शिवजी की विचित्र बारात और विवाह की तैयारी

शिवजी की विचित्र बारात और विवाह की तैयारी

दोहा :
* लगे सँवारन सकल सुर बाहन बिबिध बिमान।
होहिं सगुन मंगल सुभद करहिं अपछरा गान॥91॥
भावार्थ:-सब देवता अपने भाँति-भाँति के वाहन और विमान सजाने लगे, कल्याणप्रद मंगल शकुन होने लगे और अप्सराएँ गाने लगीं॥91॥

चौपाई :

* सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा। जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा॥
कुंडल कंकन पहिरे ब्याला। तन बिभूति पट केहरि छाला॥1॥

भावार्थ:-शिवजी के गण शिवजी का श्रृंगार करने लगे। जटाओं का मुकुट बनाकर उस पर साँपों का मौर सजाया गया। शिवजी ने साँपों के ही कुंडल और कंकण पहने, शरीर पर विभूति रमायी और वस्त्र की जगह बाघम्बर लपेट लिया॥1॥
* ससि ललाट सुंदर सिर गंगा। नयन तीनि उपबीत भुजंगा॥
गरल कंठ उर नर सिर माला। असिव बेष सिवधाम कृपाला॥2॥
भावार्थ:-शिवजी के सुंदर मस्तक पर चन्द्रमा, सिर पर गंगाजी, तीन नेत्र, साँपों का जनेऊ, गले में विष और छाती पर नरमुण्डों की माला थी। इस प्रकार उनका वेष अशुभ होने पर भी वे कल्याण के धाम और कृपालु हैं॥2॥
* कर त्रिसूल अरु डमरु बिराजा। चले बसहँ चढ़ि बाजहिं बाजा॥
देखि सिवहि सुरत्रिय मुसुकाहीं। बर लायक दुलहिनि जग नाहीं॥3॥
भावार्थ:-एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में डमरू सुशोभित है। शिवजी बैल पर चढ़कर चले। बाजे बज रहे हैं। शिवजी को देखकर देवांगनाएँ मुस्कुरा रही हैं (और कहती हैं कि) इस वर के योग्य दुलहिन संसार में नहीं मिलेगी॥3॥
* बिष्नु बिरंचि आदि सुरब्राता। चढ़ि चढ़ि बाहन चले बराता॥
सुर समाज सब भाँति अनूपा। नहिं बरात दूलह अनुरूपा॥4॥
भावार्थ:-विष्णु और ब्रह्मा आदि देवताओं के समूह अपने-अपने वाहनों (सवारियों) पर चढ़कर बारात में चले। देवताओं का समाज सब प्रकार से अनुपम (परम सुंदर) था, पर दूल्हे के योग्य बारात न थी॥4॥
दोहा :
* बिष्नु कहा अस बिहसि तब बोलि सकल दिसिराज।
बिलग बिलग होइ चलहु सब निज निज सहित समाज॥92॥
भावार्थ:-तब विष्णु भगवान ने सब दिक्पालों को बुलाकर हँसकर ऐसा कहा- सब लोग अपने-अपने दल समेत अलग-अलग होकर चलो॥92॥
चौपाई :
* बर अनुहारि बरात न भाई। हँसी करैहहु पर पुर जाई॥
बिष्नु बचन सुनि सुर मुसुकाने। निज निज सेन सहित बिलगाने॥1॥
भावार्थ:-हे भाई! हम लोगों की यह बारात वर के योग्य नहीं है। क्या पराए नगर में जाकर हँसी कराओगे? विष्णु भगवान की बात सुनकर देवता मुस्कुराए और वे अपनी-अपनी सेना सहित अलग हो गए॥1॥
* मनहीं मन महेसु मुसुकाहीं। हरि के बिंग्य बचन नहिं जाहीं॥
अति प्रिय बचन सुनत प्रिय केरे। भृंगिहि प्रेरि सकल गन टेरे॥2॥
भावार्थ:-महादेवजी (यह देखकर) मन-ही-मन मुस्कुराते हैं कि विष्णु भगवान के व्यंग्य-वचन (दिल्लगी) नहीं छूटते! अपने प्यारे (विष्णु भगवान) के इन अति प्रिय वचनों को सुनकर शिवजी ने भी भृंगी को भेजकर अपने सब गणों को बुलवा लिया॥2॥
* सिव अनुसासन सुनि सब आए। प्रभु पद जलज सीस तिन्ह नाए॥
नाना बाहन नाना बेषा। बिहसे सिव समाज निज देखा॥3॥
भावार्थ:-शिवजी की आज्ञा सुनते ही सब चले आए और उन्होंने स्वामी के चरण कमलों में सिर नवाया। तरह-तरह की सवारियों और तरह-तरह के वेष वाले अपने समाज को देखकर शिवजी हँसे॥3॥
* कोउ मुख हीन बिपुल मुख काहू। बिनु पद कर कोउ बहु पद बाहू॥
