कुरु वंश की उत्पत्ति ~ महाभारत Rise of Kuruvansh , Mahabharata

Rise of Kuruvansh Story From Mahabharata In Hindi | कुरु वंश की उत्पत्ति ~ महाभारत
कुरु वंश की शुरुआत राजा कुरु से हुई थी। वे कुरु वंश के प्रथम पुरुष थे। राजा कुरु बड़े ही प्रतापी, शूरवीर और तेजस्वी थे। उन्हीं के नाम पर ‘कुरु वंश’ की शाखाएँ निकलीं और विकसित हुईं। एक से एक प्रतापी और तेजस्वी वीर कुरु वंश में पैदा हुए थे। महाभारत के प्रसिद्ध पांडवों और कौरवों ने भी कुरु वंश में ही जन्म धारण किया था। महाभारत का युद्ध भी कुरु वंशियों के मध्य हुआ था, जो पूरे अठारह दिनों तक चला। अनुमान किया जाता है कि महाभारत में वर्णित ‘कुरु वंश’ 1200 से 800 ईसा पूर्व के दौरान शक्ति में रहा होगा। पौराणिक मान्यता को देखें तो पता लगता है कि पाण्डव अर्जुन के पोते, अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित और महापद्मनंद का काल 382 ईसा पूर्व ठहरता है।
कथा]
‘कुरु’ कौन थे? और उनका जन्म किसके द्वारा और कैसे हुआ था?, इन प्रश्नों पर वेद व्यास ने महाभारत में प्रकाश डाला है। ‘करु वंश’ की कथा बड़ी ही रोचक और प्रेरणा देने वाली है, जो इस प्रकार है-

राजा संवरण

अति प्राचीन काल में हस्तिनापुर में एक प्रतापी राजा राज्य करते थे, जिनका नाम संवरण था। राजा संवरण सूर्य के समान तेजवान थे और अपनी प्रजा का बड़ा ही ध्यान रखने वाले थे। वे स्वयं कष्ट उठाकर भी अपनी प्रजा के कष्टों को दूर करने का पूरा प्रयत्न करते थे। संवरण सूर्य देव के अनन्य भक्त थे। वह प्रतिदिन बड़ी ही श्रद्धा के साथ सूर्य देव की उपासना किया करते थे। जब तक सूर्य देव की उपासना नहीं कर लेते थे, जल का एक घूंट भी कंठ के नीचे नहीं उतारते थे।

धार्मिक कहानियाँ social media बड़ी सोच motivational success story

महाभारत की सम्पूर्ण कथा! Complete Mahabharata Story In Hindi

Quora क्या है और इसका इस्तेमाल कैसे करें? हिंदी जानकारी

friend अच्छा मित्र कौन ? जानिए विस्तार से |

best Motivational Quote of all time प्रेरणादायक विचार

champion के निर्णय कुछ ऐसे होते है | जो उसे success बनाते है |

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भावार्थ सहित पढ़े |

blood donate रक्तदान महादान या सबसे बड़ा दान है | जानिए कैसे ?

कैसे बने champion ( चैम्पियन ) दौलत के खेल में

friendship क्यो जरूरी ? जानिए विस्तार पूर्वक |

success define सफलता की परिभाषा जानिए ?

सम्पूर्ण Durga Saptashati

Google search engine क्या है ? जानिए विस्तार पूर्वक

इस तरीके से प्रचार promotion करोगे तो कामयाबी चूमेगी आपके क़दम

Quality of life “आदते” आपके जीवन की quality तय करती है |

सफलता (success) की राह

माँ तुझे बार – बार सादर प्रणाम | happy mothers day

फेसबुक (Facebook) क्या है ?जानिए |

अमीरों के रास्ते

parents ही बच्चो को काबिल बनाये कैसे?

history of cricket में पहला टॉस, पहला रन और पहला शतक, किसने, कब, कहाँ बनाया था?

