प्रतापभानु की कथा श्री रामचरितमानस बालकाण्ड

प्रतापभानु की कथा

चौपाई :
* सुनु मुनि कथा पुनीत पुरानी। जो गिरिजा प्रति संभु बखानी॥
बिस्व बिदित एक कैकय देसू। सत्यकेतु तहँ बसइ नरेसू॥1॥
भावार्थ:-हे मुनि! वह पवित्र और प्राचीन कथा सुनो, जो शिवजी ने पार्वती से कही थी। संसार में प्रसिद्ध एक कैकय देश है। वहाँ सत्यकेतु नाम का राजा रहता (राज्य करता) था॥1॥
* धरम धुरंधर नीति निधाना। तेज प्रताप सील बलवाना॥
तेहि कें भए जुगल सुत बीरा। सब गुन धाम महा रनधीरा॥2॥
भावार्थ:-वह धर्म की धुरी को धारण करने वाला, नीति की खान, तेजस्वी, प्रतापी, सुशील और बलवान था, उसके दो वीर पुत्र हुए, जो सब गुणों के भंडार और बड़े ही रणधीर थे॥2॥
* राज धनी जो जेठ सुत आही। नाम प्रतापभानु अस ताही॥
अपर सुतहि अरिमर्दन नामा। भुजबल अतुल अचल संग्रामा॥3॥
भावार्थ:-राज्य का उत्तराधिकारी जो बड़ा लड़का था, उसका नाम प्रतापभानु था। दूसरे पुत्र का नाम अरिमर्दन था, जिसकी भुजाओं में अपार बल था और जो युद्ध में (पर्वत के समान) अटल रहता था॥3॥
* भाइहि भाइहि परम समीती। सकल दोष छल बरजित प्रीती॥
जेठे सुतहि राज नृप दीन्हा। हरि हित आपु गवन बन कीन्हा॥4॥
भावार्थ:-भाई-भाई में बड़ा मेल और सब प्रकार के दोषों और छलों से रहित (सच्ची) प्रीति थी। राजा ने जेठे पुत्र को राज्य दे दिया और आप भगवान (के भजन) के लिए वन को चल दिए॥4॥
दोहा :
* जब प्रतापरबि भयउ नृप फिरी दोहाई देस।
प्रजा पाल अति बेदबिधि कतहुँ नहीं अघ लेस॥153॥
भावार्थ:-जब प्रतापभानु राजा हुआ, देश में उसकी दुहाई फिर गई। वह वेद में बताई हुई विधि के अनुसार उत्तम रीति से प्रजा का पालन करने लगा। उसके राज्य में पाप का कहीं लेश भी नहीं रह गया॥153॥
चौपाई :
* नृप हितकारक सचिव सयाना। नाम धरमरुचि सुक्र समाना॥
सचिव सयान बंधु बलबीरा। आपु प्रतापपुंज रनधीरा॥1॥
भावार्थ:-राजा का हित करने वाला और शुक्राचार्य के समान बुद्धिमान धर्मरुचि नामक उसका मंत्री था। इस प्रकार बुद्धिमान मंत्री और बलवान तथा वीर भाई के साथ ही स्वयं राजा भी बड़ा प्रतापी और रणधीर था॥1॥
* सेन संग चतुरंग अपारा। अमित सुभट सब समर जुझारा॥
सेन बिलोकि राउ हरषाना। अरु बाजे गहगहे निसाना॥2॥
भावार्थ:-साथ में अपार चतुरंगिणी सेना थी, जिसमें असंख्य योद्धा थे, जो सब के सब रण में जूझ मरने वाले थे। अपनी सेना को देखकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ और घमाघम नगाड़े बजने लगे॥2॥
* बिजय हेतु कटकई बनाई। सुदिन साधि नृप चलेउ बजाई॥
जहँ तहँ परीं अनेक लराईं। जीते सकल भूप बरिआईं॥3॥
भावार्थ:-दिग्विजय के लिए सेना सजाकर वह राजा शुभ दिन (मुहूर्त) साधकर और डंका बजाकर चला। जहाँ-तहाँ बहुतसी लड़ाइयाँ हुईं। उसने सब राजाओं को बलपूर्वक जीत लिया॥3॥
* सप्त दीप भुजबल बस कीन्हे। लै लै दंड छाड़ि नृप दीन्हे॥
सकल अवनि मंडल तेहि काला। एक प्रतापभानु महिपाला॥4॥
भावार्थ:-अपनी भुजाओं के बल से उसने सातों द्वीपों (भूमिखण्डों) को वश में कर लिया और राजाओं से दंड (कर) ले-लेकर उन्हें छोड़ दिया। सम्पूर्ण पृथ्वी मंडल का उस समय प्रतापभानु ही एकमात्र (चक्रवर्ती) राजा था॥4॥
दोहा :
* स्वबस बिस्व करि बाहुबल निज पुर कीन्ह प्रबेसु।
अरथ धरम कामादि सुख सेवइ समयँ नरेसु॥154॥
भावार्थ:-संसारभर को अपनी भुजाओं के बल से वश में करके राजा ने अपने नगर में प्रवेश किया। राजा अर्थ, धर्म और काम आदि के सुखों का समयानुसार सेवन करता था॥154॥
चौपाई :
* भूप प्रतापभानु बल पाई। कामधेनु भै भूमि सुहाई॥
सब दुख बरजित प्रजा सुखारी। धरमसील सुंदर नर नारी॥1॥
भावार्थ:-राजा प्रतापभानु का बल पाकर भूमि सुंदर कामधेनु (मनचाही वस्तु देने वाली) हो गई। (उनके राज्य में) प्रजा सब (प्रकार के) दुःखों से रहित और सुखी थी और सभी स्त्री-पुरुष सुंदर और धर्मात्मा थे॥1॥
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* सचिव धरमरुचि हरि पद प्रीती। नृप हित हेतु सिखव नित नीती॥
गुर सुर संत पितर महिदेवा। करइ सदा नृप सब कै सेवा॥2॥
भावार्थ:-धर्मरुचि मंत्री का श्री हरि के चरणों में प्रेम था। वह राजा के हित के लिए सदा उसको नीति सिखाया करता था। राजा गुरु, देवता, संत, पितर और ब्राह्मण- इन सबकी सदा सेवा करता रहता था॥2॥
*भूप धरम जे बेद बखाने। सकल करइ सादर सुख माने॥
दिन प्रति देइ बिबिध बिधि दाना। सुनइ सास्त्र बर बेद पुराना॥3॥
भावार्थ:-वेदों में राजाओं के जो धर्म बताए गए हैं, राजा सदा आदरपूर्वक और सुख मानकर उन सबका पालन करता था। प्रतिदिन अनेक प्रकार के दान देता और उत्तम शास्त्र, वेद और पुराण सुनता था॥3॥
* नाना बापीं कूप तड़ागा। सुमन बाटिका सुंदर बागा॥
बिप्रभवन सुरभवन सुहाए। सब तीरथन्ह विचित्र बनाए॥4॥
भावार्थ:-उसने बहुत सी बावलियाँ, कुएँ, तालाब, फुलवाड़ियाँ सुंदर बगीचे, ब्राह्मणों के लिए घर और देवताओं के सुंदर विचित्र मंदिर सब तीर्थों में बनवाए॥4॥
दोहा :
* जहँ लजि कहे पुरान श्रुति एक एक सब जाग।
बार सहस्र सहस्र नृप किए सहित अनुराग॥155॥
भावार्थ:-वेद और पुराणों में जितने प्रकार के यज्ञ कहे गए हैं, राजा ने एक-एक करके उन सब यज्ञों को प्रेम सहित हजार-हजार बार किया॥155॥
चौपाई :
* हृदयँ न कछु फल अनुसंधाना। भूप बिबेकी परम सुजाना॥
करइ जे धरम करम मन बानी। बासुदेव अर्पित नृप ग्यानी॥1॥
भावार्थ:-(राजा के) हृदय में किसी फल की टोह (कामना) न थी। राजा बड़ा ही बुद्धिमान और ज्ञानी था। वह ज्ञानी राजा कर्म, मन और वाणी से जो कुछ भी धर्म करता था, सब भगवान वासुदेव को अर्पित करते रहता था॥1॥

