Sunday, April 14, 2024
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रावणादि का जन्म, तपस्या और उनका ऐश्वर्य तथा अत्याचार

रावणादि का जन्म, तपस्या और उनका ऐश्वर्य तथा अत्याचार

दोहा :
* भरद्वाज सुनु जाहि जब होई बिधाता बाम।
धूरि मेरुसम जनक जम ताहि ब्यालसम दाम॥175॥
भावार्थ:-(याज्ञवल्क्यजी कहते हैं-) हे भरद्वाज! सुनो, विधाता जब जिसके विपरीत होते हैं, तब उसके लिए धूल सुमेरु पर्वत के समान (भारी और कुचल डालने वाली), पिता यम के समान (कालरूप) और रस्सी साँप के समान (काट खाने वाली) हो जाती है॥175॥
चौपाई:
* काल पाइ मुनि सुनु सोइ राजा। भयउ निसाचर सहित समाजा॥
दस सिर ताहि बीस भुजदंडा। रावन नाम बीर बरिबंडा॥1॥
भावार्थ:-हे मुनि! सुनो, समय पाकर वही राजा परिवार सहित रावण नामक राक्षस हुआ। उसके दस सिर और बीस भुजाएँ थीं और वह बड़ा ही प्रचण्ड शूरवीर था॥1॥
* भूप अनुज अरिमर्दन नामा। भयउ सो कुंभकरन बलधामा॥
सचिव जो रहा धरमरुचि जासू। भयउ बिमात्र बंधु लघु तासू॥2॥
भावार्थ:-अरिमर्दन नामक जो राजा का छोटा भाई था, वह बल का धाम कुम्भकर्ण हुआ। उसका जो मंत्री था, जिसका नाम धर्मरुचि था, वह रावण का सौतेला छोटा भाई हुआ ॥2॥
* नाम बिभीषन जेहि जग जाना। बिष्नुभगत बिग्यान निधाना॥
रहे जे सुत सेवक नृप केरे। भए निसाचर घोर घनेरे॥3॥
भावार्थ:-उसका विभीषण नाम था, जिसे सारा जगत जानता है। वह विष्णुभक्त और ज्ञान-विज्ञान का भंडार था और जो राजा के पुत्र और सेवक थे, वे सभी बड़े भयानक राक्षस हुए॥3॥
* कामरूप खल जिनस अनेका। कुटिल भयंकर बिगत बिबेका॥
कृपा रहित हिंसक सब पापी। बरनि न जाहिं बिस्व परितापी॥4॥
भावार्थ:-वे सब अनेकों जाति के, मनमाना रूप धारण करने वाले, दुष्ट, कुटिल, भयंकर, विवेकरहित, निर्दयी, हिंसक, पापी और संसार भर को दुःख देने वाले हुए, उनका वर्णन नहीं हो सकता॥4॥
दोहा :
* उपजे जदपि पुलस्त्यकुल पावन अमल अनूप।
तदपि महीसुर श्राप बस भए सकल अघरूप॥176॥
भावार्थ:-यद्यपि वे पुलस्त्य ऋषि के पवित्र, निर्मल और अनुपम कुल में उत्पन्न हुए, तथापि ब्राह्मणों के शाप के कारण वे सब पाप रूप हुए॥176॥
 चौपाई :
* कीन्ह बिबिध तप तीनिहुँ भाई। परम उग्र नहिं बरनि सो जाई॥
गयउ निकट तप देखि बिधाता। मागहु बर प्रसन्न मैं ताता॥1॥
भावार्थ:-तीनों भाइयों ने अनेकों प्रकार की बड़ी ही कठिन तपस्या की, जिसका वर्णन नहीं हो सकता। (उनका उग्र) तप देखकर ब्रह्माजी उनके पास गए और बोले- हे तात! मैं प्रसन्न हूँ, वर माँगो॥1॥

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* करि बिनती पद गहि दससीसा। बोलेउ बचन सुनहु जगदीसा॥
हम काहू के मरहिं न मारें। बानर मनुज जाति दुइ बारें॥2॥
भावार्थ:-रावण ने विनय करके और चरण पकड़कर कहा- हे जगदीश्वर! सुनिए, वानर और मनुष्य- इन दो जातियों को छोड़कर हम और किसी के मारे न मरें। (यह वर दीजिए)॥2॥
* एवमस्तु तुम्ह बड़ तप कीन्हा। मैं ब्रह्माँ मिलि तेहि बर दीन्हा॥
पुनि प्रभु कुंभकरन पहिं गयऊ। तेहि बिलोकि मन बिसमय भयऊ॥3॥
भावार्थ:-(शिवजी कहते हैं कि-) मैंने और ब्रह्मा ने मिलकर उसे वर दिया कि ऐसा ही हो, तुमने बड़ा तप किया है। फिर ब्रह्माजी कुंभकर्ण के पास गए। उसे देखकर उनके मन में बड़ा आश्चर्य हुआ॥3॥
* जौं एहिं खल नित करब अहारू। होइहि सब उजारि संसारू॥
सारद प्रेरि तासु मति फेरी। मागेसि नीद मास षट केरी॥4॥
भावार्थ:-जो यह दुष्ट नित्य आहार करेगा, तो सारा संसार ही उजाड़ हो जाएगा। (ऐसा विचारकर) ब्रह्माजी ने सरस्वती को प्रेरणा करके उसकी बुद्धि फेर दी। (जिससे) उसने छह महीने की नींद माँगी॥4॥