बिपुल नयन कोउ नयन बिहीना। रिष्टपुष्ट कोउ अति तनखीना॥4॥
भावार्थ:-कोई बिना मुख का है, किसी के बहुत से मुख हैं, कोई बिना हाथ-पैर का है तो किसी के कई हाथ-पैर हैं। किसी के बहुत आँखें हैं तो किसी के एक भी आँख नहीं है। कोई बहुत मोटा-ताजा है, तो कोई बहुत ही दुबला-पतला है॥4॥
छंद :
* तन कीन कोउ अति पीन पावन कोउ अपावन गति धरें।
भूषन कराल कपाल कर सब सद्य सोनित तन भरें॥
खर स्वान सुअर सृकाल मुख गन बेष अगनित को गनै।
बहु जिनस प्रेत पिसाच जोगि जमात बरनत नहिं बनै॥
भावार्थ:-कोई बहुत दुबला, कोई बहुत मोटा, कोई पवित्र और कोई अपवित्र वेष धारण किए हुए है। भयंकर गहने पहने हाथ में कपाल लिए हैं और सब के सब शरीर में ताजा खून लपेटे हुए हैं। गधे, कुत्ते, सूअर और सियार के से उनके मुख हैं। गणों के अनगिनत वेषों को कौन गिने? बहुत प्रकार के प्रेत, पिशाच और योगिनियों की जमाते हैं। उनका वर्णन करते नहीं बनता।
सोरठा :
* नाचहिं गावहिं गीत परम तरंगी भूत सब।
देखत अति बिपरीत बोलहिं बचन बिचित्र बिधि॥93॥
भावार्थ:-भूत-प्रेत नाचते और गाते हैं, वे सब बड़े मौजी हैं। देखने में बहुत ही बेढंगे जान पड़ते हैं और बड़े ही विचित्र ढंग से बोलते हैं॥93॥
चौपाई :
* जस दूलहु तसि बनी बराता। कौतुक बिबिध होहिं मग जाता॥
इहाँ हिमाचल रचेउ बिताना। अति बिचित्र नहिं जाइ बखाना॥1॥
भावार्थ:-जैसा दूल्हा है, अब वैसी ही बारात बन गई है। मार्ग में चलते हुए भाँति-भाँति के कौतुक (तमाशे) होते जाते हैं। इधर हिमाचल ने ऐसा विचित्र मण्डप बनाया कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता॥1॥
* सैल सकल जहँ लगि जग माहीं। लघु बिसाल नहिं बरनि सिराहीं॥
बन सागर सब नदी तलावा। हिमगिरि सब कहुँ नेवत पठावा॥2॥
भावार्थ:-जगत में जितने छोटे-बड़े पर्वत थे, जिनका वर्णन करके पार नहीं मिलता तथा जितने वन, समुद्र, नदियाँ और तालाब थे, हिमाचल ने सबको नेवता भेजा॥2॥
* कामरूप सुंदर तन धारी। सहित समाज सहित बर नारी॥
गए सकल तुहिमाचल गेहा। गावहिं मंगल सहित सनेहा॥3॥
भावार्थ:-वे सब अपनी इच्छानुसार रूप धारण करने वाले सुंदर शरीर धारण कर सुंदरी स्त्रियों और समाजों के साथ हिमाचल के घर गए। सभी स्नेह सहित मंगल गीत गाते हैं॥3॥
* प्रथमहिं गिरि बहु गृह सँवराए। जथाजोगु तहँ तहँ सब छाए॥
पुर सोभा अवलोकि सुहाई। लागइ लघु बिरंचि निपुनाई॥4॥
भावार्थ:-हिमाचल ने पहले ही से बहुत से घर सजवा रखे थे। यथायोग्य उन-उन स्थानों में सब लोग उतर गए। नगर की सुंदर शोभा देखकर ब्रह्मा की रचना चातुरी भी तुच्छ लगती थी॥4॥
छन्द :
* लघु लाग बिधि की निपुनता अवलोकि पुर सोभा सही।
बन बाग कूप तड़ाग सरिता सुभग सब सक को कही॥
मंगल बिपुल तोरन पताका केतु गृह गृह सोहहीं।
बनिता पुरुष सुंदर चतुर छबि देखि मुनि मन मोहहीं॥
भावार्थ:-नगर की शोभा देखकर ब्रह्मा की निपुणता सचमुच तुच्छ लगती है। वन, बाग, कुएँ, तालाब, नदियाँ सभी सुंदर हैं, उनका वर्णन कौन कर सकता है? घर-घर बहुत से मंगल सूचक तोरण और ध्वजा-पताकाएँ सुशोभित हो रही हैं। वहाँ के सुंदर और चतुर स्त्री-पुरुषों की छबि देखकर मुनियों के भी मन मोहित हो जाते हैं॥
दोहा :
* जगदंबा जहँ अवतरी सो पुरु बरनि कि जाइ।
रिद्धि सिद्धि संपत्ति सुख नित नूतन अधिकाइ॥94॥
भावार्थ:-जिस नगर में स्वयं जगदम्बा ने अवतार लिया, क्या उसका वर्णन हो सकता है? वहाँ ऋद्धि, सिद्धि, सम्पत्ति और सुख नित-नए बढ़ते जाते हैं॥94॥
