God श्री भगवान्‌ का प्राकट्य और बाललीला का आनंद

God श्री भगवान्‌ का प्राकट्य और बाललीला का आनंद

दोहा :
* जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल।
चर अरु अचर हर्षजुत राम जनम सुखमूल॥190॥
भावार्थ:-योग, लग्न, ग्रह, वार और तिथि सभी अनुकूल हो गए। जड़ और चेतन सब हर्ष से भर गए। (क्योंकि) श्री राम का जन्म सुख का मूल है॥190॥
चौपाई :
* नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता॥
मध्यदिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक बिश्रामा॥1॥
भावार्थ:-पवित्र चैत्र का महीना था, नवमी तिथि थी। शुक्ल पक्ष और भगवान का प्रिय अभिजित्‌ मुहूर्त था। दोपहर का समय था। न बहुत सर्दी थी, न धूप (गरमी) थी। वह पवित्र समय सब लोकों को शांति देने वाला था॥1॥
* सीतल मंद सुरभि बह बाऊ। हरषित सुर संतन मन चाऊ॥
बन कुसुमित गिरिगन मनिआरा। स्रवहिं सकल सरिताऽमृतधारा॥2॥
भावार्थ:-शीतल, मंद और सुगंधित पवन बह रहा था। देवता हर्षित थे और संतों के मन में (बड़ा) चाव था। वन फूले हुए थे, पर्वतों के समूह मणियों से जगमगा रहे थे और सारी नदियाँ अमृत की धारा बहा रही थीं॥2॥

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* सो अवसर बिरंचि जब जाना। चले सकल सुर साजि बिमाना॥
गगन बिमल संकुल सुर जूथा। गावहिं गुन गंधर्ब बरूथा॥3॥
भावार्थ:-जब ब्रह्माजी ने वह (भगवान के प्रकट होने का) अवसर जाना तब (उनके समेत) सारे देवता विमान सजा-सजाकर चले। निर्मल आकाश देवताओं के समूहों से भर गया। गंधर्वों के दल गुणों का गान करने लगे॥3॥
* बरषहिं सुमन सुअंजुलि साजी। गहगहि गगन दुंदुभी बाजी॥
अस्तुति करहिं नाग मुनि देवा। बहुबिधि लावहिं निज निज सेवा॥4॥
भावार्थ:-और सुंदर अंजलियों में सजा-सजाकर पुष्प बरसाने लगे। आकाश में घमाघम नगाड़े बजने लगे। नाग, मुनि और देवता स्तुति करने लगे और बहुत प्रकार से अपनी-अपनी सेवा (उपहार) भेंट करने लगे॥4॥
दोहा :
* सुर समूह बिनती करि पहुँचे निज निज धाम।
जगनिवास प्रभु प्रगटे अखिल लोक बिश्राम॥191
भावार्थ:-देवताओं के समूह विनती करके अपने-अपने लोक में जा पहुँचे। समस्त लोकों को शांति देने वाले, जगदाधार प्रभु प्रकट हुए॥191॥
छन्द :
* भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥
लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुजचारी।
भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी॥1॥
भावार्थ:-दीनों पर दया करने वाले, कौसल्याजी के हितकारी कृपालु प्रभु प्रकट हुए। मुनियों के मन को हरने वाले उनके अद्भुत रूप का विचार करके माता हर्ष से भर गई। नेत्रों को आनंद देने वाला मेघ के समान श्याम शरीर था, चारों भुजाओं में अपने (खास) आयुध (धारण किए हुए) थे, (दिव्य) आभूषण और वनमाला पहने थे, बड़े-बड़े नेत्र थे। इस प्रकार शोभा के समुद्र तथा खर राक्षस को मारने वाले भगवान प्रकट हुए॥1॥
* कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता।
माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता॥
करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता।
सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता॥2॥
भावार्थ:-दोनों हाथ जोड़कर माता कहने लगी- हे अनंत! मैं किस प्रकार तुम्हारी स्तुति करूँ। वेद और पुराण तुम को माया, गुण और ज्ञान से परे और परिमाण रहित बतलाते हैं। श्रुतियाँ और संतजन दया और सुख का समुद्र, सब गुणों का धाम कहकर जिनका गान करते हैं, वही भक्तों पर प्रेम करने वाले लक्ष्मीपति भगवान मेरे कल्याण के लिए प्रकट हुए हैं॥2॥
* ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै।
मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै॥
उपजा जब ग्याना प्रभु मुसुकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै।
कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै॥3॥
भावार्थ:-वेद कहते हैं कि तुम्हारे प्रत्येक रोम में माया के रचे हुए अनेकों ब्रह्माण्डों के समूह (भरे) हैं। वे तुम मेरे गर्भ में रहे- इस हँसी की बात के सुनने पर धीर (विवेकी) पुरुषों की बुद्धि भी स्थिर नहीं रहती (विचलित हो जाती है)। जब माता को ज्ञान उत्पन्न हुआ, तब प्रभु मुस्कुराए। वे बहुत प्रकार के चरित्र करना चाहते हैं। अतः उन्होंने (पूर्व जन्म की) सुंदर कथा कहकर माता को समझाया, जिससे उन्हें पुत्र का (वात्सल्य) प्रेम प्राप्त हो (भगवान के प्रति पुत्र भाव हो जाए)॥3॥
* माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा।
कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा॥
सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा।
यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा॥4॥
भावार्थ:-माता की वह बुद्धि बदल गई, तब वह फिर बोली- हे तात! यह रूप छोड़कर अत्यन्त प्रिय बाललीला करो, (मेरे लिए) यह सुख परम अनुपम होगा। (माता का) यह वचन सुनकर देवताओं के स्वामी सुजान भगवान ने बालक (रूप) होकर रोना शुरू कर दिया। (तुलसीदासजी कहते हैं-) जो इस चरित्र का गान करते हैं, वे श्री हरि का पद पाते हैं और (फिर) संसार रूपी कूप में नहीं गिरते॥4॥
दोहा :
* बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार॥192॥
भावार्थ:-ब्राह्मण, गो, देवता और संतों के लिए भगवान ने मनुष्य का अवतार लिया। वे (अज्ञानमयी, मलिना) माया और उसके गुण (सत्‌, रज, तम) और (बाहरी तथा भीतरी) इन्द्रियों से परे हैं। उनका (दिव्य) शरीर अपनी इच्छा से ही बना है (किसी कर्म बंधन से परवश होकर त्रिगुणात्मक भौतिक पदार्थों के द्वारा नहीं)॥192॥
चौपाई :
* सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी। संभ्रम चलि आईं सब रानी॥
हरषित जहँ तहँ धाईं दासी। आनँद मगन सकल पुरबासी॥1॥
भावार्थ:-बच्चे के रोने की बहुत ही प्यारी ध्वनि सुनकर सब रानियाँ उतावली होकर दौड़ी चली आईं। दासियाँ हर्षित होकर जहाँ-तहाँ दौड़ीं। सारे पुरवासी आनंद में मग्न हो गए॥1॥
* दसरथ पुत्रजन्म सुनि काना। मानहु ब्रह्मानंद समाना॥
परम प्रेम मन पुलक सरीरा। चाहत उठन करत मति धीरा॥2॥
भावार्थ:-राजा दशरथजी पुत्र का जन्म कानों से सुनकर मानो ब्रह्मानंद में समा गए। मन में अतिशय प्रेम है, शरीर पुलकित हो गया। (आनंद में अधीर हुई) बुद्धि को धीरज देकर (और प्रेम में शिथिल हुए शरीर को संभालकर) वे उठना चाहते हैं॥2॥
* जाकर नाम सुनत सुभ होई। मोरें गृह आवा प्रभु सोई॥
परमानंद पूरि मन राजा। कहा बोलाइ बजावहु बाजा॥3॥
भावार्थ:-जिनका नाम सुनने से ही कल्याण होता है, वही प्रभु मेरे घर आए हैं। (यह सोचकर) राजा का मन परम आनंद से पूर्ण हो गया। उन्होंने बाजे वालों को बुलाकर कहा कि बाजा बजाओ॥3॥
* गुर बसिष्ठ कहँ गयउ हँकारा। आए द्विजन सहित नृपद्वारा॥
अनुपम बालक देखेन्हि जाई। रूप रासि गुन कहि न सिराई॥4॥
भावार्थ:-गुरु वशिष्ठजी के पास बुलावा गया। वे ब्राह्मणों को साथ लिए राजद्वार पर आए। उन्होंने जाकर अनुपम बालक को देखा, जो रूप की राशि है और जिसके गुण कहने से समाप्त नहीं होते॥4॥
दोहा :
* नंदीमुख सराध करि जातकरम सब कीन्ह।
हाटक धेनु बसन मनि नृप बिप्रन्ह कहँ दीन्ह॥193॥
भावार्थ:-फिर राजा ने नांदीमुख श्राद्ध करके सब जातकर्म-संस्कार आदि किए और ब्राह्मणों को सोना, गो, वस्त्र और मणियों का दान दिया॥193॥
चौपाई :
* ध्वज पताक तोरन पुर छावा। कहि न जाइ जेहि भाँति बनावा॥
सुमनबृष्टि अकास तें होई। ब्रह्मानंद मगन सब लोई॥1॥
भावार्थ:-ध्वजा, पताका और तोरणों से नगर छा गया। जिस प्रकार से वह सजाया गया, उसका तो वर्णन ही नहीं हो सकता। आकाश से फूलों की वर्षा हो रही है, सब लोग ब्रह्मानंद में मग्न हैं॥1॥
* बृंद बृंद मिलि चलीं लोगाईं। सहज सिंगार किएँ उठि धाईं॥
कनक कलस मंगल भरि थारा। गावत पैठहिं भूप दुआरा॥2॥
भावार्थ:-स्त्रियाँ झुंड की झुंड मिलकर चलीं। स्वाभाविक श्रृंगार किए ही वे उठ दौड़ीं। सोने का कलश लेकर और थालों में मंगल द्रव्य भरकर गाती हुईं राजद्वार में प्रवेश करती हैं॥2॥

