इंद्र-बृहस्पति संवाद 2023

इंद्र-बृहस्पति संवाद

* देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू। जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू॥
गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई। रामहि भरतहि भेंट न होई॥4॥
भावार्थ:-भरतजी के (इस प्रेम के) प्रभाव को देखकर देवराज इन्द्र को सोच हो गया (कि कहीं इनके प्रेमवश श्री रामजी लौट न जाएँ और हमारा बना-बनाया काम बिगड़ जाए)। संसार भले के लिए भला और बुरे के लिए बुरा है (मनुष्य जैसा आप होता है जगत्‌ उसे वैसा ही दिखता है)। उसने गुरु बृहस्पतिजी से कहा- हे प्रभो! वही उपाय कीजिए जिससे श्री रामचंद्रजी और भरतजी की भेंट ही न हो॥4॥
दोहा :
* रामु सँकोची प्रेम बस भरत सप्रेम पयोधि।
बनी बात बेगरन चहति करिअ जतनु छलु सोधि॥217॥
भावार्थ:-श्री रामचंद्रजी संकोची और प्रेम के वश हैं और भरतजी प्रेम के समुद्र हैं। बनी-बनाई बात बिगड़ना चाहती है, इसलिए कुछ छल ढूँढकर इसका उपाय कीजिए॥217॥
चौपाई :
* बचन सुनत सुरगुरु मुसुकाने। सहसनयन बिनु लोचन जाने॥
मायापति सेवक सन माया। करइ त उलटि परइ सुरराया॥1॥
भावार्थ:-इंद्र के वचन सुनते ही देवगुरु बृहस्पतिजी मुस्कुराए। उन्होंने हजार नेत्रों वाले इंद्र को (ज्ञान रूपी) नेत्रोंरहित (मूर्ख) समझा और कहा- हे देवराज! माया के स्वामी श्री रामचंद्रजी के सेवक के साथ कोई माया करता है तो वह उलटकर अपने ही ऊपर आ पड़ती है॥1॥
* तब किछु कीन्ह राम रुख जानी। अब कुचालि करि होइहि हानी।
सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ। निज अपराध रिसाहिं न काऊ॥2॥
भावार्थ:-उस समय (पिछली बार) तो श्री रामचंद्रजी का रुख जानकर कुछ किया था, परन्तु इस समय कुचाल करने से हानि ही होगी। हे देवराज! श्री रघुनाथजी का स्वभाव सुनो, वे अपने प्रति किए हुए अपराध से कभी रुष्ट नहीं होते॥2॥
* जो अपराधु भगत कर करई। राम रोष पावक सो जरई॥
लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा। यह महिमा जानहिं दुरबासा॥3॥
भावार्थ:-पर जो कोई उनके भक्त का अपराध करता है, वह श्री राम की क्रोधाग्नि में जल जाता है। लोक और वेद दोनों में इतिहास (कथा) प्रसिद्ध है। इस महिमा को दुर्वासाजी जानते हैं॥3॥
* भरत सरिस को राम सनेही। जगु जप राम रामु जप जेही॥4॥
भावार्थ:-सारा जगत्‌ श्री राम को जपता है, वे श्री रामजी जिनको जपते हैं, उन भरतजी के समान श्री रामचंद्रजी का प्रेमी कौन होगा?॥4॥
दोहा :
* मनहुँ न आनिअ अमरपति रघुबर भगत अकाजु।
अजसु लोक परलोक दुख दिन दिन सोक समाजु॥218॥
भावार्थ:-हे देवराज! रघुकुलश्रेष्ठ श्री रामचंद्रजी के भक्त का काम बिगाड़ने की बात मन में भी न लाइए। ऐसा करने से लोक में अपयश और परलोक में दुःख होगा और शोक का सामान दिनोंदिन बढ़ता ही चला जाएगा॥218॥
चौपाई :
* सुनु सुरेस उपदेसु हमारा। रामहि सेवकु परम पिआरा॥
मानत सुखु सेवक सेवकाईं। सेवक बैर बैरु अधिकाईं॥1॥
भावार्थ:-हे देवराज! हमारा उपदेश सुनो। श्री रामजी को अपना सेवक परम प्रिय है। वे अपने सेवक की सेवा से सुख मानते हैं और सेवक के साथ वैर करने से बड़ा भारी वैर मानते हैं॥1॥
* जद्यपि सम नहिं राग न रोषू। गहहिं न पाप पूनु गुन दोषू॥
करम प्रधान बिस्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फलु चाखा॥2॥
भावार्थ:-यद्यपि वे सम हैं- उनमें न राग है, न रोष है और न वे किसी का पाप-पुण्य और गुण-दोष ही ग्रहण करते हैं। उन्होंने विश्व में कर्म को ही प्रधान कर रखा है। जो जैसा करता है, वह वैसा ही फल भोगता है॥2॥