चौपाई :
* नगर निकट बरात सुनि आई। पुर खरभरु सोभा अधिकाई॥
करि बनाव सजि बाहन नाना। चले लेन सादर अगवाना॥1॥
भावार्थ:-बारात को नगर के निकट आई सुनकर नगर में चहल-पहल मच गई, जिससे उसकी शोभा बढ़ गई। अगवानी करने वाले लोग बनाव-श्रृंगार करके तथा नाना प्रकार की सवारियों को सजाकर आदर सहित बारात को लेने चले॥1॥
* हियँ हरषे सुर सेन निहारी। हरिहि देखि अति भए सुखारी॥
सिव समाज जब देखन लागे। बिडरि चले बाहन सब भागे॥2॥
भावार्थ:-देवताओं के समाज को देखकर सब मन में प्रसन्न हुए और विष्णु भगवान को देखकर तो बहुत ही सुखी हुए, किन्तु जब शिवजी के दल को देखने लगे तब तो उनके सब वाहन (सवारियों के हाथी, घोड़े, रथ के बैल आदि) डरकर भाग चले॥2॥
* धरि धीरजु तहँ रहे सयाने। बालक सब लै जीव पराने॥
गएँ भवन पूछहिं पितु माता। कहहिं बचन भय कंपित गाता॥3॥
भावार्थ:-कुछ बड़ी उम्र के समझदार लोग धीरज धरकर वहाँ डटे रहे। लड़के तो सब अपने प्राण लेकर भागे। घर पहुँचने पर जब माता-पिता पूछते हैं, तब वे भय से काँपते हुए शरीर से ऐसा वचन कहते हैं॥3॥
* कहिअ काह कहि जाइ न बाता। जम कर धार किधौं बरिआता॥
बरु बौराह बसहँ असवारा। ब्याल कपाल बिभूषन छारा॥4॥
भावार्थ:-क्या कहें, कोई बात कही नहीं जाती। यह बारात है या यमराज की सेना? दूल्हा पागल है और बैल पर सवार है। साँप, कपाल और राख ही उसके गहने हैं॥4॥
छन्द :
* तन छार ब्याल कपाल भूषन नगन जटिल भयंकरा।
सँग भूत प्रेत पिसाच जोगिनि बिकट मुख रजनीचरा॥
जो जिअत रहिहि बरात देखत पुन्य बड़ तेहि कर सही।
देखिहि सो उमा बिबाहु घर घर बात असि लरिकन्ह कही॥
भावार्थ:-दूल्हे के शरीर पर राख लगी है, साँप और कपाल के गहने हैं, वह नंगा, जटाधारी और भयंकर है। उसके साथ भयानक मुखवाले भूत, प्रेत, पिशाच, योगिनियाँ और राक्षस हैं, जो बारात को देखकर जीता बचेगा, सचमुच उसके बड़े ही पुण्य हैं और वही पार्वती का विवाह देखेगा। लड़कों ने घर-घर यही बात कही।
दोहा :
* समुझि महेस समाज सब जननि जनक मुसुकाहिं।
बाल बुझाए बिबिध बिधि निडर होहु डरु नाहिं॥95॥
भावार्थ:-महेश्वर (शिवजी) का समाज समझकर सब लड़कों के माता-पिता मुस्कुराते हैं। उन्होंने बहुत तरह से लड़कों को समझाया कि निडर हो जाओ, डर की कोई बात नहीं है॥95॥
चौपाई :
* लै अगवान बरातहि आए। दिए सबहि जनवास सुहाए॥
मैनाँ सुभ आरती सँवारी। संग सुमंगल गावहिं नारी॥1॥
भावार्थ:-अगवान लोग बारात को लिवा लाए, उन्होंने सबको सुंदर जनवासे ठहरने को दिए। मैना (पार्वतीजी की माता) ने शुभ आरती सजाई और उनके साथ की स्त्रियाँ उत्तम मंगलगीत गाने लगीं॥1॥
* कंचन थार सोह बर पानी। परिछन चली हरहि हरषानी॥
बिकट बेष रुद्रहि जब देखा। अबलन्ह उर भय भयउ बिसेषा॥2॥
भावार्थ:-सुंदर हाथों में सोने का थाल शोभित है, इस प्रकार मैना हर्ष के साथ शिवजी का परछन करने चलीं। जब महादेवजी को भयानक वेष में देखा तब तो स्त्रियों के मन में बड़ा भारी भय उत्पन्न हो गया॥2॥
* भागि भवन पैठीं अति त्रासा। गए महेसु जहाँ जनवासा॥
मैना हृदयँ भयउ दुखु भारी। लीन्ही बोली गिरीसकुमारी॥3॥
भावार्थ:-बहुत ही डर के मारे भागकर वे घर में घुस गईं और शिवजी जहाँ जनवासा था, वहाँ चले गए। मैना के हृदय में बड़ा दुःख हुआ, उन्होंने पार्वतीजी को अपने पास बुला लिया॥3॥
* अधिक सनेहँ गोद बैठारी। स्याम सरोज नयन भरे बारी॥
