सप्तर्षियों की परीक्षा में पार्वतीजी का महत्व ( रामचरित मानस )

सप्तर्षियों की परीक्षा में पार्वतीजी का महत्व

चौपाई :* रिषिन्ह गौरि देखी तहँ कैसी। मूरतिमंत तपस्या जैसी॥
बोले मुनि सुनु सैलकुमारी। करहु कवन कारन तपु भारी॥1॥

भावार्थ:-ऋषियों ने (वहाँ जाकर) पार्वती को कैसी देखा, मानो मूर्तिमान्‌ तपस्या ही हो। मुनि बोले- हे शैलकुमारी! सुनो, तुम किसलिए इतना कठोर तप कर रही हो?॥1॥
*केहि अवराधहु का तुम्ह चहहू। हम सन सत्य मरमु किन कहहू॥
कहत बचन मनु अति सकुचाई। हँसिहहु सुनि हमारि जड़ताई॥2॥
भावार्थ:-तुम किसकी आराधना करती हो और क्या चाहती हो? हमसे अपना सच्चा भेद क्यों नहीं कहतीं? (पार्वती ने कहा-) बात कहते मन बहुत सकुचाता है। आप लोग मेरी मूर्खता सुनकर हँसेंगे॥2॥
* मनु हठ परा न सुनइ सिखावा। चहत बारि पर भीति उठावा॥
नारद कहा सत्य सोइ जाना। बिनु पंखन्ह हम चहहिं उड़ाना॥3॥
भावार्थ:-मन ने हठ पकड़ लिया है, वह उपदेश नहीं सुनता और जल पर दीवाल उठाना चाहता है। नारदजी ने जो कह दिया उसे सत्य जानकर मैं बिना ही पाँख के उड़ना चाहती हूँ॥3॥
* देखहु मुनि अबिबेकु हमारा। चाहिअ सदा सिवहि भरतारा॥4॥
भावार्थ:-हे मुनियों! आप मेरा अज्ञान तो देखिए कि मैं सदा शिवजी को ही पति बनाना चाहती हूँ॥4॥
दोहा :
* सुनत बचन बिहसे रिषय गिरिसंभव तव देह।
नारद कर उपदेसु सुनि कहहु बसेउ किसु गेह॥78॥
भावार्थ:-पार्वतीजी की बात सुनते ही ऋषि लोग हँस पड़े और बोले- तुम्हारा शरीर पर्वत से ही तो उत्पन्न हुआ है! भला, कहो तो नारद का उपदेश सुनकर आज तक किसका घर बसा है?॥78॥
चौपाई :
* दच्छसुतन्ह उपदेसेन्हि जाई। तिन्ह फिरि भवनु न देखा आई॥
चित्रकेतु कर घरु उन घाला। कनककसिपु कर पुनि अस हाला॥1॥
भावार्थ:-उन्होंने जाकर दक्ष के पुत्रों को उपदेश दिया था, जिससे उन्होंने फिर लौटकर घर का मुँह भी नहीं देखा। चित्रकेतु के घर को नारद ने ही चौपट किया। फिर यही हाल हिरण्यकशिपु का हुआ॥1॥
* नारद सिख जे सुनहिं नर नारी। अवसि होहिं तजि भवनु भिखारी॥
मन कपटी तन सज्जन चीन्हा। आपु सरिस सबही चह कीन्हा॥2॥
भावार्थ:-जो स्त्री-पुरुष नारद की सीख सुनते हैं, वे घर-बार छोड़कर अवश्य ही भिखारी हो जाते हैं। उनका मन तो कपटी है, शरीर पर सज्जनों के चिह्न हैं। वे सभी को अपने समान बनाना चाहते हैं॥2॥
* तेहि कें बचन मानि बिस्वासा। तुम्ह चाहहु पति सहज उदासा॥
निर्गुन निलज कुबेष कपाली। अकुल अगेह दिगंबर ब्याली॥3॥
भावार्थ:-उनके वचनों पर विश्वास मानकर तुम ऐसा पति चाहती हो जो स्वभाव से ही उदासीन, गुणहीन, निर्लज्ज, बुरे वेषवाला, नर-कपालों की माला पहनने वाला, कुलहीन, बिना घर-बार का, नंगा और शरीर पर साँपों को लपेटे रखने वाला है॥3॥
* कहहु कवन सुखु अस बरु पाएँ। भल भूलिहु ठग के बौराएँ॥
पंच कहें सिवँ सती बिबाही। पुनि अवडेरि मराएन्हि ताही॥4॥
