खल वंदना राम चरित मानस बालकाण्ड पढ़े विस्तार से

खल वंदना राम चरित मानस बालकाण्ड

खल वंदना – चौपाई :
* बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ॥
पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें। उजरें हरष बिषाद बसेरें॥1॥

भावार्थ:-अब मैं सच्चे भाव से दुष्टों को प्रणाम करता हूँ, जो बिना ही प्रयोजन, अपना हित करने वाले के भी प्रतिकूल आचरण करते हैं। दूसरों के हित की हानि ही जिनकी दृष्टि में लाभ है, जिनको दूसरों के उजड़ने में हर्ष और बसने में विषाद होता है॥1॥

* हरि हर जस राकेस राहु से। पर अकाज भट सहसबाहु से॥
जे पर दोष लखहिं सहसाखी। पर हित घृत जिन्ह के मन माखी॥2॥
भावार्थ:-जो हरि और हर के यश रूपी पूर्णिमा के चन्द्रमा के लिए राहु के समान हैं (अर्थात जहाँ कहीं भगवान विष्णु या शंकर के यश का वर्णन होता है, उसी में वे बाधा देते हैं) और दूसरों की बुराई करने में सहस्रबाहु के समान वीर हैं। जो दूसरों के दोषों को हजार आँखों से देखते हैं और दूसरों के हित रूपी घी के लिए जिनका मन मक्खी के समान है (अर्थात्‌ जिस प्रकार मक्खी घी में गिरकर उसे खराब कर देती है और स्वयं भी मर जाती है, उसी प्रकार दुष्ट लोग दूसरों के बने-बनाए काम को अपनी हानि करके भी बिगाड़ देते हैं)॥2॥

*  गुरु वंदना राम चरित मानस

*तेज कृसानु रोष महिषेसा। अघ अवगुन धन धनी धनेसा॥
उदय केत सम हित सबही के। कुंभकरन सम सोवत नीके॥3॥
भावार्थ:-जो तेज (दूसरों को जलाने वाले ताप) में अग्नि और क्रोध में यमराज के समान हैं, पाप और अवगुण रूपी धन में कुबेर के समान धनी हैं, जिनकी बढ़ती सभी के हित का नाश करने के लिए केतु (पुच्छल तारे) के समान है और जिनके कुम्भकर्ण की तरह सोते रहने में ही भलाई है॥3॥
* पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं। जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं॥
बंदउँ खल जस सेष सरोषा। सहस बदन बरनइ पर दोषा॥4॥
भावार्थ:-जैसे ओले खेती का नाश करके आप भी गल जाते हैं, वैसे ही वे दूसरों का काम बिगाड़ने के लिए अपना शरीर तक छोड़ देते हैं। मैं दुष्टों को (हजार मुख वाले) शेषजी के समान समझकर प्रणाम करता हूँ, जो पराए दोषों का हजार मुखों से बड़े रोष के साथ वर्णन करते हैं॥4॥
* पुनि प्रनवउँ पृथुराज समाना। पर अघ सुनइ सहस दस काना॥
बहुरि सक्र सम बिनवउँ तेही। संतत सुरानीक हित जेही॥5॥

–  ब्राह्मण संत वंदना राम चरित मानस बालकाण्ड

भावार्थ:-पुनः उनको राजा पृथु (जिन्होंने भगवान का यश सुनने के लिए दस हजार कान माँगे थे) के समान जानकर प्रणाम करता हूँ, जो दस हजार कानों से दूसरों के पापों को सुनते हैं। फिर इन्द्र के समान मानकर उनकी विनय करता हूँ, जिनको सुरा (मदिरा) नीकी और हितकारी मालूम देती है (इन्द्र के लिए भी सुरानीक अर्थात्‌ देवताओं की सेना हितकारी है)॥5॥
* बचन बज्र जेहि सदा पिआरा। सहस नयन पर दोष निहारा॥6॥
भावार्थ:-जिनको कठोर वचन रूपी वज्र सदा प्यारा लगता है और जो हजार आँखों से दूसरों के दोषों को देखते हैं॥6॥
दोहा :
* उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति।
जानि पानि जुग जोरि जन बिनती करइ सप्रीति॥4॥
भावार्थ:-दुष्टों की यह रीति है कि वे उदासीन, शत्रु अथवा मित्र, किसी का भी हित सुनकर जलते हैं। यह जानकर दोनों हाथ जोड़कर यह जन प्रेमपूर्वक उनसे विनय करता है॥4॥
चौपाई :
* मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा। तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा॥
बायस पलिअहिं अति अनुरागा। होहिं निरामिष कबहुँ कि कागा॥1॥
भावार्थ:-मैंने अपनी ओर से विनती की है, परन्तु वे अपनी ओर से कभी नहीं चूकेंगे। कौओं को बड़े प्रेम से पालिए, परन्तु वे क्या कभी मांस के त्यागी हो सकते हैं?॥1॥