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* चढ़ि बर बाजि बार एक राजा। मृगया कर सब साजि समाजा॥
बिंध्याचल गभीर बन गयऊ। मृग पुनीत बहु मारत भयऊ॥2॥
भावार्थ:-एक बार वह राजा एक अच्छे घोड़े पर सवार होकर, शिकार का सब सामान सजाकर विंध्याचल के घने जंगल में गया और वहाँ उसने बहुत से उत्तम-उत्तम हिरन मारे॥2॥
* फिरत बिपिन नृप दीख बराहू। जनु बन दुरेउ ससिहि ग्रसि राहू॥
बड़ बिधु नहिं समात मुख माहीं। मनहुँ क्रोध बस उगिलत नाहीं॥3॥
भावार्थ:-राजा ने वन में फिरते हुए एक सूअर को देखा। (दाँतों के कारण वह ऐसा दिख पड़ता था) मानो चन्द्रमा को ग्रसकर (मुँह में पकड़कर) राहु वन में आ छिपा हो। चन्द्रमा बड़ा होने से उसके मुँह में समाता नहीं है और मानो क्रोधवश वह भी उसे उगलता नहीं है॥3॥
* कोल कराल दसन छबि गाई। तनु बिसाल पीवर अधिकाई॥
घुरुघुरात हय आरौ पाएँ। चकित बिलोकत कान उठाएँ॥4॥
भावार्थ:-यह तो सूअर के भयानक दाँतों की शोभा कही गई। (इधर) उसका शरीर भी बहुत विशाल और मोटा था। घोड़े की आहट पाकर वह घुरघुराता हुआ कान उठाए चौकन्ना होकर देख रहा था॥4॥
दोहा :
* नील महीधर सिखर सम देखि बिसाल बराहु।
चपरि चलेउ हय सुटुकि नृप हाँकि न होइ निबाहु॥156॥
भावार्थ:-नील पर्वत के शिखर के समान विशाल (शरीर वाले) उस सूअर को देखकर राजा घोड़े को चाबुक लगाकर तेजी से चला और उसने सूअर को ललकारा कि अब तेरा बचाव नहीं हो सकता॥156॥
चौपाई :
* आवत देखि अधिक रव बाजी। चलेउ बराह मरुत गति भाजी॥
तुरत कीन्ह नृप सर संधाना। महि मिलि गयउ बिलोकत बाना॥1॥
भावार्थ:-अधिक शब्द करते हुए घोड़े को (अपनी तरफ) आता देखकर सूअर पवन वेग से भाग चला। राजा ने तुरंत ही बाण को धनुष पर चढ़ाया। सूअर बाण को देखते ही धरती में दुबक गया॥1॥
* तकि तकि तीर महीस चलावा। करि छल सुअर सरीर बचावा॥
प्रगटत दुरत जाइ मृग भागा। रिस बस भूप चलेउ सँग लागा॥2॥
भावार्थ:-राजा तक-तककर तीर चलाता है, परन्तु सूअर छल करके शरीर को बचाता जाता है। वह पशु कभी प्रकट होता और कभी छिपता हुआ भाग जाता था और राजा भी क्रोध के वश उसके साथ (पीछे) लगा चला जाता था॥2॥
* गयउ दूरि घन गहन बराहू। जहँ नाहिन गज बाजि निबाहू॥
अति अकेल बन बिपुल कलेसू। तदपि न मृग मग तजइ नरेसू॥3॥
भावार्थ:-सूअर बहुत दूर ऐसे घने जंगल में चला गया, जहाँ हाथी-घोड़े का निबाह (गमन) नहीं था। राजा बिलकुल अकेला था और वन में क्लेश भी बहुत था, फिर भी राजा ने उस पशु का पीछा नहीं छोड़ा॥3॥
* कोल बिलोकि भूप बड़ धीरा। भागि पैठ गिरिगुहाँ गभीरा॥
अगम देखि नृप अति पछिताई। फिरेउ महाबन परेउ भुलाई॥4॥
भावार्थ:-राजा को बड़ा धैर्यवान देखकर, सूअर भागकर पहाड़ की एक गहरी गुफा में जा घुसा। उसमें जाना कठिन देखकर राजा को बहुत पछताकर लौटना पड़ा, पर उस घोर वन में वह रास्ता भूल गया॥4॥
दोहा :
*खेद खिन्न छुद्धित तृषित राजा बाजि समेत।
खोजत ब्याकुल सरित सर जल बिनु भयउ अचेत॥157॥
भावार्थ:-बहुत परिश्रम करने से थका हुआ और घोड़े समेत भूख-प्यास से व्याकुल राजा नदी-तालाब खोजता-खोजता पानी बिना बेहाल हो गया॥157॥
चौपाई :
* फिरत बिपिन आश्रम एक देखा। तहँ बस नृपति कपट मुनिबेषा॥
जासु देस नृप लीन्ह छड़ाई। समर सेन तजि गयउ पराई॥1॥
भावार्थ:- वन में फिरते-फिरते उसने एक आश्रम देखा, वहाँ कपट से मुनि का वेष बनाए एक राजा रहता था, जिसका देश राजा प्रतापभानु ने छीन लिया था और जो सेना को छोड़कर युद्ध से भाग गया था॥1॥
* समय प्रतापभानु कर जानी। आपन अति असमय अनुमानी॥
गयउ न गृह मन बहुत गलानी। मिला न राजहि नृप अभिमानी॥2॥
भावार्थ:-प्रतापभानु का समय (अच्छे दिन) जानकर और अपना कुसमय (बुरे दिन) अनुमानकर उसके मन में बड़ी ग्लानि हुई। इससे वह न तो घर गया और न अभिमानी होने के कारण राजा प्रतापभानु से ही मिला (मेल किया)॥2॥
* रिस उर मारि रंक जिमि राजा। बिपिन बसइ तापस कें साजा॥
तासु समीप गवन नृप कीन्हा। यह प्रतापरबि तेहिं तब चीन्हा॥3॥
भावार्थ:-दरिद्र की भाँति मन ही में क्रोध को मारकर वह राजा तपस्वी के वेष में वन में रहता था। राजा (प्रतापभानु) उसी के पास गया। उसने तुरंत पहचान लिया कि यह प्रतापभानु है॥3॥
* राउ तृषित नहिं सो पहिचाना। देखि सुबेष महामुनि जाना॥
उतरि तुरग तें कीन्ह प्रनामा। परम चतुर न कहेउ निज नामा॥4॥
भावार्थ:-राजा प्यासा होने के कारण (व्याकुलता में) उसे पहचान न सका। सुंदर वेष देखकर राजा ने उसे महामुनि समझा और घोड़े से उतरकर उसे प्रणाम किया, परन्तु बड़ा चतुर होने के कारण राजा ने उसे अपना नाम नहीं बताया॥4॥
दोहा :
* भूपति तृषित बिलोकि तेहिं सरबरू दीन्ह देखाइ।
मज्जन पान समेत हय कीन्ह नृपति हरषाइ॥158॥
भावार्थ:-राजा को प्यासा देखकर उसने सरोवर दिखला दिया। हर्षित होकर राजा ने घोड़े सहित उसमें स्नान और जलपान किया॥158॥
चौपाई :
* गै श्रम सकल सुखी नृप भयऊ। निज आश्रम तापस लै गयऊ॥
आसन दीन्ह अस्त रबि जानी। पुनि तापस बोलेउ मृदु बानी॥1॥
भावार्थ:-सारी थकावट मिट गई, राजा सुखी हो गया। तब तपस्वी उसे अपने आश्रम में ले गया और सूर्यास्त का समय जानकर उसने (राजा को बैठने के लिए) आसन दिया। फिर वह तपस्वी कोमल वाणी से बोला- ॥1॥
*को तुम्ह कस बन फिरहु अकेलें। सुंदर जुबा जीव परहेलें॥
चक्रबर्ति के लच्छन तोरें। देखत दया लागि अति मोरें॥2॥
भावार्थ:-तुम कौन हो? सुंदर युवक होकर, जीवन की परवाह न करके वन में अकेले क्यों फिर रहे हो? तुम्हारे चक्रवर्ती राजा के से लक्षण देखकर मुझे बड़ी दया आती है॥2॥
* नाम प्रतापभानु अवनीसा। तासु सचिव मैं सुनहु मुनीसा॥
फिरत अहेरें परेउँ भुलाई। बड़ें भाग देखेउँ पद आई॥3॥
भावार्थ:-(राजा ने कहा-) हे मुनीश्वर! सुनिए, प्रतापभानु नाम का एक राजा है, मैं उसका मंत्री हूँ। शिकार के लिए फिरते हुए राह भूल गया हूँ। बड़े भाग्य से यहाँ आकर मैंने आपके चरणों के दर्शन पाए हैं॥3॥
* हम कहँ दुर्लभ दरस तुम्हारा। जानत हौं कछु भल होनिहारा॥
कह मुनि तात भयउ अँधिआरा। जोजन सत्तरि नगरु तुम्हारा॥4॥
भावार्थ:-हमें आपका दर्शन दुर्लभ था, इससे जान पड़ता है कुछ भला होने वाला है। मुनि ने कहा- हे तात! अँधेरा हो गया। तुम्हारा नगर यहाँ से सत्तर योजन पर है॥4॥
दोहा :
* निसा घोर गंभीर बन पंथ न सुनहु सुजान।
बसहु आजु अस जानि तुम्ह जाएहु होत बिहान॥159 (क)॥
भावार्थ:-हे सुजान! सुनो, घोर अँधेरी रात है, घना जंगल है, रास्ता नहीं है, ऐसा समझकर तुम आज यहीं ठहर जाओ, सबेरा होते ही चले जाना॥159 (क)॥
* तुलसी जसि भवतब्यता तैसी मिलइ सहाइ।
आपुनु आवइ ताहि पहिं ताहि तहाँ लै जाइ॥159(ख)॥
भावार्थ:-तुलसीदासजी कहते हैं- जैसी भवितव्यता (होनहार) होती है, वैसी ही सहायता मिल जाती है। या तो वह आप ही उसके पास आती है या उसको वहाँ ले जाती है॥159 (ख)॥
चौपाई :
* भलेहिं नाथ आयसु धरि सीसा। बाँधि तुरग तरु बैठ महीसा॥
नृप बहु भाँति प्रसंसेउ ताही। चरन बंदि निज भाग्य सराही॥1॥
भावार्थ:-हे नाथ! बहुत अच्छा, ऐसा कहकर और उसकी आज्ञा सिर चढ़ाकर, घोड़े को वृक्ष से बाँधकर राजा बैठ गया। राजा ने उसकी बहुत प्रकार से प्रशंसा की और उसके चरणों की वंदना करके अपने भाग्य की सराहना की॥1॥
* पुनि बोलेउ मृदु गिरा सुहाई। जानि पिता प्रभु करउँ ढिठाई॥
मोहि मुनीस सुत सेवक जानी। नाथ नाम निज कहहु बखानी॥2॥
भावार्थ:-फिर सुंदर कोमल वाणी से कहा- हे प्रभो! आपको पिता जानकर मैं ढिठाई करता हूँ। हे मुनीश्वर! मुझे अपना पुत्र और सेवक जानकर अपना नाम (धाम) विस्तार से बतलाइए॥2॥
* तेहि न जान नृप नृपहि सो जाना। भूप सुहृद सो कपट सयाना॥
बैरी पुनि छत्री पुनि राजा। छल बल कीन्ह चहइ निज काजा॥3॥
भावार्थ:-राजा ने उसको नहीं पहचाना, पर वह राजा को पहचान गया था। राजा तो शुद्ध हृदय था और वह कपट करने में चतुर था। एक तो वैरी, फिर जाति का क्षत्रिय, फिर राजा। वह छल-बल से अपना काम बनाना चाहता था॥3॥
* समुझि राजसुख दुखित अराती। अवाँ अनल इव सुलगइ छाती॥
ससरल बचन नृप के सुनि काना। बयर सँभारि हृदयँ हरषाना॥4॥
भावार्थ:-वह शत्रु अपने राज्य सुख को समझ करके (स्मरण करके) दुःखी था। उसकी छाती (कुम्हार के) आँवे की आग की तरह (भीतर ही भीतर) सुलग रही थी। राजा के सरल वचन कान से सुनकर, अपने वैर को यादकर वह हृदय में हर्षित हुआ॥4॥
दोहा :
* कपट बोरि बानी मृदल बोलेउ जुगुति समेत।
नाम हमार भिखारि अब निर्धन रहित निकेत॥160॥
भावार्थ:-वह कपट में डुबोकर बड़ी युक्ति के साथ कोमल वाणी बोला- अब हमारा नाम भिखारी है, क्योंकि हम निर्धन और अनिकेत (घर-द्वारहीन) हैं॥160॥
चौपाई :
* कह नृप जे बिग्यान निधाना। तुम्ह सारिखे गलित अभिमाना॥
सदा रहहिं अपनपौ दुराएँ। सब बिधि कुसल कुबेष बनाएँ॥1॥
भावार्थ:-राजा ने कहा- जो आपके सदृश विज्ञान के निधान और सर्वथा अभिमानरहित होते हैं, वे अपने स्वरूप को सदा छिपाए रहते हैं, क्योंकि कुवेष बनाकर रहने में ही सब तरह का कल्याण है (प्रकट संत वेश में मान होने की सम्भावना है और मान से पतन की)॥1॥
* तेहि तें कहहिं संत श्रुति टेरें। परम अकिंचन प्रिय हरि केरें॥
तुम्ह सम अधन भिखारि अगेहा। होत बिरंचि सिवहि संदेहा॥2॥
भावार्थ:-इसी से तो संत और वेद पुकारकर कहते हैं कि परम अकिंचन (सर्वथा अहंकार, ममता और मानरहित) ही भगवान को प्रिय होते हैं। आप सरीखे निर्धन, भिखारी और गृहहीनों को देखकर ब्रह्मा और शिवजी को भी संदेह हो जाता है (कि वे वास्तविक संत हैं या भिखारी)॥2॥
* जोसि सोसि तव चरन नमामी। मो पर कृपा करिअ अब स्वामी॥
सहज प्रीति भूपति कै देखी। आपु बिषय बिस्वास बिसेषी॥3॥
भावार्थ:-आप जो हों सो हों (अर्थात्‌ जो कोई भी हों), मैं आपके चरणों में नमस्कार करता हूँ। हे स्वामी! अब मुझ पर कृपा कीजिए। अपने ऊपर राजा की स्वाभाविक प्रीति और अपने विषय में उसका अधिक विश्वास देखकर॥2॥
* सब प्रकार राजहि अपनाई। बोलेउ अधिक सनेह जनाई॥
सुनु सतिभाउ कहउँ महिपाला। इहाँ बसत बीते बहु काला॥4॥
भावार्थ:-सब प्रकार से राजा को अपने वश में करके, अधिक स्नेह दिखाता हुआ वह (कपट-तपस्वी) बोला- हे राजन्‌! सुनो, मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, मुझे यहाँ रहते बहुत समय बीत गया॥4॥
दोहा :
* अब लगि मोहि न मिलेउ कोउ मैं न जनावउँ काहु।
लोकमान्यता अनल सम कर तप कानन दाहु॥161 क॥
भावार्थ:-अब तक न तो कोई मुझसे मिला और न मैं अपने को किसी पर प्रकट करता हूँ, क्योंकि लोक में प्रतिष्ठा अग्नि के समान है, जो तप रूपी वन को भस्म कर डालती है॥161 (क)॥
सोरठा :
* तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर।
सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि॥161 ख॥
भावार्थ:-तुलसीदासजी कहते हैं- सुंदर वेष देखकर मूढ़ नहीं (मूढ़ तो मूढ़ ही हैं), चतुर मनुष्य भी धोखा खा जाते हैं। सुंदर मोर को देखो, उसका वचन तो अमृत के समान है और आहार साँप का है॥161 (ख)॥
चौपाई :
* तातें गुपुत रहउँ जग माहीं। हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं॥
प्रभु जानत सब बिनहिं जनाए। कहहु कवनि सिधि लोक रिझाएँ॥1॥
भावार्थ:-(कपट-तपस्वी ने कहा-) इसी से मैं जगत में छिपकर रहता हूँ। श्री हरि को छोड़कर किसी से कुछ भी प्रयोजन नहीं रखता। प्रभु तो बिना जनाए ही सब जानते हैं। फिर कहो संसार को रिझाने से क्या सिद्धि मिलेगी॥1॥
* तुम्ह सुचि सुमति परम प्रिय मोरें। प्रीति प्रतीति मोहि पर तोरें॥
अब जौं तात दुरावउँ तोही। दारुन दोष घटइ अति मोही॥2॥
भावार्थ:-तुम पवित्र और सुंदर बुद्धि वाले हो, इससे मुझे बहुत ही प्यारे हो और तुम्हारी भी मुझ पर प्रीति और विश्वास है। हे तात! अब यदि मैं तुमसे कुछ छिपाता हूँ, तो मुझे बहुत ही भयानक दोष लगेगा॥2॥
* जिमि जिमि तापसु कथइ उदासा। तिमि तिमि नृपहि उपज बिस्वासा॥
देखा स्वबस कर्म मन बानी। तब बोला तापस बगध्यानी॥3॥
भावार्थ:-ज्यों-ज्यों वह तपस्वी उदासीनता की बातें कहता था, त्यों ही त्यों राजा को विश्वास उत्पन्न होता जाता था। जब उस बगुले की तरह ध्यान लगाने वाले (कपटी) मुनि ने राजा को कर्म, मन और वचन से अपने वश में जाना, तब वह बोला- ॥3॥
* नाम हमार एकतनु भाई। सुनि नृप बोलेउ पुनि सिरु नाई॥
कहहु नाम कर अरथ बखानी। मोहि सेवक अति आपन जानी॥4॥
भावार्थ:-हे भाई! हमारा नाम एकतनु है। यह सुनकर राजा ने फिर सिर नवाकर कहा- मुझे अपना अत्यन्त (अनुरागी) सेवक जानकर अपने नाम का अर्थ समझाकर कहिए॥4॥
दोहा :
* आदिसृष्टि उपजी जबहिं तब उतपति भै मोरि।
नाम एकतनु हेतु तेहि देह न धरी बहोरि॥162॥
भावार्थ:-(कपटी मुनि ने कहा-) जब सबसे पहले सृष्टि उत्पन्न हुई थी, तभी मेरी उत्पत्ति हुई थी। तबसे मैंने फिर दूसरी देह नहीं धारण की, इसी से मेरा नाम एकतनु है॥162॥
चौपाई :
*जनि आचरजु करहु मन माहीं। सुत तप तें दुर्लभ कछु नाहीं॥
तप बल तें जग सृजइ बिधाता। तप बल बिष्नु भए परित्राता॥1॥
भावार्थ:-हे पुत्र! मन में आश्चर्य मत करो, तप से कुछ भी दुर्लभ नहीं है, तप के बल से ब्रह्मा जगत को रचते हैं। तप के ही बल से विष्णु संसार का पालन करने वाले बने हैं॥1॥
* तपबल संभु करहिं संघारा। तप तें अगम न कछु संसारा॥
भयउ नृपहि सुनि अति अनुरागा। कथा पुरातन कहै सो लागा॥2॥
भावार्थ:-तप ही के बल से रुद्र संहार करते हैं। संसार में कोई ऐसी वस्तु नहीं जो तप से न मिल सके। यह सुनकर राजा को बड़ा अनुराग हुआ। तब वह (तपस्वी) पुरानी कथाएँ कहने लगा॥2॥
* करम धरम इतिहास अनेका। करइ निरूपन बिरति बिबेका॥
उदभव पालन प्रलय कहानी। कहेसि अमित आचरज बखानी॥3॥
भावार्थ:-कर्म, धर्म और अनेकों प्रकार के इतिहास कहकर वह वैराग्य और ज्ञान का निरूपण करने लगा। सृष्टि की उत्पत्ति, पालन (स्थिति) और संहार (प्रलय) की अपार आश्चर्यभरी कथाएँ उसने विस्तार से कही॥3॥
* सुनि महीप तापस बस भयऊ। आपन नाम कहन तब लयउ॥
कह तापस नृप जानउँ तोही। कीन्हेहु कपट लाग भल मोही॥4॥
भावार्थ:-राजा सुनकर उस तपस्वी के वश में हो गया और तब वह उसे अपना नाम बताने लगा। तपस्वी ने कहा- राजन ! मैं तुमको जानता हूँ। तुमने कपट किया, वह मुझे अच्छा लगा॥4॥
सोरठा :
* सुनु महीस असि नीति जहँ तहँ नाम न कहहिं नृप।
मोहि तोहि पर अति प्रीति सोइ चतुरता बिचारि तव॥163॥
भावार्थ:-हे राजन्‌! सुनो, ऐसी नीति है कि राजा लोग जहाँ-तहाँ अपना नाम नहीं कहते। तुम्हारी वही चतुराई समझकर तुम पर मेरा बड़ा प्रेम हो गया है॥163॥
चौपाई :
* नाम तुम्हार प्रताप दिनेसा। सत्यकेतु तव पिता नरेसा॥
गुर प्रसाद सब जानिअ राजा। कहिअ न आपन जानि अकाजा॥1॥
भावार्थ:-तुम्हारा नाम प्रतापभानु है, महाराज सत्यकेतु तुम्हारे पिता थे। हे राजन्‌! गुरु की कृपा से मैं सब जानता हूँ, पर अपनी हानि समझकर कहता नहीं॥1॥
* देखि तात तव सहज सुधाई। प्रीति प्रतीति नीति निपुनाई॥
उपजि परी ममता मन मोरें। कहउँ कथा निज पूछे तोरें॥2॥
भावार्थ:-हे तात! तुम्हारा स्वाभाविक सीधापन (सरलता), प्रेम, विश्वास और नीति में निपुणता देखकर मेरे मन में तुम्हारे ऊपर बड़ी ममता उत्पन्न हो गई है, इसीलिए मैं तुम्हारे पूछने पर अपनी कथा कहता हूँ॥2॥
* अब प्रसन्न मैं संसय नाहीं। मागु जो भूप भाव मन माहीं॥
सुनि सुबचन भूपति हरषाना। गहि पद बिनय कीन्हि बिधि नाना॥3॥
भावार्थ:-अब मैं प्रसन्न हूँ, इसमें संदेह न करना। हे राजन्‌! जो मन को भावे वही माँग लो। सुंदर (प्रिय) वचन सुनकर राजा हर्षित हो गया और (मुनि के) पैर पकड़कर उसने बहुत प्रकार से विनती की॥3॥
* कृपासिंधु मुनि दरसन तोरें। चारि पदारथ करतल मोरें॥
प्रभुहि तथापि प्रसन्न बिलोकी। मागि अगम बर होउँ असोकी॥4॥
भावार्थ:-हे दयासागर मुनि! आपके दर्शन से ही चारों पदार्थ (अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष) मेरी मुट्ठी में आ गए। तो भी स्वामी को प्रसन्न देखकर मैं यह दुर्लभ वर माँगकर (क्यों न) शोकरहित हो जाऊँ॥4॥
दोहा :
* जरा मरन दुख रहित तनु समर जितै जनि कोउ।
एकछत्र रिपुहीन महि राज कलप सत होउ॥164॥
भावार्थ:-मेरा शरीर वृद्धावस्था, मृत्यु और दुःख से रहित हो जाए, मुझे युद्ध में कोई जीत न सके और पृथ्वी पर मेरा सौ कल्पतक एकछत्र अकण्टक राज्य हो॥164॥
चौपाई :
* कह तापस नृप ऐसेइ होऊ। कारन एक कठिन सुनु सोऊ॥
कालउ तुअ पद नाइहि सीसा। एक बिप्रकुल छाड़ि महीसा॥1॥
भावार्थ:-तपस्वी ने कहा- हे राजन्‌! ऐसा ही हो, पर एक बात कठिन है, उसे भी सुन लो। हे पृथ्वी के स्वामी! केवल ब्राह्मण कुल को छोड़ काल भी तुम्हारे चरणों पर सिर नवाएगा॥1॥
* तपबल बिप्र सदा बरिआरा। तिन्ह के कोप न कोउ रखवारा॥
जौं बिप्रन्ह बस करहु नरेसा। तौ तुअ बस बिधि बिष्नु महेसा॥2॥
भावार्थ:-तप के बल से ब्राह्मण सदा बलवान रहते हैं। उनके क्रोध से रक्षा करने वाला कोई नहीं है। हे नरपति! यदि तुम ब्राह्मणों को वश में कर लो, तो ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी तुम्हारे अधीन हो जाएँगे॥2॥
* चल न ब्रह्मकुल सन बरिआई। सत्य कहउँ दोउ भुजा उठाई॥
बिप्र श्राप बिनु सुनु महिपाला। तोर नास नहिं कवनेहुँ काला॥3॥
भावार्थ:-ब्राह्मण कुल से जोर जबर्दस्ती नहीं चल सकती, मैं दोनों भुजा उठाकर सत्य कहता हूँ। हे राजन्‌! सुनो, ब्राह्मणों के शाप बिना तुम्हारा नाश किसी काल में नहीं होगा॥3॥
* हरषेउ राउ बचन सुनि तासू। नाथ न होइ मोर अब नासू॥