भगवान विष्णु के 24 अवतार कौन से हैं, जानिए | Lord Vishnu avatars

friends अधिक हो या न हो friendship मित्रता लाजवाब होनी चाहिए |

जानिए,आप महत्वपूर्ण बन रहे है,अथवा महत्वहीन |

success rules सफलता आन्तरिक नियमो से मिलती है |

decision making निर्णय लेने की क्षमता के अद्भभुद फायदें |

भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ कौन था, जानिए रहस्य

blood donation camp लोगो को नया जीवन दान देते है | कैसे ?

वैचारिक जहर से बचो विकास करो|

habits of successful people. आदते आपका भविष्य तय करती है |

business standard को सफल बनाने के 10 Golden tips

कैसे हुआ जन्म और मृत्यु से परे भगवान शिव का अवतरण

26 November विश्व पर्यावरण संरक्षण दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं |

सौभाग्यशाली कैसे बने ?

असफलता से बचने के Five point.

success formula आपको पहुंचाएगा सफलता के शिखर पर |

महाभारत की सम्पूर्ण कथा पढ़ें :

महाभारत की सम्पूर्ण कथा! Complete Mahabharata Story In Hindi

तपती से भेंट ( कुरु वंश की कथा )

एक दिन संवरण एक पर्वत पर शिकार खेलने के लिए गये। जब वह हाथ में धनुष-बाण लेकर पर्वत के ऊपर आखेट के लिए भ्रमण कर रहे थे, तब उन्हें एक अतीव सुंदर युवती दिखाई पड़ी। वह युवती सुंदरता के साँचे में ढली हुई थी। ऐसा जान पड़ता था कि उसके प्रत्येक अंग को विधाता ने बड़ी ही रुचि के साथ संवार कर बनाया हो। संवरण ने आज तक ऐसी सुन्दर युवती नहीं देखी थी। संवरण मन को मोह लेने वाली उस युवती पर आसक्त हो गये। सब कुछ भूल कर उन्होंने स्वयं को उस पर न्यौछावर कर दिया। वह उस युवती के पास जाकर, तृषित नेत्रों से उसकी ओर देखते हुए बोले- “तन्वंगी, तुम कौन हो? तुम देवी हो, गंधर्व हो या किन्नरी हो? तुम्हें देखकर मेरा चित्त चंचल हो उठा है। तुम मेरे साथ गंधर्व विवाह करके सुखोपभोग करो।” किंतु उस युवती ने संवरण की बातों का कुछ भी उत्तर नहीं दिया। वह कुछ क्षणों तक संवरण की ओर देखती रही, फिर अदृश्य हो गई। युवती के अदृश्य हो जाने पर संवरण अत्यधिक व्याकुल हो गये। वह धनुष-बाण फेंककर उन्मतों की भांति विलाप करने लगे- “सुंदरी! तुम कहाँ चली गईं? जिस प्रकार सूर्य के बिना कमल मुरझा जाता है और जिस प्रकार जल के बिना पौधा सूख जाता है, उसी प्रकार तुम्हारे बिना मैं जीवित नहीं रह सकता। तुम्हारे सौंदर्य ने मेरे मन को चुरा लिया है। तुम प्रकट होकर मुझे बताओ कि तुम कौन हो और मैं तुम्हें किस प्रकार पा सकता हूँ?”