जेहिं बिधि तुम्हहि रूपु अस दीन्हा। तेहिं जड़ बरु बाउर कस कीन्हा॥4॥
भावार्थ:-और अत्यन्त स्नेह से गोद में बैठाकर अपने नीलकमल के समान नेत्रों में आँसू भरकर कहा- जिस विधाता ने तुमको ऐसा सुंदर रूप दिया, उस मूर्ख ने तुम्हारे दूल्हे को बावला कैसे बनाया?॥4॥
छन्द :
* कस कीन्ह बरु बौराह बिधि जेहिं तुम्हहि सुंदरता दई।
जो फलु चहिअ सुरतरुहिं सो बरबस बबूरहिं लागई॥
तुम्ह सहित गिरि तें गिरौं पावक जरौं जलनिधि महुँ परौं।
घरु जाउ अपजसु होउ जग जीवत बिबाहु न हौं करौं॥
भावार्थ:-जिस विधाता ने तुमको सुंदरता दी, उसने तुम्हारे लिए वर बावला कैसे बनाया? जो फल कल्पवृक्ष में लगना चाहिए, वह जबर्दस्ती बबूल में लग रहा है। मैं तुम्हें लेकर पहाड़ से गिर पड़ूँगी, आग में जल जाऊँगी या समुद्र में कूद पड़ूँगी। चाहे घर उजड़ जाए और संसार भर में अपकीर्ति फैल जाए, पर जीते जी मैं इस बावले वर से तुम्हारा विवाह न करूँगी।
दोहा :
* भईं बिकल अबला सकल दुखित देखि गिरिनारि।
करि बिलापु रोदति बदति सुता सनेहु सँभारि॥96॥।
भावार्थ:-हिमाचल की स्त्री (मैना) को दुःखी देखकर सारी स्त्रियाँ व्याकुल हो गईं। मैना अपनी कन्या के स्नेह को याद करके विलाप करती, रोती और कहती थीं-॥96॥
चौपाई :
* नारद कर मैं काह बिगारा। भवनु मोर जिन्ह बसत उजारा॥
अस उपदेसु उमहि जिन्ह दीन्हा। बौरे बरहि लागि तपु कीन्हा॥1॥
भावार्थ:-मैंने नारद का क्या बिगाड़ा था, जिन्होंने मेरा बसता हुआ घर उजाड़ दिया और जिन्होंने पार्वती को ऐसा उपदेश दिया कि जिससे उसने बावले वर के लिए तप किया॥1॥
* साचेहुँ उन्ह कें मोह न माया। उदासीन धनु धामु न जाया॥
पर घर घालक लाज न भीरा। बाँझ कि जान प्रसव कै पीरा॥2॥
भावार्थ:-सचमुच उनके न किसी का मोह है, न माया, न उनके धन है, न घर है और न स्त्री ही है, वे सबसे उदासीन हैं। इसी से वे दूसरे का घर उजाड़ने वाले हैं। उन्हें न किसी की लाज है, न डर है। भला, बाँझ स्त्री प्रसव की पीड़ा को क्या जाने॥2॥
* जननिहि बिकल बिलोकि भवानी। बोली जुत बिबेक मृदु बानी॥
अस बिचारि सोचहि मति माता। सो न टरइ जो रचइ बिधाता॥3॥
भावार्थ:-माता को विकल देखकर पार्वतीजी विवेकयुक्त कोमल वाणी बोलीं- हे माता! जो विधाता रच देते हैं, वह टलता नहीं, ऐसा विचार कर तुम सोच मत करो!॥3॥
* करम लिखा जौं बाउर नाहू। तौ कत दोसु लगाइअ काहू॥
तुम्ह सन मिटहिं कि बिधि के अंका। मातु ब्यर्थ जनि लेहु कलंका॥4॥
भावार्थ:-जो मेरे भाग्य में बावला ही पति लिखा है, तो किसी को क्यों दोष लगाया जाए? हे माता! क्या विधाता के अंक तुमसे मिट सकते हैं? वृथा कलंक का टीका मत लो॥4॥
छन्द :
* जनि लेहु मातु कलंकु करुना परिहरहु अवसर नहीं।
दुखु सुखु जो लिखा लिलार हमरें जाब जहँ पाउब तहीं॥
सुनि उमा बचन बिनीत कोमल सकल अबला सोचहीं।
बहु भाँति बिधिहि लगाइ दूषन नयन बारि बिमोचहीं॥
भावार्थ:-हे माता! कलंक मत लो, रोना छोड़ो, यह अवसर विषाद करने का नहीं है। मेरे भाग्य में जो दुःख-सुख लिखा है, उसे मैं जहाँ जाऊँगी, वहीं पाऊँगी! पार्वतीजी के ऐसे विनय भरे कोमल वचन सुनकर सारी स्त्रियाँ सोच करने लगीं और भाँति-भाँति से विधाता को दोष देकर आँखों से आँसू बहाने लगीं।
दोहा :
* तेहि अवसर नारद सहित अरु रिषि सप्त समेत।
समाचार सुनि तुहिनगिरि गवने तुरत निकेत॥97॥
भावार्थ:-इस समाचार को सुनते ही हिमाचल उसी समय नारदजी और सप्त ऋषियों को साथ लेकर अपने घर गए॥97॥
