पुष्पवाटिका-निरीक्षण, श्री सीता-रामजी का परस्पर प्रथम दर्शन |

पुष्पवाटिका-निरीक्षण, सीताजी का प्रथम दर्शन, श्री सीता-रामजी का परस्पर दर्शन

दोहा :
* उठे लखनु निसि बिगत सुनि अरुनसिखा धुनि कान।
गुर तें पहिलेहिं जगतपति जागे रामु सुजान॥226॥
भावार्थ:-रात बीतने पर, मुर्गे का शब्द कानों से सुनकर लक्ष्मणजी उठे। जगत के स्वामी सुजान श्री रामचन्द्रजी भी गुरु से पहले ही जाग गए॥226॥
चौपाई :
* सकल सौच करि जाइ नहाए। नित्य निबाहि मुनिहि सिर नाए॥
समय जानि गुर आयसु पाई। लेन प्रसून चले दोउ भाई॥1॥
भावार्थ:-सब शौचक्रिया करके वे जाकर नहाए। फिर (संध्या-अग्निहोत्रादि) नित्यकर्म समाप्त करके उन्होंने मुनि को मस्तक नवाया। (पूजा का) समय जानकर, गुरु की आज्ञा पाकर दोनों भाई फूल लेने चले॥1॥
* भूप बागु बर देखेउ जाई। जहँ बसंत रितु रही लोभाई॥
लागे बिटप मनोहर नाना। बरन बरन बर बेलि बिताना॥2॥
भावार्थ:-उन्होंने जाकर राजा का सुंदर बाग देखा, जहाँ वसंत ऋतु लुभाकर रह गई है। मन को लुभाने वाले अनेक वृक्ष लगे हैं। रंग-बिरंगी उत्तम लताओं के मंडप छाए हुए हैं॥2॥
*नव पल्लव फल सुमन सुहाए। निज संपति सुर रूख लजाए॥
चातक कोकिल कीर चकोरा। कूजत बिहग नटत कल मोरा॥3॥
भावार्थ:-नए, पत्तों, फलों और फूलों से युक्त सुंदर वृक्ष अपनी सम्पत्ति से कल्पवृक्ष को भी लजा रहे हैं। पपीहे, कोयल, तोते, चकोर आदि पक्षी मीठी बोली बोल रहे हैं और मोर सुंदर नृत्य कर रहे हैं॥3॥
* मध्य बाग सरु सोह सुहावा। मनि सोपान बिचित्र बनावा॥
बिमल सलिलु सरसिज बहुरंगा। जलखग कूजत गुंजत भृंगा॥4॥
भावार्थ:-बाग के बीचोंबीच सुहावना सरोवर सुशोभित है, जिसमें मणियों की सीढ़ियाँ विचित्र ढंग से बनी हैं। उसका जल निर्मल है, जिसमें अनेक रंगों के कमल खिले हुए हैं, जल के पक्षी कलरव कर रहे हैं और भ्रमर गुंजार कर रहे हैं॥4॥
दोहा :
* बागु तड़ागु बिलोकि प्रभु हरषे बंधु समेत।
परम रम्य आरामु यहु जो रामहि सुख देत॥227॥
भावार्थ:-बाग और सरोवर को देखकर प्रभु श्री रामचन्द्रजी भाई लक्ष्मण सहित हर्षित हुए। यह बाग (वास्तव में) परम रमणीय है, जो (जगत को सुख देने वाले) श्री रामचन्द्रजी को सुख दे रहा है॥227॥
चौपाई :
*चहुँ दिसि चितइ पूँछि मालीगन। लगे लेन दल फूल मुदित मन॥
तेहि अवसर सीता तहँ आई। गिरिजा पूजन जननि पठाई॥1॥
भावार्थ:-चारों ओर दृष्टि डालकर और मालियों से पूछकर वे प्रसन्न मन से पत्र-पुष्प लेने लगे। उसी समय सीताजी वहाँ आईं। माता ने उन्हें गिरिजाजी (पार्वती) की पूजा करने के लिए भेजा था॥1॥
* संग सखीं सब सुभग सयानीं। गावहिं गीत मनोहर बानीं॥
सर समीप गिरिजा गृह सोहा। बरनि न जाइ देखि मनु मोहा॥2॥
भावार्थ:-साथ में सब सुंदरी और सयानी सखियाँ हैं, जो मनोहर वाणी से गीत गा रही हैं। सरोवर के पास गिरिजाजी का मंदिर सुशोभित है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता, देखकर मन मोहित हो जाता है॥।2॥
* मज्जनु करि सर सखिन्ह समेता। गई मुदित मन गौरि निकेता॥