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* करि आरति नेवछावरि करहीं। बार बार सिसु चरनन्हि परहीं॥
मागध सूत बंदिगन गायक। पावन गुन गावहिं रघुनायक॥3॥
भावार्थ:-वे आरती करके निछावर करती हैं और बार-बार बच्चे के चरणों पर गिरती हैं। मागध, सूत, वन्दीजन और गवैये रघुकुल के स्वामी के पवित्र गुणों का गान करते हैं॥3॥
* सर्बस दान दीन्ह सब काहू। जेहिं पावा राखा नहिं ताहू॥
मृगमद चंदन कुंकुम कीचा। मची सकल बीथिन्ह बिच बीचा॥4॥
भावार्थ:-राजा ने सब किसी को भरपूर दान दिया। जिसने पाया उसने भी नहीं रखा (लुटा दिया)। (नगर की) सभी गलियों के बीच-बीच में कस्तूरी, चंदन और केसर की कीच मच गई॥4॥
दोहा :
* गृह गृह बाज बधाव सुभ प्रगटे सुषमा कंद।
हरषवंत सब जहँ तहँ नगर नारि नर बृंद॥194॥
भावार्थ:-घर-घर मंगलमय बधावा बजने लगा, क्योंकि शोभा के मूल भगवान प्रकट हुए हैं। नगर के स्त्री-पुरुषों के झुंड के झुंड जहाँ-तहाँ आनंदमग्न हो रहे हैं॥194॥
चौपाई :
* कैकयसुता सुमित्रा दोऊ। सुंदर सुत जनमत भैं ओऊ॥
वह सुख संपति समय समाजा। कहि न सकइ सारद अहिराजा॥1॥
भावार्थ:-कैकेयी और सुमित्रा- इन दोनों ने भी सुंदर पुत्रों को जन्म दिया। उस सुख, सम्पत्ति, समय और समाज का वर्णन सरस्वती और सर्पों के राजा शेषजी भी नहीं कर सकते॥1॥
* अवधपुरी सोहइ एहि भाँती। प्रभुहि मिलन आई जनु राती॥
देखि भानु जनु मन सकुचानी। तदपि बनी संध्या अनुमानी॥2॥
भावार्थ:-अवधपुरी इस प्रकार सुशोभित हो रही है, मानो रात्रि प्रभु से मिलने आई हो और सूर्य को देखकर मानो मन में सकुचा गई हो, परन्तु फिर भी मन में विचार कर वह मानो संध्या बन (कर रह) गई हो॥2॥
* अगर धूप बहु जनु अँधिआरी। उड़इ अबीर मनहुँ अरुनारी॥
मंदिर मनि समूह जनु तारा। नृप गृह कलस सो इंदु उदारा॥3॥
भावार्थ:-अगर की धूप का बहुत सा धुआँ मानो (संध्या का) अंधकार है और जो अबीर उड़ रहा है, वह उसकी ललाई है। महलों में जो मणियों के समूह हैं, वे मानो तारागण हैं। राज महल का जो कलश है, वही मानो श्रेष्ठ चन्द्रमा है॥3॥
* भवन बेदधुनि अति मृदु बानी। जनु खग मुखर समयँ जनु सानी॥
कौतुक देखि पतंग भुलाना। एक मास तेइँ जात न जाना॥4॥
भावार्थ:-राजभवन में जो अति कोमल वाणी से वेदध्वनि हो रही है, वही मानो समय से (समयानुकूल) सनी हुई पक्षियों की चहचहाहट है। यह कौतुक देखकर सूर्य भी (अपनी चाल) भूल गए। एक महीना उन्होंने जाता हुआ न जाना (अर्थात उन्हें एक महीना वहीं बीत गया)॥4॥
दोहा :
* मास दिवस कर दिवस भा मरम न जानइ कोइ।
रथ समेत रबि थाकेउ निसा कवन बिधि होइ॥195॥
भावार्थ:- महीने भर का दिन हो गया। इस रहस्य को कोई नहीं जानता। सूर्य अपने रथ सहित वहीं रुक गए, फिर रात किस तरह होती॥195॥
चौपाई :
* यह रहस्य काहूँ नहिं जाना। दिनमनि चले करत गुनगाना॥
देखि महोत्सव सुर मुनि नागा। चले भवन बरनत निज भागा॥1॥
भावार्थ:-यह रहस्य किसी ने नहीं जाना। सूर्यदेव (भगवान श्री रामजी का) गुणगान करते हुए चले। यह महोत्सव देखकर देवता, मुनि और नाग अपने भाग्य की सराहना करते हुए अपने-अपने घर चले॥1॥
* औरउ एक कहउँ निज चोरी। सुनु गिरिजा अति दृढ़ मति तोरी॥
काकभुसुंडि संग हम दोऊ। मनुजरूप जानइ नहिं कोऊ॥2॥
भावार्थ:-हे पार्वती! तुम्हारी बुद्धि (श्री रामजी के चरणों में) बहुत दृढ़ है, इसलिए मैं और भी अपनी एक चोरी (छिपाव) की बात कहता हूँ, सुनो। काकभुशुण्डि और मैं दोनों वहाँ साथ-साथ थे, परन्तु मनुष्य रूप में होने के कारण हमें कोई जान न सका॥2॥
* परमानंद प्रेम सुख फूले। बीथिन्ह फिरहिं मगन मन भूले॥
यह सुभ चरित जान पै सोई। कृपा राम कै जापर होई॥3॥
भावार्थ:-परम आनंद और प्रेम के सुख में फूले हुए हम दोनों मगन मन से (मस्त हुए) गलियों में (तन-मन की सुधि) भूले हुए फिरते थे, परन्तु यह शुभ चरित्र वही जान सकता है, जिस पर श्री रामजी की कृपा हो॥3॥
* तेहि अवसर जो जेहि बिधि आवा। दीन्ह भूप जो जेहि मन भावा॥
गज रथ तुरग हेम गो हीरा। दीन्हे नृप नानाबिधि चीरा॥4॥
भावार्थ:-उस अवसर पर जो जिस प्रकार आया और जिसके मन को जो अच्छा लगा, राजा ने उसे वही दिया। हाथी, रथ, घोड़े, सोना, गायें, हीरे और भाँति-भाँति के वस्त्र राजा ने दिए॥4॥
दोहा :
* मन संतोषे सबन्हि के जहँ तहँ देहिं असीस।
सकल तनय चिर जीवहुँ तुलसिदास के ईस॥196॥
भावार्थ:-राजा ने सबके मन को संतुष्ट किया। (इसी से) सब लोग जहाँ-तहाँ आशीर्वाद दे रहे थे कि तुलसीदास के स्वामी सब पुत्र (चारों राजकुमार) चिरजीवी (दीर्घायु) हों॥196॥
चौपाई :
* कछुक दिवस बीते एहि भाँती। जात न जानिअ दिन अरु राती॥
नामकरन कर अवसरु जानी। भूप बोलि पठए मुनि ग्यानी॥1॥
भावार्थ:-इस प्रकार कुछ दिन बीत गए। दिन और रात जाते हुए जान नहीं पड़ते। तब नामकरण संस्कार का समय जानकर राजा ने ज्ञानी मुनि श्री वशिष्ठजी को बुला भेजा॥1॥
* करि पूजा भूपति अस भाषा। धरिअ नाम जो मुनि गुनि राखा॥
इन्ह के नाम अनेक अनूपा। मैं नृप कहब स्वमति अनुरूपा॥2॥
भावार्थ:-मुनि की पूजा करके राजा ने कहा- हे मुनि! आपने मन में जो विचार रखे हों, वे नाम रखिए। (मुनि ने कहा-) हे राजन्‌! इनके अनुपम नाम हैं, फिर भी मैं अपनी बुद्धि के अनुसार कहूँगा॥2॥
*जो आनंद सिंधु सुखरासी। सीकर तें त्रैलोक सुपासी॥
सो सुखधाम राम अस नामा। अखिल लोक दायक बिश्रामा॥3॥
भावार्थ:-ये जो आनंद के समुद्र और सुख की राशि हैं, जिस (आनंदसिंधु) के एक कण से तीनों लोक सुखी होते हैं, उन (आपके सबसे बड़े पुत्र) का नाम ‘राम’ है, जो सुख का भवन और सम्पूर्ण लोकों को शांति देने वाला है॥3॥
* बिस्व भरन पोषन कर जोई। ताकर नाम भरत अस होई॥
जाके सुमिरन तें रिपु नासा। नाम सत्रुहन बेद प्रकासा॥4॥
भावार्थ:-जो संसार का भरण-पोषण करते हैं, उन (आपके दूसरे पुत्र) का नाम ‘भरत’ होगा, जिनके स्मरण मात्र से शत्रु का नाश होता है, उनका वेदों में प्रसिद्ध ‘शत्रुघ्न’ नाम है॥4॥
दोहा :
* लच्छन धाम राम प्रिय सकल जगत आधार।
गुरु बसिष्‍ठ तेहि राखा लछिमन नाम उदार॥197॥
भावार्थ:-जो शुभ लक्षणों के धाम, श्री रामजी के प्यारे और सारे जगत के आधार हैं, गुरु वशिष्‍ठजी ने उनका ‘लक्ष्मण’ ऐसा श्रेष्‍ठ नाम रखा है॥197॥
चौपाई :
* धरे नाम गुर हृदयँ बिचारी। बेद तत्व नृप तव सुत चारी॥
मुनि धन जन सरबस सिव प्राना। बाल केलि रस तेहिं सुख माना॥1॥
भावार्थ:-गुरुजी ने हृदय में विचार कर ये नाम रखे (और कहा-) हे राजन्‌! तुम्हारे चारों पुत्र वेद के तत्त्व (साक्षात्‌ परात्पर भगवान) हैं। जो मुनियों के धन, भक्तों के सर्वस्व और शिवजी के प्राण हैं, उन्होंने (इस समय तुम लोगों के प्रेमवश) बाल लीला के रस में सुख माना है॥1॥
* बारेहि ते निज हित पति जानी। लछिमन राम चरन रति मानी॥
भरत सत्रुहन दूनउ भाई। प्रभु सेवक जसि प्रीति बड़ाई॥2॥
भावार्थ:-बचपन से ही श्री रामचन्द्रजी को अपना परम हितैषी स्वामी जानकर लक्ष्मणजी ने उनके चरणों में प्रीति जोड़ ली। भरत और शत्रुघ्न दोनों भाइयों में स्वामी और सेवक की जिस प्रीति की प्रशंसा है, वैसी प्रीति हो गई॥2॥
*स्याम गौर सुंदर दोउ जोरी। निरखहिं छबि जननीं तृन तोरी॥
चारिउ सील रूप गुन धामा। तदपि अधिक सुखसागर रामा॥3॥
भावार्थ:-श्याम और गौर शरीर वाली दोनों सुंदर जोड़ियों की शोभा को देखकर माताएँ तृण तोड़ती हैं (जिसमें दीठ न लग जाए)। यों तो चारों ही पुत्र शील, रूप और गुण के धाम हैं, तो भी सुख के समुद्र श्री रामचन्द्रजी सबसे अधिक हैं॥3॥
* हृदयँ अनुग्रह इंदु प्रकासा। सूचत किरन मनोहर हासा॥
कबहुँ उछंग कबहुँ बर पलना। मातु दुलारइ कहि प्रिय ललना॥4॥
भावार्थ:-उनके हृदय में कृपा रूपी चन्द्रमा प्रकाशित है। उनकी मन को हरने वाली हँसी उस (कृपा रूपी चन्द्रमा) की किरणों को सूचित करती है। कभी गोद में (लेकर) और कभी उत्तम पालने में (लिटाकर) माता ‘प्यारे ललना!’ कहकर दुलार करती है॥4॥
दोहा :
* ब्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुन बिगत बिनोद।
सो अज प्रेम भगति बस कौसल्या कें गोद॥198॥
भावार्थ:-जो सर्वव्यापक, निरंजन (मायारहित), निर्गुण, विनोदरहित और अजन्मे ब्रह्म हैं, वही प्रेम और भक्ति के वश कौसल्याजी की गोद में (खेल रहे) हैं॥198॥

