सती का दक्ष यज्ञ में जाना (श्री रामचरित मानस )

सती का दक्ष यज्ञ में जाना

सती का दक्ष यज्ञ में जाना

दोहा :* दच्छ लिए मुनि बोलि सब करन लगे बड़ जाग।
नेवते सादर सकल सुर जे पावत मख भाग॥60॥भावार्थ:-दक्ष ने सब मुनियों को बुला लिया और वे बड़ा यज्ञ करने लगे। जो देवता यज्ञ का भाग पाते हैं, दक्ष ने उन सबको आदर सहित निमन्त्रित किया॥60॥
चौपाई :
* किंनर नाग सिद्ध गंधर्बा। बधुन्ह समेत चले सुर सर्बा॥
बिष्नु बिरंचि महेसु बिहाई। चले सकल सुर जान बनाई॥1॥
भावार्थ:-(दक्ष का निमन्त्रण पाकर) किन्नर, नाग, सिद्ध, गन्धर्व और सब देवता अपनी-अपनी स्त्रियों सहित चले। विष्णु, ब्रह्मा और महादेवजी को छोड़कर सभी देवता अपना-अपना विमान सजाकर चले॥1॥
* सतीं बिलोके ब्योम बिमाना। जात चले सुंदर बिधि नाना॥
सुर सुंदरी करहिं कल गाना। सुनत श्रवन छूटहिं मुनि ध्याना॥2॥
भावार्थ:-सतीजी ने देखा, अनेकों प्रकार के सुंदर विमान आकाश में चले जा रहे हैं, देव-सुन्दरियाँ मधुर गान कर रही हैं, जिन्हें सुनकर मुनियों का ध्यान छूट जाता है॥2॥
* पूछेउ तब सिवँ कहेउ बखानी। पिता जग्य सुनि कछु हरषानी॥
जौं महेसु मोहि आयसु देहीं। कछु दिन जाइ रहौं मिस एहीं॥3॥
भावार्थ:-सतीजी ने (विमानों में देवताओं के जाने का कारण) पूछा, तब शिवजी ने सब बातें बतलाईं। पिता के यज्ञ की बात सुनकर सती कुछ प्रसन्न हुईं और सोचने लगीं कि यदि महादेवजी मुझे आज्ञा दें, तो इसी बहाने कुछ दिन पिता के घर जाकर रहूँ॥3॥
* पति परित्याग हृदयँ दुखु भारी। कहइ न निज अपराध बिचारी॥
बोली सती मनोहर बानी। भय संकोच प्रेम रस सानी॥4॥
भावार्थ:-क्योंकि उनके हृदय में पति द्वारा त्यागी जाने का बड़ा भारी दुःख था, पर अपना अपराध समझकर वे कुछ कहती न थीं। आखिर सतीजी भय, संकोच और प्रेमरस में सनी हुई मनोहर वाणी से बोलीं- ॥4॥
दोहा :
* पिता भवन उत्सव परम जौं प्रभु आयसु होइ।
तौ मैं जाउँ कृपायतन सादर देखन सोइ॥61॥
भावार्थ:-हे प्रभो! मेरे पिता के घर बहुत बड़ा उत्सव है। यदि आपकी आज्ञा हो तो हे कृपाधाम! मैं आदर सहित उसे देखने जाऊँ॥61॥
चौपाई :
* कहेहु नीक मोरेहूँ मन भावा। यह अनुचित नहिं नेवत पठावा॥
दच्छ सकल निज सुता बोलाईं। हमरें बयर तुम्हउ बिसराईं॥1॥
भावार्थ:-शिवजी ने कहा- तुमने बात तो अच्छी कही, यह मेरे मन को भी पसंद आई पर उन्होंने न्योता नहीं भेजा, यह अनुचित है। दक्ष ने अपनी सब लड़कियों को बुलाया है, किन्तु हमारे बैर के कारण उन्होंने तुमको भी भुला दिया॥1॥
* ब्रह्मसभाँ हम सन दुखु माना। तेहि तें अजहुँ करहिं अपमाना॥
जौं बिनु बोलें जाहु भवानी। रहइ न सीलु सनेहु न कानी॥2॥
भावार्थ:-एक बार ब्रह्मा की सभा में हम से अप्रसन्न हो गए थे, उसी से वे अब भी हमारा अपमान करते हैं। हे भवानी! जो तुम बिना बुलाए जाओगी तो न शील-स्नेह ही रहेगा और न मान-मर्यादा ही रहेगी॥2॥
* जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा। जाइअ बिनु बोलेहुँ न सँदेहा॥
तदपि बिरोध मान जहँ कोई। तहाँ गएँ कल्यानु न होई॥3॥
भावार्थ:-यद्यपि इसमें संदेह नहीं कि मित्र, स्वामी, पिता और गुरु के घर बिना बुलाए भी जाना चाहिए तो भी जहाँ कोई विरोध मानता हो, उसके घर जाने से कल्याण नहीं होता॥3॥
* भाँति अनेक संभु समुझावा। भावी बस न ग्यानु उर आवा॥
कह प्रभु जाहु जो बिनहिं बोलाएँ। नहिं भलि बात हमारे भाएँ॥4॥
भावार्थ:-शिवजी ने बहुत प्रकार से समझाया, पर होनहारवश सती के हृदय में बोध नहीं हुआ। फिर शिवजी ने कहा कि यदि बिना बुलाए जाओगी, तो हमारी समझ में अच्छी बात न होगी॥4॥
दोहा :
* कहि देखा हर जतन बहु रहइ न दच्छकुमारि।
दिए मुख्य गन संग तब बिदा कीन्ह त्रिपुरारि॥62॥
भावार्थ:-शिवजी ने बहुत प्रकार से कहकर देख लिया, किन्तु जब सती किसी प्रकार भी नहीं रुकीं, तब त्रिपुरारि महादेवजी ने अपने मुख्य गणों को साथ देकर उनको बिदा कर दिया॥62॥
चौपाई :
* पिता भवन जब गईं भवानी। दच्छ त्रास काहुँ न सनमानी॥
सादर भलेहिं मिली एक माता। भगिनीं मिलीं बहुत मुसुकाता॥1॥
भावार्थ:-भवानी जब पिता (दक्ष) के घर पहुँची, तब दक्ष के डर के मारे किसी ने उनकी आवभगत नहीं की, केवल एक माता भले ही आदर से मिली। बहिनें बहुत मुस्कुराती हुई मिलीं॥1॥
* दच्छ न कछु पूछी कुसलाता। सतिहि बिलोकी जरे सब गाता॥
सतीं जाइ देखेउ तब जागा। कतहूँ न दीख संभु कर भागा॥2॥
भावार्थ:-दक्ष ने तो उनकी कुछ कुशल तक नहीं पूछी, सतीजी को देखकर उलटे उनके सारे अंग जल उठे। तब सती ने जाकर यज्ञ देखा तो वहाँ कहीं शिवजी का भाग दिखाई नहीं दिया॥2॥
* तब चित चढ़ेउ जो संकर कहेऊ। प्रभु अपमानु समुझि उर दहेऊ॥
पाछिल दुखु न हृदयँ अस ब्यापा। जस यह भयउ महा परितापा॥3॥
भावार्थ:-तब शिवजी ने जो कहा था, वह उनकी समझ में आया। स्वामी का अपमान समझकर सती का हृदय जल उठा। पिछला (पति परित्याग का) दुःख उनके हृदय में उतना नहीं व्यापा था, जितना महान्‌ दुःख इस समय (पति अपमान के कारण) हुआ॥3॥
* जद्यपि जग दारुन दुख नाना। सब तें कठिन जाति अवमाना॥
समुझि सो सतिहि भयउ अति क्रोधा। बहु बिधि जननीं कीन्ह प्रबोधा॥4॥
भावार्थ:-यद्यपि जगत में अनेक प्रकार के दारुण दुःख हैं, तथापि, जाति अपमान सबसे बढ़कर कठिन है। यह समझकर सतीजी को बड़ा क्रोध हो आया। माता ने उन्हें बहुत प्रकार से समझाया-बुझाया॥4॥

Go to Sati’s Daksha Yagya
Doha:
* Say goodbye to Dachch, all the people start feeling awake.
Navte Regards Sakal Sur Je Pavat Makh Part ॥60॥
Meaning: – Daksh called all the sages and they started a big yagna. The gods who received the part of the yajna, Daksha invited them all with respect ॥60॥
Bunk:
* Kinner Nag Siddha Gandharba. Surb Surbah with the rest
Bishnu Biranchi Mahesu Bihai. Let us make a total voice. ॥1॥
Connotation: – (Having received the invitation of Daksha) Kinnar, Nag, Siddha, Gandharva and all the gods walked with their respective women. All the gods, except Vishnu, Brahma and Mahadevji, decorated their respective planes and left.
* Sati Bilok Byom Bimana. Jat chal Sundar Bidhi Nana 4
Sur Sundari Karahin Kal Song. Sunat Shravan Chotahan Muni Dhyana ॥2॥
Meaning: Satiji saw many beautiful planes going out into the sky, god-beauties singing sweetly, listening to which the monks are lost attention ॥2॥
* Ask, then you just say Father Jagya Suni Kachu Harshani
Jaune mahesu mohi aisu dehi dehi Stay away on some day, miss you only मिस3॥
Meaning: Satiji asked (the reason for the departure of the gods in the planes), then Shivji told all the things. Sati was happy to hear of the father’s yagya and started thinking that if Mahadevji gives me permission, then I should go to the father’s house for a few days on the same pretext.
* Husband abandonment, heart ache heavy. Say your personal crime!
Boli Sati Manohar Bani Fear hesitate love juice mash ॥4॥
Sense: Because there was a lot of grief in her heart of her husband’s abandonment, but considering her guilt, she would not say anything. After all, Satiji spoke to Manohar Vani, soaked in fear, hesitance, and love – ॥4॥.
Doha:
* Father Bhavan Utsav is the Supreme Lord Lord Ayusu.
Please I go kindly respectfully, see Soi ॥61॥
Meaning: Oh God! My father’s house is a big celebration. If you are allowed, then please! So I go to see him with respect ॥61॥
Bunk:
* Kāhehu Neek Morehu Mana Bhava. It is not unfair
Dachch spoke the whole personal suit. I love you Bisrain ॥1॥
Meaning: Shivji said – You said it well, my mind also liked it but they did not send the invitation, it is unfair. Daksha has called all his girls, but due to our hatred, he has forgotten you too.
* Brahm sabha we considered to be sad. Tehteen ajhun karhin insult
Speak loudly without saying Jahu Bhavani. Rahi na silu sanehu na kani ॥2॥
Sense: Once in Brahma’s assembly he was unhappy with us, because of that he still insults us. Hey Bhavani! If you are called without calling, there will be neither modesty nor affection nor dignity.
* Friend Prabhu Pitu Guru Geha. Go without talking
However, there is no recognition. There is no tomorrow, ॥3॥
Meaning: Though there is no doubt that the house of friend, master, father, and master should be called without calling, even if someone agrees, going to his house does not lead to welfare.
* Like many sovereign assemblies. Future bus no gyanu ur awa
Say, Lord Jahu No matter what we like ॥4॥
Spirituality: – Shivji explained in many ways, but with the help of Sati, he did not realize. Then Shivji said that if called without calling, it will not be a good thing in our understanding.
Doha:
* Said dekhta hai jatan bahi rahi na dachchakumari
With the main gun, then Bida Kinah Tripurari ॥62॥
Bhartarth: -Shivji looked at it in many ways, but when Sati did not stop in any way, then Tripurari Mahadevji with his main ganas left him and ॥62॥.
Bunk:
* Bhavani when father went to Bhawan. Dachh tragedy
Best regards, Found a mother. The lady got very smooth मु1॥
Meaning: When Bhavani reached the father’s (Daksha’s) house, no one paid him due to Daksha’s fear, only one mother even met with respect. So Sisters got very smiling ॥1॥
* Dachchh nor tortoise asked the crook. Sathee Biloki Jare Sab sings
Wake up when you see sati Kत दीh दीn Dikh Sambhu Kar ran ॥2॥
Meaning: – Because Daksh did not even ask her for any skill, after seeing Satiji, all her parts got burnt. Then Sati went and saw the yagya, so there was no visible part of Shiva there.
* Then you can say what you call hybrid. Prabhu insulting Samuzhi ur dheu
Not sad, as my heart became big. Just like this dreadful Maha Paritapa ॥3॥
Sense: Then he understood what Shivji had said. Sati’s heart burned as an insult to Swami. The past (husband abandonment) sorrow did not spread as much in his heart as the great sorrow this time (due to husband humiliation) ॥3॥.
* Jyadipi Jag Darun Dukh Nana. All the difficult caste avamana
Samajhi is so horrified and extremely angry. Multipurpose birth mother living Prabodha ॥4॥
Meaning: Though there are many types of grief in the world, however, caste humiliation is the most difficult. Realizing this Satiji became very angry. Mother explained to him in many ways – extinguished ॥4॥

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