पूजा कीन्हि अधिक अनुरागा। निज अनुरूप सुभग बरु मागा॥3॥
भावार्थ:-सखियों सहित सरोवर में स्नान करके सीताजी प्रसन्न मन से गिरिजाजी के मंदिर में गईं। उन्होंने बड़े प्रेम से पूजा की और अपने योग्य सुंदर वर माँगा॥3॥
* एक सखी सिय संगु बिहाई। गई रही देखन फुलवाई॥
तेहिं दोउ बंधु बिलोके जाई। प्रेम बिबस सीता पहिं आई॥4॥
भावार्थ:-एक सखी सीताजी का साथ छोड़कर फुलवाड़ी देखने चली गई थी। उसने जाकर दोनों भाइयों को देखा और प्रेम में विह्वल होकर वह सीताजी के पास आई॥4॥
दोहा :
* तासु दसा देखी सखिन्ह पुलक गात जलु नैन।
कहु कारनु निज हरष कर पूछहिं सब मृदु बैन॥228॥
भावार्थ:-सखियों ने उसकी दशा देखी कि उसका शरीर पुलकित है और नेत्रों में जल भरा है। सब कोमल वाणी से पूछने लगीं कि अपनी प्रसन्नता का कारण बता॥228॥
चौपाई :
* देखन बागु कुअँर दुइ आए। बय किसोर सब भाँति सुहाए॥
स्याम गौर किमि कहौं बखानी। गिरा अनयन नयन बिनु बानी॥1॥
भावार्थ:-(उसने कहा-) दो राजकुमार बाग देखने आए हैं। किशोर अवस्था के हैं और सब प्रकार से सुंदर हैं। वे साँवले और गोरे (रंग के) हैं, उनके सौंदर्य को मैं कैसे बखानकर कहूँ। वाणी बिना नेत्र की है और नेत्रों के वाणी नहीं है॥1॥
* सुनि हरषीं सब सखीं सयानी। सिय हियँ अति उतकंठा जानी॥
एक कहइ नृपसुत तेइ आली। सुने जे मुनि सँग आए काली॥2॥
भावार्थ:-यह सुनकर और सीताजी के हृदय में बड़ी उत्कंठा जानकर सब सयानी सखियाँ प्रसन्न हुईं। तब एक सखी कहने लगी- हे सखी! ये वही राजकुमार हैं, जो सुना है कि कल विश्वामित्र मुनि के साथ आए हैं॥2॥
* जिन्ह निज रूप मोहनी डारी। कीन्हे स्वबस नगर नर नारी॥
बरनत छबि जहँ तहँ सब लोगू। अवसि देखिअहिं देखन जोगू॥3॥
भावार्थ:-और जिन्होंने अपने रूप की मोहिनी डालकर नगर के स्त्री-पुरुषों को अपने वश में कर लिया है। जहाँ-तहाँ सब लोग उन्हीं की छबि का वर्णन कर रहे हैं। अवश्य (चलकर) उन्हें देखना चाहिए, वे देखने ही योग्य हैं॥3॥
* तासु बचन अति सियहि सोहाने। दरस लागि लोचन अकुलाने॥
चली अग्र करि प्रिय सखि सोई। प्रीति पुरातन लखइ न कोई॥4॥
भावार्थ:-उसके वचन सीताजी को अत्यन्त ही प्रिय लगे और दर्शन के लिए उनके नेत्र अकुला उठे। उसी प्यारी सखी को आगे करके सीताजी चलीं। पुरानी प्रीति को कोई लख नहीं पाता॥4॥
दोहा :
* सुमिरि सीय नारद बचन उपजी प्रीति पुनीत।
चकित बिलोकति सकल दिसि जनु सिसु मृगी सभीत॥229॥
भावार्थ:-नारदजी के वचनों का स्मरण करके सीताजी के मन में पवित्र प्रीति उत्पन्न हुई। वे चकित होकर सब ओर इस तरह देख रही हैं, मानो डरी हुई मृगछौनी इधर-उधर देख रही हो॥229॥
चौपाई :
* कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन रामु हृदयँ गुनि॥
मानहुँ मदन दुंदुभी दीन्ही। मनसा बिस्व बिजय कहँ कीन्ही॥1॥
भावार्थ:-कंकण (हाथों के कड़े), करधनी और पायजेब के शब्द सुनकर श्री रामचन्द्रजी हृदय में विचार कर लक्ष्मण से कहते हैं- (यह ध्वनि ऐसी आ रही है) मानो कामदेव ने विश्व को जीतने का संकल्प करके डंके पर चोट मारी है॥1॥
* अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा। सिय मुख ससि भए नयन चकोरा॥
भए बिलोचन चारु अचंचल। मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल॥2॥
भावार्थ:-ऐसा कहकर श्री रामजी ने फिर कर उस ओर देखा। श्री सीताजी के मुख रूपी चन्द्रमा (को निहारने) के लिए उनके नेत्र चकोर बन गए। सुंदर नेत्र स्थिर हो गए (टकटकी लग गई)। मानो निमि (जनकजी के पूर्वज) ने (जिनका सबकी पलकों में निवास माना गया है, लड़की-दामाद के मिलन-प्रसंग को देखना उचित नहीं, इस भाव से) सकुचाकर पलकें छोड़ दीं, (पलकों में रहना छोड़ दिया, जिससे पलकों का गिरना रुक गया)॥2॥
* देखि सीय शोभा सुखु पावा। हृदयँ सराहत बचनु न आवा॥
जनु बिरंचि सब निज निपुनाई। बिरचि बिस्व कहँ प्रगटि देखाई॥3॥
भावार्थ:-सीताजी की शोभा देखकर श्री रामजी ने बड़ा सुख पाया। हृदय में वे उसकी सराहना करते हैं, किन्तु मुख से वचन नहीं निकलते। (वह शोभा ऐसी अनुपम है) मानो ब्रह्मा ने अपनी सारी निपुणता को मूर्तिमान कर संसार को प्रकट करके दिखा दिया हो॥3॥
* सुंदरता कहुँ सुंदर करई। छबिगृहँ दीपसिखा जनु बरई॥
सब उपमा कबि रहे जुठारी। केहिं पटतरौं बिदेहकुमारी॥4॥
भावार्थ:-वह (सीताजी की शोभा) सुंदरता को भी सुंदर करने वाली है। (वह ऐसी मालूम होती है) मानो सुंदरता रूपी घर में दीपक की लौ जल रही हो। (अब तक सुंदरता रूपी भवन में अँधेरा था, वह भवन मानो सीताजी की सुंदरता रूपी दीपशिखा को पाकर जगमगा उठा है, पहले से भी अधिक सुंदर हो गया है)। सारी उपमाओं को तो कवियों ने जूँठा कर रखा है। मैं जनकनन्दिनी श्री सीताजी की किससे उपमा दूँ॥4॥
दोहा :
* सिय शोभा हियँ बरनि प्रभु आपनि दसा बिचारि॥
बोले सुचि मन अनुज सन बचन समय अनुहारि॥230॥
भावार्थ:-(इस प्रकार) हृदय में सीताजी की शोभा का वर्णन करके और अपनी दशा को विचारकर प्रभु श्री रामचन्द्रजी पवित्र मन से अपने छोटे भाई लक्ष्मण से समयानुकूल वचन बोले-॥230॥
चौपाई :
* तात जनकतनया यह सोई। धनुषजग्य जेहि कारन होई॥
पूजन गौरि सखीं लै आईं। करत प्रकासु फिरइ फुलवाईं॥1॥
भावार्थ:-हे तात! यह वही जनकजी की कन्या है, जिसके लिए धनुषयज्ञ हो रहा है। सखियाँ इसे गौरी पूजन के लिए ले आई हैं। यह फुलवाड़ी में प्रकाश करती हुई फिर रही है॥1॥
* जासु बिलोकि अलौकिक सोभा। सहज पुनीत मोर मनु छोभा॥
सो सबु कारन जान बिधाता। फरकहिं सुभद अंग सुनु भ्राता॥2॥
भावार्थ:-जिसकी अलौकिक सुंदरता देखकर स्वभाव से ही पवित्र मेरा मन क्षुब्ध हो गया है। वह सब कारण (अथवा उसका सब कारण) तो विधाता जानें, किन्तु हे भाई! सुनो, मेरे मंगलदायक (दाहिने) अंग फड़क रहे हैं॥2॥
* रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ। मनु कुपंथ पगु धरइ न काऊ॥
मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी। जेहिं सपनेहुँ परनारि न हेरी॥3॥
