संत असंत वंदना रामचरितमानस बालकाण्ड पढिये

संत असंत वंदना – 

संत असंत वंदना-

बंदउँ संत असज्जन चरना। दुःखप्रद उभय बीच कछु बरना॥
बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दुख दारुन देहीं॥2॥
भावार्थ:-अब मैं संत और असंत दोनों के चरणों की वन्दना करता हूँ, दोनों ही दुःख देने वाले हैं, परन्तु उनमें कुछ अन्तर कहा गया है। वह अंतर यह है कि एक (संत) तो बिछुड़ते समय प्राण हर लेते हैं और दूसरे (असंत) मिलते हैं, तब दारुण दुःख देते हैं। (अर्थात्‌ संतों का बिछुड़ना मरने के समान दुःखदायी होता है और असंतों का मिलना।)॥2॥
* उपजहिं एक संग जग माहीं। जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं॥
सुधा सुरा सम साधु असाधू। जनक एक जग जलधि अगाधू॥3॥

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भावार्थ:-दोनों (संत और असंत) जगत में एक साथ पैदा होते हैं, पर (एक साथ पैदा होने वाले) कमल और जोंक की तरह उनके गुण अलग-अलग होते हैं। (कमल दर्शन और स्पर्श से सुख देता है, किन्तु जोंक शरीर का स्पर्श पाते ही रक्त चूसने लगती है।) साधु अमृत के समान (मृत्यु रूपी संसार से उबारने वाला) और असाधु मदिरा के समान (मोह, प्रमाद और जड़ता उत्पन्न करने वाला) है, दोनों को उत्पन्न करने वाला जगत रूपी अगाध समुद्र एक ही है। (शास्त्रों में समुद्रमन्थन से ही अमृत और मदिरा दोनों की उत्पत्ति बताई गई है।)॥3॥
*भल अनभल निज निज करतूती। लहत सुजस अपलोक बिभूती॥
सुधा सुधाकर सुरसरि साधू। गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू॥4॥
गुन अवगुन जानत सब कोई। जो जेहि भाव नीक तेहि सोई॥5॥

*  खल वंदना राम चरित मानस बालकाण्ड पढ़े विस्तार से

भावार्थ:-भले और बुरे अपनी-अपनी करनी के अनुसार सुंदर यश और अपयश की सम्पत्ति पाते हैं। अमृत, चन्द्रमा, गंगाजी और साधु एवं विष, अग्नि, कलियुग के पापों की नदी अर्थात्‌ कर्मनाशा और हिंसा करने वाला व्याध, इनके गुण-अवगुण सब कोई जानते हैं, किन्तु जिसे जो भाता है, उसे वही अच्छा लगता है॥4-5॥
दोहा :
* भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु।
सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु॥5॥
भावार्थ:-भला भलाई ही ग्रहण करता है और नीच नीचता को ही ग्रहण किए रहता है। अमृत की सराहना अमर करने में होती है और विष की मारने में॥5॥
चौपाई :
* खल अघ अगुन साधु गुन गाहा। उभय अपार उदधि अवगाहा॥
तेहि तें कछु गुन दोष बखाने। संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने॥1॥

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भावार्थ:-दुष्टों के पापों और अवगुणों की और साधुओं के गुणों की कथाएँ- दोनों ही अपार और अथाह समुद्र हैं। इसी से कुछ गुण और दोषों का वर्णन किया गया है, क्योंकि बिना पहचाने उनका ग्रहण या त्याग नहीं हो सकता॥1॥
* भलेउ पोच सब बिधि उपजाए। गनि गुन दोष बेद बिलगाए॥
कहहिं बेद इतिहास पुराना। बिधि प्रपंचु गुन अवगुन साना॥2॥
भावार्थ:-भले-बुरे सभी ब्रह्मा के पैदा किए हुए हैं, पर गुण और दोषों को विचार कर वेदों ने उनको अलग-अलग कर दिया है। वेद, इतिहास और पुराण कहते हैं कि ब्रह्मा की यह सृष्टि गुण-अवगुणों से सनी हुई है॥2॥
* दुख सुख पाप पुन्य दिन राती। साधु असाधु सुजाति कुजाती॥
दानव देव ऊँच अरु नीचू। अमिअ सुजीवनु माहुरु मीचू॥3॥
माया ब्रह्म जीव जगदीसा। लच्छि अलच्छि रंक अवनीसा॥
कासी मग सुरसरि क्रमनासा। मरु मारव महिदेव गवासा॥4॥
सरग नरक अनुराग बिरागा। निगमागम गुन दोष बिभागा॥5॥

*  ब्राह्मण संत वंदना राम चरित मानस बालकाण्ड

भावार्थ:-दुःख-सुख, पाप-पुण्य, दिन-रात, साधु-असाधु, सुजाति-कुजाति, दानव-देवता, ऊँच-नीच, अमृत-विष, सुजीवन (सुंदर जीवन)-मृत्यु, माया-ब्रह्म, जीव-ईश्वर, सम्पत्ति-दरिद्रता, रंक-राजा, काशी-मगध, गंगा-कर्मनाशा, मारवाड़-मालवा, ब्राह्मण-कसाई, स्वर्ग-नरक, अनुराग-वैराग्य (ये सभी पदार्थ ब्रह्मा की सृष्टि में हैं।) वेद-शास्त्रों ने उनके गुण-दोषों का विभाग कर दिया है॥3-5॥
दोहा :
* जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार॥6॥
भावार्थ:-विधाता ने इस जड़-चेतन विश्व को गुण-दोषमय रचा है, किन्तु संत रूपी हंस दोष रूपी जल को छोड़कर गुण रूपी दूध को ही ग्रहण करते हैं॥6॥
चौपाई :
* अस बिबेक जब देइ बिधाता। तब तजि दोष गुनहिं मनु राता॥
काल सुभाउ करम बरिआईं। भलेउ प्रकृति बस चुकइ भलाईं॥1॥

*  सफलता (success) की राह

भावार्थ:-विधाता जब इस प्रकार का (हंस का सा) विवेक देते हैं, तब दोषों को छोड़कर मन गुणों में अनुरक्त होता है। काल स्वभाव और कर्म की प्रबलता से भले लोग (साधु) भी माया के वश में होकर कभी-कभी भलाई से चूक जाते हैं॥1॥
* सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं। दलि दुख दोष बिमल जसु देहीं॥
खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू। मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू॥2॥
भावार्थ:-भगवान के भक्त जैसे उस चूक को सुधार लेते हैं और दुःख-दोषों को मिटाकर निर्मल यश देते हैं, वैसे ही दुष्ट भी कभी-कभी उत्तम संग पाकर भलाई करते हैं, परन्तु उनका कभी भंग न होने वाला मलिन स्वभाव नहीं मिटता॥2॥
* लखि सुबेष जग बंचक जेऊ। बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ॥
उघरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू॥3॥
भावार्थ:-जो (वेषधारी) ठग हैं, उन्हें भी अच्छा (साधु का सा) वेष बनाए देखकर वेष के प्रताप से जगत पूजता है, परन्तु एक न एक दिन वे चौड़े आ ही जाते हैं, अंत तक उनका कपट नहीं निभता, जैसे कालनेमि, रावण और राहु का हाल हुआ ॥3॥
* किएहुँ कुबेषु साधु सनमानू। जिमि जग जामवंत हनुमानू॥
हानि कुसंग सुसंगति लाहू। लोकहुँ बेद बिदित सब काहू॥4॥

*सोचों तो leader की तरह

भावार्थ:-बुरा वेष बना लेने पर भी साधु का सम्मान ही होता है, जैसे जगत में जाम्बवान्‌ और हनुमान्‌जी का हुआ। बुरे संग से हानि और अच्छे संग से लाभ होता है क्योकि  यह बात लोक और वेद में है और सभी लोग इसको जानते हैं॥4॥
* गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा। कीचहिं मिलइ नीच जल संगा॥
साधु असाधु सदन सुक सारीं। सुमिरहिं राम देहिं गनि गारीं॥5॥
भावार्थ:-पवन के संग से धूल आकाश पर चढ़ जाती है और वही नीच (नीचे की ओर बहने वाले) जल के संग से कीचड़ में मिल जाती है। क्योकि साधु के घर के तोता-मैना राम-राम सुमिरते हैं और असाधु के घर के तोता-मैना गिन-गिनकर गालियाँ देते हैं॥5॥
* धूम कुसंगति कारिख होई। लिखिअ पुरान मंजु मसि सोई॥
सोइ जल अनल अनिल संघाता। होइ जलद जग जीवन दाता॥6॥

–  कुछ मूख्य बिंदु जिनसे सफलता की हर राह गुजरती है

भावार्थ:-कुसंग के कारण धुआँ कालिख कहलाता है, वही धुआँ (सुसंग से) सुंदर स्याही होकर पुराण लिखने के काम में आता है और वही धुआँ जल, अग्नि और पवन के संग से बादल होकर जगत को जीवन देने वाला बन जाता है॥6॥
दोहा :
* ग्रह भेजष जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग।
होहिं कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग॥7 (क)॥
भावार्थ:-ग्रह, औषधि, जल, वायु और वस्त्र- ये सब भी कुसंग और सुसंग पाकर संसार में बुरे और भले पदार्थ हो जाते हैं। चतुर एवं विचारशील पुरुष ही इस बात को जान पाते हैं॥7 (क)॥
* सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह।
ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह॥7 (ख)॥
भावार्थ:-महीने के दोनों पखवाड़ों में उजियाला और अँधेरा समान ही रहता है, परन्तु विधाता ने इनके नाम में भेद कर दिया है (एक का नाम शुक्ल और दूसरे का नाम कृष्ण रख दिया)। एक को चन्द्रमा का बढ़ाने वाला और दूसरे को उसका घटाने वाला समझकर जगत ने एक को सुयश और दूसरे को अपयश दे दिया॥7 (ख)॥

Saintly dissatisfaction
* Locked Saint Assurance Charge. Sorrowful Amphibious Beach Tortoise
Do not take a pran hari without a pass. Milat ek dukh darun dehi ॥2॥

Sense: Now I recite the feet of both the saint and the dissent, both are grieving, but there is some difference in them. The difference is that one (saint) takes the life while being separated and the other (dissatisfied) meets, then Darun gives sorrow. (That is, the separation of saints is as painful as dying and the meeting of dissenters.)॥ 2॥

* Upjahin I am the one with the world. Jalaj jonk jimi gun bilgae nahi
Sudha sura par sadhu asadhu. Janak Ek Jag Jaladhi Agadhu ॥3॥

Connotation: – Both (saints and dissenters) are born together in the world, but (born together) like Kamal and Leech, their qualities are different. (The lotus gives pleasure with vision and touch, but the blood starts sucking at the touch of the leech’s body.) Like a sage nectar (one who comes out of the world of death) and like ausadhu liqueur (generates fascination, pleasure and inertia). It is the same ocean as the world which produces both. (In the scriptures, the origin of both nectar and liquor has been told from Samudramanthan.)॥ 3॥

* Well, nothing is worth doing. Laht Sujas Apalok Bibhuti॥
Sudha Sudhakar Sursari Sadhu. Geral Anal Kalimal Sari Byadhu ॥4॥
Gun Avgun Janat everyone Jo jehi bhaav nik tehi soi ॥5॥

Meaning: Good and bad, according to their own actions, get the wealth of beautiful fame and badness. Amrit, the moon, Gangaji and the monk and poison, fire, river of sins of the Kaliyug, that is, the carnation and the murderer of violence, everyone knows their virtues, but the one who pleases is the one who loves it.
Doha:
* Bhalo bhalaihi pai lai lai nichihaihi neechu.
Sudha Saraiya Amartan Garal Saraiya Mechu ॥5॥

Concentration: – So Goodness only accepts goodness and it only accepts lowliness. Because Amrit is appreciated for immortality and in killing poison,

Bunk:
* Khal agh agun sadhu guna gaha. Amphic limitless Avgaha॥
It is very difficult to draw blame. Unsolicited Collection Unrecognized ॥1॥

Sense: The stories of the sins and demerits of the wicked and the virtues of the sages – both are immense and bottomless sea. From this, some merits and demerits have been described, because they cannot be recognized or discarded. ॥1॥

* Bhaleau poach sub Bidhi grows. Gani gun gun dodged
Kahin Bedid history is old. Bidhi Prapanchu Gun Avgun Sana ॥2॥

Meaning: All good and bad are born of Brahma, but considering the merits and demerits, the Vedas have separated them. So Vedas, history and Puranas say that this creation of Brahma is enriched with qualities and attributes. ॥2॥

* Sorrow, happiness, sin, reincarnation day. Sadhu Asadhu Sujati Kujati॥
Demon Dev Uncha Aru Neechu. Amiya Sujivanu Mahuru Michu ॥3॥
Maya Brahman Jiva Jagadisa. Lachhi Alachhi Ranka Avanisa॥
Kasi Maga Surasari Kramnasa. Maru Marv Mahidev Gawasa ॥4॥
Sarag Hell Anurag Biraga Nigamagam Gun Dosha Bibhaga ॥5॥

Meaning: – Because sukh, sin-virtue, day and night, sādhu-asadhu, sujati-kujāti, demon-god, high-low, nectar-poison, sujivan (beautiful life) -mritu, maya-brahma, jiva-god , Sampradaya-poorrata, Ranka-raja, Kashi-Magadha, Ganga-karmanasha, Marwar-Malwa, Brahmin-butcher, Heaven-hell, Anurag-Vairagya (All these substances are in the creation of Brahma.) Vedas-scriptures have given their qualities- Defects have been made ॥3-5॥

Doha:
* Root Chetan Gunn defective Biswa Keinh Kartar.
Sant Hans Gun Gahin Pyehri Bari Bikar ॥6॥
Meaning: – Vividata has made this root-conscious world virtuous, but saintly swans take only milk of virtue leaving the water like defect ॥6॥.

Bunk:
* As Bibek Jab Dei Bidhata. Then there is the blame, Gunuhin Manu Rata.
Kaal Subhau Karam Buriya. Good nature just paid good ॥1॥
Spirituality: – When giving this kind of (like a swan) conscience, the mind is enchanted in virtues, excluding defects. Good people (sadhus) also fall under the influence of Maya due to the predominance of time, nature and karma. ॥1॥

So do not take correctional Harijan Gym Dali grief dosha bimal jasu dehi
Because Khalu Karhin Bhal Pai Susungu. Mittin Malin Subhau Abhangu ॥2॥

Sense: As the devotee of God corrects that lapse and eradicates sorrows, he gives good fame, in the same way, the wicked sometimes do good with good company, but their uninterrupted filthy nature does not disappear. 2.

* Lakhi Subesh Jag Banchak Jeau. Besha Pratap Pujiahin Teu
Ugharhin is not the end. Kalanemi Jimi Ravan Rahu ॥3॥

Sense: Those who are thugs, seeing them as good (like a monk), worship the world with the brilliance of Vesh, but one day they come wide, their treachery is not fulfilled till the end, like Kalnami. , Ravana and Rahu were born ॥3॥

* Kubeh Kubeshu Sadhu Sanmanu. Jimi jag jamwant hanumanu॥
Harm Kusang Susangati Lahu. Lokhun Bedid Bidit Sab Kahu ॥4॥

Sense of meaning: Even So after creating bad clothes, the sage is respected, just like Jambavan and Hanumanji happened in the world. So There is harm from evil company and benefit from good company, this thing is in folk and Vedas and everyone knows it.

* Gagan ascendant Pawan Prasanga. Kitchen Mili Neech Jal Sanga
Sadhu Asadhu Sadan Suk Saari. Sumirahin Ram Dehin Gani Garien ॥5॥

Sense: Because Dust from the sky rises to the sky, and the same low (flowing downstream) water mixes with the mud. So Rama-Rama, the parrot-mana of the monk’s house, praises and the parrot-mana of the house of Asadhu, abuses the count ॥5॥

* Dhoom Kusangati Karikh Hoi. Likhiya Puran Manju Masi Soi॥
Soi Jal Anal Anil Sanghata. Ho jalad jag jeevan daata ॥6॥
Meaning: Smoke is called soot due to smoking

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