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चौपाई :
* काम कोटि छबि स्याम सरीरा। नील कंज बारिद गंभीरा॥
नअरुन चरन पंकज नख जोती। कमल दलन्हि बैठे जनु मोती॥1॥
भावार्थ:-उनके नीलकमल और गंभीर (जल से भरे हुए) मेघ के समान श्याम शरीर में करोड़ों कामदेवों की शोभा है। लाल-लाल चरण कमलों के नखों की (शुभ्र) ज्योति ऐसी मालूम होती है जैसे (लाल) कमल के पत्तों पर मोती स्थिर हो गए हों॥1॥
* रेख कुलिस ध्वज अंकुस सोहे। नूपुर धुनि सुनि मुनि मन मोहे॥
कटि किंकिनी उदर त्रय रेखा। नाभि गभीर जान जेहिं देखा॥2॥
भावार्थ:-(चरणतलों में) वज्र, ध्वजा और अंकुश के चिह्न शोभित हैं। नूपुर (पेंजनी) की ध्वनि सुनकर मुनियों का भी मन मोहित हो जाता है। कमर में करधनी और पेट पर तीन रेखाएँ (त्रिवली) हैं। नाभि की गंभीरता को तो वही जानते हैं, जिन्होंने उसे देखा है॥2॥
* भुज बिसाल भूषन जुत भूरी। हियँ हरि नख अति सोभा रूरी॥
उर मनिहार पदिक की सोभा। बिप्र चरन देखत मन लोभा॥3॥
भावार्थ:-बहुत से आभूषणों से सुशोभित विशाल भुजाएँ हैं। हृदय पर बाघ के नख की बहुत ही निराली छटा है। छाती पर रत्नों से युक्त मणियों के हार की शोभा और ब्राह्मण (भृगु) के चरण चिह्न को देखते ही मन लुभा जाता है॥3॥
* कंबु कंठ अति चिबुक सुहाई। आनन अमित मदन छबि छाई॥
दुइ दुइ दसन अधर अरुनारे। नासा तिलक को बरनै पारे॥4॥
भावार्थ:-कंठ शंख के समान (उतार-चढ़ाव वाला, तीन रेखाओं से सुशोभित) है और ठोड़ी बहुत ही सुंदर है। मुख पर असंख्य कामदेवों की छटा छा रही है। दो-दो सुंदर दँतुलियाँ हैं, लाल-लाल होठ हैं। नासिका और तिलक (के सौंदर्य) का तो वर्णन ही कौन कर सकता है॥4॥
* सुंदर श्रवन सुचारु कपोला। अति प्रिय मधुर तोतरे बोला॥
चिक्कन कच कुंचित गभुआरे। बहु प्रकार रचि मातु सँवारे॥5॥
भावार्थ:-सुंदर कान और बहुत ही सुंदर गाल हैं। मधुर तोतले शब्द बहुत ही प्यारे लगते हैं। जन्म के समय से रखे हुए चिकने और घुँघराले बाल हैं, जिनको माता ने बहुत प्रकार से बनाकर सँवार दिया है॥5॥
* पीत झगुलिआ तनु पहिराई। जानु पानि बिचरनि मोहि भाई॥
रूप सकहिं नहिं कहि श्रुति सेषा। सो जानइ सपनेहुँ जेहिं देखा॥6॥
भावार्थ:-शरीर पर पीली झँगुली पहनाई हुई है। उनका घुटनों और हाथों के बल चलना मुझे बहुत ही प्यारा लगता है। उनके रूप का वर्णन वेद और शेषजी भी नहीं कर सकते। उसे वही जानता है, जिसने कभी स्वप्न में भी देखा हो॥6॥
दोहा :
* सुख संदोह मोह पर ग्यान गिरा गोतीत।
दंपति परम प्रेम बस कर सिसुचरित पुनीत॥199॥
भावार्थ:-जो सुख के पुंज, मोह से परे तथा ज्ञान, वाणी और इन्द्रियों से अतीत हैं, वे भगवान दशरथ-कौसल्या के अत्यन्त प्रेम के वश होकर पवित्र बाललीला करते हैं॥199॥
चौपाई :
* एहि बिधि राम जगत पितु माता। कोसलपुर बासिन्ह सुखदाता॥
जिन्ह रघुनाथ चरन रति मानी। तिन्ह की यह गति प्रगट भवानी॥1॥
भावार्थ:-इस प्रकार (सम्पूर्ण) जगत के माता-पिता श्री रामजी अवधपुर के निवासियों को सुख देते हैं, जिन्होंने श्री रामचन्द्रजी के चरणों में प्रीति जोड़ी है, हे भवानी! उनकी यह प्रत्यक्ष गति है (कि भगवान उनके प्रेमवश बाललीला करके उन्हें आनंद दे रहे हैं)॥1॥
* रघुपति बिमुख जतन कर कोरी। कवन सकइ भव बंधन छोरी॥
जीव चराचर बस कै राखे। सो माया प्रभु सों भय भाखे॥2॥
भावार्थ:-श्री रघुनाथजी से विमुख रहकर मनुष्य चाहे करोड़ों उपाय करे, परन्तु उसका संसार बंधन कौन छुड़ा सकता है। जिसने सब चराचर जीवों को अपने वश में कर रखा है, वह माया भी प्रभु से भय खाती है॥2॥
* भृकुटि बिलास नचावइ ताही। अस प्रभु छाड़ि भजिअ कहु काही॥
मन क्रम बचन छाड़ि चतुराई। भजत कृपा करिहहिं रघुराई॥3॥
भावार्थ:-भगवान उस माया को भौंह के इशारे पर नचाते हैं। ऐसे प्रभु को छोड़कर कहो, (और) किसका भजन किया जाए। मन, वचन और कर्म से चतुराई छोड़कर भजते ही श्री रघुनाथजी कृपा करेंगे॥3॥
* एहि बिधि सिसुबिनोद प्रभु कीन्हा। सकल नगरबासिन्ह सुख दीन्हा॥
लै उछंग कबहुँक हलरावै। कबहुँ पालने घालि झुलावै॥4॥
भावार्थ:-इस प्रकार से प्रभु श्री रामचन्द्रजी ने बालक्रीड़ा की और समस्त नगर निवासियों को सुख दिया। कौसल्याजी कभी उन्हें गोद में लेकर हिलाती-डुलाती और कभी पालने में लिटाकर झुलाती थीं॥4॥
दोहा :
* प्रेम मगन कौसल्या निसि दिन जात न जान।
सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान॥200॥
भावार्थ:-प्रेम में मग्न कौसल्याजी रात और दिन का बीतना नहीं जानती थीं। पुत्र के स्नेहवश माता उनके बालचरित्रों का गान किया करतीं॥200॥
चौपाई :
* एक बार जननीं अन्हवाए। करि सिंगार पलनाँ पौढ़ाए॥
निज कुल इष्टदेव भगवाना। पूजा हेतु कीन्ह अस्नाना॥1॥
भावार्थ:-एक बार माता ने श्री रामचन्द्रजी को स्नान कराया और श्रृंगार करके पालने पर पौढ़ा दिया। फिर अपने कुल के इष्टदेव भगवान की पूजा के लिए स्नान किया॥1॥
* करि पूजा नैबेद्य चढ़ावा। आपु गई जहँ पाक बनावा॥
बहुरि मातु तहवाँ चलि आई। भोजन करत देख सुत जाई॥2॥
भावार्थ:-पूजा करके नैवेद्य चढ़ाया और स्वयं वहाँ गईं, जहाँ रसोई बनाई गई थी। फिर माता वहीं (पूजा के स्थान में) लौट आई और वहाँ आने पर पुत्र को (इष्टदेव भगवान के लिए चढ़ाए हुए नैवेद्य का) भोजन करते देखा॥2॥
* गै जननी सिसु पहिं भयभीता। देखा बाल तहाँ पुनि सूता॥
बहुरि आइ देखा सुत सोई। हृदयँ कंप मन धीर न होई॥3।
भावार्थ:-माता भयभीत होकर (पालने में सोया था, यहाँ किसने लाकर बैठा दिया, इस बात से डरकर) पुत्र के पास गई, तो वहाँ बालक को सोया हुआ देखा। फिर (पूजा स्थान में लौटकर) देखा कि वही पुत्र वहाँ (भोजन कर रहा) है। उनके हृदय में कम्प होने लगा और मन को धीरज नहीं होता॥3॥
* इहाँ उहाँ दुइ बालक देखा। मतिभ्रम मोर कि आन बिसेषा॥
देखि राम जननी अकुलानी। प्रभु हँसि दीन्ह मधुर मुसुकानी॥4॥
भावार्थ:-(वह सोचने लगी कि) यहाँ और वहाँ मैंने दो बालक देखे। यह मेरी बुद्धि का भ्रम है या और कोई विशेष कारण है? प्रभु श्री रामचन्द्रजी माता को घबड़ाई हुई देखकर मधुर मुस्कान से हँस दिए॥4॥
दोहा :
* देखरावा मातहि निज अद्भुत रूप अखंड।
रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड॥201॥
भावार्थ:-फिर उन्होंने माता को अपना अखंड अद्भुत रूप दिखलाया, जिसके एक-एक रोम में करोड़ों ब्रह्माण्ड लगे हुए हैं॥201॥
चौपाई :
* अगनित रबि ससि सिव चतुरानन। बहु गिरि सरित सिंधु महि कानन॥
काल कर्म गुन ग्यान सुभाऊ। सोउ देखा जो सुना न काऊ॥1॥