तव प्रसाद प्रभु कृपानिधाना। मो कहुँ सर्बकाल कल्याना॥4॥
भावार्थ:-राजा उसके वचन सुनकर बड़ा प्रसन्न हुआ और कहने लगा- हे स्वामी! मेरा नाश अब नहीं होगा। हे कृपानिधान प्रभु! आपकी कृपा से मेरा सब समय कल्याण होगा॥4॥
दोहा :
* एवमस्तु कहि कपट मुनि बोला कुटिल बहोरि।
मिलब हमार भुलाब निज कहहु त हमहि न खोरि॥165॥
भावार्थ:-‘एवमस्तु’ (ऐसा ही हो) कहकर वह कुटिल कपटी मुनि फिर बोला- (किन्तु) तुम मेरे मिलने तथा अपने राह भूल जाने की बात किसी से (कहना नहीं, यदि) कह दोगे, तो हमारा दोष नहीं॥165॥
चौपाई :
* तातें मैं तोहि बरजउँ राजा। कहें कथा तव परम अकाजा॥
छठें श्रवन यह परत कहानी। नास तुम्हार सत्य मम बानी॥1॥
भावार्थ:-हे राजन्‌! मैं तुमको इसलिए मना करता हूँ कि इस प्रसंग को कहने से तुम्हारी बड़ी हानि होगी। छठे कान में यह बात पड़ते ही तुम्हारा नाश हो जाएगा, मेरा यह वचन सत्य जानना॥1॥
* यह प्रगटें अथवा द्विजश्रापा। नास तोर सुनु भानुप्रतापा॥
आन उपायँ निधन तव नाहीं। जौं हरि हर कोपहिं मन माहीं॥2॥
भावार्थ:-हे प्रतापभानु! सुनो, इस बात के प्रकट करने से अथवा ब्राह्मणों के शाप से तुम्हारा नाश होगा और किसी उपाय से, चाहे ब्रह्मा और शंकर भी मन में क्रोध करें, तुम्हारी मृत्यु नहीं होगी॥2॥
* सत्य नाथ पद गहि नृप भाषा। द्विज गुर कोप कहहु को राखा॥
राखइ गुर जौं कोप बिधाता। गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता॥3॥
भावार्थ:-राजा ने मुनि के चरण पकड़कर कहा- हे स्वामी! सत्य ही है। ब्राह्मण और गुरु के क्रोध से, कहिए, कौन रक्षा कर सकता है? यदि ब्रह्मा भी क्रोध करें, तो गुरु बचा लेते हैं, पर गुरु से विरोध करने पर जगत में कोई भी बचाने वाला नहीं है॥3॥
* जौं न चलब हम कहे तुम्हारें। होउ नास नहिं सोच हमारें॥
एकहिं डर डरपत मन मोरा। प्रभु महिदेव श्राप अति घोरा॥4॥
भावार्थ:-यदि मैं आपके कथन के अनुसार नहीं चलूँगा, तो (भले ही) मेरा नाश हो जाए। मुझे इसकी चिन्ता नहीं है। मेरा मन तो हे प्रभो! (केवल) एक ही डर से डर रहा है कि ब्राह्मणों का शाप बड़ा भयानक होता है॥4॥
दोहा :
* होहिं बिप्र बस कवन बिधि कहहु कृपा करि सोउ।
तुम्ह तजि दीनदयाल निज हितू न देखउँ कोउ॥166॥
भावार्थ:-वे ब्राह्मण किस प्रकार से वश में हो सकते हैं, कृपा करके वह भी बताइए। हे दीनदयालु! आपको छोड़कर और किसी को मैं अपना हितू नहीं देखता॥166॥
चौपाई :
* सुनु नृप बिबिध जतन जग माहीं। कष्टसाध्य पुनि होहिं कि नाहीं॥
अहइ एक अति सुगम उपाई। तहाँ परन्तु एक कठिनाई॥1॥
भावार्थ:-(तपस्वी ने कहा-) हे राजन्‌ !सुनो, संसार में उपाय तो बहुत हैं, पर वे कष्ट साध्य हैं (बड़ी कठिनता से बनने में आते हैं) और इस पर भी सिद्ध हों या न हों (उनकी सफलता निश्चित नहीं है) हाँ, एक उपाय बहुत सहज है, परन्तु उसमें भी एक कठिनता है॥1॥
* मम आधीन जुगुति नृप सोई। मोर जाब तव नगर न होई॥
आजु लगें अरु जब तें भयऊँ। काहू के गृह ग्राम न गयऊँ॥2॥
भावार्थ:-हे राजन्‌! वह युक्ति तो मेरे हाथ है, पर मेरा जाना तुम्हारे नगर में हो नहीं सकता। जब से पैदा हुआ हूँ, तब से आज तक मैं किसी के घर अथवा गाँव नहीं गया॥2॥
* जौं न जाउँ तव होइ अकाजू। बना आइ असमंजस आजू॥
सुनि महीस बोलेउ मृदु बानी। नाथ निगम असि नीति बखानी॥3॥
भावार्थ:-परन्तु यदि नहीं जाता हूँ, तो तुम्हारा काम बिगड़ता है। आज यह बड़ा असमंजस आ पड़ा है। यह सुनकर राजा कोमल वाणी से बोला, हे नाथ! वेदों में ऐसी नीति कही है कि- ॥3॥
* बड़े सनेह लघुन्ह पर करहीं। गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं॥
जलधि अगाध मौलि बह फेनू। संतत धरनि धरत सिर रेनू॥4॥
भावार्थ:-बड़े लोग छोटों पर स्नेह करते ही हैं। पर्वत अपने सिरों पर सदा तृण (घास) को धारण किए रहते हैं। अगाध समुद्र अपने मस्तक पर फेन को धारण करता है और धरती अपने सिर पर सदा धूलि को धारण किए रहती है॥4॥
दोहा :
* अस कहि गहे नरेस पद स्वामी होहु कृपाल।
मोहि लागि दुख सहिअ प्रभु सज्जन दीनदयाल॥167॥
भावार्थ:-ऐसा कहकर राजा ने मुनि के चरण पकड़ लिए। (और कहा-) हे स्वामी! कृपा कीजिए। आप संत हैं। दीनदयालु हैं। (अतः) हे प्रभो! मेरे लिए इतना कष्ट (अवश्य) सहिए॥167॥
चौपाई :
* जानि नृपहि आपन आधीना। बोला तापस कपट प्रबीना॥
सत्य कहउँ भूपति सुनु तोही। जग नाहिन दुर्लभ कछु मोही॥1॥
भावार्थ:-राजा को अपने अधीन जानकर कपट में प्रवीण तपस्वी बोला- हे राजन्‌! सुनो, मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, जगत में मुझे कुछ भी दुर्लभ नहीं है॥1॥
* अवसि काज मैं करिहउँ तोरा। मन तन बचन भगत तैं मोरा॥
जोग जुगुति तप मंत्र प्रभाऊ। फलइ तबहिं जब करिअ दुराऊ॥2॥
भावार्थ:-मैं तुम्हारा काम अवश्य करूँगा, (क्योंकि) तुम, मन, वाणी और शरीर (तीनों) से मेरे भक्त हो। पर योग, युक्ति, तप और मंत्रों का प्रभाव तभी फलीभूत होता है जब वे छिपाकर किए जाते हैं॥2॥
* जौं नरेस मैं करौं रसोई। तुम्ह परुसहु मोहि जान न कोई॥
अन्न सो जोइ जोइ भोजन करई। सोइ सोइ तव आयसु अनुसरई॥3॥
भावार्थ:-हे नरपति! मैं यदि रसोई बनाऊँ और तुम उसे परोसो और मुझे कोई जानने न पावे, तो उस अन्न को जो-जो खाएगा, सो-सो तुम्हारा आज्ञाकारी बन जाएगा॥3॥
* पुनि तिन्ह के गृह जेवँइ जोऊ। तव बस होइ भूप सुनु सोऊ॥
जाइ उपाय रचहु नृप एहू। संबत भरि संकलप करेहू॥4॥
भावार्थ:-यही नहीं, उन (भोजन करने वालों) के घर भी जो कोई भोजन करेगा, हे राजन्‌! सुनो, वह भी तुम्हारे अधीन हो जाएगा। हे राजन्‌! जाकर यही उपाय करो और वर्षभर (भोजन कराने) का संकल्प कर लेना॥4॥
दोहा :
* नित नूतन द्विज सहस सत बरेहु सहित परिवार।
मैं तुम्हरे संकलप लगि दिनहिं करबि जेवनार॥168॥
भावार्थ:-नित्य नए एक लाख ब्राह्मणों को कुटुम्ब सहित निमंत्रित करना। मैं तुम्हारे सकंल्प (के काल अर्थात एक वर्ष) तक प्रतिदिन भोजन बना दिया करूँगा॥168॥
चौपाई :
* एहि बिधि भूप कष्ट अति थोरें। होइहहिं सकल बिप्र बस तोरें॥
करिहहिं बिप्र होममख सेवा। तेहिं प्रसंग सहजेहिं बस देवा॥1॥
भावार्थ:-हे राजन्‌! इस प्रकार बहुत ही थोड़े परिश्रम से सब ब्राह्मण तुम्हारे वश में हो जाएँगे। ब्राह्मण हवन, यज्ञ और सेवा-पूजा करेंगे, तो उस प्रसंग (संबंध) से देवता भी सहज ही वश में हो जाएँगे॥1॥
* और एक तोहि कहउँ लखाऊ। मैं एहिं बेष न आउब काऊ॥
तुम्हरे उपरोहित कहुँ राया। हरि आनब मैं करि निज माया॥2॥
भावार्थ:-मैं एक और पहचान तुमको बताए देता हूँ कि मैं इस रूप में कभी न आऊँगा। हे राजन्‌! मैं अपनी माया से तुम्हारे पुरोहित को हर लाऊँगा॥2॥\
* तपबल तेहि करि आपु समाना। रखिहउँ इहाँ बरष परवाना॥
मैं धरि तासु बेषु सुनु राजा। सब बिधि तोर सँवारब काजा॥3॥
भावार्थ:-तप के बल से उसे अपने समान बनाकर एक वर्ष यहाँ रखूँगा और हे राजन्‌! सुनो, मैं उसका रूप बनाकर सब प्रकार से तुम्हारा काम सिद्ध करूँगा॥3॥
* गै निसि बहुत सयन अब कीजे। मोहि तोहि भूप भेंट दिन तीजे॥
मैं तपबल तोहि तुरग समेता। पहुँचैहउँ सोवतहि निकेता॥4॥
भावार्थ:-हे राजन्‌! रात बहुत बीत गई, अब सो जाओ। आज से तीसरे दिन मुझसे तुम्हारी भेंट होगी। तप के बल से मैं घोड़े सहित तुमको सोते ही में घर पहुँचा दूँगा॥4॥
दोहा :
* मैं आउब सोइ बेषु धरि पहिचानेहु तब मोहि।
जब एकांत बोलाइ सब कथा सुनावौं तोहि॥169॥
भावार्थ:-मैं वही (पुरोहित का) वेश धरकर आऊँगा। जब एकांत में तुमको बुलाकर सब कथा सुनाऊँगा, तब तुम मुझे पहचान लेना॥169॥
चौपाई :
* सयन कीन्ह नृप आयसु मानी। आसन जाइ बैठ छलग्यानी॥
श्रमित भूप निद्रा अति आई। सो किमि सोव सोच अधिकाई॥1॥
भावार्थ:-राजा ने आज्ञा मानकर शयन किया और वह कपट-ज्ञानी आसन पर जा बैठा। राजा थका था, (उसे) खूब (गहरी) नींद आ गई। पर वह कपटी कैसे सोता। उसे तो बहुत चिन्ता हो रही थी॥1॥
* कालकेतु निसिचर तहँ आवा। जेहिं सूकर होइ नृपहि भुलावा॥
परम मित्र तापस नृप केरा। जानइ सो अति कपट घनेरा॥2॥
भावार्थ:-(उसी समय) वहाँ कालकेतु राक्षस आया, जिसने सूअर बनकर राजा को भटकाया था। वह तपस्वी राजा का बड़ा मित्र था और खूब छल-प्रपंच जानता था॥2॥
* तेहि के सत सुत अरु दस भाई। खल अति अजय देव दुखदाई॥
प्रथमहिं भूप समर सब मारे। बिप्र संत सुर देखि दुखारे॥3॥
भावार्थ:-उसके सौ पुत्र और दस भाई थे, जो बड़े ही दुष्ट, किसी से न जीते जाने वाले और देवताओं को दुःख देने वाले थे। ब्राह्मणों, संतों और देवताओं को दुःखी देखकर राजा ने उन सबको पहले ही युद्ध में मार डाला था॥3॥
* तेहिं खल पाछिल बयरु सँभारा। तापस नृप मिलि मंत्र बिचारा॥
जेहिं रिपु छय सोइ रचेन्हि उपाऊ। भावी बस न जान कछु राऊ॥4॥
भावार्थ:-उस दुष्ट ने पिछला बैर याद करके तपस्वी राजा से मिलकर सलाह विचारी (षड्यंत्र किया) और जिस प्रकार शत्रु का नाश हो, वही उपाय रचा। भावीवश राजा (प्रतापभानु) कुछ भी न समझ सका॥4॥
दोहा :
* रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि गनिअ न ताहु।
अजहुँ देत दुख रबि ससिहि सिर अवसेषित राहु॥170॥
भावार्थ:-तेजस्वी शत्रु अकेला भी हो तो भी उसे छोटा नहीं समझना चाहिए। जिसका सिर मात्र बचा था, वह राहु आज तक सूर्य-चन्द्रमा को दुःख देता है॥170॥
* तापस नृप निज सखहि निहारी। हरषि मिलेउ उठि भयउ सुखारी॥
मित्रहि कहि सब कथा सुनाई। जातुधान बोला सुख पाई॥1॥
भावार्थ:-तपस्वी राजा अपने मित्र को देख प्रसन्न हो उठकर मिला और सुखी हुआ। उसने मित्र को सब कथा कह सुनाई, तब राक्षस आनंदित होकर बोला॥1॥
* अब साधेउँ रिपु सुनहु नरेसा। जौं तुम्ह कीन्ह मोर उपदेसा॥
परिहरि सोच रहहु तुम्ह सोई। बिनु औषध बिआधि बिधि खोई॥2॥
भावार्थ:-हे राजन्‌! सुनो, जब तुमने मेरे कहने के अनुसार (इतना) काम कर लिया, तो अब मैंने शत्रु को काबू में कर ही लिया (समझो)। तुम अब चिन्ता त्याग सो रहो। विधाता ने बिना ही दवा के रोग दूर कर दिया॥2॥
* कुल समेत रिपु मूल बहाई। चौथें दिवस मिलब मैं आई॥
तापस नृपहि बहुत परितोषी। चला महाकपटी अतिरोषी॥3॥
भावार्थ:-कुल सहित शत्रु को जड़-मूल से उखाड़-बहाकर, (आज से) चौथे दिन मैं तुमसे आ मिलूँगा। (इस प्रकार) तपस्वी राजा को खूब दिलासा देकर वह महामायावी और अत्यन्त क्रोधी राक्षस चला॥3॥
* भानुप्रतापहि बाजि समेता। पहुँचाएसि छन माझ निकेता॥
नृपहि नारि पहिं सयन कराई। हयगृहँ बाँधेसि बाजि बनाई॥4॥
भावार्थ:-उसने प्रतापभानु राजा को घोड़े सहित क्षणभर में घर पहुँचा दिया। राजा को रानी के पास सुलाकर घोड़े को अच्छी तरह से घुड़साल में बाँध दिया॥4॥
दोहा :
* राजा के उपरोहितहि हरि लै गयउ बहोरि।
लै राखेसि गिरि खोह महुँ मायाँ करि मति भोरि॥171॥
भावार्थ:-फिर वह राजा के पुरोहित को उठा ले गया और माया से उसकी बुद्धि को भ्रम में डालकर उसे उसने पहाड़ की खोह में ला रखा॥171॥
चौपाई :
* आपु बिरचि उपरोहित रूपा। परेउ जाइ तेहि सेज अनूपा॥
जागेउ नृप अनभएँ बिहाना। देखि भवन अति अचरजु माना॥1॥
भावार्थ:-वह आप पुरोहित का रूप बनाकर उसकी सुंदर सेज पर जा लेटा। राजा सबेरा होने से पहले ही जागा और अपना घर देखकर उसने बड़ा ही आश्चर्य माना॥1॥
* मुनि महिमा मन महुँ अनुमानी। उठेउ गवँहिं जेहिं जान न रानी॥
कानन गयउ बाजि चढ़ि तेहीं। पुर नर नारि न जानेउ केहीं॥2॥
भावार्थ:-मन में मुनि की महिमा का अनुमान करके वह धीरे से उठा, जिसमें रानी न जान पावे। फिर उसी घोड़े पर चढ़कर वन को चला गया। नगर के किसी भी स्त्री-पुरुष ने नहीं जाना॥2॥
* गएँ जाम जुग भूपति आवा। घर घर उत्सव बाज बधावा॥
उपरोहितहि देख जब राजा। चकित बिलोक सुमिरि सोइ काजा॥3॥
भावार्थ:-दो पहर बीत जाने पर राजा आया। घर-घर उत्सव होने लगे और बधावा बजने लगा। जब राजा ने पुरोहित को देखा, तब वह (अपने) उसी कार्य का स्मरणकर उसे आश्चर्य से देखने लगा॥3॥
* जुग सम नृपहि गए दिन तीनी। कपटी मुनि पद रह मति लीनी॥
समय जान उपरोहित आवा। नृपहि मते सब कहि समुझावा॥4॥
भावार्थ:-राजा को तीन दिन युग के समान बीते। उसकी बुद्धि कपटी मुनि के चरणों में लगी रही। निश्चित समय जानकर पुरोहित (बना हुआ राक्षस) आया और राजा के साथ की हुई गुप्त सलाह के अनुसार (उसने अपने) सब विचार उसे समझाकर कह दिए॥4॥
दोहा :
* नृप हरषेउ पहिचानि गुरु भ्रम बस रहा न चेत।
बरे तुरत सत सहस बर बिप्र कुटुंब समेत॥172॥
भावार्थ:-(संकेत के अनुसार) गुरु को (उस रूप में) पहचानकर राजा प्रसन्न हुआ। भ्रमवश उसे चेत न रहा (कि यह तापस मुनि है या कालकेतु राक्षस)। उसने तुरंत एक लाख उत्तम ब्राह्मणों को कुटुम्ब सहित निमंत्रण दे दिया॥172॥
चौपाई :
* उपरोहित जेवनार बनाई। छरस चारि बिधि जसि श्रुति गाई॥
मायामय तेहिं कीन्हि रसोई। बिंजन बहु गनि सकइ न कोई॥1॥
भावार्थ:-पुरोहित ने छह रस और चार प्रकार के भोजन, जैसा कि वेदों में वर्णन है, बनाए। उसने मायामयी रसोई तैयार की और इतने व्यंजन बनाए, जिन्हें कोई गिन नहीं सकता॥1॥
* बिबिध मृगन्ह कर आमिष राँधा। तेहि महुँ बिप्र माँसु खल साँधा॥
भोजन कहुँ सब बिप्र बोलाए। पद पखारि सादर बैठाए॥2॥
भावार्थ:-अनेक प्रकार के पशुओं का मांस पकाया और उसमें उस दुष्ट ने ब्राह्मणों का मांस मिला दिया। सब ब्राह्मणों को भोजन के लिए बुलाया और चरण धोकर आदर सहित बैठाया॥2॥
* परुसन जबहिं लाग महिपाला। भै अकासबानी तेहि काला॥
बिप्रबृंद उठि उठि गृह जाहू। है बड़ि हानि अन्न जनि खाहू॥3॥
भावार्थ:-ज्यों ही राजा परोसने लगा, उसी काल (कालकेतुकृत) आकाशवाणी हुई- हे ब्राह्मणों! उठ-उठकर अपने घर जाओ, यह अन्न मत खाओ। इस (के खाने) में बड़ी हानि है॥3॥
* भयउ रसोईं भूसुर माँसू। सब द्विज उठे मानि बिस्वासू॥
भूप बिकल मति मोहँ भुलानी। भावी बस न आव मुख बानी॥4॥
भावार्थ:-रसोई में ब्राह्मणों का मांस बना है। (आकाशवाणी का) विश्वास मानकर सब ब्राह्मण उठ खड़े हुए। राजा व्याकुल हो गया (परन्तु), उसकी बुद्धि मोह में भूली हुई थी। होनहारवश उसके मुँह से (एक) बात (भी) न निकली॥4॥
दोहा :
*बोले बिप्र सकोप तब नहिं कछु कीन्ह बिचार।
जाइ निसाचर होहु नृप मूढ़ सहित परिवार॥173॥
भावार्थ:-तब ब्राह्मण क्रोध सहित बोल उठे- उन्होंने कुछ भी विचार नहीं किया- अरे मूर्ख राजा! तू जाकर परिवार सहित राक्षस हो॥173॥
चौपाई :
* छत्रबंधु तैं बिप्र बोलाई। घालै लिए सहित समुदाई॥
ईश्वर राखा धरम हमारा। जैहसि तैं समेत परिवारा॥1॥
भावार्थ:-रे नीच क्षत्रिय! तूने तो परिवार सहित ब्राह्मणों को बुलाकर उन्हें नष्ट करना चाहा था, ईश्वर ने हमारे धर्म की रक्षा की। अब तू परिवार सहित नष्ट होगा॥1॥
* संबत मध्य नास तव होऊ। जलदाता न रहिहि कुल कोऊ॥
नृप सुनि श्राप बिकल अति त्रासा। भै बहोरि बर गिरा अकासा॥2॥
भावार्थ:-एक वर्ष के भीतर तेरा नाश हो जाए, तेरे कुल में कोई पानी देने वाला तक न रहेगा। शाप सुनकर राजा भय के मारे अत्यन्त व्याकुल हो गया। फिर सुंदर आकाशवाणी हुई-॥2॥
* बिप्रहु श्राप बिचारि न दीन्हा। नहिं अपराध भूप कछु कीन्हा॥
चकित बिप्र सब सुनि नभबानी। भूप गयउ जहँ भोजन खानी॥3॥
भावार्थ:-हे ब्राह्मणों! तुमने विचार कर शाप नहीं दिया। राजा ने कुछ भी अपराध नहीं किया। आकाशवाणी सुनकर सब ब्राह्मण चकित हो गए। तब राजा वहाँ गया, जहाँ भोजन बना था॥3॥
* तहँ न असन नहिं बिप्र सुआरा। फिरेउ राउ मन सोच अपारा॥
सब प्रसंग महिसुरन्ह सुनाई। त्रसित परेउ अवनीं अकुलाई॥4॥
भावार्थ:-(देखा तो) वहाँ न भोजन था, न रसोइया ब्राह्मण ही था। तब राजा मन में अपार चिन्ता करता हुआ लौटा। उसने ब्राह्मणों को सब वृत्तान्त सुनाया और (बड़ा ही) भयभीत और व्याकुल होकर वह पृथ्वी पर गिर पड़ा॥4॥
दोहा :
* भूपति भावी मिटइ नहिं जदपि न दूषन तोर।
किएँ अन्यथा दोइ नहिं बिप्रश्राप अति घोर॥174॥
भावार्थ:-हे राजन! यद्यपि तुम्हारा दोष नहीं है, तो भी होनहार नहीं मिटता। ब्राह्मणों का शाप बहुत ही भयानक होता है, यह किसी तरह भी टाले टल नहीं सकता॥174॥
चौपाई :
* अस कहि सब महिदेव सिधाए। समाचार पुरलोगन्ह पाए॥
सोचहिं दूषन दैवहि देहीं। बिरचत हंस काग किए जेहीं॥1॥
भावार्थ:-ऐसा कहकर सब ब्राह्मण चले गए। नगरवासियों ने (जब) यह समाचार पाया, तो वे चिन्ता करने और विधाता को दोष देने लगे, जिसने हंस बनाते-बनाते कौआ कर दिया (ऐसे पुण्यात्मा राजा को देवता बनाना चाहिए था, सो राक्षस बना दिया)॥1॥
* उपरोहितहि भवन पहुँचाई। असुर तापसहि खबरि जनाई॥
तेहिं खल जहँ तहँ पत्र पठाए। सजि सजि सेन भूप सब धाए॥2॥
भावार्थ:-पुरोहित को उसके घर पहुँचाकर असुर (कालकेतु) ने (कपटी) तपस्वी को खबर दी। उस दुष्ट ने जहाँ-तहाँ पत्र भेजे, जिससे सब (बैरी) राजा सेना सजा-सजाकर (चढ़) दौड़े॥2॥
* घेरेन्हि नगर निसान बजाई। बिबिध भाँति नित होइ लराई॥
जूझे सकल सुभट करि करनी। बंधु समेत परेउ नृप धरनी॥3॥
भावार्थ:-और उन्होंने डंका बजाकर नगर को घेर लिया। नित्य प्रति अनेक प्रकार से लड़ाई होने लगी। (प्रताप भानु के) सब योद्धा (शूरवीरों की) करनी करके रण में जूझ मरे। राजा भी भाई सहित खेत रहा॥3॥
* सत्यकेतु कुल कोउ नहिं बाँचा। बिप्रश्राप किमि होइ असाँचा॥
रिपु जिति सब नृप नगर बसाई। निज पुर गवने जय जसु पाई॥4॥
भावार्थ:-सत्यकेतु के कुल में कोई नहीं बचा। ब्राह्मणों का शाप झूठा कैसे हो सकता था। शत्रु को जीतकर नगर को (फिर से) बसाकर सब राजा विजय और यश पाकर अपने-अपने नगर को चले गए॥4॥