दोहा :
* गए बिभीषन पास पुनि कहेउ पुत्र बर मागु।
तेहिं मागेउ भगवंत पद कमल अमल अनुरागु॥177॥
भावार्थ:-फिर ब्रह्माजी विभीषण के पास गए और बोले- हे पुत्र! वर माँगो। उसने भगवान के चरणकमलों में निर्मल (निष्काम और अनन्य) प्रेम माँगा॥177॥
चौपाई :
* तिन्हहि देइ बर ब्रह्म सिधाए। हरषित ते अपने गृह आए॥
मय तनुजा मंदोदरि नामा। परम सुंदरी नारि ललामा॥1॥
भावार्थ:-उनको वर देकर ब्रह्माजी चले गए और वे (तीनों भाई) हर्षित हेकर अपने घर लौट आए। मय दानव की मंदोदरी नाम की कन्या परम सुंदरी और स्त्रियों में शिरोमणि थी॥1॥
* सोइ मयँ दीन्हि रावनहि आनी। होइहि जातुधानपति जानी॥
हरषित भयउ नारि भलि पाई। पुनि दोउ बंधु बिआहेसि जाई॥2॥
भावार्थ:-मय ने उसे लाकर रावण को दिया। उसने जान लिया कि यह राक्षसों का राजा होगा। अच्छी स्त्री पाकर रावण प्रसन्न हुआ और फिर उसने जाकर दोनों भाइयों का विवाह कर दिया॥2॥
* गिरि त्रिकूट एक सिंधु मझारी। बिधि निर्मित दुर्गम अति भारी॥
सोइ मय दानवँ बहुरि सँवारा। कनक रचित मनि भवन अपारा॥3॥
भावार्थ:-समुद्र के बीच में त्रिकूट नामक पर्वत पर ब्रह्मा का बनाया हुआ एक बड़ा भारी किला था। (महान मायावी और निपुण कारीगर) मय दानव ने उसको फिर से सजा दिया। उसमें मणियों से जड़े हुए सोने के अनगिनत महल थे॥3॥
* भोगावति जसि अहिकुल बासा। अमरावति जसि सक्रनिवासा॥
तिन्ह तें अधिक रम्य अति बंका। जग बिख्यात नाम तेहि लंका॥4॥
भावार्थ:-जैसी नागकुल के रहने की (पाताल लोक में) भोगावती पुरी है और इन्द्र के रहने की (स्वर्गलोक में) अमरावती पुरी है, उनसे भी अधिक सुंदर और बाँका वह दुर्ग था। जगत में उसका नाम लंका प्रसिद्ध हुआ॥4॥
दोहा :
* खाईं सिंधु गभीर अति चारिहुँ दिसि फिरि आव।
कनक कोट मनि खचित दृढ़ बरनि न जाइ बनाव॥178 क॥
भावार्थ:-उसे चारों ओर से समुद्र की अत्यन्त गहरी खाई घेरे हुए है। उस (दुर्ग) के मणियों से जड़ा हुआ सोने का मजबूत परकोटा है, जिसकी कारीगरी का वर्णन नहीं किया जा सकता॥178 (क)॥
* हरि प्रेरित जेहिं कलप जोइ जातुधानपति होइ।
सूर प्रतापी अतुलबल दल समेत बस सोइ॥178 ख॥
भावार्थ:-भगवान की प्रेरणा से जिस कल्प में जो राक्षसों का राजा (रावण) होता है, वही शूर, प्रतापी, अतुलित बलवान्‌ अपनी सेना सहित उस पुरी में बसता है॥178 (ख)॥
चौपाई :
* रहे तहाँ निसिचर भट भारे। ते सब सुरन्ह समर संघारे॥
अब तहँ रहहिं सक्र के प्रेरे। रच्छक कोटि जच्छपति केरे॥1॥
भावार्थ:-(पहले) वहाँ बड़े-बड़े योद्धा राक्षस रहते थे। देवताओं ने उन सबको युद्द में मार डाला। अब इंद्र की प्रेरणा से वहाँ कुबेर के एक करोड़ रक्षक (यक्ष लोग) रहते हैं॥1॥
*दसमुख कतहुँ खबरि असि पाई। सेन साजि गढ़ घेरेसि जाई॥
देखि बिकट भट बड़ि कटकाई। जच्छ जीव लै गए पराई॥2॥
भावार्थ:-रावण को कहीं ऐसी खबर मिली, तब उसने सेना सजाकर किले को जा घेरा। उस बड़े विकट योद्धा और उसकी बड़ी सेना को देखकर यक्ष अपने प्राण लेकर भाग गए॥2॥
* फिरि सब नगर दसानन देखा। गयउ सोच सुख भयउ बिसेषा॥
सुंदर सहज अगम अनुमानी। कीन्हि तहाँ रावन रजधानी॥3॥
भावार्थ:-तब रावण ने घूम-फिरकर सारा नगर देखा। उसकी (स्थान संबंधी) चिन्ता मिट गई और उसे बहुत ही सुख हुआ। उस पुरी को स्वाभाविक ही सुंदर और (बाहर वालों के लिए) दुर्गम अनुमान करके रावण ने वहाँ अपनी राजधानी कायम की॥3॥
* जेहि जस जोग बाँटि गृह दीन्हे। सुखी सकल रजनीचर कीन्हें॥
एक बार कुबेर पर धावा। पुष्पक जान जीति लै आवा॥4॥
भावार्थ:-योग्यता के अनुसार घरों को बाँटकर रावण ने सब राक्षसों को सुखी किया। एक बार वह कुबेर पर चढ़ दौड़ा और उससे पुष्पक विमान को जीतकर ले आया॥4॥
