Tuesday, April 16, 2024
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पृथ्वी और देवतादि की करुण पुकार श्री रामचरितमानस

पृथ्वी और देवतादि की करुण पुकार

चौपाई :
* बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। जे लंपट परधन परदारा॥
मानहिं मातु पिता नहिं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा॥1॥
भावार्थ:-पराए धन और पराई स्त्री पर मन चलाने वाले, दुष्ट, चोर और जुआरी बहुत बढ़ गए। लोग माता-पिता और देवताओं को नहीं मानते थे और साधुओं (की सेवा करना तो दूर रहा, उल्टे उन) से सेवा करवाते थे॥1॥
* जिन्ह के यह आचरन भवानी। ते जानेहु निसिचर सब प्रानी॥
अतिसय देखि धर्म कै ग्लानी। परम सभीत धरा अकुलानी॥2॥
भावार्थ:-(श्री शिवजी कहते हैं कि-) हे भवानी! जिनके ऐसे आचरण हैं, उन सब प्राणियों को राक्षस ही समझना। इस प्रकार धर्म के प्रति (लोगों की) अतिशय ग्लानि (अरुचि, अनास्था) देखकर पृथ्वी अत्यन्त भयभीत एवं व्याकुल हो गई॥2॥
* गिरि सरि सिंधु भार नहिं मोही। जस मोहि गरुअ एक परद्रोही।
सकल धर्म देखइ बिपरीता। कहि न सकइ रावन भय भीता॥3॥
भावार्थ:-(वह सोचने लगी कि) पर्वतों, नदियों और समुद्रों का बोझ मुझे इतना भारी नहीं जान पड़ता, जितना भारी मुझे एक परद्रोही (दूसरों का अनिष्ट करने वाला) लगता है। पृथ्वी सारे धर्मों को विपरीत देख रही है, पर रावण से भयभीत हुई वह कुछ बोल नहीं सकती॥3॥
 *धेनु रूप धरि हृदयँ बिचारी। गई तहाँ जहँ सुर मुनि झारी॥
निज संताप सुनाएसि रोई। काहू तें कछु काज न होई॥4॥
भावार्थ:-(अंत में) हृदय में सोच-विचारकर, गो का रूप धारण कर धरती वहाँ गई, जहाँ सब देवता और मुनि (छिपे) थे। पृथ्वी ने रोककर उनको अपना दुःख सुनाया, पर किसी से कुछ काम न बना॥4॥
छन्द :
* सुर मुनि गंधर्बा मिलि करि सर्बा गे बिरंचि के लोका।
सँग गोतनुधारी भूमि बिचारी परम बिकल भय सोका॥
ब्रह्माँ सब जाना मन अनुमाना मोर कछू न बसाई।
जा करि तैं दासी सो अबिनासी हमरेउ तोर सहाई॥
भावार्थ:-तब देवता, मुनि और गंधर्व सब मिलकर ब्रह्माजी के लोक (सत्यलोक) को गए। भय और शोक से अत्यन्त व्याकुल बेचारी पृथ्वी भी गो का शरीर धारण किए हुए उनके साथ थी। ब्रह्माजी सब जान गए। उन्होंने मन में अनुमान किया कि इसमें मेरा कुछ भी वश नहीं चलने का। (तब उन्होंने पृथ्वी से कहा कि-) जिसकी तू दासी है, वही अविनाशी हमारा और तुम्हारा दोनों का सहायक है॥
सोरठा :
* धरनि धरहि मन धीर कह बिरंचि हरि पद सुमिरु।
जानत जन की पीर प्रभु भंजिहि दारुन बिपति॥184॥
भावार्थ:-ब्रह्माजी ने कहा- हे धरती! मन में धीरज धारण करके श्री हरि के चरणों का स्मरण करो। प्रभु अपने दासों की पीड़ा को जानते हैं, वे तुम्हारी कठिन विपत्ति का नाश करेंगे॥184॥
चौपाई :
* बैठे सुर सब करहिं बिचारा। कहँ पाइअ प्रभु करिअ पुकारा॥
पुर बैकुंठ जान कह कोई। कोउ कह पयनिधि बस प्रभु सोई॥1॥
भावार्थ:-सब देवता बैठकर विचार करने लगे कि प्रभु को कहाँ पावें ताकि उनके सामने पुकार (फरियाद) करें। कोई बैकुंठपुरी जाने को कहता था और कोई कहता था कि वही प्रभु क्षीरसमुद्र में निवास करते हैं॥1॥
* जाके हृदयँ भगति जसि प्रीती। प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहिं रीती॥
तेहिं समाज गिरिजा मैं रहेऊँ। अवसर पाइ बचन एक कहेउँ॥2॥
भावार्थ:-जिसके हृदय में जैसी भक्ति और प्रीति होती है, प्रभु वहाँ (उसके लिए) सदा उसी रीति से प्रकट होते हैं। हे पार्वती! उस समाज में मैं भी था। अवसर पाकर मैंने एक बात कही-॥2॥