    


Story of Pratapbhanu
Bunk:
* Sunu Muni Katha Punit Purani. Jo Girija per Sovereign Bakhani
Biswa Bidit is a Kaikeya Desu. Satyaketu Tahan Basai Naresu ॥1॥
Sense: O monk! Listen to the sacred and ancient story that Shiva had told to Parvati. Famous in the world is Kaikeya country. There lived a king named Satyaketu (reigned) ॥1॥
* Dharam Dhurndhar Nidhi Nidhana. Tej Pratap Seal Balwana॥
Jugal Sut Bira is in the center of it. Sab Gun Dham Maha Ranadhira ॥2॥
Connotation: – He was the mine of policy, brilliant, glorious, majestic, sushil and strong, holding the axis of religion, he had two brave sons, who were the repositories of all virtues and the great Randhir.
* Raj Dhani who is the firstborn Naam Pratapbhanu As Tahi॥
Upper Suthi Arimardan Nama. Bhujbal Atul Achal Sangrama ॥3॥
Bhaartarth: – The elder boy who succeeded the state was named Pratapbhanu. The name of the second son was Arimardan, who had immense strength in his arms and who was adamant in war (like a mountain) ॥3॥.
* Bhaihi Bhaihi Param Samiti. Gross Defect Trick Barjit Preeti 4
Jethe Suthi Raj Nripa Dinha. Hari Hit Aapu Gawan Ban Kinha ॥4॥
Meaning: – Brother-brother had a great friendship and true love without all kinds of faults and deceit. The king gave the kingdom to the firstborn son and you walked to the forest to worship God ((4).
Doha:
* When Prataparbi Bhayau Nripa Phiri Dohai Des.
Praja Pal is not very impolite at all. 3153॥
Meaning: – When Pratapbhanu became king, his cry again returned to the country. He started following the subjects in the best manner according to the method mentioned in the Vedas. There was no trace of sin in his kingdom ॥153॥
Bunk:
* Nirpa Beneficial Secretary Sayana. Name Dharmaruchi Sukra Samana॥
Secretary Sayan Bandhu Balbeera. Aapu Pratappunj Ranadhira ॥1॥
Bhaartarth: – One who was interested in Raja and wise like Shukracharya was his minister named Dharmruchi. Thus, along with intelligent ministers and strong and brave brothers, the king himself was also very majestic and Randhir.
* Sen with Chaturang Apara. Amit Subhat Sab Samar Jujhara
Sen. Biloki Rau Harshana. Aru Baje Gahghe Nisana ॥2॥
Bhaartharth: – There was immense Chaturangini army, with innumerable warriors, all of whom were about to die in the battle. The king was very happy to see his army and the boisterous drums started ringing ॥2॥
* Made Katkai for Bijoy. Sudin Sadhi Nripe Chaleu rang
There are many lamis Live Gross Bhupi ॥3॥
Meaning: Decorating the army for Digvijay, that king went on auspicious day (Muhurta) and played the danka. There were many battles everywhere. He conquered all the kings by force ॥3॥
* Sapta Deep Bhujbal just. Lai Lai Dhan Khadi Nripa Dinhe॥
Gross Avni Mandal Tehi Kala. A Pratapbhanu Mahipala ॥4॥
Sense: With the help of his arms, he subdued the seven islands (lands) and took the punishment (tax) from the kings and left them. At that time Pratapbhanu was the only (Chakravarti) king of the entire Prithvi Mandal ॥4॥.
Doha:
* Swabus biswari kar bahubal nij pur kinh prabhesu.
Arath Dharam Kamadi Sukh Sevai Samayen Nareshu ॥154॥
Meaning: – The king entered his city after subduing the world with the help of his arms. The king used to enjoy the pleasures of earth, religion and work etc. ॥154॥
Bunk:
* Bhupa Pratapbhanu Bal Pai. Kamdhenu Bhai Bhoomi Suhai 4
All the miseries are subject to happiness. Dharamseel Beautiful Male Female ॥1॥
Meaning: After receiving the power of Raja Pratapbhanu, the land became beautiful Kamdhenu (one who gives the desired thing). The people (in his kingdom) were free and happy from all (kinds of) sorrows and all men and women were beautiful and righteous ॥1॥.
* Secretary Dharmaruchi Hari Pad Preeti. Sikhism and policy for the benefit of the nripe
Gur Sur Sant Pitar Mahideva. Always do reptile service ॥2॥
Spiritualism: – Religious minister had love at the feet of Shri Hari. He always taught him policy for the interest of the king. King Guru, God, saint, ancestor and Brahmin – used to serve them all forever ॥2॥
* Bhoop Dharam J. Bed Bakhane. Honor a lot of happiness
Per day per day. Suni sastra bar bed old ॥3॥
Meaning: The religion of the kings mentioned in the Vedas, the king always followed them respectfully and with pleasure. Gives many kinds of donations everyday and listens to the best scriptures, Vedas and Puranas.
* Nana Bapi Kupa Tadaga. Suman Batika Sundar Baga॥
Biprabhavan Surabhavan Suhay. Make all arrows bizarre ॥4॥
Meaning: – He made many bawalis, wells, ponds, Phulwadis, beautiful gardens, houses for Brahmins and beautiful quaint temples of the gods in all pilgrimages. ॥4॥
Doha:
* Where the elder says, Shruti awakens one by one.
Anurag, including Bar Sahasra Sahasra Nripa ॥155॥
Bhartharth: – In the Vedas and Puranas, as many types of yagyas have been said, the king performed all those sacrifices one by one thousand times with love ॥155॥.