तपती का कथन ( कुरु वंश की कथा )

संवरण की ऐसी अवस्था और व्याकुलता से वह युवती पुन: प्रकट हुई। वह संवरण की ओर देखती हुई बोली- “राजन! मैं स्वयं आप पर मुग्ध हूँ, किंतु मैं अपने पिता की आज्ञा के वश में हूँ। मैं सूर्य देव की छोटी पुत्री हूँ। मेरा नाम ‘तपती’ है। जब तक मेरे पिता आज्ञा नहीं देंगे, मैं आपके साथ विवाह नहीं कर सकती। यदि आपको मुझे पाना है तो मेरे पिता को प्रसन्न कीजिए।” वह युवती अपने कथन को समाप्त करती हुई पुन: अदृश्य हो गई। संवरण पुन: उन्मत्तों की भांति विलाप करने लगे। वह आकुलित होकर पृथ्वी पर गिर गये और ‘तपती-तपती’ की पुकार से पर्वत को ध्वनित करने लगे। संवरण तपती को पुकारते-पुकारते धरती पर गिरकर बेहोश हो गये। जब उनकी चेतना वापस आई, तो पुन: उन्हें तपती स्मरण हो आई। उन्हें तपती का वह कथन भी स्मरण हुआ कि- “यदि मुझे पाना चाहते हैं, तो मेरे पिता सूर्य देव को प्रसन्न कीजिए। उनकी आज्ञा के बिना मैं आपसे विवाह नहीं कर सकती।”
सूर्य देव द्वारा संवरण की परीक्षा
संवरण की रगों में विद्युत की तरंग-सी दौड़ उठी। वह मन ही मन सोचते रहे कि तपती को पाने के लिए सूर्य देव की आराधना करेंगे। उन्हें प्रसन्न करने में सब कुछ भूल जायेंगे। संवरण सूर्य देव की आराधना करने लगे। धीरे-धीरे सालों बीत गए, संवरण तप करते रहे। अंत में सूर्य देव के मन में संवरण की परीक्षा लेने का विचार उत्पन्न हुआ। रात्रि का समय था। चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था। संवरण नैत्र बंद किए हुए ध्यान की मुद्रा में विराजमान थे। सहसा उनके कानों में किसी की आवाज़ आई- “संवरण, तू यहाँ तप में संलग्न है। तेरी राजधानी अग्नि में जल रही है।” यह कथन सुनने पर भी संवरण चुपचाप अपनी जगह पर बैठे रहे। उनके मन में रंचमात्र भी दु:ख पैदा नहीं हुआ। उनके कानों में पुन: दूसरी आवाज सुनाई दी- “संवरण, तेरे कुटुंब के सभी लोग अग्नि में जलकर मर गए।” किंतु फिर भी राजा संवरण हिमालय के समान दृढ़ होकर अपने स्थान पर ही जमे रहे। उनके कानों में पुन: तीसरी बार कंठ-स्वर सुनाई पड़ा- “संवरण, तेरी प्रजा अकाल की अग्नि में जलकर भस्म हो रही है। तेरे नाम को सुनकर लोग थू-थू कर रहे हैं।” इस पर भी संवरण दृढतापूर्वक तप में लगे रहे। उनकी दृढ़ता पर सूर्य देव प्रसन्न हो उठे और उन्होंने प्रकट होकर कहा- “संवरण, मैं तुम्हारी दृढ़ता पर मुग्ध हूँ। बोलो, तुम्हें क्या चाहिए?”

तपती से विवाह ( कुरु वंश की कथा )

संवरण सूर्य देव को प्रणाम करते हुए बोले- “देव! मुझे आपकी पुत्री तपती को छोड़कर और कुछ नहीं चाहिए। कृपा करके मुझे तपती को देकर मेरे जीवन को कृतार्थ कीजिए।” भगवान सूर्य देव ने प्रसन्नता की मुद्रा में उत्तर दिया- “संवरण, मैं सब कुछ जानता हूँ। तपती भी तुमसे प्रेम करती है। आज से तपती तुम्हारी है।” सूर्य देव ने अपनी पुत्री तपती का संवरण के साथ विधिवत विवाह कर दिया। संवरण तपती को लेकर उसी पर्वत पर रहने लगे और पत्नी को प्राप्त करने के बाद राग-रंग में अपनी प्रजा को भी भूल गये।

राज्य में अकाल ( कुरु वंश की कथा )

