परीक्षित के जन्म की कथा ~ महाभारत Story of Parikshit’s birth

परीक्षित के जन्म की कथा ~ महाभारत

व्यास ने भी श्रीकृष्ण के वचनों का अनुमोदन किया। अर्जुन अश्वत्थामा को रस्सी में बांधकर द्रौपदी के पास ले आये। द्रौपदी ने दयार्द्र होकर उसे छोड़ने को कहा किंतु श्रीकृष्ण की प्रेरणा से अर्जुन ने उसके सिर से मणि निकालकर द्रौपदी को दी। (परीक्षित)
उत्तरा के गर्भ में बालक ब्रह्मास्त्र के तेज से दग्ध होने लगा। तब श्रीकृष्ण ने सूक्ष्म रूप से उत्तरा के गर्भ में प्रवेश किया। उनका वह ज्योतिर्मय सूक्ष्म शरीर अँगूठे के आकार का था। वे चारों भुजाओं में शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किये हुते थे। कानों में कुणडल तथा आँखें रक्तवर्ण थीं। हाथ में जलती हुई गदा लेकर उस गर्भ स्थित बालक के चारों ओर घुमाते थे। (परीक्षित)
जिस प्रकार सूर्यदेव अन्धकार को हटा देते हैं, उसी प्रकार वह गदा अश्वत्थामा के छोड़े हुए ब्रह्मास्त्र की अग्नि को शांत करती थी। गर्भस्थित वह बालक उस ज्योतिर्मय शक्ति को अपने चारों ओर घूमते हुये देखता था। वह सोचने लगता कि यह कौन है और कहाँ से आया है? कुछ समय पश्चात् पाण्डव यज्ञ की दीक्षा के निमित्त राजा मरुत का धन लेने के लिये उत्तर दिशा में गये हुए थे। उसी बीच उनकी अनुपस्थिति में तथा श्रीकृष्ण की उपस्थिति में दस मास पश्चात् उस बालक का जन्म हुआ। परन्तु बालक गर्भ से बाहर नकलते ही मृतवत् हो गया। बालक को मरा हुआ देखकर रनिवास में रुदन आरम्भ हो गया। शोक का समुद्र उमड़ पड़ा। कुरु वंश को पिण्डदान करने वाला केवल एक मात्र यही बालक उत्पन्न हुआ था, सो वह भी न रहा।
कुन्ती, द्रौपदी, सुभद्रा आदि सभी महान् शोक सागर में डूबकर आँसू बहाने लगीं। उत्तरा के गर्भ से मृत बालक के जन्म का समाचार सुनकर श्रीकृष्ण तुरन्त ही सात्यकि को साथ लेकर अन्तःपुर पहुँचे। वहाँ रनिवास में करुण क्रन्दन को सुनकर उनका हृदय भर अया। इतना करुण क्रन्दन युद्ध में मरे हुए पुत्रों के लिये भी सुभद्रा और द्रौपदी ने नहीं किया था, जितना कि उस नवजात शिशु की मृत्यु पर कर रही थीं।
भगवान श्रीकृष्ण को देखते ही वे उनके चरणों पर गिर पड़ीं और दहाड़ मार-मार कर विलाप करते हुए बोलीं- “हे जनार्दन! तुमने यह प्रतिज्ञा की थी कि यह बालक इस ब्रह्मास्त्र से मृत्यु को प्राप्त न होगा तथा साठ वर्ष तक जीवित रहकर धर्म का राज्य करेगा। किन्तु यह बालक तो मृतावस्था में पड़ा हुआ है। यह तुम्हारे पौत्र अभिमन्यु का बालक है। हे हरिसूदन! इस बालक को अपनी अमृत भरी दृष्टि से जीवन दान दो।” (परीक्षित)