भावार्थ:-रघुवंशियों का यह सहज (जन्मगत) स्वभाव है कि उनका मन कभी कुमार्ग पर पैर नहीं रखता। मुझे तो अपने मन का अत्यन्त ही विश्वास है कि जिसने (जाग्रत की कौन कहे) स्वप्न में भी पराई स्त्री पर दृष्टि नहीं डाली है॥3॥
* जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन पीठी। नहिं पावहिं परतिय मनु डीठी॥
मंगन लहहिं न जिन्ह कै नाहीं। ते नरबर थोरे जग माहीं॥4॥
भावार्थ:-रण में शत्रु जिनकी पीठ नहीं देख पाते (अर्थात्‌ जो लड़ाई के मैदान से भागते नहीं), पराई स्त्रियाँ जिनके मन और दृष्टि को नहीं खींच पातीं और भिखारी जिनके यहाँ से ‘नाहीं’ नहीं पाते (खाली हाथ नहीं लौटते), ऐसे श्रेष्ठ पुरुष संसार में थोड़े हैं॥4॥
दोहा :
* करत बतकही अनुज सन मन सिय रूप लोभान।
मुख सरोज मकरंद छबि करइ मधुप इव पान॥231॥
भावार्थ:- यों श्री रामजी छोटे भाई से बातें कर रहे हैं, पर मन सीताजी के रूप में लुभाया हुआ उनके मुखरूपी कमल के छबि रूप मकरंद रस को भौंरे की तरह पी रहा है॥231॥
चौपाई :
* चितवति चकित चहूँ दिसि सीता। कहँ गए नृप किसोर मनु चिंता॥
जहँ बिलोक मृग सावक नैनी। जनु तहँ बरिस कमल सित श्रेनी॥1॥
भावार्थ:-सीताजी चकित होकर चारों ओर देख रही हैं। मन इस बात की चिन्ता कर रहा है कि राजकुमार कहाँ चले गए। बाल मृगनयनी (मृग के छौने की सी आँख वाली) सीताजी जहाँ दृष्टि डालती हैं, वहाँ मानो श्वेत कमलों की कतार बरस जाती है॥1॥
* लता ओट तब सखिन्ह लखाए। स्यामल गौर किसोर सुहाए॥
देखि रूप लोचन ललचाने। हरषे जनु निज निधि पहिचाने॥2॥
भावार्थ:-तब सखियों ने लता की ओट में सुंदर श्याम और गौर कुमारों को दिखलाया। उनके रूप को देखकर नेत्र ललचा उठे, वे ऐसे प्रसन्न हुए मानो उन्होंने अपना खजाना पहचान लिया॥2॥
* थके नयन रघुपति छबि देखें। पलकन्हिहूँ परिहरीं निमेषें॥
अधिक सनेहँ देह भै भोरी। सरद ससिहि जनु चितव चकोरी॥3॥
भावार्थ:-श्री रघुनाथजी की छबि देखकर नेत्र थकित (निश्चल) हो गए। पलकों ने भी गिरना छोड़ दिया। अधिक स्नेह के कारण शरीर विह्वल (बेकाबू) हो गया। मानो शरद ऋतु के चन्द्रमा को चकोरी (बेसुध हुई) देख रही हो॥3॥
* लोचन मग रामहि उर आनी। दीन्हे पलक कपाट सयानी॥
जब सिय सखिन्ह प्रेमबस जानी। कहि न सकहिं कछु मन सकुचानी॥4॥
भावार्थ:-नेत्रों के रास्ते श्री रामजी को हृदय में लाकर चतुरशिरोमणि जानकीजी ने पलकों के किवाड़ लगा दिए (अर्थात नेत्र मूँदकर उनका ध्यान करने लगीं)। जब सखियों ने सीताजी को प्रेम के वश जाना, तब वे मन में सकुचा गईं, कुछ कह नहीं सकती थीं॥4॥
दोहा :
* लताभवन तें प्रगट भे तेहि अवसर दोउ भाइ।
तकिसे जनु जुग बिमल बिधु जलद पटल बिलगाई॥232॥
भावार्थ:-उसी समय दोनों भाई लता मंडप (कुंज) में से प्रकट हुए। मानो दो निर्मल चन्द्रमा बादलों के परदे को हटाकर निकले हों॥232॥
चौपाई :
* सोभा सीवँ सुभग दोउ बीरा। नील पीत जलजाभ सरीरा॥
मोरपंख सिर सोहत नीके। गुच्छ बीच बिच कुसुम कली के॥1॥