भरत-निषाद मिलन और संवाद और भरतजी का तथा नगरवासियों का प्रेम

* तदपि करहिं सम बिषम बिहारा। भगत अभगत हृदय अनुसारा॥
अगनु अलेप अमान एकरस। रामु सगुन भए भगत प्रेम बस॥3॥
भावार्थ:-तथापि वे भक्त और अभक्त के हृदय के अनुसार सम और विषम व्यवहार करते हैं (भक्त को प्रेम से गले लगा लेते हैं और अभक्त को मारकर तार देते हैं)। गुणरहित, निर्लेप, मानरहित और सदा एकरस भगवान्‌ श्री राम भक्त के प्रेमवश ही सगुण हुए हैं॥3॥
* राम सदा सेवक रुचि राखी। बेद पुरान साधु सुर साखी॥
अस जियँ जानि तजहु कुटिलाई। करहु भरत पद प्रीति सुहाई॥4॥
भावार्थ:-श्री रामजी सदा अपने सेवकों (भक्तों) की रुचि रखते आए हैं। वेद, पुराण, साधु और देवता इसके साक्षी हैं। ऐसा हृदय में जानकर कुटिलता छोड़ दो और भरतजी के चरणों में सुंदर प्रीति करो॥4॥
दोहा :
* राम भगत परहित निरत पर दुख दुखी दयाल।
भगत सिरोमनि भरत तें जनि डरपहु सुरपाल॥219॥
भावार्थ:-हे देवराज इंद्र! श्री रामचंद्रजी के भक्त सदा दूसरों के हित में लगे रहते हैं, वे दूसरों के दुःख से दुःखी और दयालु होते हैं। फिर भरतजी तो भक्तों के शिरोमणि हैं, उनसे बिलकुल न डरो॥219॥
चौपाई :
* सत्यसंध प्रभु सुर हितकारी। भरत राम आयस अनुसारी॥
स्वारथ बिबस बिकल तुम्ह होहू। भरत दोसु नहिं राउर मोहू॥1॥
भावार्थ:-प्रभु श्री रामचंद्रजी सत्यप्रतिज्ञ और देवताओं का हित करने वाले हैं और भरतजी श्री रामजी की आज्ञा के अनुसार चलने वाले हैं। तुम व्यर्थ ही स्वार्थ के विशेष वश होकर व्याकुल हो रहे हो। इसमें भरतजी का कोई दोष नहीं, तुम्हारा ही मोह है॥1॥
* सुनि सुरबर सुरगुर बर बानी। भा प्रमोदु मन मिटी गलानी॥
बरषि प्रसून हरषि सुरराऊ। लगे सराहन भरत सुभाऊ॥2॥
भावार्थ:-देवगुरु बृहस्पतिजी की श्रेष्ठ वाणी सुनकर इंद्र के मन में बड़ा आनंद हुआ और उनकी चिंता मिट गई। तब हर्षित होकर देवराज फूल बरसाकर भरतजी के स्वभाव की सराहना करने लगे॥2॥

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Indra-Jupiter dialog

Seeing the influence of Bharatji (of this love), Devraj Indra got to thinking (that somewhere with his love, Shri Ramji should not return and our ready-made work go wrong). The world is good for good and bad for bad (man looks like the world you are). He said to Guru Brihaspati- Oh God! Take the same measures so that the meeting of Shri Ramchandraji and Bharatji is not done.

Shri Ramchandraji is a subdued of Sankochi and Prem and Bharatji is a sea of love. Made-up matter wants to be spoiled, so find some trick and remedy it.

Devguru Brihaspati smiled as soon as he heard Indra’s words. He considered Indra (knowledge-wise) with thousand eyes as blind (foolish) and said – O Devraj! If someone does Maya with the servant of Shri Ramchandraji, the lord of Maya, then he falls on his own.

At that time (last time), he had done something after knowing the attitude of Shri Ramchandraji, but this time there will be loss due to mischief. Hey Devraj! Listen to the nature of Shri Raghunathji, he never gets angry with the crime committed against him.

But anyone who commits the crime of his devotee gets burnt in the anger of Shri Rama. History (Katha) is famous in both folk and Vedas. Durvasaji knows this glory.

The whole world chants Sri Rama, they chant Shri Ram, who will be the lover of Shri Ramchandraji like Bharatji?

Hey Devraj! Do not even bring in the mind of spoiling the work of the devotee of Raghukul Shrestha Shri Ramchandraji. By doing this, there will be unhappiness in the world and grief in the hereafter and the grief will go on increasing day by day.

So Hey Devraj!Because  Listen to our sermon. Shri Ramji is very dear to his servant. They take pleasure in the service of their servant, and consider heavy hatred by hating with the servant.

Although they are equal – they have no passion, no fury, nor do they accept any sin-virtue and virtue. He has dominated karma in the world. What one does, he bears the same fruit.

However, they behave evenly and oddly according to the heart of the devotee and the devotee (embracing the devotee with love and wiring the devotee). Godless Lord Rama is virtuous, virtuous, unarmed, honorable and always monogamous.

Shri Ramji has always been interested in his servants (devotees). The Vedas, Puranas, Sadhus and Gods are its witnesses. Knowing this in your heart, leave notoriety and love beautiful at the feet of Bharatji.

Hey Devraj Indra! Devotees of Shri Ramchandraji are always in the interest of others, they are sad and kind to others. Then Bharatji is the head of the devotees, do not be afraid of them at all.

Prabhu Shri Ramchandraji is a Satyapratin and one who is interested in the gods and Bharatji is going to follow the orders of Shri Ramji. You are vainly distraught under special control of selfishness. There is no fault of Bharatji in this, you are fascinated.

Hearing the great voice of Devguru Brihaspati, Indra felt very happy and his anxiety disappeared. Then Devraj started to appreciate Bharatji’s nature by showering flowers.

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