(king) राजा दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ, रानियों का गर्भवती होना

(king) राजा दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ, रानियों का गर्भवती होना

* गिरि कानन जहँ तहँ भरि पूरी। रहे निज निज अनीक रचि रूरी॥
यह सब रुचिर चरित मैं भाषा। अब सो सुनहु जो बीचहिं राखा॥3॥
भावार्थ:-वे (वानर) पर्वतों और जंगलों में जहाँ-तहाँ अपनी-अपनी सुंदर सेना बनाकर भरपूर छा गए। यह सब सुंदर चरित्र मैंने कहा। अब वह चरित्र सुनो जिसे बीच ही में छोड़ दिया था॥3॥
* अवधपुरीं रघुकुलमनि राऊ। बेद बिदित तेहि दसरथ नाऊँ॥
धरम धुरंधर गुननिधि ग्यानी। हृदयँ भगति भति सारँगपानी॥4॥
भावार्थ:-अवधपुरी में रघुकुल शिरोमणि दशरथ नाम के राजा हुए, जिनका नाम वेदों में विख्यात है। वे धर्मधुरंधर, गुणों के भंडार और ज्ञानी थे। उनके हृदय में शांर्गधनुष धारण करने वाले भगवान की भक्ति थी और उनकी बुद्धि भी उन्हीं में लगी रहती थी॥4॥
दोहा :
* कौसल्यादि नारि प्रिय सब आचरन पुनीत।
पति अनुकूल प्रेम दृढ़ हरि पद कमल बिनीत॥188॥
भावार्थ:-उनकी कौसल्या आदि प्रिय रानियाँ सभी पवित्र आचरण वाली थीं। वे (बड़ी) विनीत और पति के अनुकूल (चलने वाली) थीं और श्री हरि के चरणकमलों में उनका दृढ़ प्रेम था॥188॥

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 चौपाई :
* एक बार भूपति मन माहीं। भै गलानि मोरें सुत नाहीं॥
गुर गृह गयउ तुरत महिपाला। चरन लागि करि बिनय बिसाला॥1॥
भावार्थ:-एक बार राजा के मन में बड़ी ग्लानि हुई कि मेरे पुत्र नहीं है। राजा तुरंत ही गुरु के घर गए और चरणों में प्रणाम कर बहुत विनय की॥1॥
* निज दुख सुख सब गुरहि सुनायउ। कहि बसिष्ठ बहुबिधि समुझायउ॥
धरहु धीर होइहहिं सुत चारी। त्रिभुवन बिदित भगत भय हारी॥2॥
भावार्थ:-राजा ने अपना सारा सुख-दुःख गुरु को सुनाया। गुरु वशिष्ठजी ने उन्हें बहुत प्रकार से समझाया (और कहा-) धीरज धरो, तुम्हारे चार पुत्र होंगे, जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध और भक्तों के भय को हरने वाले होंगे॥2॥
* सृंगी रिषिहि बसिष्ठ बोलावा। पुत्रकाम सुभ जग्य करावा॥
भगति सहित मुनि आहुति दीन्हें। प्रगटे अगिनि चरू कर लीन्हें॥3॥
भावार्थ:-वशिष्ठजी ने श्रृंगी ऋषि को बुलवाया और उनसे शुभ पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराया। मुनि के भक्ति सहित आहुतियाँ देने पर अग्निदेव हाथ में चरु (हविष्यान्न खीर) लिए प्रकट हुए॥3॥
दोहा :
*जो बसिष्ठ कछु हृदयँ बिचारा। सकल काजु भा सिद्ध तुम्हारा॥
यह हबि बाँटि देहु नृप जाई। जथा जोग जेहि भाग बनाई॥4॥
भावार्थ:-(और (king) राजा दशरथ से बोले-) वशिष्ठ ने हृदय में जो कुछ विचारा था, तुम्हारा वह सब काम सिद्ध हो गया। हे राजन्‌! (अब) तुम जाकर इस हविष्यान्न (पायस) को, जिसको जैसा उचित हो, वैसा भाग बनाकर बाँट दो॥4॥

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दोहा :
* तब अदृस्य भए पावक सकल सभहि समुझाइ।
परमानंद मगन नृप हरष न हृदयँ समाइ॥189॥
भावार्थ:-तदनन्तर अग्निदेव सारी सभा को समझाकर अन्तर्धान हो गए। (king) राजा परमानंद में मग्न हो गए, उनके हृदय में हर्ष समाता न था॥189॥
चौपाई :
* तबहिं रायँ प्रिय नारि बोलाईं। कौसल्यादि तहाँ चलि आईं॥
अर्ध भाग कौसल्यहि दीन्हा। उभय भाग आधे कर कीन्हा॥1॥
भावार्थ:-उसी समय (king) राजा ने अपनी प्यारी पत्नियों को बुलाया। कौसल्या आदि सब (रानियाँ) वहाँ चली आईं। राजा ने (पायस का) आधा भाग कौसल्या को दिया, (और शेष) आधे के दो भाग किए॥1॥
* कैकेई कहँ नृप सो दयऊ। रह्यो सो उभय भाग पुनि भयऊ॥
कौसल्या कैकेई हाथ धरि। दीन्ह सुमित्रहि मन प्रसन्न करि॥2॥
भावार्थ:-वह (उनमें से एक भाग) (king) राजा ने कैकेयी को दिया। शेष जो बच रहा उसके फिर दो भाग हुए और (king) राजा ने उनको कौसल्या और कैकेयी के हाथ पर रखकर (अर्थात्‌ उनकी अनुमति लेकर) और इस प्रकार उनका मन प्रसन्न करके सुमित्रा को दिया॥2॥
* एहि बिधि गर्भसहित सब नारी। भईं हृदयँ हरषित सुख भारी॥
जा दिन तें हरि गर्भहिं आए। सकल लोक सुख संपति छाए॥3॥
भावार्थ:-इस प्रकार सब स्त्रियाँ गर्भवती हुईं। वे हृदय में बहुत हर्षित हुईं। उन्हें बड़ा सुख मिला। जिस दिन से श्री हरि (लीला से ही) गर्भ में आए, सब लोकों में सुख और सम्पत्ति छा गई॥3॥
* मंदिर महँ सब राजहिं रानीं। सोभा सील तेज की खानीं॥
सुख जुत कछुक काल चलि गयऊ। जेहिं प्रभु प्रगट सो अवसर भयऊ॥4॥
भावार्थ:-शोभा, शील और तेज की खान (बनी हुई) सब रानियाँ महल में सुशोभित हुईं। इस प्रकार कुछ समय सुखपूर्वक बीता और वह अवसर आ गया, जिसमें प्रभु को प्रकट होना था॥4॥