भावार्थ:-अगणित सूर्य, चन्द्रमा, शिव, ब्रह्मा, बहुत से पर्वत, नदियाँ, समुद्र, पृथ्वी, वन, काल, कर्म, गुण, ज्ञान और स्वभाव देखे और वे पदार्थ भी देखे जो कभी सुने भी न थे॥1॥
* देखी माया सब बिधि गाढ़ी। अति सभीत जोरें कर ठाढ़ी॥
देखा जीव नचावइ जाही। देखी भगति जो छोरइ ताही॥2॥
भावार्थ:-सब प्रकार से बलवती माया को देखा कि वह (भगवान के सामने) अत्यन्त भयभीत हाथ जोड़े खड़ी है। जीव को देखा, जिसे वह माया नचाती है और (फिर) भक्ति को देखा, जो उस जीव को (माया से) छुड़ा देती है॥2॥
* तन पुलकित मुख बचन न आवा। नयन मूदि चरननि सिरु नावा॥
बिसमयवंत देखि महतारी। भए बहुरि सिसुरूप खरारी॥3॥
भावार्थ:-(माता का) शरीर पुलकित हो गया, मुख से वचन नहीं निकलता। तब आँखें मूँदकर उसने श्री रामचन्द्रजी के चरणों में सिर नवाया। माता को आश्चर्यचकित देखकर खर के शत्रु श्री रामजी फिर बाल रूप हो गए॥3॥
* अस्तुति करि न जाइ भय माना। जगत पिता मैं सुत करि जाना॥
हरि जननी बहुबिधि समुझाई। यह जनि कतहुँ कहसि सुनु माई॥4॥
भावार्थ:-(माता से) स्तुति भी नहीं की जाती। वह डर गई कि मैंने जगत्पिता परमात्मा को पुत्र करके जाना। श्री हरि ने माता को बहुत प्रकार से समझाया (और कहा-) हे माता! सुनो, यह बात कहीं पर कहना नहीं॥4॥
दोहा :
* बार बार कौसल्या बिनय करइ कर जोरि।
अब जनि कबहूँ ब्यापै प्रभु मोहि माया तोरि॥202॥
भावार्थ:-कौसल्याजी बार-बार हाथ जोड़कर विनय करती हैं कि हे प्रभो! मुझे आपकी माया अब कभी न व्यापे॥202॥
चौपाई :
* बालचरित हरि बहुबिधि कीन्हा। अति अनंद दासन्ह कहँ दीन्हा॥
कछुक काल बीतें सब भाई। बड़े भए परिजन सुखदाई॥1॥
भावार्थ:-भगवान ने बहुत प्रकार से बाललीलाएँ कीं और अपने सेवकों को अत्यन्त आनंद दिया। कुछ समय बीतने पर चारों भाई बड़े होकर कुटुम्बियों को सुख देने वाले हुए॥1॥
* चूड़ाकरन कीन्ह गुरु जाई। बिप्रन्ह पुनि दछिना बहु पाई॥
परम मनोहर चरित अपारा। करत फिरत चारिउ सुकुमारा॥2॥
भावार्थ:-तब गुरुजी ने जाकर चूड़ाकर्म-संस्कार किया। ब्राह्मणों ने फिर बहुत सी दक्षिणा पाई। चारों सुंदर राजकुमार बड़े ही मनोहर अपार चरित्र करते फिरते हैं॥2॥
* मन क्रम बचन अगोचर जोई। दसरथ अजिर बिचर प्रभु सोई॥
भोजन करत बोल जब राजा। नहिं आवत तजि बाल समाजा॥3॥
भावार्थ:-जो मन, वचन और कर्म से अगोचर हैं, वही प्रभु दशरथजी के आँगन में विचर रहे हैं। भोजन करने के समय जब राजा बुलाते हैं, तब वे अपने बाल सखाओं के समाज को छोड़कर नहीं आते॥3॥
* कौसल्या जब बोलन जाई। ठुमुकु ठुमुकु प्रभु चलहिं पराई॥
निगम नेति सिव अंत न पावा। ताहि धरै जननी हठि धावा॥4॥
भावार्थ:-कौसल्या जब बुलाने जाती हैं, तब प्रभु ठुमुक-ठुमुक भाग चलते हैं। जिनका वेद ‘नेति’ (इतना ही नहीं) कहकर निरूपण करते हैं और शिवजी ने जिनका अन्त नहीं पाया, माता उन्हें हठपूर्वक पकड़ने के लिए दौड़ती हैं॥4॥
* धूसर धूरि भरें तनु आए। भूपति बिहसि गोद बैठाए॥5॥।
भावार्थ:-वे शरीर में धूल लपेटे हुए आए और राजा ने हँसकर उन्हें गोद में बैठा लिया॥5॥
दोहा :
*भोजन करत चपल चित इत उत अवसरु पाइ।
भाजि चले किलकत मुख दधि ओदन लपटाइ॥203॥
भावार्थ:-भोजन करते हैं, पर चित चंचल है। अवसर पाकर मुँह में दही-भात लपटाए किलकारी मारते हुए इधर-उधर भाग चले॥203॥
चौपाई :
* बालचरित अति सरल सुहाए। सारद सेष संभु श्रुति गाए॥
जिन्ह कर मन इन्ह सन नहिं राता। ते जन बंचित किए बिधाता॥1॥
भावार्थ:-श्री रामचन्द्रजी की बहुत ही सरल (भोली) और सुंदर (मनभावनी) बाललीलाओं का सरस्वती, शेषजी, शिवजी और वेदों ने गान किया है। जिनका मन इन लीलाओं में अनुरक्त नहीं हुआ, विधाता ने उन मनुष्यों को वंचित कर दिया (नितांत भाग्यहीन बनाया)॥1॥
* भए कुमार जबहिं सब भ्राता। दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता॥
गुरगृहँ गए पढ़न रघुराई। अलप काल बिद्या सब आई॥2॥
भावार्थ:-ज्यों ही सब भाई कुमारावस्था के हुए, त्यों ही गुरु, पिता और माता ने उनका यज्ञोपवीत संस्कार कर दिया। श्री रघुनाथजी (भाइयों सहित) गुरु के घर में विद्या पढ़ने गए और थोड़े ही समय में उनको सब विद्याएँ आ गईं॥2॥
* जाकी सहज स्वास श्रुति चारी। सो हरि पढ़ यह कौतुक भारी॥
बिद्या बिनय निपुन गुन सीला। खेलहिंखेल सकल नृपलीला॥3॥
भावार्थ:-चारों वेद जिनके स्वाभाविक श्वास हैं, वे भगवान पढ़ें, यह बड़ा कौतुक (अचरज) है। चारों भाई विद्या, विनय, गुण और शील में (बड़े) निपुण हैं और सब राजाओं की लीलाओं के ही खेल खेलते हैं॥3॥
* करतल बान धनुष अति सोहा। देखत रूप चराचर मोहा॥
जिन्ह बीथिन्ह बिहरहिं सब भाई। थकित होहिं सब लोग लुगाई॥4॥
भावार्थ:-हाथों में बाण और धनुष बहुत ही शोभा देते हैं। रूप देखते ही चराचर (जड़-चेतन) मोहित हो जाते हैं। वे सब भाई जिन गलियों में खेलते (हुए निकलते) हैं, उन गलियों के सभी स्त्री-पुरुष उनको देखकर स्नेह से शिथिल हो जाते हैं अथवा ठिठककर रह जाते हैं॥4॥
दोहा :
* कोसलपुर बासी नर नारि बृद्ध अरु बाल।
प्रानहु ते प्रिय लागत सब कहुँ राम कृपाल॥204॥
भावार्थ:-कोसलपुर के रहने वाले स्त्री, पुरुष, बूढ़े और बालक सभी को कृपालु श्री रामचन्द्रजी प्राणों से भी बढ़कर प्रिय लगते हैं॥204॥
चौपाई :
* बंधु सखा सँग लेहिं बोलाई। बन मृगया नित खेलहिं जाई॥
पावन मृग मारहिं जियँ जानी। दिन प्रति नृपहि देखावहिं आनी॥1॥
भावार्थ:-श्री रामचन्द्रजी भाइयों और इष्ट मित्रों को बुलाकर साथ ले लेते हैं और नित्य वन में जाकर शिकार खेलते हैं। मन में पवित्र समझकर मृगों को मारते हैं और प्रतिदिन लाकर राजा (दशरथजी) को दिखलाते हैं॥1॥
* जे मृग राम बान के मारे। ते तनु तजि सुरलोक सिधारे॥
अनुज सखा सँग भोजन करहीं। मातु पिता अग्या अनुसरहीं॥2॥
भावार्थ:-जो मृग श्री रामजी के बाण से मारे जाते थे, वे शरीर छोड़कर देवलोक को चले जाते थे। श्री रामचन्द्रजी अपने छोटे भाइयों और सखाओं के साथ भोजन करते हैं और माता-पिता की आज्ञा का पालन करते हैं॥2॥
* जेहि बिधि सुखी होहिं पुर लोगा। करहिं कृपानिधि सोइ संजोगा॥
बेद पुरान सुनहिं मन लाई। आपु कहहिं अनुजन्ह समुझाई॥3॥
भावार्थ:-जिस प्रकार नगर के लोग सुखी हों, कृपानिधान श्री रामचन्द्रजी वही संयोग (लीला) करते हैं। वे मन लगाकर वेद-पुराण सुनते हैं और फिर स्वयं छोटे भाइयों को समझाकर कहते हैं॥3॥
* प्रातकाल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा॥
आयसु मागि करहिं पुर काजा। देखि चरित हरषइ मन राजा॥4॥
भावार्थ:-श्री रघुनाथजी प्रातःकाल उठकर माता-पिता और गुरु को मस्तक नवाते हैं और आज्ञा लेकर नगर का काम करते हैं। उनके चरित्र देख-देखकर राजा मन में बड़े हर्षित होते हैं॥4॥