भावार्थ:-दोनों सुंदर भाई शोभा की सीमा हैं। उनके शरीर की आभा नीले और पीले कमल की सी है। सिर पर सुंदर मोरपंख सुशोभित हैं। उनके बीच-बीच में फूलों की कलियों के गुच्छे लगे हैं॥1॥
* भाल तिलक श्रम बिन्दु सुहाए। श्रवन सुभग भूषन छबि छाए॥
बिकट भृकुटि कच घूघरवारे। नव सरोज लोचन रतनारे॥2॥
भावार्थ:-माथे पर तिलक और पसीने की बूँदें शोभायमान हैं। कानों में सुंदर भूषणों की छबि छाई है। टेढ़ी भौंहें और घुँघराले बाल हैं। नए लाल कमल के समान रतनारे (लाल) नेत्र हैं॥2॥
* चारु चिबुक नासिका कपोला। हास बिलास लेत मनु मोला॥
मुखछबि कहि न जाइ मोहि पाहीं। जो बिलोकि बहु काम लजाहीं॥3॥
भावार्थ:-ठोड़ी नाक और गाल बड़े सुंदर हैं और हँसी की शोभा मन को मोल लिए लेती है। मुख की छबि तो मुझसे कही ही नहीं जाती, जिसे देखकर बहुत से कामदेव लजा जाते हैं॥3॥
* उर मनि माल कंबु कल गीवा। काम कलभ कर भुज बलसींवा॥
सुमन समेत बाम कर दोना। सावँर कुअँर सखी सुठि लोना॥4॥
भावार्थ:-वक्षःस्थल पर मणियों की माला है। शंख के सदृश सुंदर गला है। कामदेव के हाथी के बच्चे की सूँड के समान (उतार-चढ़ाव वाली एवं कोमल) भुजाएँ हैं, जो बल की सीमा हैं। जिसके बाएँ हाथ में फूलों सहित दोना है, हे सखि! वह साँवला कुँअर तो बहुत ही सलोना है॥4॥
दोहा :
* केहरि कटि पट पीत धर सुषमा सील निधान।
देखि भानुकुलभूषनहि बिसरा सखिन्ह अपान॥233॥
भावार्थ:-सिंह की सी (पतली, लचीली) कमर वाले, पीताम्बर धारण किए हुए, शोभा और शील के भंडार, सूर्यकुल के भूषण श्री रामचन्द्रजी को देखकर सखियाँ अपने आपको भूल गईं॥233॥
चौपाई :
* धरि धीरजु एक आलि सयानी। सीता सन बोली गहि पानी॥
बहुरि गौरि कर ध्यान करेहू। भूपकिसोर देखि किन लेहू॥1॥
भावार्थ:-एक चतुर सखी धीरज धरकर, हाथ पकड़कर सीताजी से बोली- गिरिजाजी का ध्यान फिर कर लेना, इस समय राजकुमार को क्यों नहीं देख लेतीं॥1॥
* सकुचि सीयँ तब नयन उघारे। सनमुख दोउ रघुसिंघ निहारे॥
नख सिख देखि राम कै सोभा। सुमिरि पिता पनु मनु अति छोभा॥2॥
भावार्थ:-तब सीताजी ने सकुचाकर नेत्र खोले और रघुकुल के दोनों सिंहों को अपने सामने (खड़े) देखा। नख से शिखा तक श्री रामजी की शोभा देखकर और फिर पिता का प्रण याद करके उनका मन बहुत क्षुब्ध हो गया॥2॥
* परबस सखिन्ह लखी जब सीता। भयउ गहरु सब कहहिं सभीता॥
पुनि आउब एहि बेरिआँ काली। अस कहि मन बिहसी एक आली॥3॥
भावार्थ:-जब सखियों ने सीताजी को परवश (प्रेम के वश) देखा, तब सब भयभीत होकर कहने लगीं- बड़ी देर हो गई। (अब चलना चाहिए)। कल इसी समय फिर आएँगी, ऐसा कहकर एक सखी मन में हँसी॥3॥
* गूढ़ गिरा सुनि सिय सकुचानी। भयउ बिलंबु मातु भय मानी॥
धरि बड़ि धीर रामु उर आने। फिरी अपनपउ पितुबस जाने॥4॥
भावार्थ:-सखी की यह रहस्यभरी वाणी सुनकर सीताजी सकुचा गईं। देर हो गई जान उन्हें माता का भय लगा। बहुत धीरज धरकर वे श्री रामचन्द्रजी को हृदय में ले आईं और (उनका ध्यान करती हुई) अपने को पिता के अधीन जानकर लौट चलीं॥4॥