दोहा :
* कौतुकहीं कैलास पुनि लीन्हेसि जाइ उठाइ।
मनहुँ तौलि निज बाहुबल चला बहुत सुख पाइ॥179॥
भावार्थ:-फिर उसने जाकर (एक बार) खिलवाड़ ही में कैलास पर्वत को उठा लिया और मानो अपनी भुजाओं का बल तौलकर, बहुत सुख पाकर वह वहाँ से चला आया॥179॥
 चौपाई :
* सुख संपति सुत सेन सहाई। जय प्रताप बल बुद्धि बड़ाई॥
नित नूतन सब बाढ़त जाई। जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई॥1॥
भावार्थ:-सुख, सम्पत्ति, पुत्र, सेना, सहायक, जय, प्रताप, बल, बुद्धि और बड़ाई- ये सब उसके नित्य नए (वैसे ही) बढ़ते जाते थे, जैसे प्रत्येक लाभ पर लोभ बढ़ता है॥1॥
* अतिबल कुंभकरन अस भ्राता। जेहि कहुँ नहिं प्रतिभट जग जाता॥
करइ पान सोवइ षट मासा। जागत होइ तिहूँ पुर त्रासा॥2॥
भावार्थ:-अत्यन्त बलवान्‌ कुम्भकर्ण सा उसका भाई था, जिसके जोड़ का योद्धा जगत में पैदा ही नहीं हुआ। वह मदिरा पीकर छह महीने सोया करता था। उसके जागते ही तीनों लोकों में तहलका मच जाता था॥2॥
* जौं दिन प्रति अहार कर सोई। बिस्व बेगि सब चौपट होई॥
समर धीर नहिं जाइ बखाना। तेहि सम अमित बीर बलवाना॥3॥
भावार्थ:-यदि वह प्रतिदिन भोजन करता, तब तो सम्पूर्ण विश्व शीघ्र ही चौपट (खाली) हो जाता। रणधीर ऐसा था कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। (लंका में) उसके ऐसे असंख्य बलवान वीर थे॥3॥
* बारिदनाद जेठ सुत तासू। भट महुँ प्रथम लीक जग जासू॥
जेहि न होइ रन सनमुख कोई। सुरपुर नितहिं परावन होई॥4॥
भावार्थ:- मेघनाद रावण का बड़ा लड़का था, जिसका जगत के योद्धाओं में पहला नंबर था। रण में कोई भी उसका सामना नहीं कर सकता था। स्वर्ग में तो (उसके भय से) नित्य भगदड़ मची रहती थी॥4॥
दोहा :
* कुमुख अकंपन कुलिसरद धूमकेतु अतिकाय।
एक एक जग जीति सक ऐसे सुभट निकाय॥180॥
भावार्थ:-(इनके अतिरिक्त) दुर्मुख, अकम्पन, वज्रदन्त, धूमकेतु और अतिकाय आदि ऐसे अनेक योद्धा थे, जो अकेले ही सारे जगत को जीत सकते थे॥180॥
चौपाई :
* कामरूप जानहिं सब माया। सपनेहुँ जिन्ह कें धरम न दाया॥
दसमुख बैठ सभाँ एक बारा। देखि अमित आपन परिवारा॥1॥
भावार्थ:-सभी राक्षस मनमाना रूप बना सकते थे और (आसुरी) माया जानते थे। उनके दया-धर्म स्वप्न में भी नहीं था। एक बार सभा में बैठे हुए रावण ने अपने अगणित परिवार को देखा-॥1॥
* सुत समूह जन परिजन नाती। गनै को पार निसाचर जाती॥
सेन बिलोकि सहज अभिमानी। बोला बचन क्रोध मद सानी॥2॥
भावार्थ:-पुत्र-पौत्र, कुटुम्बी और सेवक ढेर-के-ढेर थे। (सारी) राक्षसों की जातियों को तो गिन ही कौन सकता था! अपनी सेना को देखकर स्वभाव से ही अभिमानी रावण क्रोध और गर्व में सनी हुई वाणी बोला-॥2॥
* सुनहु सकल रजनीचर जूथा। हमरे बैरी बिबुध बरूथा॥
ते सनमुख नहिं करहिं लराई। देखि सबल रिपु जाहिं पराई॥3॥
भावार्थ:-हे समस्त राक्षसों के दलों! सुनो, देवतागण हमारे शत्रु हैं। वे सामने आकर युद्ध नहीं करते। बलवान शत्रु को देखकर भाग जाते हैं॥3॥
* तेन्ह कर मरन एक बिधि होई। कहउँ बुझाइ सुनहु अब सोई॥
द्विजभोजन मख होम सराधा। सब कै जाइ करहु तुम्ह बाधा॥4॥
भावार्थ:-उनका मरण एक ही उपाय से हो सकता है, मैं समझाकर कहता हूँ। अब उसे सुनो। (उनके बल को बढ़ाने वाले) ब्राह्मण भोजन, यज्ञ, हवन और श्राद्ध- इन सबमें जाकर तुम बाधा डालो॥4॥
दोहा :
* छुधा छीन बलहीन सुर सहजेहिं मिलिहहिं आइ।
तब मारिहउँ कि छाड़िहउँ भली भाँति अपनाइ॥181॥
भावार्थ:-भूख से दुर्बल और बलहीन होकर देवता सहज ही में आ मिलेंगे। तब उनको मैं मार डालूँगा अथवा भलीभाँति अपने अधीन करके (सर्वथा पराधीन करके) छोड़ दूँगा॥181॥