The revelation of God Shri Bhagwan and the joy of Balleela

Doha:
* Jog Lagan Planet Bar Date Gross Favorable.
Char Aru Achar Harshajut Ram Janam Sukhmool ॥190॥
Meaning: – Yoga, lagna, planets, warps and dates all became favorable. Root and conscious were filled with joy. (Because) the birth of Sri Rama is the root of happiness ॥190॥
Bunk:
* Naumi Date Madhu Mass Punita. Sukal Pakh Abhijit Hariprita॥
Mid-day very sit na ghama Holy Kaal Lok Bishrama ा1॥

Bhaarthar: – The holy month was the month of Chaitra, the Navami date. Shukla Paksha and the beloved Abhijitha of God was auspicious. It was the afternoon time. It was neither very cold nor sunny. That holy time was to give peace to all the realms ॥1॥
* Sital dim Surbhi Bahu Bau. Haritrit Sur Santan Man Chau
Ban Kusumit Girigan Maniara. Svahin Gross Saritamritadhara ॥2॥
Meaning: – The cool, dim and fragrant wind was blowing. The gods were cheerful and the saints had (great) fervor. Forests were bloated, clusters of mountains were shining with stones and all the rivers were flowing with the flow of nectar ॥2॥.

* When the opportunity to go to Birnchi. Chale gross tune
Gagan Bimal Sankul Sur Jutha. Gavahin Gun Gandarb Barutha ॥3॥
Meaning: When Brahma Ji saw that opportunity (of the appearance of God), then (including him) all the deities went on decorating the plane. The serene sky was filled with groups of gods. The groups of Gandharvas started singing the qualities ॥3॥
* Barshahin Suman Suanjuli Saji. Gahgahi Gagan Dundubhi Baji॥
Astuti Karahin Naga Muni Deva. Bahubidhi Lahahin Personal Private Service ॥4॥

Meaning: Decorating flowers in beautiful Anjali and showering flowers. In the sky, the boisterous drums began to ring. The serpent, the sage and the deity began to praise and in many ways started offering their own service (gifts) ॥4॥
Doha:
* Sur group requested to reach their personal residence.
Jaganivas Prabhu Pratee Akhil Lok Bishram ॥191
Connotation: – The group of gods pleaded and reached their respective worlds. Jagadadhar Prabhu appeared, giving peace to all the realms ॥191॥

Verse:
* Dear Kripla Deendayala Kausalya, benefited.
Harishit Mehtari sage mind lost amazing form
Lochan Abhirama Tanu Ghanasyama, his Ordnance Bhujachari.
Bhushan Banmala Nayan Bisala Sobhasindhu Khari ॥1॥

Senseless: – The compassionate lord of Kausalji appeared to have mercy on the people. The mother was filled with joy at the thought of her wonderful form that defeated the sages. He had a black body like a cloud which gave pleasure to the eyes, he had his (special) armament (wearing) in four arms, wore (divine) jewelery and vanmala, had big eyes. In this way, the God who killed the sea and khar demon of Shobha appeared ॥1॥

* Say dui kari zori astuti tori kehi kiddhi karoon ananta.
Maya Gunn Gyanayet Amana Bed Puran Bhananta
Karuna Sukh Sagar Sab gun agar jehi gawhin shruti santa.
Public interest in social interest, fearful disclosure Shrikanta ॥2॥
Meaning: – With both hands folded mother started saying – O infinite! How can i praise you The Vedas and the Puranas tell you beyond maya, virtue and knowledge and without magnitude. Goddess Lakshmipati, who loves the devotees, has appeared for my welfare on the shrutis and saints, the sea of ​​mercy and happiness, which they sing as the abode of all virtues.