विवाह के बाद संवरण भोग-विलास में डूब गये और दूसरी ओर उनके राज्य में भीषण अकाल पैदा हुआ। धरती सूख गई, कुएँ, तालाब और पेड़-पौधे भी सूख गए। प्रजा भूखों मरने लगी। लोग राज्य को छोड़कर दूसरे देशों में जाने लगे। किसी देश का राजा जब राग-रंग में डूब जाता है, तो उसकी प्रजा का यही हाल होता है। राजा संवरण का मंत्री बड़ा बुद्धिमान और उदार हृदय का था। वह संवरण का पता लगाने के लिए निकल पड़ा। वह घूमता-घामता उसी पर्वत पर आ पहुँचा, जिस पर संवरण तपती के साथ निवास करता था। संवरण के साथ तपती को देखकर बुद्धिमान मंत्री समझ गया कि उसका राजा स्त्री के सौंदर्य जाल में फंसा हुआ है। मंत्री ने बड़ी ही बुद्धिमानी के साथ काम किया। उसने संवरण को वासना के जाल से छुड़ाने के लिए अकाल की अग्नि में जलते हुए मनुष्यों के चित्र बनवाए। वह उन चित्रों को लेकर संवरण के सामने उपस्थित हुआ। उसने संवरण से कहा- “महाराज! मैं आपको चित्रों की एक पुस्तक भेंट करना चाहता हूँ।”

संवरण के मंत्री ने चित्रों की वह पुस्तक संवरण की ओर बढ़ा दी। संवरण पुस्तक के पृष्ठों को उलट-पलट कर देखने लगे। किसी पृष्ठ में मनुष्य पेड़ों की पत्तियाँ खा रहे थे, किसी में माताएँ अपने बच्चों को कुएँ में फेंक रही थीं। किसी पृष्ठ में भूखे मनुष्य जानवरों को कच्चा मांस खा रहे थे और किसी पृष्ठ में प्यासे मनुष्य हाथों में कीचड़ लेकर चाट रहे थे। संवरण चित्रों को देखकर गंभीरता के साथ बोला- “यह किस राजा के राज्य की प्रजा का दृश्य है?” मंत्री ने बहुत ही धीमे और प्रभावपूर्वक स्वर में उत्तर दिया- “उस राजा का नाम ‘संवरण’ है।” यह सुनकर संवरण चकित हो उठा। वह विस्मय भरी दृष्टि से मंत्री की ओर देखने लगा। मंत्री पुन: अपने ढंग से बोला- “मैं सच कह रहा हूँ महाराज! यह आपकी ही प्रजा का दृश्य है। प्रजा भूखों मर रही है। चारों ओर हाहाकार मचा है। राज्य में न अन्न है, न जल है। धरती की छाती फट गई है। महाराज, वृक्ष भी आपको पुकारते-पुकारते सूख गए हैं।”

कुरु का जन्म ( कुरु वंश की सम्पूर्ण कथा )

मंत्री के मुख से अपने राज्य और प्रजा का यह हाल सुनकर संवरण का हृदय कांप उठा। वह उठकर खड़ा हो गया और बोला- “मेरी प्रजा का यह हाल है और मैं यहाँ मद में पड़ा हुआ हूँ। मुझे धिक्कार है। मंत्री जी! मैं आपका कृतज्ञ हूँ, आपने मुझे जगाकर बहुत अच्छा किया।” संवरण तपती के साथ अपनी राजधानी पहुँचा। उसके राजधानी में पहुँचते ही जोरों की वर्षा प्रारम्भ हो गई। सूखी हुई पृथ्वी हरियाली से ढक गई। अकाल दूर हो गया। प्रजा सुख और शांति के साथ जीवन व्यतीत करने लगी। वह संवरण को परमात्मा और तपती को देवी मानकर दोनों की पूजा करने लगी। कुछ समय पश्चात संवरण और तपती से एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम ‘कुरु’ रखा गया। कुरु भी अपने माता-पिता के समान ही प्रतापी और पुण्यात्मा थे। आगे चलकर उनके नाम से ‘कुरु वंश’ प्रारम्भ हुआ।

success rules सफलता आन्तरिक नियमो से मिलती है |

हर जानकारी अपनी भाषा हिंदी में सरल शब्दों में प्राप्त करने के लिए  हमारे फेसबुक पेज को लाइक करे जहाँ आपको सही बात पूरी जानकारी के साथ प्रदान की जाती है | हमारे फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए यहाँ क्लिक करें |