Bunk:
* Researching the heart of the heart. Bhoop Bibeki Param Sujana
Karai Je Dharam Karam Mani Bani Basudev Arpit Nripa Gyani ॥1॥
Meaning: There was no reconnaissance (desire) of any fruit in the heart of the king. The king was very intelligent and knowledgeable. Whatever religion the wise king did with karma, mind and speech, he used to offer everything to Lord Vasudev.
* A king in times past. All society is ready
Bindhyachal became serious. Antelope
Meaning: Once the king, riding a good horse, decorated all the hunting material and went to the dense forest of Vindhyachal and there he killed many good deer. ॥2॥
* Firat Bipin Nripe Dikh Barahu. Janu Ban Dureu Sasihi Grassi Rahu॥
I am not the face of the elder sister. I’m not angry just grow ॥3॥
Sense: Raja saw a boar wandering in the forest. (He looked like this due to the teeth) as if the moon was greased (holding it in the mouth) and hidden in Rahu forest. The moon grew in her mouth

Story of Pratapbhanu
Bunk:
* Sunu Muni Katha Punit Purani. Jo Girija per Sovereign Bakhani
Biswa Bidit is a Kaikeya Desu. Satyaketu Tahan Basai Naresu ॥1॥
Sense: O monk! Listen to the sacred and ancient story that Shiva had told to Parvati. Famous in the world is Kaikeya country. There lived a king named Satyaketu (reigned) ॥1॥
* Dharam Dhurndhar Nidhi Nidhana. Tej Pratap Seal Balwana॥
Jugal Sut Bira is in the center of it. Sab Gun Dham Maha Ranadhira ॥2॥
Connotation: – He was the mine of policy, brilliant, glorious, majestic, sushil and strong, holding the axis of religion, he had two brave sons, who were the repositories of all virtues and the great Randhir.
* Raj Dhani who is the firstborn Naam Pratapbhanu As Tahi॥
Upper Suthi Arimardan Nama. Bhujbal Atul Achal Sangrama ॥3॥
Bhaartarth: – The elder boy who succeeded the state was named Pratapbhanu. The name of the second son was Arimardan, who had immense strength in his arms and who was adamant in war (like a mountain) ॥3॥.
* Bhaihi Bhaihi Param Samiti. Gross Defect Trick Barjit Preeti 4
Jethe Suthi Raj Nripa Dinha. Hari Hit Aapu Gawan Ban Kinha ॥4॥
Meaning: – Brother-brother had a great friendship and true love without all kinds of faults and deceit. The king gave the kingdom to the firstborn son and you walked to the forest to worship God ((4).
Doha:
* When Prataparbi Bhayau Nripa Phiri Dohai Des.
Praja Pal is not very impolite at all. 3153॥
Meaning: – When Pratapbhanu became king, his cry again returned to the country. He started following the subjects in the best manner according to the method mentioned in the Vedas. There was no trace of sin in his kingdom ॥153॥
Bunk:
* Nirpa Beneficial Secretary Sayana. Name Dharmaruchi Sukra Samana॥
Secretary Sayan Bandhu Balbeera. Aapu Pratappunj Ranadhira ॥1॥
Bhaartarth: – One who was interested in Raja and wise like Shukracharya was his minister named Dharmruchi. Thus, along with intelligent ministers and strong and brave brothers, the king himself was also very majestic and Randhir.
* Sen with Chaturang Apara. Amit Subhat Sab Samar Jujhara
Sen. Biloki Rau Harshana. Aru Baje Gahghe Nisana ॥2॥
Bhaartharth: – There was immense Chaturangini army, with innumerable warriors, all of whom were about to die in the battle. The king was very happy to see his army and the boisterous drums started ringing ॥2॥
* Made Katkai for Bijoy. Sudin Sadhi Nripe Chaleu rang
There are many lamis Live Gross Bhupi ॥3॥
Meaning: Decorating the army for Digvijay, that king went on auspicious day (Muhurta) and played the danka. There were many battles everywhere. He conquered all the kings by force ॥3॥
* Sapta Deep Bhujbal just. Lai Lai Dhan Khadi Nripa Dinhe॥
Gross Avni Mandal Tehi Kala. A Pratapbhanu Mahipala ॥4॥
Sense: With the help of his arms, he subdued the seven islands (lands) and took the punishment (tax) from the kings and left them. At that time Pratapbhanu was the only (Chakravarti) king of the entire Prithvi Mandal ॥4॥.
Doha:
* Swabus biswari kar bahubal nij pur kinh prabhesu.
Arath Dharam Kamadi Sukh Sevai Samayen Nareshu ॥154॥
Meaning: – The king entered his city after subduing the world with the help of his arms. The king used to enjoy the pleasures of earth, religion and work etc. ॥154॥
Bunk:
* Bhupa Pratapbhanu Bal Pai. Kamdhenu Bhai Bhoomi Suhai 4
All the miseries are subject to happiness. Dharamseel Beautiful Male Female ॥1॥
Meaning: After receiving the power of Raja Pratapbhanu, the land became beautiful Kamdhenu (one who gives the desired thing). The people (in his kingdom) were free and happy from all (kinds of) sorrows and all men and women were beautiful and righteous ॥1॥.
* Secretary Dharmaruchi Hari Pad Preeti. Sikhism and policy for the benefit of the nripe
Gur Sur Sant Pitar Mahideva. Always do reptile service ॥2॥
Spiritualism: – Religious minister had love at the feet of Shri Hari. He always taught him policy for the interest of the king. King Guru, God, saint, ancestor and Brahmin – used to serve them all forever ॥2॥
* Bhoop Dharam J. Bed Bakhane. Honor a lot of happiness
Per day per day. Suni sastra bar bed old ॥3॥
Meaning: The religion of the kings mentioned in the Vedas, the king always followed them respectfully and with pleasure. Gives many kinds of donations everyday and listens to the best scriptures, Vedas and Puranas.
* Nana Bapi Kupa Tadaga. Suman Batika Sundar Baga॥
Biprabhavan Surabhavan Suhay. Make all arrows bizarre ॥4॥
Meaning: – He made many bawalis, wells, ponds, Phulwadis, beautiful gardens, houses for Brahmins and beautiful quaint temples of the gods in all pilgrimages. ॥4॥
Doha:
* Where the elder says, Shruti awakens one by one.
Anurag, including Bar Sahasra Sahasra Nripa ॥155॥
Bhartharth: – In the Vedas and Puranas, as many types of yagyas have been said, the king performed all those sacrifices one by one thousand times with love ॥155॥.

Bunk:
* Researching the heart of the heart. Bhoop Bibeki Param Sujana
Karai Je Dharam Karam Mani Bani Basudev Arpit Nripa Gyani ॥1॥
Meaning: There was no reconnaissance (desire) of any fruit in the heart of the king. The king was very intelligent and knowledgeable. Whatever religion the wise king did with karma, mind and speech, he used to offer everything to Lord Vasudev.
* A king in times past. All society is ready
Bindhyachal became serious. Antelope
Meaning: Once the king, riding a good horse, decorated all the hunting material and went to the dense forest of Vindhyachal and there he killed many good deer. ॥2॥
* Firat Bipin Nripe Dikh Barahu. Janu Ban Dureu Sasihi Grassi Rahu॥
I am not the face of the elder sister. I’m not angry just grow ॥3॥
Sense: Raja saw a boar wandering in the forest. (He looked like this due to the teeth) as if the moon was greased (holding it in the mouth) and hidden in Rahu forest. The moon grew in her mouth

Story of Pratapbhanu
Bunk:
* Sunu Muni Katha Punit Purani. Jo Girija per Sovereign Bakhani
Biswa Bidit is a Kaikeya Desu. Satyaketu Tahan Basai Naresu ॥1॥
Sense: O monk! Listen to the sacred and ancient story that Shiva had told to Parvati. Famous in the world is Kaikeya country. There lived a king named Satyaketu (reigned) ॥1॥
* Dharam Dhurndhar Nidhi Nidhana. Tej Pratap Seal Balwana॥
Jugal Sut Bira is in the center of it. Sab Gun Dham Maha Ranadhira ॥2॥
Connotation: – He was the mine of policy, brilliant, glorious, majestic, sushil and strong, holding the axis of religion, he had two brave sons, who were the repositories of all virtues and the great Randhir.
* Raj Dhani who is the firstborn Naam Pratapbhanu As Tahi॥
Upper Suthi Arimardan Nama. Bhujbal Atul Achal Sangrama ॥3॥
Bhaartarth: – The elder boy who succeeded the state was named Pratapbhanu. The name of the second son was Arimardan, who had immense strength in his arms and who was adamant in war (like a mountain) ॥3॥.
* Bhaihi Bhaihi Param Samiti. Gross Defect Trick Barjit Preeti 4
Jethe Suthi Raj Nripa Dinha. Hari Hit Aapu Gawan Ban Kinha ॥4॥
Meaning: – Brother-brother had a great friendship and true love without all kinds of faults and deceit. The king gave the kingdom to the firstborn son and you walked to the forest to worship God ((4).
Doha:
* When Prataparbi Bhayau Nripa Phiri Dohai Des.
Praja Pal is not very impolite at all. 3153॥
Meaning: – When Pratapbhanu became king, his cry again returned to the country. He started following the subjects in the best manner according to the method mentioned in the Vedas. There was no trace of sin in his kingdom ॥153॥
Bunk:
* Nirpa Beneficial Secretary Sayana. Name Dharmaruchi Sukra Samana॥
Secretary Sayan Bandhu Balbeera. Aapu Pratappunj Ranadhira ॥1॥
Bhaartarth: – One who was interested in Raja and wise like Shukracharya was his minister named Dharmruchi. Thus, along with intelligent ministers and strong and brave brothers, the king himself was also very majestic and Randhir.
* Sen with Chaturang Apara. Amit Subhat Sab Samar Jujhara
Sen. Biloki Rau Harshana. Aru Baje Gahghe Nisana ॥2॥
Bhaartharth: – There was immense Chaturangini army, with innumerable warriors, all of whom were about to die in the battle. The king was very happy to see his army and the boisterous drums started ringing ॥2॥
* Made Katkai for Bijoy. Sudin Sadhi Nripe Chaleu rang
There are many lamis Live Gross Bhupi ॥3॥
Meaning: Decorating the army for Digvijay, that king went on auspicious day (Muhurta) and played the danka. There were many battles everywhere. He conquered all the kings by force ॥3॥
* Sapta Deep Bhujbal just. Lai Lai Dhan Khadi Nripa Dinhe॥
Gross Avni Mandal Tehi Kala. A Pratapbhanu Mahipala ॥4॥
Sense: With the help of his arms, he subdued the seven islands (lands) and took the punishment (tax) from the kings and left them. At that time Pratapbhanu was the only (Chakravarti) king of the entire Prithvi Mandal ॥4॥.
Doha:
* Swabus biswari kar bahubal nij pur kinh prabhesu.
Arath Dharam Kamadi Sukh Sevai Samayen Nareshu ॥154॥
Meaning: – The king entered his city after subduing the world with the help of his arms. The king used to enjoy the pleasures of earth, religion and work etc. ॥154॥
Bunk:
* Bhupa Pratapbhanu Bal Pai. Kamdhenu Bhai Bhoomi Suhai 4
All the miseries are subject to happiness. Dharamseel Beautiful Male Female ॥1॥
Meaning: After receiving the power of Raja Pratapbhanu, the land became beautiful Kamdhenu (one who gives the desired thing). The people (in his kingdom) were free and happy from all (kinds of) sorrows and all men and women were beautiful and righteous ॥1॥.
* Secretary Dharmaruchi Hari Pad Preeti. Sikhism and policy for the benefit of the nripe
Gur Sur Sant Pitar Mahideva. Always do reptile service ॥2॥
Spiritualism: – Religious minister had love at the feet of Shri Hari. He always taught him policy for the interest of the king. King Guru, God, saint, ancestor and Brahmin – used to serve them all forever ॥2॥
* Bhoop Dharam J. Bed Bakhane. Honor a lot of happiness
Per day per day. Suni sastra bar bed old ॥3॥
Meaning: The religion of the kings mentioned in the Vedas, the king always followed them respectfully and with pleasure. Gives many kinds of donations everyday and listens to the best scriptures, Vedas and Puranas.
* Nana Bapi Kupa Tadaga. Suman Batika Sundar Baga॥
Biprabhavan Surabhavan Suhay. Make all arrows bizarre ॥4॥
Meaning: – He made many bawalis, wells, ponds, Phulwadis, beautiful gardens, houses for Brahmins and beautiful quaint temples of the gods in all pilgrimages. ॥4॥
Doha:
* Where the elder says, Shruti awakens one by one.
Anurag, including Bar Sahasra Sahasra Nripa ॥155॥
Bhartharth: – In the Vedas and Puranas, as many types of yagyas have been said, the king performed all those sacrifices one by one thousand times with love ॥155॥.