चौपाई :
* मेघनाद कहूँ पुनि हँकरावा। दीन्हीं सिख बलु बयरु बढ़ावा॥
जे सुर समर धीर बलवाना। जिन्ह कें लरिबे कर अभिमाना॥1॥
भावार्थ:-फिर उसने मेघनाद को बुलवाया और सिखा-पढ़ाकर उसके बल और देवताओं के प्रति बैरभाव को उत्तेजना दी। (फिर कहा-) हे पुत्र ! जो देवता रण में धीर और बलवान्‌ हैं और जिन्हें लड़ने का अभिमान है॥1॥
* तिन्हहि जीति रन आनेसु बाँधी। उठि सुत पितु अनुसासन काँघी॥
एहि बिधि सबही अग्या दीन्हीं। आपुनु चलेउ गदा कर लीन्ही॥2॥
भावार्थ:-उन्हें युद्ध में जीतकर बाँध लाना। बेटे ने उठकर पिता की आज्ञा को शिरोधार्य किया। इसी तरह उसने सबको आज्ञा दी और आप भी हाथ में गदा लेकर चल दिया॥2॥
* चलत दसानन डोलति अवनी। गर्जत गर्भ स्रवहिं सुर रवनी॥
रावन आवत सुनेउ सकोहा। देवन्ह तके मेरु गिरि खोहा॥3॥
भावार्थ:-रावण के चलने से पृथ्वी डगमगाने लगी और उसकी गर्जना से देवरमणियों के गर्भ गिरने लगे। रावण को क्रोध सहित आते हुए सुनकर देवताओं ने सुमेरु पर्वत की गुफाएँ तकीं (भागकर सुमेरु की गुफाओं का आश्रय लिया)॥3॥
* दिगपालन्ह के लोक सुहाए। सूने सकल दसानन पाए॥
पुनि पुनि सिंघनाद करि भारी। देइ देवतन्ह गारि पचारी॥4॥
भावार्थ:-दिक्पालों के सारे सुंदर लोकों को रावण ने सूना पाया। वह बार-बार भारी सिंहगर्जना करके देवताओं को ललकार-ललकारकर गालियाँ देता था॥4॥
* रन मद मत्त फिरइ गज धावा। प्रतिभट खोजत कतहुँ न पावा॥
रबि ससि पवन बरुन धनधारी। अगिनि काल जम सब अधिकारी॥5॥
भावार्थ:-रण के मद में मतवाला होकर वह अपनी जोड़ी का योद्धा खोजता हुआ जगत भर में दौड़ता फिरा, परन्तु उसे ऐसा योद्धा कहीं नहीं मिला। सूर्य, चन्द्रमा, वायु, वरुण, कुबेर, अग्नि, काल और यम आदि सब अधिकारी,॥5॥
* किंनर सिद्ध मनुज सुर नागा। हठि सबही के पंथहिं लागा॥
ब्रह्मसृष्टि जहँ लगि तनुधारी। दसमुख बसबर्ती नर नारी॥6॥
भावार्थ:-किन्नर, सिद्ध, मनुष्य, देवता और नाग- सभी के पीछे वह हठपूर्वक पड़ गया (किसी को भी उसने शांतिपूर्वक नहीं बैठने दिया)। ब्रह्माजी की सृष्टि में जहाँ तक शरीरधारी स्त्री-पुरुष थे, सभी रावण के अधीन हो गए॥6॥
* आयसु करहिं सकल भयभीता। नवहिं आइ नित चरन बिनीता॥7॥
भावार्थ:-डर के मारे सभी उसकी आज्ञा का पालन करते थे और नित्य आकर नम्रतापूर्वक उसके चरणों में सिर नवाते थे॥7॥
दोहा :
* भुजबल बिस्व बस्य करि राखेसि कोउ न सुतंत्र।
मंडलीक मनि रावन राज करइ निज मंत्र॥182 क॥
भावार्थ:-उसने भुजाओं के बल से सारे विश्व को वश में कर लिया, किसी को स्वतंत्र नहीं रहने दिया। (इस प्रकार) मंडलीक राजाओं का शिरोमणि (सार्वभौम सम्राट) रावण अपनी इच्छानुसार राज्य करने लगा॥182 (क)॥
* देव जच्छ गंधर्ब नर किंनर नाग कुमारि।
जीति बरीं निज बाहु बल बहु सुंदर बर नारि॥182 ख॥
भावार्थ:-देवता, यक्ष, गंधर्व, मनुष्य, किन्नर और नागों की कन्याओं तथा बहुत सी अन्य सुंदरी और उत्तम स्त्रियों को उसने अपनी भुजाओं के बल से जीतकर ब्याह लिया॥182 (ख)॥
चौपाई :
* इंद्रजीत सन जो कछु कहेऊ। सो सब जनु पहिलेहिं करि रहेऊ॥
प्रथमहिं जिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा। तिन्ह कर चरित सुनहु जो कीन्हा॥1॥
भावार्थ:-मेघनाद से उसने जो कुछ कहा, उसे उसने (मेघनाद ने) मानो पहले से ही कर रखा था (अर्थात्‌ रावण के कहने भर की देर थी, उसने आज्ञापालन में तनिक भी देर नहीं की।) जिनको (रावण ने मेघनाद से) पहले ही आज्ञा दे रखी थी, उन्होंने जो करतूतें की उन्हें सुनो॥1॥
* देखत भीमरूप सब पापी। निसिचर निकर देव परितापी॥