श्रीकृष्ण सबको सान्त्वना देकर तत्काल प्रसूतिगृह में गये और वहाँ के प्रबन्ध का अवलोकन किया। चारों ओर जल के घट रखे थे, अग्नि भी जल रही थी, घी की आहुति दी जा रही थी, श्वेत पुष्प एवं सरसों बिखरे थे और चमकते हुए अस्त्र भी रखे हुए थे। इस विधि से यज्ञ, राक्षस एवं अन्य व्याधियों से प्रसूतिगृह को सुरक्षित रखा गया था। उत्तरा पुत्रशोक के कारण मूर्छित हो गई थी। (परीक्षित)
उसी समय द्रौपदी आदि रानियाँ वहाँ आकर कहने लगीं- “हे कल्याणी! तुम्हारे सामने जगत् के जीवनदाता साक्षात भगवान श्रीकृष्णचन्द्र, तुम्हारे श्वसुर खड़े हैं। चेतन हो जाओ।” श्रीकृष्ण ने कहा- “पुत्री! शोक न करो। तुम्हारा यह पुत्र अभी जीवित होता है। मैंने जीवन में कभी झूठ नहीं बोला है। सबके सामने मैंने प्रतिज्ञा की है वह अवश्य पूर्ण होगी। मैंने तुम्हारे इस बालक की रक्षा गर्भ में की है तो भला अब कैसे मरने दूँगा।” इतना कहकर श्रीकृष्ण ने उस बालक पर अपनी अमृतमयी दृष्टि डाली और बोले- “यदि मैंने कभी झूठ नहीं बोला है, सदा ब्रह्मचर्य व्रत का नियम से पालन किया है, युद्ध में कभी पीठ नहीं दिखाई है, मैंने कभी भूल से भी अधर्म नहीं किया है तो अभिमन्यु का यह मृत बालक जीवित हो जाये।”
उनके इतना कहते ही वह बालक हाथ पैर हिलाते हुए रुदन करने लगा। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सत्य और धर्म के बल से ब्रह्मास्त्र को पीछे लौटाकर ब्रह्मलोक में भेज दिया। उनके इस अद्भुत कर्म से बालक को जीवित देखकर अन्तःपुर की सारी स्त्रियाँ आश्चर्यचकित रह गईं और उनकी वन्दना करने लगीं। भगवान श्रीकृष्ण ने उस बालक का नाम ‘परीक्षित’ रखा, क्योंकि वह कुरुकुल के परिक्षीण (नाश) होने पर उत्पन्न हुआ था।
जब युधिष्ठिर लौटकर आये और पुत्र जन्म का समाचार सुना तो वे अति प्रसन्न हुए और उन्होंने असंख्य गाय, गाँव, हाथी, घोड़े, अन्न आदि ब्राह्मणों को दान दिये। उत्तम ज्योतिषियों को बुलाकर बालक के भविष्य के विषय में प्रश्न पूछे। ज्योतिषियों ने बताया कि वह बालक अति प्रतापी, यशस्वी तथा इच्क्ष्वाकु समान प्रजापालक, दानी, धर्मी, पराक्रमी और भगवान श्रीकृष्णचन्द्र का भक्त होगा। (परीक्षित)
एक ऋषि के शाप से तक्षक द्वारा मृत्यु से पहले संसार के माया मोह को त्यागकर गंगा के तट पर श्रीशुकदेव जी से आत्मज्ञान प्राप्त करेगा। धर्मराज युधिष्ठिर ज्योतिषियों के द्वारा बताये गये भविष्यफल को सुनकर प्रसन्न हुए और उन्हें यथोचित दक्षिणा देकर विदा किया। वह बालक शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा के समान दिन प्रतिदिन बढ़ने लगा। धर्मराज युधिष्ठिर ने राजा मरुत का गड़ा हुआ धन लाकर अश्वमेघ यज्ञ किया। श्रीकृष्ण की देख रेख-में यज्ञ निर्विघ्न सम्पन्न हो गया। सभी कार्य पूर्ण हो जाने पर श्रीकृष्ण भी द्वारका लौट गए।
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Story of Parikshit’s birth ~ Mahabharata