* Universe is created, Maya Rome is called Rome.
Mum ur so stale, this sad Sunit Dheer Mati is not stable.
Stems when Gyana Prabhu Musukana Charit is very different.
Kahi katha suhai matu extinguished like type is love love ॥3॥

Connotation: – Vedas say that in each of your Rome there are groups (filled) of many cosmos created by Maya. You have been in my womb – even on hearing this laughter, the wisdom of the dull (prudent) men is not stable (gets distracted). When mother was born with knowledge, God smiled. They want to do a lot of character. Therefore, he explained to the mother by telling a beautiful story (of previous birth), so that he would get the (vatsalya) love of the son (become a son of God) ॥3॥

* Mata puni boli so mati doli tajhu tat this rupa.
Kisai sisulila very dear
Suni Bachan Sujana Rodan Thana Hoi child Surbhupa.
This character is Gavahin Haripad Pavahinthe Parhin Bhavakupa ॥4॥
Meaning: That mother’s intellect changed, then she again said – O Tat! Leave this form and do the most dear Balleela, (for me) this happiness will be absolutely unique. Hearing this (mother’s) word, the lord of the gods Sujan Lord started crying as a child (form). (Tulsidasji says-) Those who sing this character get the post of Shri Hari and (again) do not fall into the well of the world ॥4॥.

Doha:
* Bipra Dhenu Sur Sant Hit Leenh Manuj Avatar.
Personal wish made tanu maya gun go cross ॥192॥
Bhaarthar: – God incarnated man for Brahmins, Goes, Gods and Saints. They are beyond (ignorance, malina) maya and its qualities (satta, raja, tam) and (outer and inner) senses. His (divine) body is made up of his own will (by being restrained by any karma bond and not by trinitarian physical substances) ॥192॥
Bunk:
* Suni sisu rudan param dear bani. All the queen came to the confusion
Harikshit where the maid is right Anand Magan Sakal Purbasi ॥1॥

Meaning: Hearing the very sweet sound of the baby’s cry, all the queens ran away with a rush. Maidens ran wherever they pleased. All the priests were delighted ॥1॥
* Dasaratha son born Suni Kana. Manhu Brahmanand Samana 4
The ultimate love is my mind I don’t want to lose my love ॥2॥
Meaning: Hearing the birth of Raja Dasarathaji’s son with his ears, as if he got absorbed in Brahmananda. There is a lot of love in the mind, the body is pulsed. (Impatient in bliss) He wants to get up by enduring wisdom (and handling a relaxed body) ॥2॥
* I went and heard the name. MoreGoddess God
Parmanand Puri Mana Raja. Where are you going, Bajaahu Baja ॥3॥

Spirituality: – The person whose name is benefited by hearing, the same Lord has come to my house. (Thinking) The king’s mind was filled with absolute bliss. He called the instruments and asked them to play the instrument ॥3॥
* Guru Basistha said where he laughed. Arrived by Nrivada with two children.
Anupam went to see the child. Roop Rasi Gun Kahin Sirai ॥4॥
Bhartarth: – Called to Guru Vashistha. They came to the Rajdwar with Brahmins. He went and saw the unique child, which is the amount of form and whose qualities do not end by saying ॥4॥.
Doha:
* Nandimukh sarad kar jatakaram all kineh.
Hatak Dhenu Basan Mani Nripa Bipranh Kahan Dinh ॥193॥

Meaning: – Then the king performed all the rituals and rituals by performing Nandimukh Shradh and donated gold, cow, clothes and beads to the Brahmins. ॥193॥
Bunk:
* Flag Marker Toran Pur Chhava. Do not go anywhere like make it.
Sumanbriti Akas Brahmanand Magan Sab Loi ॥1॥
Meaning: – The city was covered with dhwaja, pennant and pylons. The way it was decorated, it cannot be described. Flowers are raining from the sky, everyone is engrossed in Brahmananda.
* Brind Brind Milli Chale Logai. Sahaj singar ki uthi dhi Dhani
Kanak Kalas Mangal Bhari Thara. Gavat paithhin bhup duara ॥2॥

Meaning: – The women walked together in flocks. She ran up after doing natural makeup. Taking the urn of gold and filling the matter with Mars, they sing and enter the gateway में2॥
* Do not perform aarti Again and again on Sisu Charanni
Magadh Sut Bandigan Singer. Pavan Gun Gavin Raghunayak ॥3॥
Meaning: They perform aarti and relieve it and fall on the feet of the child again and again. Magadha, cotton, wood, and singers sing the sacred qualities of the lord of Raghukul. ॥3॥
* Serbs dan dinh sab kahu. Jehin pawa rakha nahin tahu॥
Mrigamad Chandan Kunkum Keecha. Machi Gut Bithinh Bich Beecha ॥4॥
Meaning: Raja gave a lot of donations to everyone. Whoever found did not keep it (robbed). Musk (sandalwood and saffron) mixed in between all the streets (of the city) ॥4॥
Doha:
* Ghar Griha Baz Badhav Subh Pragte Sushma Kand.
Harshavant sub jahan tah nagar nari nar brind ॥194॥

Bhaarthar: -Ghar-ghar Mangalmay Badhawa started ringing, because the original God of Shobha has appeared. Herds of men and women of the city are rejoicing everywhere ॥194॥
Bunk:
* Kaikyasuta Sumitra Dau. Beautiful Sut Public Opinion
That happiness is the time of prosperity. Can’t say Sard Ahiraja ॥1॥
Bhartharth: -Kakeyi and Sumitra- Both also gave birth to beautiful sons. That happiness, wealth, time and society cannot be described by Saraswati and king of snakes, Sesha.
* Avadhpuri Sohai Ehi Bhanti. Prabhuhi Milan aayi janu rati
See Bhanu Janu Mana Sakuchani. Even though the evening was estimated ॥2॥

Meaning: – Avadhpuri is beautifying in this way, as if the night has come to meet the Lord and seeing the sun as if it has been broken in the mind, but still considering it in the mind, it is as if it has become (evening) ॥2॥.
* If incense multitudinaries. Fly abir manhoo arunari
Temple Mani Group Janu Tara. Nripe Ghar Kalas so Indu Udara ॥3॥
Sense: If there is a lot of smoke in the incense of darkness (of evening) and it is the light of the abir that is flying. The groups of beads in the palaces are as if the stars are there. The Kalash of the Raj Mahal is the same as the best moon.
* The building is very soft. Janu khag vocal time
Seeing the prodigy, forget the kite One month not to go to ॥4॥

Meaning: – In the Raj Bhavan, the very soft voice that is being vedhvani is the same as the chirping of the stained birds from time to time. Seeing this prodigy, Surya also forgot his gait. One month he did not go away (that is, he spent a month there) ॥4॥
Doha:
* Mass Day Tax Day, I do not know anyone.
Rabi Thakeu Nisa Kavan Bidhi Ho with the Chariot ॥195॥
Meaning: It has been a day of the month. Nobody knows this secret. Surya stayed there with his chariot, then how would the night be ॥195॥
Bunk:
* This secret should not be known. To humiliate the day
Dehi Mahotsav Sur Muni Naga. Chal Bhavan barnat nija ran ॥1॥
Meaning: No one knows this secret. Suryadev (of Lord Shri Ramji) went on praising. Seeing this festival, the gods, munis and nag went to their respective homes appreciating their destiny ॥1॥

* And let me say a personal theft. Sunu Girija very strong mother Tori
Kakbhusundi with us. Manujarupa jaan nahin kau ॥2॥
Bhartarth: O Parvati! Your intellect (at the feet of Shri Ramji) is very firm, so I speak of one more of your theft (concealment), listen. Both Kakbhusundi and I were there together, but being in human form, no one could know us.
* Bliss blossoms love. Bethinh Phirin Megan Mana Forgotten
He slept very well Kripa Ram Kai Jaapar Hoi ॥3॥
Sense: We both wandered with joyful mind (overjoyed) in the streets (blissful of body and mind), bloated in the joys of ultimate bliss and love, but this auspicious character can be known only on which Shri Ramji’s grace Be ॥3॥
* This is the opportunity which is alive. Dinh bhup jo jehi man bhava
Gaj Rath Turg Hem Go Hira. Dinhe Nripa Nanabidhi Incision ॥4॥
Meaning: The way the king came and the person who liked it on that occasion gave it to him. The king gave elephant, chariots, horses, gold, cows, diamonds and internal clothes ॥4॥