Khal Vandana Ram Charit Manas Balkans

Khal Vandana – Chaupai:
* Multi-banded gun capabilities. Left without right
But whose interest and loss benefits. Har Hris Bishad Basare

Sense: Now I bow down to the wicked in the true sense, who, without any purpose, conduct themselves against those who do their own good. It is the loss of the interest of others, in whose sight there is profit, who is glad to destroy others and sad in settling.

* Hari har jas rakase from Rahu. But from Akaz Bhat Sahasabahu
Blame it on Jay, Sahasakhi. But the interest of those whose mind is ॥2॥

Connotation: -which is the same as Rahu for the full moon moon of Hari and Hara (ie, where Lord Vishnu or Shankar’s Yash is described, they obstruct) and like Sahasrabahu in doing evil to others. Are brave. Those who see the faults of others with a thousand eyes and for the ghee like others whose mind is like a fly (ie, just as a fly falls into ghee and spoils it and dies itself, similarly wicked people They spoil the work done by doing their own loss) ॥2॥

 दान का फल और महत्व क्या है ? जानिए विस्तार पूर्वक

* Tej Krisanu Fury Mahisesa. Agh Avagun Dhan Dhani Dhanesa॥

Uday Ket equal interest Kumbhakaran Sama Sowat Neeke ॥3॥

Sense: Those who are like Yamaraja in fire and anger in Tej (heat burning others), rich in sin and demerit like Kubera, whose rising to destroy the interest of all is Ketu (the last star). Is equal and who is good only while sleeping like Kumbhakarna ॥3॥

* But there is no exaggeration. Jimi Him Upal Krishi Dali Garhi
Bandhan Khal as Sesh Sarosha. Dosha on Sahas Badan Barani ॥4॥

Sense: As you destroy the hailstones, you also thaw, in the same way, they leave their bodies to spoil the work of others. I bow down to the wicked (with a thousand faces) as Seshaji, who describes his faults with a thousand faces with great fury ॥4॥.

* Purna Purnavan Prithuraj Samana Samana But awh hear sahas das kana॥
Bahuri is active even without you. Sant Suraniq Hita Jehi ॥5॥

Connotation: – Punah: I salute him like King Prithu (who asked for ten thousand ears to hear the fame of God), who hears the sins of others with ten thousand ears. Then I treat them like Indra, whom the Sura (alcoholic) finds to be low and beneficial (for Indra is also good for the suranic ie the army of gods) ॥5॥

भरतीय संस्कृति की मुख्य विशेषताए| क्या आप जानते है ?

* Bachan bajra jehi piara always. Blame it on Sahas Nayan ॥6॥

Sense: Those who love the harsh thunderbolt always and those who see the faults of others with a thousand eyes ॥6॥

Doha:
* Indifferent Ari Meet Hit Sunat Jarhin Khal Rit.
Jani pani jug jori jori jana begati kari sapriti ॥4॥

Meaning: It is the custom of the wicked that they are jealous after listening to the interest of anyone, indifferent, enemy or friend. Knowing this, with folded hands, this man lovingly pleads with them ॥4॥

Bunk:
* I slept on my December Tinh nij oor na laub bhora॥
Bias palihin is very beautiful. Hohin Niramish Kabhoon Kaga ॥1॥

Meaning: – I have requested on my behalf, but they will never miss on their behalf. Raise crows with great love, but can they ever be a renunciate of flesh? ॥1॥

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