 

When Draupadi got the news that her five sons had been killed by Ashwatthama, she went on an indefinite fast and said that she would break the fast only when she would receive the gem which remained on Ashwatthama’s forehead.

Arjun sets out to capture Ashwatthama. A fierce war broke out between Ashwatthama and Arjuna. Ashwatthama used Brahmastra on Arjuna, on which Arjuna also left Brahmastra. Arjuna announces his Brahmastra at the behest of Narada and Vyasa, but Ashwatthama attacks Brahmastra on Abhimanyu’s pregnant wife Uttara to destroy the Pandavas from their roots.

Krishna said- “Uttara is blessed with the birth of a child named Parikshit. His son will definitely be born. Even if that child is dead due to your use of weapons, I will give him life. He will be the emperor of the land and You will spend three thousand years in sinless places carrying the sin of such slaughter. The smell of blood will always be released from your body. You will be suffering from many diseases. ”

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Complete story of Mahabharata! Complete Mahabharata Story In Hindi

 

Vyasa also approved the words of Shri Krishna. Arjuna tied Ashwatthama in a rope and brought it to Draupadi. Draupadi asked her to leave him as a dynasty but Arjuna, with the inspiration of Shri Krishna, removed the gem from his head and gave it to Draupadi.

In Uttara’s womb, the child started getting burnt by the sharpness of Brahmastra. Then Shri Krishna microscopically entered the womb of Uttara. His astrological astral body was in the shape of a thumb. He wore conch, chakra, mace, padma in all four arms. The ears were blunt and the eyes were bloodshot. They used to rotate around the child in that womb with a mace burning in their hands.

Just as Suryadev removes the darkness, similarly she used to soothe the fire of Brahmastra left of mace Ashwatthama. The child in the womb saw that astrological power revolving around him. He starts wondering who it is and where it came from? After some time, for the initiation of Pandava Yajna, King Marut had gone north to take money. Meanwhile, that child was born in his absence and after ten months in the presence of Shri Krishna. But the child died after copying out of the womb. Seeing the child dead, Ruddan started in Ranivas. A sea of ​​grief arose. The only child born to the Kuru dynasty was born, so he did not live.

Kunti, Draupadi, Subhadra etc. all drowned in the ocean of great sorrow and started shedding tears. Hearing the news of the birth of a dead child from Uttara’s womb, Shri Krishna immediately reached Satpur with Satyaki. Hearing Karun Krandan there in Ranivas, he was filled with heart. Not so much for Karun Krandan’s dead sons as Subhadra and Draupadi did, even as they were doing at the death of that newborn child.

Seeing Lord Krishna, she fell at his feet and roared and mourned and said, “O Janardan! You had promised that this child will not die from this Brahmastra and live for sixty years of religion. The kingdom will do. But this child is lying in a state of disarray. This is the child of your grandson Abhimanyu. O Harisudan! Give life to this child with your nectar-filled vision. ”

Shri Krishna consoled everyone and immediately went to the maternity home and observed the management there. Water was stored all around, fire was also burning, ghee was being sacrificed, white flowers and mustard were scattered and shining weapons were also kept. By this method, the maternity house was kept safe from yagna, demon and other diseases. Uttara had fainted due to bereavement on her son’s death.

At the same time Draupadi etc. queens came there and started saying – “O Kalyani! Lord Krishna Krishna, your life-giver is standing in front of you. Your body is standing. Become conscious.” Shri Krishna said- “Daughter! Do not grieve. This son of yours still lives. I have never lied in life. I have promised in front of everyone that it will be complete. I have protected this child in your womb. How will I let you die now. ” Saying this, Shri Krishna cast his nectaric gaze on the child and said- “If I have never lied, always followed the rule of Brahmacharya fast, never shown back in war, I have never committed wrongdoing even by mistake. So let this dead child of Abhimanyu come alive. ”

As soon as they said this, the child started crying while shaking hands and feet. Lord Krishna returned Brahmastra back to Brahmaloka with the strength of his truth and religion. Seeing the child alive by this wonderful deed, all the women of Antapur were surprised and started to worship him. Lord Sri Krishna named the child as ‘Parikshit’, because he was born when the kurukula was overcome.

When Yudhishthira returned and heard the news of son’s birth, he was very happy and donated innumerable cows, villages, elephants, horses, grains etc. to the Brahmins. Called the best astrologers and asked questions about the future of the child. Astrologers told that that child will be very glorious, famous and Ichkshvaku like Prajapalak, Dani, righteous, mighty and a devotee of Lord Shri Krishna Chandra.

Shishukdev ji is on the banks of the Ganges, abandoning the illusion of the world before the death of the sage by the curse of a sage. He will attain enlightenment. Dharmaraja Yudhishthira was pleased to hear the horoscope told by the astrologers and gave them proper dakshina and sent them away. That child started growing day by day like the moon of Shukla Paksha. Dharmaraja Yudhishthira performed Ashwamedha Yagna by bringing the buried wealth of King Marut. The yagna was completed smoothly under the supervision of Shri Krishna. On completion of all the work Sri Krishna also returned to Dwarka.

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