भावार्थ:-ऐसे वर के मिलने से कहो, तुम्हें क्या सुख होगा? तुम उस ठग (नारद) के बहकावे में आकर खूब भूलीं। पहले पंचों के कहने से शिव ने सती से विवाह किया था, परन्तु फिर उसे त्यागकर मरवा डाला॥
दोहा :
* अब सुख सोवत सोचु नहिं भीख मागि भव खाहिं।
सहज एकाकिन्ह के भवन कबहुँ कि नारि खटाहिं॥79॥
भावार्थ:-अब शिव को कोई चिन्ता नहीं रही, भीख माँगकर खा लेते हैं और सुख से सोते हैं। ऐसे स्वभाव से ही अकेले रहने वालों के घर भी भला क्या कभी स्त्रियाँ टिक सकती हैं?॥79॥
चौपाई :
* अजहूँ मानहु कहा हमारा। हम तुम्ह कहुँ बरु नीक बिचारा॥
अति सुंदर सुचि सुखद सुसीला। गावहिं बेद जासु जस लीला॥1॥
भावार्थ:-अब भी हमारा कहा मानो, हमने तुम्हारे लिए अच्छा वर विचारा है। वह बहुत ही सुंदर, पवित्र, सुखदायक और सुशील है, जिसका यश और लीला वेद गाते हैं॥1॥
* दूषन रहित सकल गुन रासी। श्रीपति पुर बैकुंठ निवासी॥
अस बरु तुम्हहि मिलाउब आनी। सुनत बिहसि कह बचन भवानी॥2॥
भावार्थ:-वह दोषों से रहित, सारे सद्‍गुणों की राशि, लक्ष्मी का स्वामी और वैकुण्ठपुरी का रहने वाला है। हम ऐसे वर को लाकर तुमसे मिला देंगे। यह सुनते ही पार्वतीजी हँसकर बोलीं-॥2॥
* सत्य कहेहु गिरिभव तनु एहा। हठ न छूट छूटै बरु देहा॥
कनकउ पुनि पषान तें होई। जारेहुँ सहजु न परिहर सोई॥3॥
भावार्थ:-आपने यह सत्य ही कहा कि मेरा यह शरीर पर्वत से उत्पन्न हुआ है, इसलिए हठ नहीं छूटेगा, शरीर भले ही छूट जाए। सोना भी पत्थर से ही उत्पन्न होता है, सो वह जलाए जाने पर भी अपने स्वभाव (सुवर्णत्व) को नहीं छोड़ता॥3॥
* नारद बचन न मैं परिहरऊँ। बसउ भवनु उजरउ नहिं डरउँ॥
गुर कें बचन प्रतीति न जेही। सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही॥4॥
भावार्थ:-अतः मैं नारदजी के वचनों को नहीं छोड़ूँगी, चाहे घर बसे या उजड़े, इससे मैं नहीं डरती। जिसको गुरु के वचनों में विश्वास नहीं है, उसको सुख और सिद्धि स्वप्न में भी सुगम नहीं होती॥4॥
दोहा :
* महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम।
जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥80॥
भावार्थ:-माना कि महादेवजी अवगुणों के भवन हैं और विष्णु समस्त सद्‍गुणों के धाम हैं, पर जिसका मन जिसमें रम गया, उसको तो उसी से काम है॥80॥
चौपाई :
* जौं तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा। सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा॥
अब मैं जन्मु संभु हित हारा। को गुन दूषन करै बिचारा॥1॥
भावार्थ:-हे मुनीश्वरों! यदि आप पहले मिलते, तो मैं आपका उपदेश सिर-माथे रखकर सुनती, परन्तु अब तो मैं अपना जन्म शिवजी के लिए हार चुकी! फिर गुण-दोषों का विचार कौन करे?॥1॥
* जौं तुम्हरे हठ हृदयँ बिसेषी। रहि न जाइ बिनु किएँ बरेषी॥
तौ कौतुकिअन्ह आलसु नाहीं। बर कन्या अनेक जग माहीं॥2॥
भावार्थ:-यदि आपके हृदय में बहुत ही हठ है और विवाह की बातचीत (बरेखी) किए बिना आपसे रहा ही नहीं जाता, तो संसार में वर-कन्या बहुत हैं। खिलवाड़ करने वालों को आलस्य तो होता नहीं (और कहीं जाकर कीजिए)॥2॥
* जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥
तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहिं सत बार महेसू॥3॥
भावार्थ:-मेरा तो करोड़ जन्मों तक यही हठ रहेगा कि या तो शिवजी को वरूँगी, नहीं तो कुमारी ही रहूँगी। स्वयं शिवजी सौ बार कहें, तो भी नारदजी के उपदेश को न छोड़ूँगी॥3॥
* मैं पा परउँ कहइ जगदंबा। तुम्ह गृह गवनहु भयउ बिलंबा॥
देखि प्रेमु बोले मुनि ग्यानी। जय जय जगदंबिके भवानी॥4॥
भावार्थ:-जगज्जननी पार्वतीजी ने फिर कहा कि मैं आपके पैरों पड़ती हूँ। आप अपने घर जाइए, बहुत देर हो गई। (शिवजी में पार्वतीजी का ऐसा) प्रेम देखकर ज्ञानी मुनि बोले- हे जगज्जननी! हे भवानी! आपकी जय हो! जय हो!!॥4॥
दोहा :
* तुम्ह माया भगवान सिव सकल गजत पितु मातु।
नाइ चरन सिर मुनि चले पुनि पुनि हरषत गातु॥81॥
भावार्थ:-आप माया हैं और शिवजी भगवान हैं। आप दोनों समस्त जगत के माता-पिता हैं। (यह कहकर) मुनि पार्वतीजी के चरणों में सिर नवाकर चल दिए। उनके शरीर बार-बार पुलकित हो रहे थे॥81॥
चौपाई :
* जाइ मुनिन्ह हिमवंतु पठाए। करि बिनती गिरजहिं गृह ल्याए॥
बहुरि सप्तरिषि सिव पहिं जाई। कथा उमा कै सकल सुनाई॥1॥
भावार्थ:-मुनियों ने जाकर हिमवान्‌ को पार्वतीजी के पास भेजा और वे विनती करके उनको घर ले आए, फिर सप्तर्षियों ने शिवजी के पास जाकर उनको पार्वतीजी की सारी कथा सुनाई॥1॥
* भए मगन सिव सुनत सनेहा। हरषि सप्तरिषि गवने गेहा॥
मनु थिर करि तब संभु सुजाना। लगे करन रघुनायक ध्याना॥2॥
भावार्थ:-पार्वतीजी का प्रेम सुनते ही शिवजी आनन्दमग्न हो गए। सप्तर्षि प्रसन्न होकर अपने घर (ब्रह्मलोक) को चले गए। तब सुजान शिवजी मन को स्थिर करके श्री रघुनाथजी का ध्यान करने लगे॥2॥
* तारकु असुर भयउ तेहि काला। भुज प्रताप बल तेज बिसाला॥
तेहिं सब लोक लोकपति जीते। भए देव सुख संपति रीते॥3॥
भावार्थ:-उसी समय तारक नाम का असुर हुआ, जिसकी भुजाओं का बल, प्रताप और तेज बहुत बड़ा था। उसने सब लोक और लोकपालों को जीत लिया, सब देवता सुख और सम्पत्ति से रहित हो गए॥3॥
*अजर अमर सो जीति न जाई। हारे सुर करि बिबिध लराई॥
तब बिरंचि सन जाइ पुकारे। देखे बिधि सब देव दुखारे॥4॥
भावार्थ:-वह अजर-अमर था, इसलिए किसी से जीता नहीं जाता था। देवता उसके साथ बहुत तरह की लड़ाइयाँ लड़कर हार गए। तब उन्होंने ब्रह्माजी के पास जाकर पुकार मचाई। ब्रह्माजी ने सब देवताओं को दुःखी देखा॥4॥
दोहा :
* सब सन कहा बुझाइ बिधि दनुज निधन तब होइ।
संभु सुक्र संभूत सुत एहि जीतइ रन सोइ॥82॥
भावार्थ:-ब्रह्माजी ने सबको समझाकर कहा- इस दैत्य की मृत्यु तब होगी जब शिवजी के वीर्य से पुत्र उत्पन्न हो, इसको युद्ध में वही जीतेगा॥82॥
चौपाई :
* मोर कहा सुनि करहु उपाई। होइहि ईस्वर करिहि सहाई॥
सतीं जो तजी दच्छ मख देहा। जनमी जाइ हिमाचल गेहा॥1॥