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Pushpavatika-Vigyan, the first philosophy of Sitaji, the mutual philosophy of Shri Sita-Ramji

Doha:
* Arise Lakhanu Nisi Bigat Suni Arunsikha Dhuni Kan.
First of all, Jagatpati Jaage Ramu Sujan ॥226॥
Sense: At the end of the night, hearing the words of the rooster by the ears, Lakshmanji woke up. Swami Sujan Shri Ramchandraji of the world also woke up before the Guru ॥226॥
Bunk:
* Gross bath should be bathed. Nitya nibahi munihi head naye
The time came to know about Ayasu. Len Prasoon went to brother-in-law ॥1॥
Sense: They all took a shower and took a bath. Then (Sandhya-Agnihotri), after finishing the routine, he gave muni a head. Knowing the time of worship, after getting the permission of the Guru, the two brothers went to collect flowers.

* Bhup Bagu Bar Dekhe Jai Where the spring is Ritu, Lobhai
Laughing bit manohar Nana. बर2 बर
Sense: He went and saw the beautiful garden of the king, where the spring season has remained tempting. There are many trees that attract the mind. The pavilions of colorful vines are covered ॥2॥
* New Pallava Fruit Suman Suhaye. Get rid of your personal property
Chatak kokil kir chakora. Kujat Bihag Natat Kal Mora ॥3॥
Meaning: – New, beautiful trees with leaves, fruits and flowers are also bringing Kalpavriksha to their wealth. Papihe, cuckoo, parrot, chakor etc. Birds are speaking sweet dialect and peacocks are dancing beautifully ॥3॥

* Madhya Bagh Saru Soh Suhawa. Make Mani Sopan Bichitra
Bimal Salilu Sarsij Multicolor. Jalkhag Kujat Gunjat Bhringa ॥4॥
Meaning: – The beautiful lake in the middle of the garden is beautiful, in which the stairs of the beads are oddly made. Its water is pure, in which the lotus of many colors are blooming, the water birds are tweeting and the bhumar is humming ॥4॥.
Doha:
* Bagu Tadagu with Lord Harshe brothers.
Param Ramya Aramu Jehu who gives Ramhi Sukh ॥227॥
Meaning: Seeing the garden and the lake, Lord Sri Ramachandraji was pleased with brother Lakshman. This garden is (in fact) the ultimate delightful one, which is giving happiness to the (who gives happiness to the world) Shri Ramchandraji ॥227॥

Bunk:
* All this last tail is Maligan. Lage Lane Dal Phool Mudit Man
Sita came down on this occasion. Girija Poojan Janani Pathai ॥1॥
Sense: After looking at the four sides and asking the Malis, they started taking letters and flowers with a happy heart. At the same time Sitaji came there. Mother sent him to worship Girijaji (Parvati) ॥1॥
* All the best friends with friends Gavhin Geet Manohar Bani
Girija Griha Soha near Sir. Barani na ji dekhi manu moha ॥2॥
Bhaartarth: -Sath has all the Sundari and Sayani Sakhi, who are singing songs from Manohar Vani. The temple of Girijaji near Sarovar is adorned, which cannot be described, seeing the mind is fascinated.

* Majjnu Kari Sir Sakhinh Sameta. Gaya mudit mana gauri niketa
Pooja ki nahi is more beautiful Personal analogous Subha Baru Maga ॥3॥
Meaning: After taking bath in the lake with the help of Sikhs, Sita ji went to Girijaji’s temple with a happy heart. He worshiped with great love and asked for his beautiful groom. ॥3॥
* A Sakhi Siye Sangu Bihai. Gaya rahe dekhan phulwai
Tehin Dow brothers went to Biloke. Prem Bibus Sita Pahi I4 4
Meaning: A friend left Sita and went to see Phulwadi. She went and saw the two brothers and feigned love, she came to Sitaji.

Doha:
* Tasu dasa dekhi sakhinh pulak gat jalu nain.
Kahu Karanu, do not ask for everything, all soft-hearted ॥228॥
Meaning: Sikhs saw his condition that his body is pulsed and water is filled in his eyes. Everyone started asking Komal Vani to give a reason for his happiness ॥228॥

Bunk:
* Seeing Bagu Kuan Dui came. Bee Kisor all well
Siam Gaur Kimi Kahaun Bakhani Gir Anayan Nayan Binu Bani ॥1॥
Bhaartarth 🙁 He said-) Two princes have come to see the garden. Teenagers are of all ages and are beautiful in every way. They are dark and white, how can I tell their beauty. Voice is without eye and voice is not voice ॥1॥

* Suni Harshi Sabhi Sakhi Sayani. I am very anxious
A Kahi Nripsut Tei Aali. Listen to Muni Song Aay Kali ॥2॥
Meaning: Hearing this and knowing the great yearning in the heart of Sitaji, all Sayani stories were pleased. Then a friend said – O friend! He is the same prince who has heard that Vishwamitra has come with sage yesterday ॥2॥

* Who dared Mohni Roop Mohini Keenhe Swabas Nagar Male Female
In the morning, everyone is there Avasi Dekhiya Dekhin Jogu ॥3॥
Meaning: – And who has put the siren of his form and subdue the men and women of the city. Everywhere, everybody is describing his image. They must (must) see them, they are worth seeing ॥3॥

* Tasu Bachaan Ati Sihi Sohne. Daras lagi lochan akulane॥
Dear Sakhi slept while walking. Preeti Puratik Lakhai Koi ॥4॥
Meaning: His words were very dear to Sita and his eyes arose to see her. Sitaji went ahead with the same beloved friend. No one can write the old love ॥4॥
Doha:
* Sumiri Siya Narada Bachan Stems Preeti Punit.
Astonished Bilokati Gross Dis Janus Sisu Deer Allot ॥229॥
Sense: After recollecting the words of Naradji, a holy love arose in the mind of Sitaji. She is surprised and looking everywhere like this, as if the scared deer are looking here and there ॥229॥

Bunk:
* Kankan Kinkini Nupur Dhuni Suni. Kahat Lakhan San Ramu Hridayam Guni 4
Manhun Madan Dundubhi Dinhi Where is Mansa Biswa Bijay ॥1॥
Meaning: – Hearing the words of Kankan (stiff hands), girdle and pajeb, Shri Ramchandraji, thinking in the heart, says to Lakshman- (This sound is coming) as if Cupid has decided to win the world and has hit the sting. 1॥