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* हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना॥
देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं। कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं॥3॥
भावार्थ:-मैं तो यह जानता हूँ कि भगवान सब जगह समान रूप से व्यापक हैं, प्रेम से वे प्रकट हो जाते हैं, देश, काल, दिशा, विदिशा में बताओ, ऐसी जगह कहाँ है, जहाँ प्रभु न हों॥3॥
* अग जगमय सब रहित बिरागी। प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी॥
मोर बचन सब के मन माना। साधु-साधु करि ब्रह्म बखाना॥4॥
भावार्थ:-वे चराचरमय (चराचर में व्याप्त) होते हुए ही सबसे रहित हैं और विरक्त हैं (उनकी कहीं आसक्ति नहीं है), वे प्रेम से प्रकट होते हैं, जैसे अग्नि। (अग्नि अव्यक्त रूप से सर्वत्र व्याप्त है, परन्तु जहाँ उसके लिए अरणिमन्थनादि साधन किए जाते हैं, वहाँ वह प्रकट होती है। इसी प्रकार सर्वत्र व्याप्त भगवान भी प्रेम से प्रकट होते हैं।) मेरी बात सबको प्रिय लगी। ब्रह्माजी ने ‘साधु-साधु’ कहकर बड़ाई की॥4॥
दोहा :
* सुनि बिरंचि मन हरष तन पुलकि नयन बह नीर।
अस्तुति करत जोरि कर सावधान मतिधीर॥185॥
भावार्थ:-मेरी बात सुनकर ब्रह्माजी के मन में बड़ा हर्ष हुआ, उनका तन पुलकित हो गया और नेत्रों से (प्रेम के) आँसू बहने लगे। तब वे धीरबुद्धि ब्रह्माजी सावधान होकर हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे॥185॥
छन्द :
* जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता।
गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिंधुसुता प्रिय कंता॥
पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरम न जानइ कोई।
जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ अनुग्रह सोई॥1॥
भावार्थ:-हे देवताओं के स्वामी, सेवकों को सुख देने वाले, शरणागत की रक्षा करने वाले भगवान! आपकी जय हो! जय हो!! हे गो-ब्राह्मणों का हित करने वाले, असुरों का विनाश करने वाले, समुद्र की कन्या (श्री लक्ष्मीजी) के प्रिय स्वामी! आपकी जय हो! हे देवता और पृथ्वी का पालन करने वाले! आपकी लीला अद्भुत है, उसका भेद कोई नहीं जानता। ऐसे जो स्वभाव से ही कृपालु और दीनदयालु हैं, वे ही हम पर कृपा करें॥1॥
* जय जय अबिनासी सब घट बासी ब्यापक परमानंदा।
अबिगत गोतीतं चरित पुनीतं मायारहित मुकुंदा॥
जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगत मोह मुनिबृंदा।
निसि बासर ध्यावहिं गुन गन गावहिं जयति सच्चिदानंदा॥2॥
भावार्थ:-हे अविनाशी, सबके हृदय में निवास करने वाले (अन्तर्यामी), सर्वव्यापक, परम आनंदस्वरूप, अज्ञेय, इन्द्रियों से परे, पवित्र चरित्र, माया से रहित मुकुंद (मोक्षदाता)! आपकी जय हो! जय हो!! (इस लोक और परलोक के सब भोगों से) विरक्त तथा मोह से सर्वथा छूटे हुए (ज्ञानी) मुनिवृन्द भी अत्यन्त अनुरागी (प्रेमी) बनकर जिनका रात-दिन ध्यान करते हैं और जिनके गुणों के समूह का गान करते हैं, उन सच्चिदानंद की जय हो॥2॥
* जेहिं सृष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाय न दूजा।
सो करउ अघारी चिंत हमारी जानिअ भगति न पूजा॥
जो भव भय भंजन मुनि मन रंजन गंजन बिपति बरूथा।
मन बच क्रम बानी छाड़ि सयानी सरन सकल सुरजूथा॥3॥
भावार्थ:-जिन्होंने बिना किसी दूसरे संगी अथवा सहायक के अकेले ही (या स्वयं अपने को त्रिगुणरूप- ब्रह्मा, विष्णु, शिवरूप- बनाकर अथवा बिना किसी उपादान-कारण के अर्थात्‌ स्वयं ही सृष्टि का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण बनकर) तीन प्रकार की सृष्टि उत्पन्न की, वे पापों का नाश करने वाले भगवान हमारी सुधि लें। हम न भक्ति जानते हैं, न पूजा, जो संसार के (जन्म-मृत्यु के) भय का नाश करने वाले, मुनियों के मन को आनंद देने वाले और विपत्तियों के समूह को नष्ट करने वाले हैं। हम सब देवताओं के समूह, मन, वचन और कर्म से चतुराई करने की बान छोड़कर उन (भगवान) की शरण (आए) हैं॥3॥
* सारद श्रुति सेषा रिषय असेषा जा कहुँ कोउ नहिं जाना।
जेहि दीन पिआरे बेद पुकारे द्रवउ सो श्रीभगवाना॥
भव बारिधि मंदर सब बिधि सुंदर गुनमंदिर सुखपुंजा।
मुनि सिद्ध सकल सुर परम भयातुर नमत नाथ पद कंजा॥4॥
भावार्थ:-सरस्वती, वेद, शेषजी और सम्पूर्ण ऋषि कोई भी जिनको नहीं जानते, जिन्हें दीन प्रिय हैं, ऐसा वेद पुकारकर कहते हैं, वे ही श्री भगवान हम पर दया करें। हे संसार रूपी समुद्र के (मथने के) लिए मंदराचल रूप, सब प्रकार से सुंदर, गुणों के धाम और सुखों की राशि नाथ! आपके चरण कमलों में मुनि, सिद्ध और सारे देवता भय से अत्यन्त व्याकुल होकर नमस्कार करते हैं॥4॥