भावार्थ:-मेरी बात सुनकर उपाय करो। ईश्वर सहायता करेंगे और काम हो जाएगा। सतीजी ने जो दक्ष के यज्ञ में देह का त्याग किया था, उन्होंने अब हिमाचल के घर जाकर जन्म लिया है॥1॥
* तेहिं तपु कीन्ह संभु पति लागी। सिव समाधि बैठे सबु त्यागी॥
जदपि अहइ असमंजस भारी। तदपि बात एक सुनहु हमारी॥2॥
भावार्थ:-उन्होंने शिवजी को पति बनाने के लिए तप किया है, इधर शिवजी सब छोड़-छाड़कर समाधि लगा बैठे हैं। यद्यपि है तो बड़े असमंजस की बात, तथापि मेरी एक बात सुनो॥2॥
* पठवहु कामु जाइ सिव पाहीं। करै छोभु संकर मन माहीं॥
तब हम जाइ सिवहि सिर नाई। करवाउब बिबाहु बरिआई॥3॥
भावार्थ:-तुम जाकर कामदेव को शिवजी के पास भेजो, वह शिवजी के मन में क्षोभ उत्पन्न करे (उनकी समाधि भंग करे)। तब हम जाकर शिवजी के चरणों में सिर रख देंगे और जबरदस्ती (उन्हें राजी करके) विवाह करा देंगे॥3॥
* एहि बिधि भलेहिं देवहित होई। मत अति नीक कहइ सबु कोई॥
अस्तुति सुरन्ह कीन्हि अति हेतू। प्रगटेउ बिषमबान झषकेतू॥4॥
भावार्थ:-इस प्रकार से भले ही देवताओं का हित हो (और तो कोई उपाय नहीं है) सबने कहा- यह सम्मति बहुत अच्छी है। फिर देवताओं ने बड़े प्रेम से स्तुति की। तब विषम (पाँच) बाण धारण करने वाला और मछली के चिह्नयुक्त ध्वजा वाला कामदेव प्रकट हुआ॥4॥

Importance of Parvati in the examination of the Saptarshi
Bunk:
* How did Rishinh Gauri see it? Like penance
Said Muni Sunu Salakumari. Karhu Kavan Karan Tapu Heavy ॥1॥
Meaning: How did the rishis (going there) see Parvati, as if the idol was austerity. Muni said – O Shailkumari! Listen, what are you doing such harsh penance? ॥1॥
* Kehi Avaradhahu ka tumhu chahu. Hum Sun Satya Marmu Qin Kahoo
Kahat Bachchan Manu was extremely hesitant. Hansihhu Suni Hamari Inertia ॥2॥
Meaning: Whom do you worship and what do you want? Why don’t you tell us your true secret? (Parvati said-) Saying this, the mind feels very uncomfortable. You will laugh at my foolishness ॥2॥
* Manu hatha teach not to listen. Raise wall on the face
Narada said to sleep truthfully. Binu Pankhanh Hum Chahin Hoahan ॥3॥
Meaning: – Man has taken stubbornness, he does not listen to the sermon and wants to raise the wall on the water. Knowing the truth of what Naradji said, I want to fly without a face ॥3॥
* Dekhu Muni Abibeku Ours. Always want the best India ॥4॥
Meaning: O monks! You see my ignorance that I always want to make Shivji my husband ॥4॥
Doha:
* Sunat Bachan is very popular.
Narada kar upadesu suni kahhu basu kisu geh ॥78॥
Meaning: – Hearing the talk of Parvati ji, the sages laughed and said – Your body is born from the mountain itself! Well, say, whose house has been settled till date after listening to Narada’s teachings?
Bunk:
* Dachchsutnh went to Upadesenhi. I did not see Tinh Firi Bhavan
Gharu ki ghul un ghala Kankakasipu Kar Punis As Hala ॥1॥
Charity: – He had gone and preached to the sons of Daksha, so that he did not return even to see the face of the house. Narada destroyed Chitrakettu’s house. Then the same situation happened for Hiranyakashipu ॥1॥
* Narada Sikh J Sunhin Male Female. Avasi Hojjhi Bhavanu Beggar॥
Maniac insidious gentleman Chinaha. Aapu saris sabhi chah kinha ॥2॥
Sense: Those men and women who listen to Narada, they leave home and become beggars. His mind is insidious, gentlemen’s mark on his body. They want to make everyone like them ॥2॥
* To save your life. Love you husband Sahaja Udasa
Nirgun Nilaj Kubesh Kapali. Akul Ageh Digambar Byali ॥3॥
Sense: Believing their words, you want a husband who is, by nature, indifferent, poor, shameless, bad-tempered, wearing a garland of male-skulls, totalless, without a home, naked and keeping snakes on his body. Is going to be ॥3॥
* Kahuhu Kavan Sukhu As Baru. Although forgetting the thugs
Say panch, siv sati bibahi Puni Avderi Maraenhi Tahi ॥4॥
Meaning: Tell me, what happiness will you have after meeting such a groom? You forgot the excuse of that thug (Narada). At first, Shiva married Sati at the behest of Panchas, but then abandoned her and got her killed.
Doha:
* Now Sukh Sowat Sochhu Nahin Bhig Margi Bhav Khanhi.
When should the buildings of spontaneous solitude be found in Nara Khatahin? 797.
Meaning: – Now Shiva is not worried, begging and eating and sleeping happily. With such a nature, how can women stay alone in the house of those who live alone? ॥79॥
Bunk:
* Ajhu Manhu is our I will tell you, I am buryed
Exquisite Suchi Pleasant Susila. Gawhin Bed Jasu Jas Leela ॥1॥
Sense: Now also, obey our saying, we have a good groom for you. He is very beautiful, pious, pleasing and gentle, whose fame and leela sing the Vedas. ॥1॥
* Non-combustible gross guna rasi. Shreepati Pur Baikuntha resident 4
As baru tumhi milaubi aani Sunat Bihasi ka Bachaan Bhawani ॥2॥
Bhartharth: – He is the lord of all virtues, lord of Lakshmi and resident of Vaikunthapuri, devoid of defects. We will bring such a groom and meet you. On hearing this, Parvatiji laughed and said -42.
* Satya Kahehu Giribhav Tanu Eha. Do not miss persistence, Baru deha॥
Kankau revived. Jarehun Sahaju na Parihar Soi ॥3॥
Meaning: You said the truth that this body of mine originated from the mountain, so the persistence will not be missed, even if the body is left out. Gold is also produced from stone, so it does not leave its nature (gold) even when burnt.
* Narada Bachan, I shall not pass away. Basu Bhawanu Ujrau Nahin deroon
There was no realization of life Sapnehun sugam na sukh sidhi tehi ॥4॥
Sense: So I will not leave the words of Naradji, whether settled or desolated, I am not afraid of it. One who does not believe in the words of the Guru, he is not happy even in the dream of happiness and fulfillment.
Doha:
* Mahadev Avgun Bhavan Bishnu Sakal Gun Dham.
Jehi kar manu rum jahi san tehi tehi san kaam ॥80॥
Connotation: – Mahadevji is the house of the demons and Vishnu is the abode of all virtues, but the one whose heart is full of rum, he only has to work with it.
Bunk:
* You meet me first. Sunatiun Sikh Tumhari dhari lead॥
Now I lost my sovereign interest. Gun dun do bachara ॥1॥
Sense: O monks! If you would have met earlier, I would have listened to your sermon head-forehead, but now I have lost my birth to Shivji! Then who should consider the merits and demerits? ॥1॥
* Once again, your persistence is heartless. Can’t go without getting married
Tou Kautukiyan Alasu is not there. Bur kanyo many jag maha ॥2॥
Meaning: If there is a lot of stubbornness in your heart and you cannot keep going without talking (marriage), then there are many bridesmaids in the world. To those who play, they do not have laziness (and go somewhere else) ॥2॥
Ours is born. Burun Sambhon na khooni kuari॥
Upadasu after worshiping God Apu kahhin sat bar mahesu ॥3॥
Meaning: – I will be persistent for crores of births that either I will go to Shiva, or else I will remain a virgin. Even if Shivji himself says a hundred times, he will not give up Naradji’s teachings.
* I am hereOh God! You are homeless
See Premu said, Muni gyani. Jai Jai Jagdambike Bhavani ॥4॥
Meaning: – Jagjjnani Parvati ji again said that I fall on your feet. You go home, it’s too late. Seeing the love of Parvatiji in Shiva, the wise sage said – O Jagjjanani! Hey Bhavani! We salute you! Hail !!॥ 4॥
Doha:
* You maya lord siv sakal gajat pitu matu.
Nai charan head muni chale puni punisht gathu ॥81॥
Meaning: You are Maya and Shiva is God. You are both parents of the whole world. (Saying) The sage walked at the feet of Parvatiji and walked. Their bodies were pulsing repeatedly ॥81॥
Bunk:
* Jai Muninh read Himavantu. Please pray for Girjahin Griha
Bahuri Saptarishi Siva was identified. Story Uma Cai gross narrated ॥1॥
Sense: The munis went and sent Himavan to Parvatiji and they pleaded and brought him home, then the Saptarshi went to Shiva and told him the whole story of Parvati ji.
* Brother Magan Sew Sunat Saneha. Harshi Saptarishi Gavane Geha॥
Manu stabilize then Sambhu Sujana. Lage Karan Raghunayak Dhyana ॥2॥
Bhaarthar: – Shiva became ecstatic as soon as he heard the love of Parvatiji. The Saptarshi pleased and went to his home (Brahmaloka). Then Suzanne Shivji stabilized the mind and started meditating on Shri Raghunathji ॥2॥
* Taraku Asura Bhayu Tehi Kala. Bhuj Pratap Bal Tej Bisala
All these people won the Lokpati. Lord Dev Sukh Sampati Rite ॥3॥
Meaning: At the same time, there was an asura named Tarak, whose strength of arms, majesty and glory was very big. He conquered all the lokas and lokpalas, all the gods became devoid of happiness and wealth.
* Ajar Amar so Jiti did not go. Lose my eyes
Then Birnchi called Sun Jae. Dekha Bidhi Sab Deo Dukhare ॥4॥
Connotation: – He was ajar-immortal, so was not won by anyone. The gods lost a lot of battles with him. Then he went to Brahmaji and called. Brahma saw all the gods grieving ॥4॥
Doha:
* All Sun said that extinguished Bidhi Danuj passed away.
Sambhu Sukr Sambhut Sut Ehi Jeeti Run Soi ॥82॥
Meaning: – Brahmaji explained to everyone and said – The death of this monster will happen when a son is born with Shiva’s semen, he will win it in battle.
Bunk:
* Peacock said Suni Karahu Upai. God
Sati who fostered life. Janmi Jai Himachal Geha ॥1॥
Meaning: Take measures after listening to me. God will help and work will be done. Satiji, who had sacrificed his body in the sacrificial fire, has now taken birth in Himachal’s home ॥1॥.
* Tehintu kineh sambhu pati lagi hai. Sabu Tyagi sitting in the trance
Although a lot of confusion is heavy. However, one thing is our हमारी2॥
Meaning: They have done penance to make Shivji a husband, Shivji has left everything and is sitting in a tomb. Although it is a matter of great confusion, however listen to one of my words ॥2॥
* Patvahu kamu jai siv paani There is no other way in mind
Then we went to the barber head. Karwaub Bibahu Bahiya ॥3॥
Meaning: You go and send Kamdev to Shivji, he will create anger in Shivji’s mind (dissolve his samadhi). Then we will go and lay the head at the feet of Shiva and force (persuade him) to get married ॥3॥
* Ehi Bidhi Bhalein Devhit Hoi. Do not say very low
Astuti Surnh Keenhi is very much Pragteau Bishmban Jhushketu ॥4॥
Meaning: In this way even if the gods are interested (and there is no way) everyone said – This opinion is very good. Then the gods praised with great love. Then the cupid holding the asymmetrical (five) arrow and the flag with the symbol of the fish appeared ॥4॥

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