Bunk:
* Researching the heart of the heart. Bhoop Bibeki Param Sujana
Karai Je Dharam Karam Mani Bani Basudev Arpit Nripa Gyani ॥1॥
Meaning: There was no reconnaissance (desire) of any fruit in the heart of the king. The king was very intelligent and knowledgeable. Whatever religion the wise king did with karma, mind and speech, he used to offer everything to Lord Vasudev.
* A king in times past. All society is ready
Bindhyachal became serious. Antelope
Meaning: Once the king, riding a good horse, decorated all the hunting material and went to the dense forest of Vindhyachal and there he killed many good deer. ॥2॥
* Firat Bipin Nripe Dikh Barahu. Janu Ban Dureu Sasihi Grassi Rahu॥
I am not the face of the elder sister. I’m not angry just grow ॥3॥
Sense: Raja saw a boar wandering in the forest. (He looked like this due to the teeth) as if the moon was greased (holding it in the mouth) and hidden in Rahu forest. The moon grew in her mouth

Story of Pratapbhanu
Bunk:
* Sunu Muni Katha Punit Purani. Jo Girija per Sovereign Bakhani
Biswa Bidit is a Kaikeya Desu. Satyaketu Tahan Basai Naresu ॥1॥
Sense: O monk! Listen to the sacred and ancient story that Shiva had told to Parvati. Famous in the world is Kaikeya country. There lived a king named Satyaketu (reigned) ॥1॥
* Dharam Dhurndhar Nidhi Nidhana. Tej Pratap Seal Balwana॥
Jugal Sut Bira is in the center of it. Sab Gun Dham Maha Ranadhira ॥2॥
Connotation: – He was the mine of policy, brilliant, glorious, majestic, sushil and strong, holding the axis of religion, he had two brave sons, who were the repositories of all virtues and the great Randhir.
* Raj Dhani who is the firstborn Naam Pratapbhanu As Tahi॥
Upper Suthi Arimardan Nama. Bhujbal Atul Achal Sangrama ॥3॥
Bhaartarth: – The elder boy who succeeded the state was named Pratapbhanu. The name of the second son was Arimardan, who had immense strength in his arms and who was adamant in war (like a mountain) ॥3॥.
* Bhaihi Bhaihi Param Samiti. Gross Defect Trick Barjit Preeti 4
Jethe Suthi Raj Nripa Dinha. Hari Hit Aapu Gawan Ban Kinha ॥4॥
Meaning: – Brother-brother had a great friendship and true love without all kinds of faults and deceit. The king gave the kingdom to the firstborn son and you walked to the forest to worship God ((4).
Doha:
* When Prataparbi Bhayau Nripa Phiri Dohai Des.
Praja Pal is not very impolite at all. 3153॥
Meaning: – When Pratapbhanu became king, his cry again returned to the country. He started following the subjects in the best manner according to the method mentioned in the Vedas. There was no trace of sin in his kingdom ॥153॥
Bunk:
* Nirpa Beneficial Secretary Sayana. Name Dharmaruchi Sukra Samana॥
Secretary Sayan Bandhu Balbeera. Aapu Pratappunj Ranadhira ॥1॥
Bhaartarth: – One who was interested in Raja and wise like Shukracharya was his minister named Dharmruchi. Thus, along with intelligent ministers and strong and brave brothers, the king himself was also very majestic and Randhir.
* Sen with Chaturang Apara. Amit Subhat Sab Samar Jujhara
Sen. Biloki Rau Harshana. Aru Baje Gahghe Nisana ॥2॥
Bhaartharth: – There was immense Chaturangini army, with innumerable warriors, all of whom were about to die in the battle. The king was very happy to see his army and the boisterous drums started ringing ॥2॥
* Made Katkai for Bijoy. Sudin Sadhi Nripe Chaleu rang
There are many lamis Live Gross Bhupi ॥3॥
Meaning: Decorating the army for Digvijay, that king went on auspicious day (Muhurta) and played the danka. There were many battles everywhere. He conquered all the kings by force ॥3॥
* Sapta Deep Bhujbal just. Lai Lai Dhan Khadi Nripa Dinhe॥
Gross Avni Mandal Tehi Kala. A Pratapbhanu Mahipala ॥4॥
Sense: With the help of his arms, he subdued the seven islands (lands) and took the punishment (tax) from the kings and left them. At that time Pratapbhanu was the only (Chakravarti) king of the entire Prithvi Mandal ॥4॥.
Doha:
* Swabus biswari kar bahubal nij pur kinh prabhesu.
Arath Dharam Kamadi Sukh Sevai Samayen Nareshu ॥154॥
Meaning: – The king entered his city after subduing the world with the help of his arms. The king used to enjoy the pleasures of earth, religion and work etc. ॥154॥
Bunk:
* Bhupa Pratapbhanu Bal Pai. Kamdhenu Bhai Bhoomi Suhai 4
All the miseries are subject to happiness. Dharamseel Beautiful Male Female ॥1॥
Meaning: After receiving the power of Raja Pratapbhanu, the land became beautiful Kamdhenu (one who gives the desired thing). The people (in his kingdom) were free and happy from all (kinds of) sorrows and all men and women were beautiful and righteous ॥1॥.
* Secretary Dharmaruchi Hari Pad Preeti. Sikhism and policy for the benefit of the nripe
Gur Sur Sant Pitar Mahideva. Always do reptile service ॥2॥
Spiritualism: – Religious minister had love at the feet of Shri Hari. He always taught him policy for the interest of the king. King Guru, God, saint, ancestor and Brahmin – used to serve them all forever ॥2॥
* Bhoop Dharam J. Bed Bakhane. Honor a lot of happiness
Per day per day. Suni sastra bar bed old ॥3॥
Meaning: The religion of the kings mentioned in the Vedas, the king always followed them respectfully and with pleasure. Gives many kinds of donations everyday and listens to the best scriptures, Vedas and Puranas.
* Nana Bapi Kupa Tadaga. Suman Batika Sundar Baga॥
Biprabhavan Surabhavan Suhay. Make all arrows bizarre ॥4॥
Meaning: – He made many bawalis, wells, ponds, Phulwadis, beautiful gardens, houses for Brahmins and beautiful quaint temples of the gods in all pilgrimages. ॥4॥
Doha:
* Where the elder says, Shruti awakens one by one.
Anurag, including Bar Sahasra Sahasra Nripa ॥155॥
Bhartharth: – In the Vedas and Puranas, as many types of yagyas have been said, the king performed all those sacrifices one by one thousand times with love ॥155॥.