Call of the earth and goddess

Bunk:
* Flooded Khal Multi Thief Jura. J lupt pradhan pardara॥
Mother Goddess Father Nahin Deva. Sadhunh Sun Karva Vahin Seva ॥1॥
Sense: The people who are angry, evil, thieves and gamblers have increased greatly. People did not believe in parents and deities and used to serve sadhus (serving them, on the contrary).
* Whose prayers were this. Te janehu nisichar sub prani
See the glorification of religion Param Sabit Dhara Akulani ॥2॥
Bhaarthar :- (Shri Shivji says that-) O Bhavani! Those who have such behavior, consider all those creatures as demons. In this way, the earth became very frightened and distraught after seeing excessive guilt (anorexia, non-attachment) towards religion (people) ॥2॥.

* Giri Siri Indus Bhar Nahi Mohi. Jas mohi garu a sadist
Look at the gross religion, Biprita. Can’t say, Ravan was afraid ॥3॥
Sense: I started thinking that the burden of mountains, rivers and seas does not make me feel so heavy, as heavy as I feel as a paralytic (destroyer of others). Earth is seeing the opposite of all religions, but scared of Ravana, she cannot speak anything.
Also read – Birth of Ravanadi, penance and his opulence and atrocities
* Dhenu as a heartless person. Where are you here
Cried her sorrow. Kahu te kortu kaj na hoi ॥4॥
Connotation: – (Finally) Thinking in the heart, taking the form of a cow, went to the earth, where all the gods and sages (hidden) were. The earth stopped and told them its grief, but nothing could be done by anyone.

Verse:
* Meet Muni Gandarba Loka of Sarba Gay Birnchi.
Song Gotanudhari Bhoomi Bachari The Ultimate Bikal Fear Soak॥
Brahma is all known, mind is not peacock.
Go to maid, so abinasi hamreau to sahai
Meaning: Then the gods, munis and gandharvas all went to Brahma’s lok (Satyaloka). Poor Earth, very distraught with fear and mourning, was with them holding Go’s body. Brahmaji came to know everything. He guessed in my mind that I would not have anything under control. (Then he said to the earth that-) Whosoever you are, she is the imperishable helper of both you and yours.

Soratha:
* Dharni dhari mana dheer kaha birchchi hari pad sumiru.
Pir Prabhu Bhanjihi Darun Bipati of Janat Jan 4184॥
Meaning: – Brahmaji said- O Earth! Remember the feet of Shri Hari with patience in your mind. God knows the suffering of his slaves, they will destroy your difficult calamity. 4184॥
Bunk:
* Sitting notes, all the people are bothered. Where can you call me God?
Someone says Pur Baikuntha Jaan Kau Keh Panayidhi Bus Prabhu Soi ॥1॥
Meaning: All the gods sat and started thinking about where to reach the Lord so that they would call in front of them. Some used to ask to go to Baikunthpuri and some used to say that the same Lord resides in Kshirasamudra.