करहिं उपद्रव असुर निकाया। नाना रूप धरहिं करि माया॥2॥
भावार्थ:-सब राक्षसों के समूह देखने में बड़े भयानक, पापी और देवताओं को दुःख देने वाले थे। वे असुरों के समूह उपद्रव करते थे और माया से अनेकों प्रकार के रूप धरते थे॥2॥
* जेहि बिधि होइ धर्म निर्मूला। सो सब करहिं बेद प्रतिकूला॥
जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं। नगर गाउँ पुर आगि लगावहिं॥3॥
भावार्थ:-जिस प्रकार धर्म की जड़ कटे, वे वही सब वेदविरुद्ध काम करते थे। जिस-जिस स्थान में वे गो और ब्राह्मणों को पाते थे, उसी नगर, गाँव और पुरवे में आग लगा देते थे॥3॥
* सुभ आचरन कतहुँ नहिं होई। देव बिप्र गुरु मान न कोई॥
नहिं हरिभगति जग्य तप ग्याना। सपनेहु सुनिअ न बेद पुराना॥4॥
भावार्थ:-(उनके डर से) कहीं भी शुभ आचरण (ब्राह्मण भोजन, यज्ञ, श्राद्ध आदि) नहीं होते थे। देवता, ब्राह्मण और गुरु को कोई नहीं मानता था। न हरिभक्ति थी, न यज्ञ, तप और ज्ञान था। वेद और पुराण तो स्वप्न में भी सुनने को नहीं मिलते थे॥4॥
छन्द :
* जप जोग बिरागा तप मख भागा श्रवन सुनइ दससीसा।
आपुनु उठि धावइ रहै न पावइ धरि सब घालइ खीसा॥
अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा धर्म सुनिअ नहिं काना।
तेहि बहुबिधि त्रासइ देस निकासइ जो कह बेद पुराना॥
भावार्थ:-जप, योग, वैराग्य, तप तथा यज्ञ में (देवताओं के) भाग पाने की बात रावण कहीं कानों से सुन पाता, तो (उसी समय) स्वयं उठ दौड़ता। कुछ भी रहने नहीं पाता, वह सबको पकड़कर विध्वंस कर डालता था। संसार में ऐसा भ्रष्ट आचरण फैल गया कि धर्म तो कानों में सुनने में नहीं आता था, जो कोई वेद और पुराण कहता, उसको बहुत तरह से त्रास देता और देश से निकाल देता था।
सोरठा :
* बरनि न जाइ अनीति घोर निसाचर जो करहिं।
हिंसा पर अति प्रीति तिन्ह के पापहि कवनि मिति॥183॥
भावार्थ:-राक्षस लोग जो घोर अत्याचार करते थे, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। हिंसा पर ही जिनकी प्रीति है, उनके पापों का क्या ठिकाना॥183॥
   

Birth of Ravanadi, penance and his opulence and tyranny

Doha:
* Bharadwaj sunu jahi jab hoi bidhata balm.
Dhuri Merusam Janak Jam Tahi Byalsam Price ॥175॥
Bhaarthar 🙁 Yajnavalkyaji says-) O Bharadwaj! Listen, when the creator is opposite, then for him the dust becomes like Sumeru mountain (heavy and crushing), like father Yama (calorific) and rope like snake (biting) )175॥.
Bunk:
* Kaal Pai Muni Sunu Soi Raja. Society including Bhairau Nisachar
Ten heads and twenty arms. Raavan Naam Bir Baribanda ॥1॥
Sense: O monk! Listen, with the time, he became a demon named Ravana with the king family. He had ten heads and twenty arms and was a very strong knight ॥1॥
* Bhupa Anuj Arimardan Nama. Bhayu so Kumbhakaran Baldama
The secretary who remained is Dharmaruchi Jasu. Bhayu Bimatra Bandhu Small Tasu ॥2॥
Bhaartarth: – The king’s younger brother named Arimardan, he became Kumbhakarna, the abode of force. His minister, whose name was Dharmruchi, became Ravana’s half-younger brother ॥2॥
* Naam Bibhishan Jehi jag jana jaana. BIG BIGYAN NIDHANA॥
Jee Sutlek Nripe Kere Brother Nisachar is very dense ॥3॥
Meaning: It was named Vibhishan, which the whole world knows. He was Vishnubhakta and store of knowledge and the king’s sons and servants all became great demons.