Bunk:
* Researching the heart of the heart. Bhoop Bibeki Param Sujana
Karai Je Dharam Karam Mani Bani Basudev Arpit Nripa Gyani ॥1॥
Meaning: There was no reconnaissance (desire) of any fruit in the heart of the king. The king was very intelligent and knowledgeable. Whatever religion the wise king did with karma, mind and speech, he used to offer everything to Lord Vasudev.
* A king in times past. All society is ready
Bindhyachal became serious. Antelope
Meaning: Once the king, riding a good horse, decorated all the hunting material and went to the dense forest of Vindhyachal and there he killed many good deer. ॥2॥
* Firat Bipin Nripe Dikh Barahu. Janu Ban Dureu Sasihi Grassi Rahu॥
I am not the face of the elder sister. I’m not angry just grow ॥3॥
Sense: Raja saw a boar wandering in the forest. (He looked like this due to the teeth) as if the moon was greased (holding it in the mouth) and hidden in Rahu forest. The moon grew in her mouthKei Tahi. Charan bandi nija bhagya sarai ॥1॥
Meaning: O O Nath! Very well, after saying so and commanding him, the king sat down by tying the horse to the tree. The king praised him in many ways and praised his fate by worshiping his feet.
* Puni boleau soft dropped suhai. Dear Father, Lord, I should be free
Mohi Munis Sut Sevak Jani. Nath naam nij kahhu bakhani ॥2॥
Meaning: – Then said to the beautiful gentle voice – O Lord! I am proud to know you as a father. Hey Munishwar! Knowing me as your son and servant, tell me your name (Dham) in detail ॥2॥
* Teh na jaan nripa nripah to sleep. Bhup Suhrid So Fraud Sayana
Barry Puni Chhatri Puni Raja. Trick force kinh chahi nij kaja ॥3॥
Sense: Raja did not recognize him, but he did recognize the king. The king was pure hearted and was clever in deceit. One is the Vari, then the Kshatriya of the caste, then the King. He wanted to make his work with deceit. ॥3॥
* Samuzhi Rajsukh Dukhi Arati. Avan anal and smoked chest 4
Sansarl Bachan Nripa ki Suni Kana. Bayer Sambhari Hriday Harshana ॥4॥
Sense: That enemy was grieved by understanding (remembering) his state happiness. His chest (of the potter) was burning like an inner fire. Hearing the simple words of the king by ear, remembering his hatred, he rejoiced in the heart.
Doha:
* Including fraud, bori bri mundle boleu juguti.
Naam Hamar Bhikhari Now Poorless Niket ॥160॥
Sense: He dipped in treachery and uttered a gentle voice with great tact – Now our name is a beggar, because we are poor and Aniket (house-gateless) ॥160॥
Bunk:
* Kah nripe j bigyan nidhana. Throw a little pride
Always stay close to yourself Make all the birds Kushal ॥1॥
Sense: Raja said- Those who are like your science and are always concealed, they always hide their nature, because there is all kind of well-being in keeping with misfortune (there is a possibility of being revered as a saint and Fall of value) ॥1॥
* Tehtee kahin saint shruti terne. Dear unseen dear Hari
You have to bend a lot of beggars. Hot Birnchi Siwhi Sandeha ॥2॥
Sense: In this way, the saint and the Vedas call out that only the supreme abode (utterly arrogance, love and honor) is loved by God. Seeing poor, beggars and homeless people like you, Brahma and Shiva also suspect (whether they are real saints or beggars) ॥2॥
* Josi Soci Tav Charan Namami. Please bless me, now master.
Sahaj saw Preeti Bhupati Kai. Aapu Bishya Biswas Bisishi ॥3॥
Meaning: Whatever you are, (ie, whoever you are), I greet you at your feet. Hey master! Now please be kind to me Seeing the king’s natural affection for himself and his greater faith in himself, ॥2॥
* All kinds of Rajhis adopted. Boleu more Sneh Janae
Sunu Satibhau should say Mahipala. There is a lot of past black here ॥4॥
Sense: In all ways, subduing the king, showing more affection, he (hypocritical) said – O king! Listen, I tell you the truth, a lot of time has passed since I lived here ॥4॥
Doha:
* Now lagi mohi na milee kou ko main na jaunavoon kahu.
Tapa kanan dah ॥161 k
Sense: So far no one has met me nor do I reveal myself to anyone, because prestige in the world is like fire, which consumes the ascetic forest ॥161 (a)॥
Soratha:
* Look at Tulsi, Subeshu Bhulin, idiot nor clever male.
Beautiful Kekihi Pekhoo Bachan Sudha Sama Asan Ahi ॥161b॥
Sense: Tulsidas ji says – Seeing beautiful clothes is not foolish (fools are foolish), even smart people are deceived. Look at the beautiful peacock, its word is like nectar and the food is of snake ॥161 (b)॥
Bunk:
* I am the only one who remains secret. No greener purpose
God knows everything without a living. Kahhu kavani siddhi lok ridge ॥1॥
Meaning: The hypocrite-ascetic said-) That is why I hide in the world. Nothing serves anyone except Sri Hari. God knows everything without even living. Then say what will be accomplished by plowing the world ॥1॥
* Thank you so much, dear dear peacock. Preeti Priti Mohi
Now you have to go to other places. Darun Dosh Khati Ati Mohi ॥2॥
Meaning: You are pure and beautiful intellect, I love it very much and you also have love and trust in me. Hey Tat Now, if I hide anything from you, then I will feel a terrible blame ॥2॥
* Jimi Jimi Tapasu Kathai Udasa. Timi Timi Nirghee Yield Biswas
Saw swabus karma Then said Tapas Bagdhyani ॥3॥
Meaning: Just as he used to say the words of ascetic indifference, as soon as the king got confidence. When the monk, who meditated like a heron, knew the king with karma, mind and word, he said – ॥3॥
* Name Hamar Ekatanu Bhai. Suni nripa boleu puni siru nai
Arath Bakhani named Kahu Mohi Sevak Ati Apan Jani ॥4॥
Meaning: O brother! Our name is Ekatanu. Hearing this, the king again turned his head and said – Knowing me your very (servile) servant, explain the meaning of your name and say ॥4॥.
Doha:
* Adisrishti stems when the uttapi bhai mori.
Naam ekatanu for tehi deh na dhari bhori ॥162॥
Spirituality: – (The saintly monk said-) When the first creation was born, then I was born. Since then I did not wear another body again, this is why my name is Ekatanu. ॥162॥
Bunk:
* Never mind my soul. Not a rare tortoise
Tenacity created the world, created the world. Tapa Bishnu Bishnu Bhai Parratta ॥1॥
Meaning: O son! Do not be surprised in the mind, nothing is rare with austerity, Brahma creates the world with the power of austerity. Vishnu has become a follower of the world by the power of tenacity. ॥1॥
* Tapbal Sambhu Karhin Sanghara. Tapa te agam na kachu sansara
Fearful creepKei Tahi. Charan bandi nija bhagya sarai ॥1॥
Meaning: O O Nath! Very well, after saying so and commanding him, the king sat down by tying the horse to the tree. The king praised him in many ways and praised his fate by worshiping his feet.
* Puni boleau soft dropped suhai. Dear Father, Lord, I should be free
Mohi Munis Sut Sevak Jani. Nath naam nij kahhu bakhani ॥2॥
Meaning: – Then said to the beautiful gentle voice – O Lord! I am proud to know you as a father. Hey Munishwar! Knowing me as your son and servant, tell me your name (Dham) in detail ॥2॥
* Teh na jaan nripa nripah to sleep. Bhup Suhrid So Fraud Sayana
Barry Puni Chhatri Puni Raja. Trick force kinh chahi nij kaja ॥3॥
Sense: Raja did not recognize him, but he did recognize the king. The king was pure hearted and was clever in deceit. One is the Vari, then the Kshatriya of the caste, then the King. He wanted to make his work with deceit. ॥3॥
* Samuzhi Rajsukh Dukhi Arati. Avan anal and smoked chest 4
Sansarl Bachan Nripa ki Suni Kana. Bayer Sambhari Hriday Harshana ॥4॥
Sense: That enemy was grieved by understanding (remembering) his state happiness. His chest (of the potter) was burning like an inner fire. Hearing the simple words of the king by ear, remembering his hatred, he rejoiced in the heart.
Doha:
* Including fraud, bori bri mundle boleu juguti.
Naam Hamar Bhikhari Now Poorless Niket ॥160॥
Sense: He dipped in treachery and uttered a gentle voice with great tact – Now our name is a beggar, because we are poor and Aniket (house-gateless) ॥160॥
Bunk:
* Kah nripe j bigyan nidhana. Throw a little pride
Always stay close to yourself Make all the birds Kushal ॥1॥
Sense: Raja said- Those who are like your science and are always concealed, they always hide their nature, because there is all kind of well-being in keeping with misfortune (there is a possibility of being revered as a saint and Fall of value) ॥1॥
* Tehtee kahin saint shruti terne. Dear unseen dear Hari
You have to bend a lot of beggars. Hot Birnchi Siwhi Sandeha ॥2॥
Sense: In this way, the saint and the Vedas call out that only the supreme abode (utterly arrogance, love and honor) is loved by God. Seeing poor, beggars and homeless people like you, Brahma and Shiva also suspect (whether they are real saints or beggars) ॥2॥
* Josi Soci Tav Charan Namami. Please bless me, now master.
Sahaj saw Preeti Bhupati Kai. Aapu Bishya Biswas Bisishi ॥3॥
Meaning: Whatever you are, (ie, whoever you are), I greet you at your feet. Hey master! Now please be kind to me Seeing the king’s natural affection for himself and his greater faith in himself, ॥2॥
* All kinds of Rajhis adopted. Boleu more Sneh Janae
Sunu Satibhau should say Mahipala. There is a lot of past black here ॥4॥
Sense: In all ways, subduing the king, showing more affection, he (hypocritical) said – O king! Listen, I tell you the truth, a lot of time has passed since I lived here ॥4॥
Doha:
* Now lagi mohi na milee kou ko main na jaunavoon kahu.
Tapa kanan dah ॥161 k
Sense: So far no one has met me nor do I reveal myself to anyone, because prestige in the world is like fire, which consumes the ascetic forest ॥161 (a)॥
Soratha:
* Look at Tulsi, Subeshu Bhulin, idiot nor clever male.
Beautiful Kekihi Pekhoo Bachan Sudha Sama Asan Ahi ॥161b॥
Sense: Tulsidas ji says – Seeing beautiful clothes is not foolish (fools are foolish), even smart people are deceived. Look at the beautiful peacock, its word is like nectar and the food is of snake ॥161 (b)॥
Bunk:
* I am the only one who remains secret. No greener purpose
God knows everything without a living. Kahhu kavani siddhi lok ridge ॥1॥
Meaning: The hypocrite-ascetic said-) That is why I hide in the world. Nothing serves anyone except Sri Hari. God knows everything without even living. Then say what will be accomplished by plowing the world ॥1॥
* Thank you so much, dear dear peacock. Preeti Priti Mohi
Now you have to go to other places. Darun Dosh Khati Ati Mohi ॥2॥
Meaning: You are pure and beautiful intellect, I love it very much and you also have love and trust in me. Hey Tat Now, if I hide anything from you, then I will feel a terrible blame ॥2॥
* Jimi Jimi Tapasu Kathai Udasa. Timi Timi Nirghee Yield Biswas
Saw swabus karma Then said Tapas Bagdhyani ॥3॥
Meaning: Just as he used to say the words of ascetic indifference, as soon as the king got confidence. When the monk, who meditated like a heron, knew the king with karma, mind and word, he said – ॥3॥
* Name Hamar Ekatanu Bhai. Suni nripa boleu puni siru nai
Arath Bakhani named Kahu Mohi Sevak Ati Apan Jani ॥4॥
Meaning: O brother! Our name is Ekatanu. Hearing this, the king again turned his head and said – Knowing me your very (servile) servant, explain the meaning of your name and say ॥4॥.
Doha:
* Adisrishti stems when the uttapi bhai mori.
Naam ekatanu for tehi deh na dhari bhori ॥162॥
Spirituality: – (The saintly monk said-) When the first creation was born, then I was born. Since then I did not wear another body again, this is why my name is Ekatanu. ॥162॥
Bunk:
* Never mind my soul. Not a rare tortoise
Tenacity created the world, created the world. Tapa Bishnu Bishnu Bhai Parratta ॥1॥
Meaning: O son! Do not be surprised in the mind, nothing is rare with austerity, Brahma creates the world with the power of austerity. Vishnu has become a follower of the world by the power of tenacity. ॥1॥
* Tapbal Sambhu Karhin Sanghara. Tapa te agam na kachu sansara
Fearful creepRaga Katha Purati Kahay So So Laga ॥2॥
Meaning: Rudra destroys with the force of yourself. There is no such thing in the world that cannot be met with tenacity. On hearing this, the king was very much pleased. Then he (ascetic) started telling old stories ॥2॥
* Karam Dharam History Kare formulation Birati Bibeka॥
The origin of the Holocaust story. Kaheshi Amit Acharaj Bakhani ॥3॥
Connotation: – By saying work, religion and many types of history, he began to represent disinterest and knowledge. He told in detail the wonderful stories of the creation of origin, observance (condition) and destruction (pralaya) ॥3॥
* Sun Maheep Tapas is simply terrifying. Aap na naam kahan te leyau॥
Say if you know Tapas Nripe Kinhehu treachery log bhal mohi ॥4॥
Senseless: – Hearing the king, the ascetic fell into control and then he started telling him his name. The ascetic said- Rajan! I know you You cheated, I liked it ॥4॥
Soratha:
* Sunu Mahi Asi policy where the name is not called.
Extreme love on Mohi Tohi Soi cleverness thought ॥163॥
Meaning: O king! Listen, there is a policy that kings do not say their names wherever they are. Considering your same cleverness, I have fallen in love with you ॥163॥
Bunk:
* Naam Tumhar Pratap Dinesa. Satyaketu, Father Naresa
Gur Prasad, all dear king. Kahin Aap Jaan Jaan Akaza जा1॥
Bhaartarth: – Your name is Pratapbhanu, Maharaj Satyaketu was your father. Hey Rajan! By the grace of the master, I know everything, but considering my loss, I do not say ॥1॥
* Look after the smooth correction. Love policy policy
Let the fairy mother Mamta mind. Where should I tell my story? ॥2॥
Meaning: O Tat! Seeing your natural straightforwardness, love, faith and mastery in policy, a lot of affection has arisen in my mind, that is why I ask you to tell my story.
* Now I am not happy. Magu jo bhup bhaav maan maa mere
Suni Subchan Bhupathi Harshana. Gahi Padh Binay Keenhi Bidhi Nana ॥3॥
Meaning: – Now I am happy, do not doubt it. Hey Rajan! Ask for whatever is in your mind. Hearing the beautiful (beloved) word, the king was delighted and, holding (Muni’s) feet, he begged in many ways ॥3॥
* Please visit the Munshi Darsan. Turn around
Prabhu, however pleased. Margi agam bar hoon asoki ॥4॥
Meaning: O Dayasagar Muni! All four substances (Artha, Dharma, Kama and Moksha) came into my grasp with your vision. Still seeing Swami pleased, I should be shocked by asking for this rare groom (why not) ॥4॥
Doha:
* Just die, painless Tanu Samar Jitai Jani Kou.
Ekchhatra Repuhin Mahi Raj Kalap Sat Hou ॥164॥
Meaning: – May my body be devoid of old age, death and sorrow, no one can win me in war and my hundred Kalpakat Ekkatra Akantak kingdom on earth should be ॥164॥
Bunk:
* Where should you be a Tapus Nripe? Karan is a tough Sun Soo
Kalau tua pad naihi lead. A dipstick ring month ॥1॥
Meaning: – The ascetic said – O king! Let it be so, but one thing is difficult, listen to it as well. O lord of the earth! Except only the Brahmin clan, Kaal will also behead you at your feet ॥1॥
* Tapabal Bipra always bear. ्हाराप न को को को को उ रखउ रख रख रख रख रख रख रख रख रख॥ रख॥ रख
Jaw Bipranh just Karhu Naresa. Tou Tu Bus Bidhi Bishnu Mahesa ॥2॥
Meaning: – Brahmins always remain strong by the power of tapas. There is no one to protect them from their anger. Hey Narpati! If you subdue the Brahmins, then Brahma, Vishnu and Mahesh will also be under you.
* No, Brahmakul Sun Baari. Tell the truth, you raised your arm.
Bipra curse binu sunu mahipala. Toor naas nahin kavnehun kala ॥3॥
Meaning: I cannot force myself with the Brahmin clan, I raise both arms and tell the truth. Hey Rajan! Listen, without the curse of the Brahmins, you will not perish in any time.
* Hersheau Rau Bachan Suni Tasu. Nath no ho peacock now Nasu
Tava Prasad Prabhu Kripanidhana. Mo Kahun Sarbakal Kalyana ॥4॥
Sense: Raja was very happy to hear his words and started saying – O Lord! I will not be destroyed now. O Lord, please! By your grace i will be well all the time ॥4॥
Doha:
* Aavamastu kahi kaput muni bola kutil bahori.
Milab Hamar Bhulab Nij Kahhut Hamahin Khori ॥165॥
Meaning: – By saying ‘Evamastu’ (so be it), that crooked hypocrite sage again said – (But) if you will tell me to meet me and forget your path (not to say, if), then we are not to blame ॥165॥.
Bunk:
* So I am a great king. Say the story
Chhath Shravan this layer story. Naas tumhar satya mam bani ॥1॥
Meaning: O king! I refuse you because you will be very hurt by saying this episode. You will be destroyed as soon as you hear this in the sixth ear, knowing this truth of my word.
* This may be revealed or twilight. Naas to Sunu Bhanupratapa 4
There is no death on these measures. Jaun hari har kohpahin mahan maa ॥2॥
Meaning: O Pratap Bhanu! Listen, by the manifestation of this or the curse of the Brahmins, you will be destroyed and in some way, even if Brahma and Shankar are angry in your mind, you will not die.
* Satya Nath Pad Ghi Nripa language. Dwij gur kop kaahu rakha
Rakhai Guru used to fight Gur Birodh Nahin Kou Jag Trata ॥3॥
Bhaartarth: -Raja holding the feet of the monk said- O lord! Is true Who can protect, say, the anger of the Brahmin and the Guru? If Brahma also rages, then the Guru saves, but there is no one to save the world if he opposes the Guru.
* I will say to you every moment. How are you, don’t think about us
I am a fearless man. Prabhu Mahidev curse ati ghara ॥4॥Is ॥4॥
Doha:
* Hohin bipra bus kavan bidhi kahhu kripa kari soo.
You should not look at Deendayal’s personal interests.
Meaning: How can those Brahmins be subdued, please tell them as well. Hey Deendayalu! I don’t see anyone else except you ॥166॥
Bunk:
* Sunu Nripa Bibidh Jatan Jag Mahe. It is not a painful thought.
Ahai is a very easy agent. There but one difficulty ॥1॥
Meaning: – (The ascetic said-) Hey Rajon! Listen, there are many remedies in the world, but they are troublesome (they are very difficult to make) and whether or not they can be proven (their success is not sure). ) Yes, a solution is very easy, but it also has a difficulty. ॥1॥
* Mam adheen juguti nripa soi. Mor jab taw nagar hoi॥
Start today when you are afraid. Kahu’s home village not lost ॥2॥
Meaning: O king! That tactic is in my hands, but I cannot go to your city. Ever since I was born, till date I have not been to anyone’s home or village.
* I am not going to sleep Bana aayi ambush aaju
Suni Mahi Boleu became soft. Nath Nigam Asi Policy Bakhani ॥3॥
Sense: But if I do not go, then your work deteriorates. Today this great confusion has arisen. Hearing this, the king said with soft speech, O Nath! There is such a policy in the Vedas that – ॥3॥
* Don’t do it on the big sunny short. Giri nij sireni sada trin dhar॥
Jaladhi Agadh Mauli Bah Fenu. Sant Dharni Dharat head Renu ॥4॥
Meaning: Large people love the younger ones. Mountains always bear the grass (grass) on their ends. The deep sea bears the froth on its head, and the earth always bears dust on its head.
Doha:
* As kahi gah ghee nares pad swami hohu kripal
God is sorry, Lord Sajjan Deendayal ॥167॥
Meaning: – Saying this, the king held the feet of the monk. (And said-) O Lord! Please You are a saint Deendayalu is (So) Lord! Bear so much trouble for me अव167॥
Bunk:
* Jan Nrihahi Aadhina Aadhina. Said Tapas fraud Prabina॥
To tell the truth, listen to Bhupathi. Jag Nahin Rare Turtle Mohi ॥1॥
Meaning: Knowing Raja as his subordinate, proficient ascetic said in the treachery, O Rajan! Listen, I tell you the truth, nothing is rare in the world ॥1॥
* Occupational work I should do. Mann tan bachaan bhagat tain mora॥
Jog Juguti Tapa Mantra Prabhau. When it comes to fruition, ॥2॥
Meaning: – I will do your work, (because) you are my devotee with mind, speech and body (all three). But the effect of Yoga, Yukti, Tapa and Mantras only flourish when they are done in secret ॥2॥.
* Jauran nares karoon karo kitchen. You do not know my love
Food was served, so it was done. Soi soi tav aysu anusarai ॥3॥
Meaning: O Narpati! If I make a kitchen and you serve it and no one knows me, then whoever eats the grain will become obedient to you ॥3॥
* Puni Tinh’s home in Jai Jou. Tav bas hoi bhoop sunu soo
There is a remedy to the clue. Sambat Bhari compiles ॥4॥
Meaning: Not only this, even the house of those (eaters) who will have food, O Rajan! Listen, that too will be under you. Hey Rajan! Go and do the same measures and take a pledge to take food throughout the year वर्ष4॥
Doha:
* Family including Nit Nutan Dwij Sahas Sat Barehu.
I will compile your day to day and day, वन168॥
Meaning: To invite new one lakh Brahmins with family. I will make food every day till your moment (ie one year).
Bunk:
* Ehhi Bidhi Bhoop Suffering. Hohihin gross bill bus
Karihhin Bipr Hommakh Service. Tehin Prasang Sahajehin Bas Deva ॥1॥
Meaning: O king! In this way all the Brahmins will be in your control with very little effort. If Brahmins perform havan, yagya and seva-puja, then the gods will also be easily subjugated by that affair (relation).
* And I should say one thing. I am not angry and come
I told you above Hari anab main kari nij maya ॥2॥
Sense: I tell you another identity that I will never come in this form. Hey Rajan! I will bring your priest from my illusion ॥2॥ \
* Tapbal tehi kari apu samana samana. Keep it here
I am Dhari Tasu Beshu Sunu Raja. Sab Bidhi Tor Sanwarb Kaja ॥3॥
Sense: I will keep him here for one year with the help of pain and will keep you here, O king! Listen, I will prove my work in every way by making his appearance ॥3॥
* Gai nisi very sion now kije. Mohi Tohi Bhup
I used to be happy Reached Sowtahi Niketa ॥4॥
Meaning: O king! Night has passed, now go to sleep. I will meet you on the third day from today. With the power of tenacity, I will bring you home with the horse at bedtime ॥4॥
Doha:
* I am so asleep
When the solitude is spoken, all the stories are beautiful ॥169॥
Meaning: – I will disguise the same (of the priest). When I will call you in isolation and tell you the story, then you will recognize me ॥169॥
Bunk:
* Sayan Keenh Nripe Ayusu obeyed. Chalgyani sits in the seat
Shrimat Bhup Nidra came very So Kim Sov think more ॥1॥
Sense: Raja obeyed and slept and he sat on a stoic posture. The king was tired, (he) got very (deep) sleep. But how did he sleep insidiously. He was worried a lot ॥1॥
* Kalketu Nisichar Teh Aava. It is easy to forget
Param Mitra Tapas Nripa Kera. Know that you are very hypocritical, ॥2॥
Sense: At the same time, there came the monster Kalaketu, who turned a king into a pig. He was a great friend of the ascetic king and knew a lot of deceit. ॥2॥
* Sat Sut Aru ten brothers of Tehi. Khal Ati Ajay Dev Dukhadai॥
Everyone died on the first day. Bipr Sant Sur Dekhi Dukhare ॥3॥
Meaning: He had a hundred sons and ten brothers, who are very wicked, win over no one
Sense: If I do not follow your statement, (even if) I perish. I am not worried about it. My mind is God (Only) fearing the same fear that the curse of the Brahmins would be terribleIs ॥4॥
Doha:
* Hohin bipra bus kavan bidhi kahhu kripa kari soo.
You should not look at Deendayal’s personal interests.
Meaning: How can those Brahmins be subdued, please tell them as well. Hey Deendayalu! I don’t see anyone else except you ॥166॥
Bunk:
* Sunu Nripa Bibidh Jatan Jag Mahe. It is not a painful thought.
Ahai is a very easy agent. There but one difficulty ॥1॥
Meaning: – (The ascetic said-) Hey Rajon! Listen, there are many remedies in the world, but they are troublesome (they are very difficult to make) and whether or not they can be proven (their success is not sure). ) Yes, a solution is very easy, but it also has a difficulty. ॥1॥
* Mam adheen juguti nripa soi. Mor jab taw nagar hoi॥
Start today when you are afraid. Kahu’s home village not lost ॥2॥
Meaning: O king! That tactic is in my hands, but I cannot go to your city. Ever since I was born, till date I have not been to anyone’s home or village.
* I am not going to sleep Bana aayi ambush aaju
Suni Mahi Boleu became soft. Nath Nigam Asi Policy Bakhani ॥3॥
Sense: But if I do not go, then your work deteriorates. Today this great confusion has arisen. Hearing this, the king said with soft speech, O Nath! There is such a policy in the Vedas that – ॥3॥
* Don’t do it on the big sunny short. Giri nij sireni sada trin dhar॥
Jaladhi Agadh Mauli Bah Fenu. Sant Dharni Dharat head Renu ॥4॥
Meaning: Large people love the younger ones. Mountains always bear the grass (grass) on their ends. The deep sea bears the froth on its head, and the earth always bears dust on its head.
Doha:
* As kahi gah ghee nares pad swami hohu kripal
God is sorry, Lord Sajjan Deendayal ॥167॥
Meaning: – Saying this, the king held the feet of the monk. (And said-) O Lord! Please You are a saint Deendayalu is (So) Lord! Bear so much trouble for me अव167॥
Bunk:
* Jan Nrihahi Aadhina Aadhina. Said Tapas fraud Prabina॥
To tell the truth, listen to Bhupathi. Jag Nahin Rare Turtle Mohi ॥1॥
Meaning: Knowing Raja as his subordinate, proficient ascetic said in the treachery, O Rajan! Listen, I tell you the truth, nothing is rare in the world ॥1॥
* Occupational work I should do. Mann tan bachaan bhagat tain mora॥
Jog Juguti Tapa Mantra Prabhau. When it comes to fruition, ॥2॥
Meaning: – I will do your work, (because) you are my devotee with mind, speech and body (all three). But the effect of Yoga, Yukti, Tapa and Mantras only flourish when they are done in secret ॥2॥.
* Jauran nares karoon karo kitchen. You do not know my love
Food was served, so it was done. Soi soi tav aysu anusarai ॥3॥
Meaning: O Narpati! If I make a kitchen and you serve it and no one knows me, then whoever eats the grain will become obedient to you ॥3॥
* Puni Tinh’s home in Jai Jou. Tav bas hoi bhoop sunu soo
There is a remedy to the clue. Sambat Bhari compiles ॥4॥
Meaning: Not only this, even the house of those (eaters) who will have food, O Rajan! Listen, that too will be under you. Hey Rajan! Go and do the same measures and take a pledge to take food throughout the year वर्ष4॥
Doha:
* Family including Nit Nutan Dwij Sahas Sat Barehu.
I will compile your day to day and day, वन168॥
Meaning: To invite new one lakh Brahmins with family. I will make food every day till your moment (ie one year).
Bunk:
* Ehhi Bidhi Bhoop Suffering. Hohihin gross bill bus
Karihhin Bipr Hommakh Service. Tehin Prasang Sahajehin Bas Deva ॥1॥
Meaning: O king! In this way all the Brahmins will be in your control with very little effort. If Brahmins perform havan, yagya and seva-puja, then the gods will also be easily subjugated by that affair (relation).
* And I should say one thing. I am not angry and come
I told you above Hari anab main kari nij maya ॥2॥
Sense: I tell you another identity that I will never come in this form. Hey Rajan! I will bring your priest from my illusion ॥2॥ \
* Tapbal tehi kari apu samana samana. Keep it here
I am Dhari Tasu Beshu Sunu Raja. Sab Bidhi Tor Sanwarb Kaja ॥3॥
Sense: I will keep him here for one year with the help of pain and will keep you here, O king! Listen, I will prove my work in every way by making his appearance ॥3॥
* Gai nisi very sion now kije. Mohi Tohi Bhup
I used to be happy Reached Sowtahi Niketa ॥4॥
Meaning: O king! Night has passed, now go to sleep. I will meet you on the third day from today. With the power of tenacity, I will bring you home with the horse at bedtime ॥4॥
Doha:
* I am so asleep
When the solitude is spoken, all the stories are beautiful ॥169॥
Meaning: – I will disguise the same (of the priest). When I will call you in isolation and tell you the story, then you will recognize me ॥169॥
Bunk:
* Sayan Keenh Nripe Ayusu obeyed. Chalgyani sits in the seat
Shrimat Bhup Nidra came very So Kim Sov think more ॥1॥
Sense: Raja obeyed and slept and he sat on a stoic posture. The king was tired, (he) got very (deep) sleep. But how did he sleep insidiously. He was worried a lot ॥1॥
* Kalketu Nisichar Teh Aava. It is easy to forget
Param Mitra Tapas Nripa Kera. Know that you are very hypocritical, ॥2॥
Sense: At the same time, there came the monster Kalaketu, who turned a king into a pig. He was a great friend of the ascetic king and knew a lot of deceit. ॥2॥
* Sat Sut Aru ten brothers of Tehi. Khal Ati Ajay Dev Dukhadai॥
Everyone died on the first day. Bipr Sant Sur Dekhi Dukhare ॥3॥
Meaning: He had a hundred sons and ten brothers, who are very wicked, win over no one were to be known and to grieve the gods. Seeing the unhappiness of Brahmins, saints and deities, the king had already killed them all in battle.
* Tehin khal pachhil bayru sambhara. Tapas Nripe Milli Mantra Bichhara॥
Jehin ripu chhay soi rachenhi upau. Future bus na jaan kachchu rau ॥4॥
Meaning: That wicked remembering the previous hatred and meeting with the ascetic king, advised Salah Vichari (conspiracy) and devised the same way as the enemy is destroyed. The future king (Pratapbhanu) could not understand anything ॥4॥
Doha:
* Ripu Tejasi alone does his short work Ganiya na Tahu.
Ajhun Deet Dukh Rabi Sasihi Head Unseen Rahu ॥170॥
Meaning: Even if the enemy is lonely, it should not be considered small. Rahu, whose head was only left, grieves the Sun and Moon till date ॥170॥
* Tapas Nripe Nij Sakhihi Nihari. Harshi meet, fear awake happiness
Friend told all the stories. Jatudhan said happiness was found ॥1॥
Meaning: The ascetic king got pleased after seeing his friend and got happy. He told his friend all the stories, then the demon exulted and said ॥1॥
* Now Sadhu Ripu Sunhu Naresa. Joon tum kein peacock upadesa
Parihari thinking, you sleep. Binu Drug Biodhi Bidhi Khoi ॥2॥
Meaning: O king! Listen, when you have done (as much) as I said, now I have controlled the enemy (understand). Now you sleep worrying The creator removed the disease without medicine ॥2॥
* Ripu Original Baha’i including Kul. I came on fourth day
Tapas Nirhi is very enduring. Chalak Mahakapati atrocious ॥3॥
Sense: I will meet you on the fourth day (from today), by overthrowing the enemy from its roots. (Thus) By giving great comfort to the ascetic king, he ran a great and very angry demon.
* Bhanupratapahi Baji Sameta. Reach out
Nripahi Narai Pahyan was made. Hygroon made Bandhesi market ॥4॥
Meaning: – He sent Pratapbhanu Raja with a horse to the house in a moment. After putting the king to the queen, put the horse in a horse-riding well ॥4॥
Doha:
* Hari Lai Gayu Bahori, above the king.
Le Rakesi Giri Khoh Mahu Mayan Kari Mati Bhori ॥171॥
Meaning: – Then he took the priest of the king and confusing his intellect with illusion from Maya, he kept it in the mountain lair ॥171॥
Bunk:
* The above mentioned Rupa. Pareau jai tehi sage anupa
Jaageu Nripe Bheehan Bihana. See building considered very surprising ॥1॥
Senseless: – He took the form of a priest and lay down on his beautiful SEZ. The king woke up before dawn and seeing his house, he considered it a big surprise ॥1॥
* Muni Mahima Mana Mahoo Estimated. Wake up the village Jehin Jaan na Rani
Kanan Gayu Bajji Not only male nor female knows नार2॥
Sense: In anticipation of the glory of the Muni, he got up slowly, in which the queen would not die. Then he mounted the same horse and went to the forest. None of the men and women of the city knew ॥2॥
* Gaya Jam Jug Bhupathi Aava. Ghar Ghar Utsav Baz Badhwa॥
See above when the king. Amazed Bilok Sumiri Soi Kaja ॥3॥
Sense: At two o’clock the king came. Festivities started happening from house to house and Badhwa started ringing. When the king saw the priest, he (his) remembered the same work and started to look at him with surprise ॥3॥
* Jug sam nri hai pathe din. Insidious muni pad ra mati lini
Time to know the above Nrihihte mate all kahi samuzhava ॥4॥
Connotation: – Three days were spent on Raja like Yuga. His intellect remained at the feet of the hypocritical monk. Knowing a certain time, the priest (demon made) came and according to the secret advice with the king (he) explained his thoughts to him and said कह4॥.
Doha:
* Nripa Harsheu Pahichani Guru is not living illusion
सत172 समेत including Bipr family immediately
Bhaartarth 🙁 According to the hint) the king was pleased to recognize the Guru (in that form). He could not be confused (whether it is Tapas Muni or Kalketu Raksha). He immediately invited one lakh fine Brahmins with family. ॥172॥
Bunk:
* Made banqueting above. Chharas Chari Bidhi as Shruti Gai
Mayamay Tehin Keenhi Kitchen. Bijan Bahu gani gi saini koi ॥1॥
Bhaarthar: – The priest created six rasas and four types of food, as described in the Vedas. He prepared the Mayamayi kitchen and made so many dishes that no one could count. ॥1॥
* Amish Randha after doing death. Tehi mahun bipra maasu khal sandha॥
Should say food, all the people said. Regards sit with regards ॥2॥
Meaning: – Cooked the flesh of many kinds of animals and that wicked mixed the flesh of Brahmins. All Brahmins were called for food and washed the stage and made them sit with respect ॥2॥
* Parusan Jabhin Lag Mahipala. Bhai Akasbani tehi kala॥
Biprbrind arises aristocracy There is great loss of food, food and drink ॥3॥
Sense: As the king started serving, the same period (kalatekrit) came to air – O Brahmins! Get up and go to your house, don’t eat this food. There is a big loss in this (eating) ॥3॥
* Bhayu Kitchen Bhusur Masu. All Dwijs arose as if Biswasu
Bhoop Bikal Mati Mohan Bhulani. The future bus is not open mouth ॥4॥
Meaning: – The meat of Brahmins is made in Rasoi. All the Brahmins stood up, believing (of Akashvani). The king was distraught (but), his intellect was forgotten in fascination. Hopefully (one) thing (also) did not come out of his mouth ॥4॥
Doha:
* Said Bipra Sakop then Nahin Kachhu Keenh Bichar.
Jai Nisachar Hohu Nrup Mud including family ॥173॥
Meaning: Then the Brahmin spoke with anger – He did not consider anything – Oh foolish king! You are a monster with a family ॥173॥
Bunk:
* Chhatrabandhu Tain Bipra spoke. Blessed with sea॥
Ishwar Rakha Dharam is ours. Parivara including Jai Tanti ॥1॥
Meaning: – The lowly Kshatriya! You wanted to destroy the Brahmins along with the family and wanted to destroy them, God protected our religion. Now you will be destroyed along with family ॥1॥
* Related Center

Be careful. There is no water donor.
Nripa suni curse bikal ati trasa. Bhai Bahori Bur Gira Akasa ॥2॥
Meaning: Within a year, you will perish, there will be no water giver in your family. Hearing the curse, the king became very distraught in fear. Then there was a beautiful air
* Biprahu curse Bachari na Dinha. No offense Bhup Kachu Kinha
Surprised Bipra, everything was well received. Bhup Gayu where eating food ॥3॥
Sense: O Brahmins! You did not curse after thinking. The king did not commit any crime. Hearing Akashvani, all the Brahmins were surprised. Then the king went to where the food was made बना3॥
* Teh na asan nahin bipra suara. Fireau Rau Mana Soch Apara॥
Heard all the events Trisit Pareau Avni Akulai ॥4॥

Sense: There was neither food nor cook Brahmin. Then the king returned with great concern in his mind. He told all the stories to the Brahmins and (very) frightened and distraught, he fell on the earth.
Doha:
* Bhupathi future is not erased, nor is there any corruption.
Do not do otherwise Biprashap घ174 अति
Sense: O Rajan! Although you are not to blame, the promise does not disappear. The curse of Brahmins is very terrible, it cannot be postponed in any way ॥174॥
Bunk:
* As you say, all Mahidev siddha. Receive news men
Thinking about God, Birchhat hans kag ke jee ॥1॥
Meaning: All Brahmins went away by saying this. The townspeople (when) got this news, they started worrying and blaming the creator, who made a crow while making a swan (such a saintly king should have been made a deity, so made a demon) ॥1॥
* Transported to the above building. Asura Taasahi Khabari Janaai
Read the letter wherever it is. Sage Sage Sen Bhup
Connotation: – When the priest was brought to his house, Asura (Kalketu) gave the news to the (insidious) ascetic. The wicked sent letters everywhere, whereby all the (Barry) King’s army rushed and decorated (climbed) ॥2॥
Nissan rang the city of Gherrenhi. Without any reason, Lai Larai
Make me feel better. Pareau Nripa Dharni with brothers ॥3॥
Bhaarthar: – And they surrounded the city by playing danka. Fighting started in many ways every day. All the warriors (of the knights) (of Pratap Bhanu) died battling in the battle. The king also stayed with his brother ॥3॥
* Satyaketu Kul Kow did not share. Biprashrap Kimi Hoi Asancha॥
Ripu Jiti sub nriup Nagar settled. Nij Pur Gawane Jai Jasu Pai ॥4॥
Meaning: No one is left in the family of Satyaketu. How could the curse of Brahmins be false. After conquering the enemy and settling the city (again), all the kings went to their respective cities after winning victory and fame.

3 thoughts on “प्रतापभानु की कथा श्री रामचरितमानस बालकाण्ड”

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