Rise of Kuruvansh Story from Mahabharata In Hindi | Origin of Kuru dynasty ~ Mahabharata

 

The Kuru dynasty began with King Kuru. He was the first man of this dynasty. King Kuru was very majestic, brave, and brilliant. The branches of the ‘Kuru dynasty’ emerged and developed in his name. One of the majestic and fiery heroes was born in the Kuru dynasty. The famous Pandavas and Kauravas of Mahabharata also took birth in the Kuru dynasty itself. The battle of Mahabharata also took place between the Kuru dynasty, which lasted for eighteen days. The ‘Kuru dynasty’ mentioned in the Mahabharata is estimated to have been in power from 1200 to 800 BCE. Looking at the mythological belief, it is known that the period of Parikshit and Mahapadmananda, son of Abhimanyu, grandson of Pandava Arjuna, stop in 382 BC.
The story
Who was ‘Kuru’? And by whom and how was he born ?, Ved Vyas has highlighted these questions in Mahabharata. The story of ‘Karu Dynasty’ is very interesting and inspiring, which is as follows-

King sand

In ancient times, a majestic king ruled in Hastinapur, whose name was Sandra. King Sandaran was as bright as the Sun and was very considerate of his subjects. He himself tried his best to overcome the sufferings of his subjects even after taking the trouble. Sambar was an exclusive devotee of Sun God. He used to worship Sun God with great reverence every day. Till he could not worship the sun god, he did not even take a sip of water under the throat.

Read the complete story of Mahabharata:

The complete story of Mahabharata! Complete Mahabharata Story In Hindi

Meet with heat

One day Sandhar went to a mountain to hunt. As he was traveling with the bow and arrow in his hand atop the mountain, he saw an extremely beautiful young lady. That young woman was cast in the mold of beauty. It seemed that the creator of each of his parts was groomed with great interest. Samvar had not seen such a beautiful woman to date. Sanvran became enamored of the woman who captivated the mind. Forgetting everything, he surrendered himself to her. He went to the young woman, looking at her with satisfied eyes, and said- “Tanwangi, who are you? Are you a goddess, a Gandharva, or a kinnari? My mind has become fickle when you see me. You marry me with a Gandharva and take pleasure. ” But the woman did not answer anything about the statement. She kept looking at the closure for a few moments, then disappeared. Sanvara became extremely distraught when the woman became invisible. He threw a bow and arrow and mourned like demons – “Beautiful! Where have you gone? Just as the lotus withers without the sun and the way the plant dries up without water, similarly I cannot survive without you.” Your beauty has stolen my mind. You appear and tell me who you are and how I can find you. ”