Doha:
* Where the mind is full of contentment
Tulsidas of gross life, everlasting life ॥196॥
Sense: Raja satisfied everyone’s mind. (From here on) everybody was blessing wherever the lord of Tulsidas, all the sons (four princes) should live forever (longevity) ॥196॥
Bunk:
* Kurtuk day passed like this. Don’t know your day Mother॥
Knowing the opportunity Bhup Boli Pathe Muni Gyani ॥1॥
Meaning: Thus a few days passed. It does not seem to go away day and night. Knowing the time of the naming ceremony, the king called the learned sage Shri Vashistha.
* Kari Puja Bhupathi as language. Dhariya name jo muni guni rakha
His name has many Anupa. I Nripa Kahab Self Consciousness ॥2॥

Meaning: – After worshiping the Muni, the king said- O Muni! Name the thoughts that you have kept in mind. (The sage said-) O king! They have unique names, yet according to my intellect I would say ॥2॥
* Joe Anand Sindhu Sukharasi. Seeker in Traylok Supasi
So Sukhadham Ram as Nama. Akhil Lok Dayak Bishrama ॥3॥
Sense: These are the sea of ​​bliss and the amount of happiness, the one particle of which (Anandasindhu) makes all the three worlds happy, the name of those (your eldest son) is ‘Ram’, the building of happiness and the whole world. Peacemaker ॥3॥
* Biswa Bharn was done by nutrition. Taqar Naam Bharat As Hoi॥
Jake Sumiran then Ripu Nasa. Name Satruhan Beda Prakasa ॥4॥
Meaning: – Those who maintain the world, the name of (your second son) will be ‘Bharata’, whose memorization is the destruction of the enemy, the famous ‘Shatrughna’ name in the Vedas is ॥4॥.

Doha:
* Lachhan Dham Ram Dear Gross World Base.
Guru Basistha Tehi Rakha Lachhiman Name Liberal ॥197॥
Bhaartarth: – The auspicious signs of Dharma, the beloved of Shri Ramji and the basis of the whole world, Guru Vashistha has named him ‘Laxman’ such a great name ॥197॥
Bunk:
* Dhare Naam Gur Hridayin Bichari. Bedha element Nri Tattva Sut Chari॥
Muni dhan jan sarbas siv prana. Bal Kali Ras is considered to be your happiness ॥1॥
Meaning: – Guruji kept this name after considering it in his heart (and said-) O king! All four of your sons are the elements of the Veda (Sakshata Paratpara Bhagavan). Those who are the wealth of sages, the servants of devotees and the soul of Shiva, they (with the love of you at this time) have considered happiness in the juice of Baal Leela.
* Barehi te personal interest husband Jani. Lachhiman Ram Charan obeyed
Bharat Satruhan Dunou Bhai. Lord servant like love
Sense of meaning: Lakshmanji added love to his feet by knowing that Shri Ramchandraji was his supremely beneficial master. Both Bharata and Shatrughna brothers have the kind of love that is appreciated by the lord and servant ॥2॥.

* Syam Gaur Beautiful Dou Jori. Nirkhhin Chhabi Jananiin Trin Tori
Chariu Seal Roop Gun Dhama. However more Sukhsagar Rama ॥3॥
Spirituality: – Mothers break the trinity (in which the tooth is not worn) by seeing the beauty of both the beautiful pairs of Shyam and Gaur body. Even though all the four sons are the abode of modesty, form and quality, even the sea of ​​happiness Shri Ramchandraji is the highest.
* Heart Grace Indu Prakasa. Suchit Kiran Manohar Hasa॥
To go out of the way Matu Dularai kahi dear lallana ॥4॥
Spirituality: – The moon in his heart is illuminated in his heart. The laughter that defeats his mind indicates the rays of that (moon of grace). Sometimes in the lap (with) and sometimes in the best cradle (lying) mother ‘dear Lallana!’ Saying it cries ॥4॥

Doha:
* Bypak Brahm Niranjan Nirgun Bigat Binod.
So aj love bhagti kosalya ko lap ॥198॥
Spiritualism: – Who is omnipresent, Niranjan (Mayarhit), Nirgun, humorous and unborn Brahman, he is in the lap of Kausalyaji (playing) under the control of love and devotion ॥198॥
Bunk:
* Kama koti chhabi siam sarira. Neil Kanj Barid Gambhira॥
Narun Charan Pankaj Nakh Joti Janu Moti seated with lotus flower ॥1॥
Meaning: Like his Nilkamal and Gambhir (filled with water) cloud, Shyam body has the grace of millions of Cupids. The (good) light of the nails of the red-red lotus lotus looks as if the (red) beads on the lotus leaves have settled ॥1॥
* Rekha Kulis flag Ankus Sohe. Nupur Dhuni Suni Muni Man Mohe॥
Kati kinkini abdominal triad line. Navel saw serious life.

Spirituality: – (In Charanatlas) the signs of Vajra, Dhwaja and Ankush are beautiful. Hearing the sound of Nupur (Penjani), the sages are also fascinated. There are girdles in the waist and three lines (trivali) on the abdomen. Only those who have seen the severity of the navel have seen it ॥2॥
* Bhuj Bisal Bhushan Jut Brown. Hari nakh ati sobha roori
Sobha of Ur Manihar Padik. Bipra Charan sees Mana Lobha ॥3॥
Meaning: There are huge arms adorned with ornaments. The tiger’s fingernail is very rare on the heart. The mind is drawn as soon as the necklace of gemstones with jewels on the chest and the foot sign of a Brahmin (Bhrigu) ॥3॥.

* Kambu Kanth Ati Chibuk Suhai. Anan Amit Madan Chhabi Chai
Dui dui dasan adhar arunare. NASA Tilak to be defeated ॥4॥
Connotation: – Kantha is like a conch (fluctuating, embellished with three lines) and the chin is very beautiful. There are innumerable Kamadeva’s eyes on the face. There are two beautiful teeth, red lips. Who can describe the nostrils and tilak (beauty of)? ॥4॥
* Beautiful Shravan Sucharu Kapola. Very dear sweet tots said
Chikkan Kach Malicious Gabhuare. Multiple types of Matu Sanare ॥5॥
Meaning: – Beautiful ears and very beautiful cheeks. The words sweet melodies look very cute. There are smooth and curly hair kept from the time of birth, which the mother has groomed in many ways ॥5॥.
* Peet Jhagulia Tanu Pahirai. Janu pani bicharni mohi bhai 4
The form may not be called Shruti Sesha. So know, I have seen dreams.

Meaning: – Yellow finger is worn on the body. I love walking on their knees and hands. The Vedas and Seshaji cannot even describe their form. He knows someone who has ever seen in a dream ॥6॥
Doha:
* Happiness fell on happiness Sandoh fascination.
Couple’s supreme love settled Suneet Punit 99199॥
Sense of meaning: the pleasures of happiness, beyond attachment and knowledge, speech and senses.They are past, they do holy Balleela under the immense love of Lord Dasharatha-Kausalya.
Bunk:
* Ehi Bidhi Ram Jagat Pitu Mata. Kosalpur Basinh Sukhdata॥
Whom Raghunath Charan obeyed This movement of Tinh revealed Bhavani ॥1॥
Bhaartarth: -Thus the (entire) world’s parents Shri Ramji gives happiness to the residents of Awadhpur, who have added love at the feet of Shri Ramchandraji, O Bhavani! This is his direct movement (that God is giving him joy by loving him) ॥1॥
* Raghupati Bimukh Jatan Kar Kori. Kavan Sakai bhav bandhan chori
Just like a living animal. So Maya lord is afraid
Meaning: Being a man who is alienated from Shri Raghunath, may take millions of measures, but who can release his world bond. Maya, who has kept all the living creatures under her control, is afraid of God. ॥2॥

* Bhrkuti Bilas Nachavai Tahi. As Prabhu Chhadri Bhajiya Kahu Kahi
Manipulation of the mind is clever. Bhajat kripa karihhin raghurai ॥3॥
Meaning: – God makes that Maya dance at the behest of the eyebrows. Except such a lord and say, (and) whom to worship. Shri Raghunathji will be pleased as soon as he leaves cleverness of mind, word and deed. ॥3॥
* Ehi Bidhi Sisubinod Prabhu Kinha. Sakal Nagarbasinh Sukh Dinha॥
Lai Ungang Kabhunk Halaravai Pigeon Cradle Scrub ॥4॥