* Kamarup Khal Jinas Aneka. Crooked Big Bibeka का
All sinners violent without grace. Barni Na Jahin Biswa Paritapati ॥4॥
Sense: All of them, of many castes, who take arbitrary forms, are wicked, devious, fierce, irrational, merciless, violent, sinful and sorrowing all over the world, they cannot be described ॥4॥.
Doha:
* Stems like Pulastyakul, Holy Amal Anoop.
However, the curse is just a gross सकल176
Meaning: Though they originated in the holy, serene and unique family of the sage Pulastya, however due to the curse of the Brahmins they all became sins पाप176॥.
Bunk:
* Kinh Bibhidh Tapi, three brothers. The ultimate fiery non-sleeping girl went to sleep.
Gayu used to watch meditation near meditation. Maghu bar delights i tata ॥1॥
Meaning: Three brothers did many kinds of very difficult austerities, which cannot be described. (His fiery) Seeing the tenacity, Brahmaji went to him and said – O Tat! I’m happy, ask for the groom ॥1॥
* Very requested post Boleu Bachan Sunhu Jagadisa
We should not kill the dead of Kahu. Banar Manuj caste two times ॥2॥
Bhaartarth: -Ravana humbly and holding the stage said- O Jagadishwar! Listen, apes and humans – except these two nations, we should not die for anyone else. (Give this groom) ॥2॥
* Evamastu tum bada tena kinaha Main brahma mili tehi bar dinha॥
Puni Prabhu Kumbhakaran Oh my mind, mindless fearful ॥3॥
Meaning: – (Shivji says that-) I and Brahma together gave him a boon that this should be so, you have done great penance. Then Brahmaji went to Kumbhakarna. He was surprised to see him आश्चर्य3॥
* Jaun ehin khal nit karab aharu. Hoihi Sub Ujari Sansaru
Sarad Prairie Tasu Mati Ferry. Margesi Need Mass Shut Carey ॥4॥
Spirituality: – If this wicked diet is regular, then the whole world will become desolate. (Thinking so), Brahmaji changed Saraswati’s mind by inspiring him. (From which) he asked for six months of sleep ॥4॥
Doha:
* Went to Bibhishan near Puni, son of Baru Magu.
Tehin Mageu Bhagwant Pad Kamal Amal Anuragu ॥177॥
Meaning: – Then Brahmaji went to Vibhishana and said- O son! Ask for the groom. He asked for unqualified (fair and exclusive) love in the feet of the Lord ॥177॥
Bunk:
* Tinhhi Dei Ber Brahm Sidha. Harishit te come to his home
Maya Tanuja Mandodari Nama. Param Sundari Nari Lalama ॥1॥
Charity: – After giving them a groom, Brahma went away and he (the three brothers) returned to his home with joyful hacker. The girl named Mandodari of Maya Demon was the supreme beauty, and the women had a shiromani. ॥1॥

* Soi Mayin Dinhi Ravanhi Aani Hohi Jatudhanapati Jani
Harshit Bharau Narai was well received. Puni Dow Brothers Bihai Jai ॥2॥
Bhaartarth: -May brought him to Ravana. He knew that it would be the king of demons. Ravan was pleased to find a good woman and then he went and married the two brothers ॥2॥
* Giri Trikoot a Indus Mazhari. Bidh made inaccessible very heavy॥
Soi Maya Danavan Bahuri Sarnara Kanik Mani Bhavan Apara ॥3॥
Bhaartarth: – In the middle of the sea there was a big heavy fort built of Brahma on the mountain called Trikuta. (Great elusive and accomplished artisan) Maya demon punished her again. There were countless palaces of gold studded with jewels in it ॥3॥
* Bhogavati Jasi Ahikul Basa. Amravati Jasi Sakranivasa॥
More beautiful than threeteen. Jag bhayyat naam tehi lanka ॥4॥
Meaning: As Nagakul’s residence (in the Hades) is Bhogavati Puri and Indra’s living (in Swargalok) is Amravati Puri, more beautiful than that and it was fortified. His name Lanka became famous in the world ॥4॥

Doha:
* Ditch Sindhu Gambhir is the fourth most beautiful December
Canned Coat Made Strict Barni Jai Banana ॥178
Meaning: It is surrounded by a very deep moat of the sea. मजबूत178 (a) है There is a strong gold plinth of gold studded with the beads of that (fortification).
* Hari Apostle Jahin Kalp who was Jatudhanapati.
The bus slept with surly atulbal party
Spiritualism: Due to the inspiration of God, the king who is the king of demons (Ravana), the same Shur, the majestic, the incomparable strongman, resides in that Puri with his army ॥178 (b)॥
Bunk:
* Stay here with good friend. Te sab suranh samar sanghare
Now stay under pressure Rachhak Koti Jachhpati Kere ॥1॥
Spiritualism 🙁 Previously) there were great warrior demons living there. The gods killed them all in the war. Now, with the inspiration of Indra, there are one crore guards (Yakshas) of Kuber.