चौपाई :
* तब नारद सबही समुझावा। पूरुब कथा प्रसंगु सुनावा॥
मयना सत्य सुनहु मम बानी। जगदंबा तव सुता भवानी॥1॥
भावार्थ:-तब नारदजी ने पूर्वजन्म की कथा सुनाकर सबको समझाया (और कहा) कि हे मैना! तुम मेरी सच्ची बात सुनो, तुम्हारी यह लड़की साक्षात जगज्जनी भवानी है॥1॥
* अजा अनादि सक्ति अबिनासिनि। सदा संभु अरधंग निवासिनि॥
जग संभव पालन लय कारिनि। निज इच्छा लीला बपु धारिनि॥2॥
भावार्थ:-ये अजन्मा, अनादि और अविनाशिनी शक्ति हैं। सदा शिवजी के अर्द्धांग में रहती हैं। ये जगत की उत्पत्ति, पालन और संहार करने वाली हैं और अपनी इच्छा से ही लीला शरीर धारण करती हैं॥2॥
* जनमीं प्रथम दच्छ गृह जाई। नामु सती सुंदर तनु पाई॥
तहँहुँ सती संकरहि बिबाहीं। कथा प्रसिद्ध सकल जग माहीं॥3॥
भावार्थ:-पहले ये दक्ष के घर जाकर जन्मी थीं, तब इनका सती नाम था, बहुत सुंदर शरीर पाया था। वहाँ भी सती शंकरजी से ही ब्याही गई थीं। यह कथा सारे जगत में प्रसिद्ध है॥3॥
* एक बार आवत सिव संगा। देखेउ रघुकुल कमल पतंगा॥
भयउ मोहु सिव कहा न कीन्हा। भ्रम बस बेषु सीय कर लीन्हा॥4॥
भावार्थ:-एक बार इन्होंने शिवजी के साथ आते हुए (राह में) रघुकुल रूपी कमल के सूर्य श्री रामचन्द्रजी को देखा, तब इन्हें मोह हो गया और इन्होंने शिवजी का कहना न मानकर भ्रमवश सीताजी का वेष धारण कर लिया॥4॥
छन्द :
* सिय बेषु सतीं जो कीन्ह तेहिं अपराध संकर परिहरीं।
हर बिरहँ जाइ बहोरि पितु कें जग्य जोगानल जरीं॥
अब जनमि तुम्हरे भवन निज पति लागि दारुन तपु किया।
अस जानि संसय तजहु गिरिजा सर्बदा संकरप्रिया॥
भावार्थ:-सतीजी ने जो सीता का वेष धारण किया, उसी अपराध के कारण शंकरजी ने उनको त्याग दिया। फिर शिवजी के वियोग में ये अपने पिता के यज्ञ में जाकर वहीं योगाग्नि से भस्म हो गईं। अब इन्होंने तुम्हारे घर जन्म लेकर अपने पति के लिए कठिन तप किया है ऐसा जानकर संदेह छोड़ दो, पार्वतीजी तो सदा ही शिवजी की प्रिया (अर्द्धांगिनी) हैं।
दोहा :
* सुनि नारद के बचन तब सब कर मिटा बिषाद।
छन महुँ ब्यापेउ सकल पुर घर घर यह संबाद॥98॥
भावार्थ:-तब नारद के वचन सुनकर सबका विषाद मिट गया और क्षणभर में यह समाचार सारे नगर में घर-घर फैल गया॥98॥
चौपाई :
* तब मयना हिमवंतु अनंदे। पुनि पुनि पारबती पद बंदे॥
नारि पुरुष सिसु जुबा सयाने। नगर लोग सब अति हरषाने॥1॥
भावार्थ:-तब मैना और हिमवान आनंद में मग्न हो गए और उन्होंने बार-बार पार्वती के चरणों की वंदना की। स्त्री, पुरुष, बालक, युवा और वृद्ध नगर के सभी लोग बहुत प्रसन्न हुए॥1॥
* लगे होन पुर मंगल गाना। सजे सबहिं हाटक घट नाना॥
भाँति अनेक भई जेवनारा। सूपसास्त्र जस कछु ब्यवहारा॥2॥
भावार्थ:-नगर में मंगल गीत गाए जाने लगे और सबने भाँति-भाँति के सुवर्ण के कलश सजाए। पाक शास्त्र में जैसी रीति है, उसके अनुसार अनेक भाँति की ज्योनार हुई (रसोई बनी)॥2॥
*सो जेवनार कि जाइ बखानी। बसहिं भवन जेहिं मातु भवानी॥
सादर बोले सकल बराती। बिष्नु बिरंचि देव सब जाती॥3॥
भावार्थ:-जिस घर में स्वयं माता भवानी रहती हों, वहाँ की ज्योनार (भोजन सामग्री) का वर्णन कैसे किया जा सकता है? हिमाचल ने आदरपूर्वक सब बारातियों, विष्णु, ब्रह्मा और सब जाति के देवताओं को बुलवाया॥3॥
* बिबिधि पाँति बैठी जेवनारा। लागे परुसन निपुन सुआरा॥
नारिबृंद सुर जेवँत जानी। लगीं देन गारीं मृदु बानी॥4॥