* As kahi firi chitae tehi ora. Say Mukhi Sasi Bhai Nayan Chakora
Brother Bilochan Charu Achanchal. Manhun sakuchi nimi tije diganchal ॥2॥
Meaning: Hearing thisShri Ramji looked at it again. His eyes became square to the moon (beholding) the face of Shri Sitaji. Beautiful eyes fixed (stare). As if Nimi (ancestor of Janakji) (who is believed to be inhabited by all the eyelids, it is not appropriate to see the meeting of the girl-son-in-law, in this sense), left the eyelids, (left the eyelids, causing the eyelids to fall. Stopped) ॥2॥

* See Sibi Shobha Sukhu Pawa. Heart appreciates Bachnu
Janu Birnchi sub personal settlement. Where did you see the progress ॥3॥
Meaning: Seeing the beauty of Sitaji, Shri Ramji found great happiness. In the heart, they appreciate it, but the word does not come out of their mouth. (That grace is such a unique one) as if Brahma idolized all his dexterity and showed it to the world by showing ॥3॥.

* Beautiful beauty, beautiful. Chhabhigrahon Deepsikha Janu Barai॥
Juthari is all equal Kehindan Pattaroun Bidhekumari ॥4॥
Spiritualism: – She (Sita’s beauty) is also beautiful beauty. (She looks like this) as if the flame of a lamp is burning in a house of beauty. (Till now the building of beauty was dark, that building as if lit up by getting Deepshikha as the beauty of Sitaji, has become more beautiful than before). Poets have kept all similes up. Whom should I liken to Janakanandini Shri Sitaji ॥4॥

Doha:
* Siya Shobha Hiyan Barani Prabhu Apni Dasa Bichari
Said Suchi Man Anuj Sun Bacha Time Anuhari ॥230॥
Spirituality: – (Thus) by describing the beauty of Sitaji in the heart and considering his condition, Lord Shri Ramchandraji, with a pure heart, spoke timely words to his younger brother Lakshman. – 2302

Bunk:
* Tat Janakatanaya slept this. Dhanushjagya Jehi Karan Hoi॥
Poojan Gouri came to Sakhi. Karat Prakasu Phirai Phulavai ॥1॥
Meaning: O Tat! This is the daughter of Janakji, for whom Dhanushyagya is being done. Sakhis have brought it for Gauri worship. It has been illuminating in Phulwadi again ॥1॥
* Jasu Biloki Supernatural Sobha. Sahaj Punit Mor Manu Chobha॥
So Sabu Karan lives. Farqahin Subhad Ang Sunu Bhrata ॥2॥
Meaning: Seeing its supernatural beauty, my mind has become enraged by nature itself. Know all that reason (or all its reasons), but brother! Listen, my auspicious (right) parts are tearing ॥2॥

* Spontaneous sublime by doing Raghubansinh. Manu kupant pagu dhari na kau॥
Mohie very realization of mind Jhin Sapnehun Parnarien Harry ॥3॥
Meaning: It is the innate (inborn) nature of the Raghuvanshis that their mind never sets foot on the way. I have great faith in my mind that who (who says waking) has not even seen a foreign woman in a dream ॥3॥.

* The one who won the repu run. Nahin pavahin parathiya manu dithi
Mangan Lahin, who is not Te Narbar Thore Jag Maa ॥4॥
Sense: In the enemy, enemies whose backs cannot be seen (ie those who do not run away from the battlefield), foreign women whose mind and vision are not able to pull, and beggars who do not get ‘no’ from here (do not return empty handed), such Great men are few in the world ॥4॥

Doha:
* Karat batakhi anuj sun man siy roop gobhan.
Mook Saroj Makarand Chhabri Madhup Iv Paan ॥231॥
Bhaartarth: – This is how Shri Ramji is talking to his younger brother, but the mind is tempted as Sitaji is drinking Makranda Ras, the image of lotus in the form of his face, like a bumblebee ॥231॥
Bunk:
* Chitwati amazed Chhoo Dis Sita. Where did Nripe Kisor Manu worry?
Where Bilok deer Savak Naini. Janu Tahn Baris Kamal Sit Shreni ॥1॥
Meaning: – Sitaji is looking around with surprise. The mind is worried about where the prince went. Bal Mriganayani (with the eye of an antelope), where the sight of Sitaji, as if there is a line of white lotus, ॥1॥

* Lata Oat then brought Sakhinh. Syamal Gaur Kisor Suhaye 4
Look at the temptation Harshe Janu Nija Nidhi identified ॥2॥
Meaning: Then the Sakhis showed the beautiful Shyam and Gaur Kumar in Lata Ki Oat. Seeing his form, the eyes were tempted, he was pleased as if he recognized his treasure ॥2॥