* Dasmukh katahun khabhi asi pai Sen saZi Garh Gheresi Jai
Look at the big bites. Zoo fauna carried parai ॥2॥

Meaning: – Ravana got such news somewhere, then he decorated the army and surrounded the fort. Seeing that great warrior and his large army, Yaksha fled with his life ॥2॥
* Saw all the city of Dassan. Gayu thinking happiness, fear, fear
Beautiful easy way forward guess. Kainhi tahan ravan rajadhani ॥3॥
Meaning: Then Ravana wandered and saw the whole city. His (locational) anxiety was erased and he felt very happy. Ravana established his capital there by estimating that Puri as naturally beautiful and inaccessible (to those outside).
* Jh jis jog distributed home dinhe. Happy gross furniture
Once attacked Kubera. Pushpak Jaan Jiti Le Awa ॥4॥
Meaning: According to the ability, Ravana made all the demons happy by dividing the houses. Once he ran over to Kubera and brought Pushpak Vimana to him.
Doha:
* Kautukhi Kailas Puni Leenhesi Jai Raised.
Manu Tawli Nijah Bahubal Chal Chalk a lot of happiness ॥179॥
Sense: Then he went (once) in the mess and lifted the Mount of Kailas and as if weighed the strength of his arms, he went away from there after getting great pleasure ॥179॥.
Bunk:
* Sukh Sampati Sut Sen Sahai. Jai Pratap Bal Brag wisdom
Every new person went to flood. Jimi yilai greed ghansh ॥1॥
Meaning: – happiness, wealth, son, army, helpers, Jai, Pratap, strength, wisdom and bravado – all these were constantly growing new (in the same way), as greed increases at every profit ॥1॥.

* Atibal Kumbhakaran as brother. How can I say that the peril is awake?
Karai Paan Sovi Hats Masa. Jagu Ho Tihu Pur Trasa ॥2॥
Meaning: – Extremely powerful was his brother like Kumbhakarna, whose warrior was not born in the world. He used to drink alcohol and used to sleep for six months. As soon as he woke up, there was panic in the three worlds ॥2॥
* Slept twice a day per diet. Biswa Begi Sab Chopat Hoi
Summer is not long gone Tehi Sama Amit Bir Balwana ॥3॥
Sense: If he used to eat every day, then the whole world would soon collapse. Randhir was such that cannot be described. (In Lanka) He had such many powerful heroes बल3॥
* Baridnad Jeth Sut Tasu. Bhat mah maan leek jag jasu
Jehin hoi run sanmukh koi Surpur Nitin Paravan Hoi ॥4॥
Bhaartarth: – Meghnad was the elder boy of Ravana, whose number was the first among the warriors of the world. No one could face him in Ran. There was a routine stampede in heaven (due to his fear) ॥4॥
Doha:
* Kumukh Acampan Kulisarad Comet Atikayya.
Every one can win such good bodies ॥180॥
Spirituality 🙁 Apart from these) Durmukh, Akampan, Vajradant, Comet and Atikayya etc. were many such warriors, who alone could conquer the whole world ॥180॥
Bunk:
* Kamarup Janahin all Maya. Dreamers who did not listen
A Barah sit in front of the house See Amit Apan Parivar ॥1॥
Meaning: All demons could make arbitrary forms and knew (demoniac) Maya. His mercy-religion was not even in the dream. Once, while sitting in the assembly, Ravana saw his uncountable family – ॥1॥.
* Sut group of family members grandson. Go across Nisachar.
Sen. but spontaneously arrogant. Said Bachchan rage item mash ॥2॥

Connotations: -Putra-grandson, Kutumbi and servants were heaps-of-heaps. Who could have counted the castes of (all) demons! Seeing his army, Ravana, arrogant by nature, uttered a voice soaked in anger and pride – ॥2॥
* Sunhu Sakal Rajutran Jutha. Our Barry Bibudh Barutha
Te Sanmukh Nahin Karhin Larai. See Sabal Repu Jahin Parai ॥3॥
Sense: O parties of all demons! Listen, the gods are our enemies. They do not fight in front of them. Seeing the powerful enemy flee ॥3॥
* Tenh kar maan hai a Bidhi Say extinguished sleep now sleep
Dwijbhojan Makh Home Saradha. Everyone should go, hinder you. ॥4॥
Meaning: Their death can be done by one solution, I explain and say. Now listen to him. (To increase their strength) Brahmin food, Yagya, Havan and Shraadh – go all these and hinder you ॥4॥
Doha:
* Chudha stripped forceless sur Sahajehin milihhin ai.
Then Marihuan said that Chhadihun adopted well ॥181॥
Senseless: – By becoming weak and powerless from the earth, the gods will come easily. Then I will kill them or leave them under my control (completely subjugated). 1181
Bunk:
* Meghnad Kahun Puni Shakwa Deen Sikh Balu Bairu Promotion
J Sur Summer Dhir Balwana. Who are proud and proud ॥1॥
Spiritualism: – Then he called Meghnad and after teaching and encouraging his force and hatred towards the gods. (Then said-) O son! Gods who are cold and strong in battle and who are proud to fight ॥1॥
* Tinhhi Jeeti Run Aneesu Bandhi. Uthi Sut Pitu Anusasan Kanghi॥
Ehh Bidhi Sabhi Agya Dinhi Apunu chaleau mada kar leenhi ॥2॥
Meaning: Bringing them to victory and winning the war. The son rose up and obeyed the father’s command. Similarly, he gave orders to everyone and you too walked away with mace in hand. हाथ2॥
* Chalat Dasanan Dolati Avni. Garjat Garbhvahin Sur Ravani॥
Ravan Avat listened to Sakoha. Devanh tke Meru Giri Khoha ॥3॥
Sense: The earth began to tremble due to the movement of Ravana and the womb of the devarni with the roar. Hearing Ravana coming in anger, the Gods held the caves of the Sumeru mountain (ran away and took shelter in the caves of Sumeru) ॥3॥
* The people of Digpalanh are happy. Get the list
Puni puni jingle heavy Dei devatanh gari pachari ॥4॥
Meaning: – Ravana found all the beautiful worlds of the dikpalas deserted. He used to repeatedly humiliate the deities by humming heavy lions ॥4॥

* Run item Matt Firai Gaja attack. There is no way to find a return.
Rabi Sasi Pawan Barun Dhandhari. Agni Kal Jam Sub Officer .
Meaning: Being drunk in the world of search, he is searching for the warrior of his pair all over the worldRuns around, but he does not find such a warrior anywhere. Sun, Moon, Vayu, Varuna, Kubera, Agni, Kaal and Yama etc. all officers, ॥5॥
* Kinner Siddha Manuj Sur Naga. Hathi sabhi ki panthin hain
Brahmacrishti where there is tension. Dasmukh Basbarti Male Female ॥6॥
Connotation: – Kinnar, Siddha, Man, Deity and Snake – He stubbornly fell behind everyone (he did not let anyone sit peacefully). In Brahmaji’s creation, as far as men and women were, all of them became subordinate to Ravana.
* Ayasu Karhin gross fearfulness. Navahini Niti Charan Binita ॥7॥
Sense: All of them obeyed his commandment and always humbly bowed his head at his feet.
Doha:
* Bhujbal biswa bas kar kari rakhesi kou no sutantra.
Mandlik Mani Ravan Raj Kari Nija Mantra
Sense: He subdued the whole world with the help of arms, he did not let anyone remain independent. (Thus) Ravana, the Shiromani (universal emperor) of the Mandalika kings, reigned as he wished. 2182 (a)
* Dev Jachh Gandharb Male Kinner Nag Kumari.
JITI BARIN NIZ BAHU BAL MULTI BEAUTIFUL BAR NARI ॥182B॥
Spirituality: – He won the marriage of Goddess, Yaksha, Gandharva, man, eunuch and damsels of serpents and many other beautiful and noble women with the help of his arms. ॥182 (b)॥
Bunk:
* Indrajit Son, who will be called a tortoise. So all the people should do it first.
The first one who should say Ayesu Dinha. Tinh Kar Charit Sunhu Jo Kinah ॥1॥
Meaning: – He (Meghnad) had already done what he told Meghnad (ie, it was too late for Ravana to say, he did not delay at all in obedience.) Whom (Ravana from Meghnad) He had already given the command, listen to the misdeeds he did. ॥1॥
* Look at all sinners. Nisichar Nikar Dev Paripati 4
Took out the rogue asura. Nana Roop Dharhin Kari Maya ॥2॥

Sense: All the groups of demons were very terrible to see, sinners and grieving gods. They used to cause trouble to groups of asuras and took many forms from Maya ॥2॥
* Jhe Bidhi Hoi Dharma Nirmula. So everyone is doing a bad response
Jehin Jehin des Dhenu Dwij Pavahin. Nagar Gaon Pur Aggavhan ॥3॥
Spiritualism: Just as the root of religion was cut off, they used to do all the Vedavirth work. Wherever they found Go and Brahmins, they set fire to the same city, village and east.
* Subh Aacharna did not happen at all. Dev Bipra Guru maan no
Nahin Haribhagati Jagya Tapa Sapnehu suniya bedh old ॥4॥
Bhaarthar: – (due to their fear), there was no auspicious conduct (Brahmin food, yagna, shradh etc.) anywhere. Nobody believed the deity, Brahmin and Guru. There was neither hallucination, nor sacrifice, penance and knowledge. The Vedas and Puranas were not even heard in the dream.
Verse:
* Chant Jog Birga Tapa Makh Bhaga Shravan Sunai Dasisa.
You are not getting rid of everything, you are not doing everything.
As corrupt Achara bha sansara dharma is not accepted.
Teh Bahubhidi Tragedy des niktai jo kah bedh old
Connotation: – Ravana could hear the ears of the (deities) participating in chanting, yoga, asceticism, penance and yajna, if he could hear it with his ears (at the same time) he would run up. Nothing could remain, he would capture everyone and destroy it. Such corrupt conduct spread in the world that religion was not heard in the ears, whoever used to say Vedas and Puranas, would give him a lot of tragedy and throw him out of the country.
Soratha:
* Do not go away without any trouble, who will do it.
Papi poetry of extreme love on violence ॥183॥
Meaning: The gross atrocities that the Rakshasas used to do, cannot be described. Whose love is on violence, what is the place of their sins ॥183॥


parmender yadav
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