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King Dasharatha’s son’s funeral sacrifice, queens getting pregnant

* Giri Kanan where the entire Bhari Puri Here is my personal friend
All this language of interest. Now so Sunhu jo beechin Rakha ॥3॥
Senseless: – They (monkeys) filled their beautiful army everywhere in the mountains and forests. All this beautiful character I said. Now listen to the character who was left in the middle ॥3॥

* Avadhpuri Raghukulamani Rau. Bed Biddit Tehi Dasrath Naun
Dharam Dhurandhar Gunnidhi Gyani. Hriday Bhagati Bhati Sarangapani ॥4॥
Bhartharth: – Ravukul Shiromani Dasharatha became the king in Avadhpuri, whose name is famous in the Vedas. He was virtuous, repository of virtues, and knowledgeable. His heart was devotional to the God who wore the rainbow and his wisdom was also kept in him.

Doha:
* Kausalyadi Narai dear all Aachan Punit.
Husband friendly love firm Hari Pad Kamal Binit ॥188॥
Meaning: His dear queens etc. were all of pure conduct. She was (elder) Vineet and husband-friendly (walking) and she had a strong love for Shri Hari’s feet.

Bunk:
* Bhupati once again Bhai Galani Morane Sut Nahi
Gur Griha Gayu Quick Mahipala. Apply Charan Binay Bisala ॥1॥
Sense: Once upon a time there was great guilt in the mind of the king that I do not have a son. The king immediately went to the Guru’s house and bowed at the feet and pleaded very much.

* All grief pleases everyone Where is Basistha Bahubhidhi Samuzhayu
Dharu Dheer Hoihin Sut Chari. Tribhuvan Bidit Bhagat lost fear ॥2॥

Meaning: – Raja narrated all his happiness and grief to the Guru. Guru Vashisthaji explained to him in many ways (and said-) Be patient, you will have four sons, who will be famous in the three worlds and will defeat the fear of devotees. ॥2॥
* Srngi Rishihi Basistha Bolava. Putrakam Subha Jagya Karava
Muni Ahuti Dinh including Bhagi. Reveal the fire without fire ॥3॥

Meaning: – Vashishtha summoned Shringi Rishi and performed auspicious son Kameshti Yagya. Agni Dev appeared with Charu (Havishyan Kheer) in his hand on offering sacrifices with devotion to the sage ॥3॥
Doha:
* The person who has been tortured. Gross cashew nut is yours
This hubby distributed dehu tree. Jatha Jog Jhee Bhaag was made ॥4॥

Bhaartarth 🙁 And Dasharatha said-) Vashistha had all the thoughts in his heart, all your work was proved. Hey Rajan! (Now) you go and divide this poison (emulsion), as appropriate, by dividing it into ॥4॥.
Doha:
* Then the patriarchs collect the whole group.
Ecstasy mergan nripa harsh na hriday samai ॥189॥

Connotation: -Dadantar Agnidev, after explaining the whole assembly, was imprisoned. The king was engrossed in ecstasy, there was no joy in his heart.

Bunk:
* Then, I spoke dear dear friend. Kausalyadi came here
Half part Kausalhi Dinh. Half part of the common area ॥1॥

Meaning: – At that time the king called his beloved wives. Kausalya etc. everyone (queens) came there. The king gave half of the (emulsion) to Kausalya, and divided the remaining half into two किए1॥.
* Kaikei kahan nripa so duu Ryo so the common part is again fearful
Kausalya Kaikeyi Hathi Dhari. Dinh Sumitrahi please the mind ॥2॥

Bhartharth: – He (one part of them) was given by the king to Kaikeyi. The remaining who survived remained in two parts, and the king placed them on the hand of Kausalya and Kaikeyi (ie, taking his permission) and thus pleased his mind and gave it to Sumitra.
* All women, including pregnant women Brotherly heart, happiness is heavy
Every day, Hari came in the womb. Gross public happiness assets ॥3॥

Meaning: Thus all women became pregnant. She was very happy in her heart. He got great happiness. From the day Shri Hari came (from Leela) in the womb, happiness and wealth took hold in all the realms ॥3॥
* Temples are all Rajah Rani. Sobha Seal Tej ki Khani
Sukh jut kachuk kaal chali gaye Jhin Prabhu revealed so fearful opportunity ॥4॥
Meaning: – All queens of Shobha, Sheel and Tej Khan (remained) adorned the palace. Thus some time was spent happily and the occasion came in which the Lord was to appear.

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