropriety or justification of the work. Duryodhana left the decision to Bhima, Arjuna, Nakula and Sahadeva to see the Pandavas silently, ‘Draupadi being at stake’, fair or unfair. Arjuna and Bhima said that- “The person who has lost himself in the stakes, he could not keep any other thing at stake.”

Dhritarashtra, recognizing the essence of the gathering, rebuked Duryodhana and asked Draupadi to ask for three brides. Draupadi first sought liberation from Yudhishthira’s slavery from the groom so that in future his son would not be called Pratibindhya Das son.

Bhima, Arjuna, Nakula and Sahadev from the second groom, with weapons and chariot, sought freedom from slavery. She was not ready to ask for a third groom, because according to her, Kshatriya women are entitled to ask for two brides.

Dhritarashtra asked him to forget his entire past and maintain his affection. At the same time, he was allowed to enjoy his kingdom by going to Khandav forest. Dhritarashtra once again ordered him to gamble before he left for Khandav Forest, inspired by Duryodhana. It was decided that only one stake would be kept. Whoever loses among the sons of Pandava or Dhritarashtra, they will wear deer for twelve years and remain in exile for one year. If he is recognized in that one year, he will again take twelve years of exile.

At the stop of Bhishma, Vidur, Dronacharya etc., there was also a mutiny, in which the Pandavas were defeated. The Kauravas were victorious by Shakuni playing fraudulently. Before the exodus, the Pandavas took an oath that they would breathe peace by destroying all enemies.

Under the leadership of Sridhaumya, the Pandavas took Draupadi and left for the forest. Sridhaumya proceeded further singing the mantras. He went on to say that the priests would sing the same way after the Kauravas were killed in the war. Yudhishthira covered his mouth. Bhima was looking at his arm. Arjun was spreading the sand. Sahadev rubbed mud on the mouth. Nakula had put mud on his body. Draupadi was covering her mouth and mourning with them.

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