* See tired Nayan Raghupati Chhabi. Palankhihu Parhiram Nimesh
More beautiful body, brother. Sarad Sasihi Janu Chitav Chakori ॥3॥
Sense: At the sight of Shri Raghunathji, the eyes became tired. The eyelids also stopped falling. The body became feverish due to excess affection. As if you are seeing Chakori (unconscious) of the moon of autumn ॥3॥

* Lochan Mag Ramhi ur Aani. Dinhe Palak Kapat Sayani॥
When Siy Sakhinh Prembas Jani Kahin nahin kachhu mana sakuchani ॥4॥
Connotation: Chatur Shiromani Jankiji brought the eyelashes in the heart through the eyes (ie, eyes closed and meditated on her). When Sakhis knew Sitaji under love, then she was hesitant in her mind, could not say anything.

Doha:
* Latabhwan revealed his opportunity as he did.
How Janu Jug Bimal Bidhu Jalad Pattal Bilgai ॥232॥
Meaning: At the same time both brothers appeared from the lata mandapa (bower). As if two clear moons have come out after removing the curtain of clouds 232॥

Bunk:
* Sobha Sivan Subhag Doo Bira. Indigo yellow water
The head of the head is soaked. Bunch Beach Beach Kusum Kali ॥1॥
Expressions: – Both beautiful brothers are the limit of Shobha. The aura of his body is like blue and yellow lotus. Beautiful peacock embellish on the head. Between them are clusters of flower buds ॥1॥

* Bhal Tilak labor point should be pleasant. Shravan Subhash Bhushan Chhabhi Chhaye
Biket Bhrkuti Kach Ghooghawar. Nav Saroj Lochan Ratanare ॥2॥
Meaning: Tilak and drops of sweat on the forehead are beautiful. There is a picture of beautiful Bhushan in the ears. Has crooked eyebrows and curly hair. Ratnaare (red) eyes are like the new red lotus ॥2॥

* Charu Chibuk Nasika Kapola. Haas Bilas Let Manu MoLa॥
Mukhchhabi is not known as Mohi Which is not so much work ॥3॥
Meaning: The little nose and cheeks are very beautiful and the beauty of laughter buys the mind. The image of the mouth cannot be said to me, seeing that many cupids are ashamed ॥3॥

* Ur Mani Maal Kambu Kal Geva. Bhuj Balsinwa doing work
Do balm with Suman. Sawar Koonar Sakhi Sauthi Lona ॥4॥
Meaning: There is a rosary of beads on the spot. There is a beautiful throat like a conch. Kamdev has elephant-like trunk (fluctuating and soft) arms, which are the limits of force. Who has two with flowers in his left hand, O sister! That little virgin is very Salona ॥4॥

Doha:
* Kehri Kati Pat Peet Dhar Sushma Seal Fund.
See Bhanukulbhushanhi Bisra Sakhinh Apan ॥233॥
Spirituality: -Singh’s c (thin, flexible) waist, holding Pitambar, stores of beauty and modesty, seeing Bhushan Sri Ramachandra of Suryakul, the sorrows forgot themselves ॥233॥
Bunk:
* Dhari Dhiraju an Aliyyani. Sita Sun said a lot of water
Very carefully meditate. Bhupakissor Dekhi Kin Lehu ॥1॥
Sense: A clever friend, patient and holding hands, said to Sita: Take care of Girijaji again, why don’t you see the prince this time ॥1॥

* Sakuchi Siyan then Nayan rises. Sanmukh do Raghu Singh Nihare॥
Nakh Sikh see Ram Kai Sobha. Sumiri father panu manu ati chobha ॥2॥
Sense: Then Sitaji opened his eyes and saw the two lions of Raghukul in front of him. Seeing the glory of Shri Ramji from Nakh to Shikha and then remembering his father’s pledge, his mind became very angry ॥2॥
* Parbas Sakhinh Lakhi when Sita. Bhayau gharu sab kahin sabhita
Puni aub ehi beriya kali As Kahi Man Bihasi Ek Aali ॥3॥
Meaning: – When the Sakhis saw Sita ji the paravash (under the control of love), then everyone started to say in fear – it was too late. (Must go on now). Laughter will come again at the same time tomorrow, saying that laughter 3॥

* Sneaky Siyi Sakuchani fell dumb. Bhauu Bilambu Matu obeyed
Dhari Badi Dheer Ramu ur Aane. Phiri apanapu pitubas jane ॥4॥
Meaning: Hearing this mysterious voice of Sakhi, Sitaji was hesitant. He felt afraid of his mother late. Enduring a lot, she brought Sri Ramachandraji to her heart and (meditating on her) returned to find herself subordinate to her father.

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