भावार्थ:-भोजन (करने वालों) की बहुत सी पंगतें बैठीं। चतुर रसोइए परोसने लगे। स्त्रियों की मंडलियाँ देवताओं को भोजन करते जानकर कोमल वाणी से गालियाँ देने लगीं॥4॥
छन्द :
* गारीं मधुर स्वर देहिं सुंदरि बिंग्य बचन सुनावहीं।
भोजनु करहिं सुर अति बिलंबु बिनोदु सुनि सचु पावहीं॥
जेवँत जो बढ्यो अनंदु सो मुख कोटिहूँ न परै कह्यो।
अचवाँइ दीन्हें पान गवने बास जहँ जाको रह्यो॥
भावार्थ:-सब सुंदरी स्त्रियाँ मीठे स्वर में गालियाँ देने लगीं और व्यंग्य भरे वचन सुनाने लगीं। देवगण विनोद सुनकर बहुत सुख अनुभव करते हैं, इसलिए भोजन करने में बड़ी देर लगा रहे हैं। भोजन के समय जो आनंद बढ़ा वह करोड़ों मुँह से भी नहीं कहा जा सकता। (भोजन कर चुकने पर) सबके हाथ-मुँह धुलवाकर पान दिए गए। फिर सब लोग, जो जहाँ ठहरे थे, वहाँ चले गए।
दोहा :
*बहुरि मुनिन्ह हिमवंत कहुँ लगन सुनाई आइ।
समय बिलोकि बिबाह कर पठए देव बोलाइ॥99॥
भावार्थ:-फिर मुनियों ने लौटकर हिमवान्‌ को लगन (लग्न पत्रिका) सुनाई और विवाह का समय देखकर देवताओं को बुला भेजा॥99॥
चौपाई :
* बोलि सकल सुर सादर लीन्हे। सबहि जथोचित आसन दीन्हे॥
बेदी बेद बिधान सँवारी। सुभग सुमंगल गावहिं नारी॥1॥
भावार्थ:-सब देवताओं को आदर सहित बुलवा लिया और सबको यथायोग्य आसन दिए। वेद की रीति से वेदी सजाई गई और स्त्रियाँ सुंदर श्रेष्ठ मंगल गीत गाने लगीं॥1॥
* सिंघासनु अति दिब्य सुहावा। जाइ न बरनि बिरंचि बनावा॥
बैठे सिव बिप्रन्ह सिरु नाई। हृदयँ सुमिरि निज प्रभु रघुराई॥2॥
भावार्थ:-वेदिका पर एक अत्यन्त सुंदर दिव्य सिंहासन था, जिस (की सुंदरता) का वर्णन नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह स्वयं ब्रह्माजी का बनाया हुआ था। ब्राह्मणों को सिर नवाकर और हृदय में अपने स्वामी श्री रघुनाथजी का स्मरण करके शिवजी उस सिंहासन पर बैठ गए॥2॥
* बहुरि मुनीसन्ह उमा बोलाईं। करि सिंगारु सखीं लै आईं॥
देखत रूपु सकल सुर मोहे। बरनै छबि अस जग कबि को है॥3॥
भावार्थ:-फिर मुनीश्वरों ने पार्वतीजी को बुलाया। सखियाँ श्रृंगार करके उन्हें ले आईं। पार्वतीजी के रूप को देखते ही सब देवता मोहित हो गए। संसार में ऐसा कवि कौन है, जो उस सुंदरता का वर्णन कर सके?॥3॥
* जगदंबिका जानि भव भामा। सुरन्ह मनहिं मन कीन्ह प्रनामा॥
सुंदरता मरजाद भवानी। जाइ न कोटिहुँ बदन बखानी॥4॥
भावार्थ:-पार्वतीजी को जगदम्बा और शिवजी की पत्नी समझकर देवताओं ने मन ही मन प्रणाम किया। भवानीजी सुंदरता की सीमा हैं। करोड़ों मुखों से भी उनकी शोभा नहीं कही जा सकती॥4॥
छन्द :
* कोटिहुँ बदन नहिं बनै बरनत जग जननि सोभा महा।
सकुचहिं कहत श्रुति सेष सारद मंदमति तुलसीकहा॥
छबिखानि मातु भवानि गवनीं मध्य मंडप सिव जहाँ।
अवलोकि सकहिं न सकुच पति पद कमल मनु मधुकरु तहाँ॥
भावार्थ:-जगज्जननी पार्वतीजी की महान शोभा का वर्णन करोड़ों मुखों से भी करते नहीं बनता। वेद, शेषजी और सरस्वतीजी तक उसे कहते हुए सकुचा जाते हैं, तब मंदबुद्धि तुलसी किस गिनती में है? सुंदरता और शोभा की खान माता भवानी मंडप के बीच में, जहाँ शिवजी थे, वहाँ गईं। वे संकोच के मारे पति (शिवजी) के चरणकमलों को देख नहीं सकतीं, परन्तु उनका मन रूपी भौंरा तो वहीं (रसपान कर रहा) था।


Shiva’s bizarre procession and wedding preparations
Doha:
* Lage adorned Gross Sur Bahan Bibidh Biman.