Statement of heat

With such a state of distress and distraction, the woman reappeared. She looked towards the hymn and said- “Rajan! I myself am enchanted by you, but I am under the command of my father. I am the younger daughter of the Sun God. My name is ‘Tapati’. Unless my father commands I will not marry you. If you want me, please my father. ” The woman ends her statement and becomes invisible again. Samvar again started mourning like a maniac. He fell down on the earth and began to sound the mountain with the cry of ‘hot and hot’. Calling the sandalwood heat, he fell down on the earth and fainted. When his consciousness returned, he remembered the burning heat again. He also remembered the statement of the ascetic that- “If you want to have me, please my father Surya Dev. I cannot marry you without his permission.”
Sun test
A wave of electricity rose in the veins of sand. He kept on thinking that he would worship the sun god to get the heat. You will forget everything to make them happy. Sandhya started worshiping Sun God. Gradually, years passed, meditation kept on doing. In the end, the idea of ​​taking the test of sunrise arose in the mind of Sun God. It was night. There was silence everywhere. Samvara Naitra was seated in a closed meditation posture. Suddenly someone heard a voice in his ears – “Sanctum, you are engaged here in penance. Your capital is burning in fire.” Even after hearing this statement, Sandhar remained silently in his place. Even a little sorrow did not arise in his mind. A second sound was heard again in his ears – “Sandhar, all the people of your family died in the fire.” But even then King Samvar remained as firm as the Himalayas and stayed in his place. For the third time, he heard a loud voice in his ears – “Sanvar, your subjects are being burned in the fire of famine. People are spitting on hearing your name.” On this too, Sankara remained steadfast in penance. The Sun God was pleased at his perseverance and he appeared and said – “Sangh, I am fascinated by your perseverance. Say, what do you want?”

Married to a hot woman

Salutation said to the sun god, “God! I want nothing more than your daughter Tapti. Please give me gratitude for my life by giving me to Tapti.” Lord Surya Dev replied in a posture of happiness- “Sanvar, I know everything. The heat also loves you. The heat is yours from today.” Surya Dev duly married his daughter Tapti with Sambar.

or. They started living on the same mountain with sandal heat and after getting a wife, they forgot their subjects in raga-rang.

Famine in the state

After marriage, Sambaran drowned in indulgence and luxury, and on the other hand, a severe famine arose in his kingdom. The earth dried up, wells, ponds, and trees also dried up. The subjects started dying of hunger. People left the state and started moving to other countries. When the king of a country drowns in raga-rang, the condition of his subjects is the same. The minister of King Samvar was very intelligent and of a generous heart. He set out to find the cacophony. He wandered and reached the same mountain on which Samvar resided with the heat. Seeing the scorching heat, the wise minister understood that his king was trapped in the beautiful web of the woman. The minister acted with great intelligence. He made pictures of humans burning in the fire of famine to free Sanvran from the trap of lust. He took the pictures and appeared before the ceremony. He told Samvar- “Maharaj! I want to present you a book of pictures.”

The Minister of Sanitation moved that book of pictures towards the publication. The pages of the book began to be turned back and forth. On one page, humans were eating the leaves of trees, in some, the mothers were throwing their children in the well. On one page, hungry humans were eating raw meat from animals and on another page, thirsty people were licking with mud in their hands. On seeing the hymn pictures, he said with seriousness- “This is the scene of the subjects of which king’s kingdom?” The minister replied in a very slow and effective voice – “The name of that king is ‘Sandhar’.” Sandhar got surprised after hearing this. He looked at the minister with astonishing eyesight. The minister again said in his own way – “I am telling the truth, Maharaj! This is the scene of your people. The people are dying of hunger. There is chaos all around. The state has neither food nor water. The chest of the earth explodes. Gone. Maharaj, the trees have dried up, calling you. ”

Birth of Kuru
Hearing this condition of his state and subjects from the mouth of the minister, Sancharan’s heart shook. He got up and stood up and said- “This is the condition of my people and I am lying here under the head. I am sorry. Minister! I am thankful to you, you did me very well by waking me up.” Sandhar reached his capital with heat. As soon as he reached the capital, heavy rain started. Dry earth covered with greenery. The famine went away. The subjects started living with happiness and peace. She started worshiping both, considering Sanvara as divine and Tapati as a goddess. After some time, a son was born from Sambaran and Tapti, named ‘Kuru’. Kuru was also as great and virtuous as his parents. Later, the ‘Kuru dynasty’ started in his name.

1 thought on “कुरु वंश की उत्पत्ति ~ महाभारत Rise of Kuruvansh , Mahabharata”

Leave a Comment

%d bloggers like this: