षष्ठ सोपान-मंगलाचरण

षष्ठ सोपान-मंगलाचरण

श्लोक :
* रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं
योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम्‌।
मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवं
वन्दे कन्दावदातं सरसिजनयनं देवमुर्वीशरूपम्‌॥1॥
भावार्थ : कामदेव के शत्रु शिवजी के सेव्य, भव (जन्म-मृत्यु) के भय को हरने वाले, काल रूपी मतवाले हाथी के लिए सिंह के समान, योगियों के स्वामी (योगीश्वर), ज्ञान के द्वारा जानने योग्य, गुणों की निधि, अजेय, निर्गुण, निर्विकार, माया से परे, देवताओं के स्वामी, दुष्टों के वध में तत्पर, ब्राह्मणवृन्द के एकमात्र देवता (रक्षक), जल वाले मेघ के समान सुंदर श्याम, कमल के से नेत्र वाले, पृथ्वीपति (राजा) के रूप में परमदेव श्री रामजी की मैं वंदना करता हूँ॥1॥
* शंखेन्द्वाभमतीवसुन्दरतनुं शार्दूलचर्माम्बरं
कालव्यालकरालभूषणधरं गंगाशशांकप्रियम्‌।
काशीशं कलिकल्मषौघशमनं कल्याणकल्पद्रुमं
नौमीड्यं गिरिजापतिं गुणनिधिं कन्दर्पहं शंकरम्‌॥2॥
भावार्थ : शंख और चंद्रमा की सी कांति के अत्यंत सुंदर शरीर वाले, व्याघ्रचर्म के वस्त्र वाले, काल के समान (अथवा काले रंग के) भयानक सर्पों का भूषण धारण करने वाले, गंगा और चंद्रमा के प्रेमी, काशीपति, कलियुग के पाप समूह का नाश करने वाले, कल्याण के कल्पवृक्ष, गुणों के निधान और कामदेव को भस्म करने वाले, पार्वती पति वन्दनीय श्री शंकरजी को मैं नमस्कार करता हूँ॥2॥
श्लोक :
यो ददाति सतां शम्भुः कैवल्यमपि दुर्लभम्‌।
खलानां दण्डकृद्योऽसौ शंकरः शं तनोतु मे॥3॥
भावार्थ : जो सत्‌ पुरुषों को अत्यंत दुर्लभ कैवल्यमुक्ति तक दे डालते हैं और जो दुष्टों को दण्ड देने वाले हैं, वे कल्याणकारी श्री शम्भु मेरे कल्याण का विस्तार करें॥3॥
दोहा :
* लव निमेष परमानु जुग बरष कलप सर चंड।
भजसि न मन तेहि राम को कालु जासु कोदंड॥
भावार्थ : लव, निमेष, परमाणु, वर्ष, युग और कल्प जिनके प्रचण्ड बाण हैं और काल जिनका धनुष है, हे मन! तू उन श्री रामजी को क्यों नहीं भजता?
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Because Sevya of Kamdev’s enemy, Shiva, who defeats the fear of bhava (birth-death), is like a lion for a black-eyed elephant, lord of yogis (yogisvar), knowable by knowledge, treasure of virtues, invincible, nirguna, Nirvikara, beyond Maya, the lord of the gods, ready in the slaughter of the wicked.
the only deity (protector) of the Brahmanvrinda, the beautiful Shyam like a cloud with water, the lotus with eyes, the Prithvipati (king) as Paramdev Sri Ramji’s I. I pray
So The very beautiful body of the shell of the conch and the moon, the Vyagracharam attire, the eagle-like (or black), holding the horrific snakes of Bhushan, the lover of the Ganges and the Moon, Kashipati, the destroyer of the sin group of Kali Yuga , Kalpavriksha of welfare, wealth of virtues and devouring Kamadeva, I salute Parvati husband Vandani Sri Shankaraji.
Because Those who give away extremely rare Kaivalyamukti to the seven men and those who are going to punish the wicked, those welfare Sri Shambhu extend my welfare.
Because Love, Nimesh, Atoms, Years, Yugas and Kalpas who have fierce arrows and Kaal whose bow is, O mind! So Why don’t you worship those Shri Ramji?

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