Spiritualism: In this way, Lord Shri Ramchandraji fought and gave happiness to all the city dwellers. Sometimes Kausalaji used to shake him in his lap and sometimes swing him in the cradle.
Doha:
* Don’t know love is going on every day.
Sut Sneh Just Mother Child Recitation ॥200॥
Meaning: In love, Kausalyaji did not know the elimination of night and day. With the affection of the son, the mother used to sing their child pictures ॥200॥

Bunk:
* Gives the mother once. Kari Singar Palanon Pouda
God is the presiding deity. Kinah Asana for worship ॥1॥
Spirituality: Once, Mother gave bath to Shri Ramchandraji and made her adorned on the cradle. Then took a bath to worship the presiding deity of his family ॥1॥
* Kari Puja Naibedya Offering. Supply made where baking is done.
Bahuri Matu Tehwan came Seeing food, Sut ji ॥2॥
Spirituality: – After worshiping, offered Naivedya and went to the place where the kitchen was made. Then the mother returned to the same place (in the place of worship) and upon coming there saw the son (of the naivedya offered to the presiding deity) eating ॥2॥.
* Gai janani sisu first fearfulness. Saw hair here and there again
Bahuri Aayi Dekha Sut Soi Heart and heart did not become cold ॥3.
Meaning: Fearing mother (who slept in the cradle, who brought it here and was afraid of it) went to the son, then he saw the child sleeping there. Then (returning to the place of worship) saw that the same son is there (eating). His heart started shivering and the mind does not end up ॥3॥

* Saw two children here. Hallucinations peacock
See Ram Janani Akulani. Prabhu Hansi Dinh Madhur Musukani ॥4॥
Sense: She started thinking that here and there I saw two boys. Is this an illusion of my intelligence or is there a specific reason? Prabhu Shri Ramchandraji laughed with a sweet smile on seeing his mother mumbled ॥4॥
Doha:
* Dekhrava Matahi Nija amazing form unbroken.
Rome Rome per category Koti Brahmand ॥201॥
Meaning: – Then he showed his unbroken wonderful form to the mother, in whose crores of cosmos are engaged in each.

Bunk:
* Agnit Rabi Sasi Siva Chaturanan. Bahu Giri Sarit Sindhu Mahi Kanan
Kaal karma gun gyan subhau. Saw what you didn’t hear ऊ1॥
Sense: Look at the Sun, Moon, Shiva, Brahma, many mountains, rivers, sea, earth, forests, times, deeds, virtues, knowledge and nature, and even those things which were never even heard ॥1॥.
* Saw Maya all the birds Chirpy
Saw the creature Dekha bhagi jo chorai tahi ॥2॥
Meaning: – In all ways Balwati saw Maya that she (in front of God) is standing with very scared hands folded. Looked at the living being, which she makes Maya dance and (then) saw devotion, which frees that creature (from Maya) ॥2॥

* Do not pull your mouth Nayan Moodi Charanni Siru Nava॥
Looking at Bismayant. Bhae Bahuri Sisuroop Khari ॥3॥
Meaning: – (Mother’s) body has become pulsed, the word does not come out of the mouth. Then, with his eyes closed, he brought his head to the feet of Shri Ramchandraji. Seeing the mother surprised, Khar’s enemy Shri Ramji turned into a child again ॥3॥
* Do not pray, do not be afraid. Let the father of the world go to sleep
Hari Janani Bahubidhi Samuzhai. This person Katahu Kahsi Sunu Mai ॥4॥
Spirituality: – (from mother) is also not praised. She was afraid that I had known Jagatpita God as a son. Sri Hari explained to Mata in a very different way (and said-) O Mother! Listen, don’t say it anywhere ॥4॥

Doha:
* Repeatedly Kausalya Binay Kari Kar Jori.
Now, when are you alive, Prabhu Mohi Maya Tori ॥202॥
Meaning: – Kausalyaji repeatedly pleads with folded hands, O Lord! I will never let your illusion now ॥202॥
Bunk:
* Balcharit Hari Bahubidhi Kinha. Where is Anand Anand Das Dinha
Everyone should pass some time. Big Brother Family Carpenter ॥1॥
Connotation: – God performed many types of hair and gave great joy to his servants. After some time, the four brothers grew up and gave happiness to the relatives ॥1॥.
* Chudakaran Keenh Guru Jai Bipranh Puni Dikhina Bahu Pai॥
The most beautiful chartered apara. Karat Firat Chariu Sukumara ॥2॥
Meaning: Then Guruji went and performed Chudakarma-Sanskar. The Brahmins then found many Dakshina. The four handsome princes walk around with a very handsome character ॥

* Mind order saved unnoticed. Dasrath Ajir Bichar Prabhu Soi
Say food when the king. No recurring child society ॥3॥
Meaning: The mind, words and actionsI am inconspicuous, I am wandering in the courtyard of Lord Dasharathaji. When the king calls at the time of lunch, then he does not leave the society of his child’s friends ॥3॥
* Kausalya when spoken. Thumuku Thumuku Prabhu Challin Parai॥
Nigam neti siv end na pawa Tahi dhairai jaani haathi dhada ॥4॥
Meaning: When Kausalya goes to call, then Lord Tumuk-Tumuk runs away. Whose Vedas represent ‘Neti’ (not only this) and Shivji, whose end is not found, mother rushes to stubbornly catch them ॥4॥
* Fill the gray axle, attenuated. Bhupathi is sitting on his lap ॥5॥.
Sense: They came with dust in the body and the king smilingly seated them in the lap.

Doha:
* Meal is found in the world.
Bijli chale kilkat mukh dadhi odan lapatai ॥203॥
Meaning: Eating, but the mind is fickle. On getting the opportunity, you rolled the curd and rice in the mouth and started running around here and there ॥203॥
Bunk:
* Very easy to use childish. Sarad sesh sambhu sruti sing
Those whom the mind does not agree with. Bidata ंचित1॥ irrigated
Bhaartarth: – Very simple (naive) and beautiful (pleasant) balalilas of Shri Ramchandraji have been sung by Saraswati, Seshaji, Shivji and Vedas. Whose mind was not attached to these pastimes, the creator deprived them (made them extremely fortunate) ॥1॥
* Brother Kumar, when everyone is brother. Dinh Janeu Guru Pitu Mata Om
Readers Raghurai went to Gurugriha. Alp Kaal Bidya Sab I ॥2॥
Meaning: Just as all brothers were of Kumaravastha, just as Guru, father and mother performed their sacrificial rituals. Shri Raghunathji (including brothers) went to the Guru’s house to study, and within a short time, he got all the teachings.

* Jaaki Sahaja Swas Shruti Chari. So Hari read this prodigy heavy॥
Bidya binay nipun gun sila. GameHinkhel Gross Nriplila ॥3॥
Sense: Read the Lord, who is the natural breath of the four Vedas, it is a great curiosity. The four brothers are (great) adept in learning, humility, virtue and modesty and play the games of all kings’ pastimes ॥3॥.
* Kartal bahn bow ati soha. Dekhrat roop charachar moha॥
Whose brother Bithinh Biharin Everybody gets tired ॥4॥
Bhartharth: – Arms and bow are very beautiful in hands. On seeing the form, the pasture (root-conscious) becomes fascinated. All those brothers who play (get out) in the streets, all the men and women of those streets look at them, they become relaxed or lingering. ि4॥
Doha:
* Kosalpur, stale male, female, elderly, and bal.
Pranahu te dear cost saab kahoon ram kripal ॥204॥
Meaning: Women, men, old men and children of Kosalpur are loved by everyone more than the compassionate Shri Ram Chandraji Pran. 4204॥
Bunk:
* Bandhu Sakha Song Lehin Boli. Ban mrigaya nite khelhin jai
May the holy antelope live ृ1॥
Meaning: Shri Ramchandraji summons brothers and favored friends and takes them along and goes hunting in the forest. Thinking holy in the mind, they kill the deer and bring it to the king every day and show it to the king (Dashrathji).

* J Mrig Ram Ban ki Mare. Te Tanu Teji Surlok Sidhare॥
Anuj Sakha Sanga is not a food. Matu father Agya not follow ॥2॥
Spirituality: – The antelope who was killed by the arrow of Shri Ramji used to leave his body and go to Devaloka. Shri Ramchandraji dines with his younger brothers and Sakhas and obeys the parents’ orders ॥2॥
* Jhe Bidhi Sukhi Hohin Pur Loga. Karhin Kripanidhi Soi Sanjoga
Beda Puran brought to mind. Aapu kahin anujanh samuzhai ॥3॥
Meaning: Just as the people of the city are happy, Kripanidhan Shri Ramchandraji makes the same coincidence (Lila). They listen to the Vedas and they listen to the younger brothers and say, ॥3॥.
* Raghunatha in the morning. Matu Father Guru Nawahin Matha॥
Ayasu Magi Karahin Pur Kaja. See Harshai Man Raja ॥4॥
Meaning: – Shri Raghunath ji gets up early in the morning and gives parents and gurus a head and takes orders and works in the city. The king is very happy in his mind after seeing his character ॥4॥

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