* Jake Hriday Bhagati Jasi Preeti. Prabhu teh revealed
I live in this society. Opportunity Pai Bachaan should say one ॥2॥
Sense: In whose heart there is devotion and love, the Lord always appears there (for him) in the same manner. Hey Parvati! I was also in that society. Having said the opportunity, I said one thing – 42॥
* Hari Bipak Sarbatra Samana. I am going to be revealed in love

Des Kaal Dis Bidisihu Where are you, God is not there ॥3॥
Sense: I know that God is equally widespread everywhere, through love they appear, tell in the country, time, direction, Vidisha, where is a place where there is no God प्रभु3॥.
* Aga jagi devi devi devi God will come in love
Peacock left everyone’s mind Sage-monk doing Brahman bakhan ॥4॥
Connotation: – They are the most devoid of being characharamaya (permeated in the pasture) and are detached (they have no attachment), they are manifested by love, like fire. (Agni is invariably pervading everywhere, but where the araimanthanadi means are made for it, it appears. Similarly, the pervading God also appears with love.) Everyone loved me. Brahmaji magnified it as ‘Sadhu-Sadhu’.

Also read – Know the diamond test. Know how to succeed
Doha:
* Suni Birnchi Man Harsh Tan Pulki Nayan Bah Neer.
Attention works, careful tax, careful, धी185॥
Meaning: – Hearing my talk, Brahmaji felt very happy, his body became pulsated and tears started flowing from his eyes (of love). Then he started praising Dheerbuddhi Brahmaji with folded hands ॥185॥.
Verse:
* Jai Jai Suranayak Jan pleasing Pranatpal Bhagwanta.
Go Dwij Hitkari Jai Asuari Sindusuta Dear Kanta
Nobody knows, to follow the wonderful land
The simple grace which is Deendayala Karu grace soi ॥1॥

Meaning: O lord of gods, God who pleases servants, God who protects refuge. We salute you! Jai Ho!! O the benefactors of the Go Brahmins, those who destroy the Asuras, dear lord of the sea girl (Shri Lakshmiji)! We salute you! O deity and follower of the earth! Your Leela is amazing, no one knows its secret. Only those who are kind and compassionate by nature, only they should bless us.

* Jai Jai Abinasi Sub Ghat Baasi Bipak Parmananda.
Abigat Gotit Charit Punitam Mayarhit Mukunda
Jhe la lagi biragi bhagya baragat moh munibrinda.
Nissi Basar Dhyavahin Gun Gun Gawahin Jayati Sachchidananda ॥2॥

Sense: O indestructible, residing in everyone’s heart (the transcendent), omnipresent, supreme bliss, unknowable, beyond the senses, holy character, devoid of illusion, Mukunda (salvation)! We salute you! Jai Ho!! (From this world and all the pleasures of the hereafter) The monkvrind (the wise), who is completely untouched by the disgusted and enchanted, also becomes the most devout (lover) whom he meditates night and day and whose

They sing the group of virtues, hail those Sachchidananda ॥2॥
* Jhini Srishti Upai Tribidh Banaa Sa Sahee Do Duja Do
So please think about our lives, don’t worship them.
Jo bhav bhajan bhanjan muni man ranjan ganjan bipati barutha.
Mana Bacha Kram Bani Chhadri Sayani Saran Sakal Surjutha ॥3॥

Sense: Those who created three types of creation alone (or by making themselves trigoniform – Brahma, Vishnu, Shirupa – without any other companions or helpers, or without any causal factor, that is, being an integral cause of creation itself), May the God who destroys sins forgive us. We do not know devotion, nor worship, who are the destroyer of worldly (birth-to-death) fears, the pleasures of the sages and destroying the group of plagues. We are the refuge of those (Gods) leaving the group of all the gods to be shrewd with mind, words and deeds ॥3॥

* Sarad shruti sesha rishya asesha ja kahon ko ko nahin
Jee Deen Piare Beda Pukare Dvarau So Shree Bhagwana
Bhava Baridhi Mandar Sub Bidhi Sundar Gunmandir Sukhpunja.
Muni Siddha Sakal Sur Param Bhayatur Namat Nath Pada Kanja ॥4॥
Meaning: – Sarswati, Vedas, Seshaji and all the sages who do not know anyone, who are dear to them, say such Vedas by saying, Shri Lord, have mercy on us. O Mandarachal form of the ocean of the world (churning), beautiful in all ways, the abode of virtues and the zodiac of happiness! Muni, Siddha and all the gods in your feet lotus, very distraught with fear, greet them.

parmender yadav
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I am simple and honest person
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