Hohin Sagun Mangal Subhad Karhin Apchara Anthem ॥91॥
Meaning: – All the gods started decorating their vehicles and aircraft like their own, the well-known Mangal Shakuns started and the Apsaras started singing ॥91॥
Bunk:
* Sivhi Sambhu Gun Karahin Singara. Jata mukut ahi mauru sarnara॥
Kundal Kankan Pyahara Tan Bibhuti Pat Kehari Blister ॥1॥
Sense: Shiva’s gana started adorning Shivji. A crown of jatas was made and decorated with snakes. Shivji wore the coil and kankan of the snakes, worshiped Vibhuti on the body and wrapped the tiger in place of the cloth ॥1॥
* Sasi frontal beautiful head Ganges. Nayan trie sabit bhujanga॥
Garl Kanth ur male head garland. Asiva Besh Sivdham Kripla ॥2॥
Sense: There was a moon on Shivaji’s beautiful head, Gangaji on his head, three eyes, a serpent of snakes, venom in the throat and a garland of soft bones on the chest. In this way, even if their dress is inauspicious, they are the abode of welfare and kind. ॥2॥
* Kar trisul aru damru biraja. Come, just climb, Bajhin Baja
See, Sivhi Surtariya Musukahi Bur laul dulahini jag na ॥3॥
Meaning: Trident in one hand and Damru in the other is graceful. Shivji climbed on the bull. Instruments are playing Devangans are smiling (and saying that) seeing Shiva, they will not be found worthy of this groom in the world ॥3॥
* Bishnu Biranchi etc. Surabrata. Climbed out
The society is like everything. Nahin Barat Dulah Anupraka ॥4॥
Connotation: – The groups of gods like Vishnu and Brahma etc. boarded their vehicles (riders) and went to the procession. The society of the gods was unique in all respects, but there was no procession worthy of the groom.
Doha:
* Bishnu said as bihasi then speak gross disrage.
The society with all personalities ॥92॥
Meaning: – Then Lord Vishnu called all the dikpalas and laughing and said so – Let everyone, including their respective parties, come separately and ॥92॥.
Bunk:
* Bar Anuhari Barat Na Bhai. Laughed at God
Bishnu Bachan Suni Sur Musukane. Nije Nij Sen Sen Billangane ॥1॥
Meaning: O brother! This procession of us is not worthy of groom. Will you go to the city and make you laugh? Hearing the talk of Lord Vishnu, the gods smiled and they separated along with their army ॥1॥
* Manne Mane Mahesu Musukahi. There is no saving of life without God.
Very dear Bachchan Sunat dear Kere. Bhringhi Prairie Gross Gun Terre ॥2॥
Meaning: -Mahadevji (seeing this) smiles mind-to-mind that Vishnu does not miss the sarcastic words of God. Hearing these very dear words of his beloved (Lord Vishnu), Shivji also sent his beggar and called all his people ॥2॥.
Everyone came here only. Prabhu pad jalaj sis tinh naye
Nana Bahan Nana Baisha. Saw Sew Samaj Nija ॥3॥
Meaning: On hearing Shivaji’s orders, everyone came and gave him head in the lotus feet of Swami. Shiva laughed seeing his society with different types of riders and different types of ॥3॥.
* Kou mukh heen bipul muk kahu. Without doing any work, there are many verses.
Bipul Nayan Kou Nayan Bihina. Very well-behaved. ॥4॥
Meaning: Someone is without face, someone has many faces, some is without hands and feet and some have many hands and feet. If someone has many eyes, no one has an eye. Some are very fat and fresh, some are very thin ॥4॥
Verses:
* Tan kin ko ko ati peen pov ko, keep the pace unchanged.
Fill all the corporeal body with a bruise karla kapal.
Khar Swan Pig Creatal Mouth Gun Besh Agnit.
The majority of the phantom Pisac Jogi is not formed.
Meaning: Some are very lean, some are very fat, some are pure and some are wearing impure clothes. Wearing ghastly ornaments, they have a skull in their hands and all of them have fresh blood wrapped in their bodies. Their faces are from donkeys, dogs, pigs and jackals. Who counted the countless vestments of gana? There are many types of phantoms, vampires and yogis. They are not made to describe them.
Soratha:
* Nachhin Gawhin Geet Param Tarangi Bhoot all.
See the very Biprīn Bolhin Bachchan Bichitra Bidhi ॥93॥
Connotation: – The ghost-phantom dances and sings, they are all capricious. Looks very clumsy and speaks very strangely ॥93॥
Bunk:
* Like Dulhu Tasi Bani Barata. Prodigal
Here to spend Himachal. Do not overdo it. ख1॥
Meaning: Like a groom, now the procession has become the same. While walking along the road, they become curiosities. Here Himachal created such a strange pavilion that it cannot be described. ॥1॥
* Sail gross where the world is not there. Minor Bisal Nahin Barani Sehri॥
Ban Sagar Sub River Talaaw Himgiri sub kahun nevat pathawa ॥2॥
Meaning: As many small and big mountains were in the world, which cannot be crossed by describing and as many forests, seas, rivers and ponds, Himachal sent an invitation to everyone ॥2॥
* Kamrup beautiful tan stripe. Including women, including women
Gaya Sakal Tuhimachal Geha. Ganehi Mangal Saneha ॥3॥
Meaning: They all went to Himachal’s home with beautiful women and societies wearing beautiful bodies as they desired. All sing Mars songs with affection ॥3॥
* First house Giri multi house As soon as possible, there is no silence.
Pur Sobha Avaloki Suhai. Implemented Small Birnchi Nipunai ॥4॥
Meaning: – Himachal had already decorated many houses. Everyone deservedly landed in those places. Seeing the beautiful beauty of the city, Brahma’s creation Chaturi also seemed insignificant ॥4॥
Verse:
* Nippalata Avloki Pur Sobha right of short people.
Ban Bagh Kup Tadag Sarita said to all the people.
Mangal Bipul Toran Patka Ketu Griha Ghar Sohhi.
Banita Purush beautiful beautiful picture
Meaning: Seeing the beauty of the city, Brahma’s mastery really seems insignificant. Forests, gardens, wells

Aaliab, rivers are all beautiful, who can describe them? A lot of Mars poles and flag-bearers are beautifying from house to house. Seeing the images of beautiful and clever women and men there, even the sages are captivated.
Doha:
* Jagdamba is born where the person leaves.
Riddhi Siddhi Property Sukh Nitan Nutan Adhikari ॥94॥
Meaning: Jagadamba himself incarnated in the city, can he be described? There Riddhi, Siddhi, Wealth and Happiness grow ever-increasing ॥94॥
Bunk:
* The city came near Barat Suni. Pur Kharbharu Sobha Adhyaya
Kari Banav Sajhi Bahan Nana. Chale Lane Regards Agwana ॥1॥
Meaning: Hearing the marriage near the city, there was a stir in the city, which increased its beauty. The people who received the reception went to take the procession with respect by decorating and decorating various types of riders.
* Hi Hershe Sur Sen Nihari. See Harihi, very dear
Sew society when seen. Bidhan goes to Bahan, everyone runs away ॥2॥
Sense: Everyone was happy to see the society of gods and Vishnu was very happy to see God, but when he started seeing Shivji’s team, then all his vehicles (elephants of horsemen, horses, chariots, etc.) were scared Run away ॥2॥
* Dhee Dhiraju is tinkling. Children, all living creatures
He went to the house asking Pitu Mata. Kahin Bachaan Fear Staggers Sings ॥3॥
Sense: Some very wise people endured and stayed there. The boys all ran away with their lives. On reaching home, when parents ask, then they say such a promise to the body trembling with fear ॥3॥
* Kahi kah kahi kahi kahi na bata Fiercely free
Baru Baurah Bashan Aswara. Beyal Kapal Bibhushan Chhara ॥4॥
Meaning: – Say, nothing is said. Is this a procession or an army of Yamraj? The groom is mad and rides on the bull. Snake, skull and ashes are his ornaments ॥4॥
Verse:
* Tan chhar biyal kapal bhushan ngan intricate cowardice.
Song Bhoot Phantom Pisach Jogini Biket Mukh Rajanichara॥
The person who is living, watching the marriage is right after doing the same.
Look, so Uma Bibahu said every thing about the house.
Bhartharth: – The bridegroom’s body is covered with ashes, snakes and skull ornaments, he is naked, jatadhari and fierce. She is accompanied by terrifying-faced ghosts, phantoms, vampires, yoginis and demons, who will survive by seeing the procession, is truly her great virtue and will see the marriage of Parvati. The boys said the same from house to house.
Doha:
* Samuzhi Mahes Samaj Sub Janak Janak Musukahin.
Child extinguished Bididhi Bidhi fearless Hohu Duru Nahan ॥95॥
Meaning: Understanding the society of Maheshwar (Shivji), parents of all boys smile. He kindly explained to the boys that be fearless, there is nothing to fear ॥95॥
Bunk:
* Le Agwan came to Barathi. Let the people live well
Main Subha Aarti Sanwari With Sumangal Gawhi Nari ॥1॥
Meaning: – The firemen brought the wedding procession, they gave everyone a beautiful stay. Maina (mother of Parvati ji) decorated the auspicious aarti and the women accompanying her started singing good songs. ॥1॥
* Kanchan Thar Soh Bur Water. Perception lasted Hari Harshani
When seen Biket Baish Rudrahi. Ablanh ur bhaya bhayu bisesha ॥2॥
Connotation: – The plank of gold is beautiful in beautiful hands, thus Maina went to hug Shiva with joy. When Mahadevji was seen in a terrible rage, then a great fear arose in the minds of women.
* Bhagi Bhavan Paithi Ati Trasa. Mahesu Jahan Janwasa
Maina heart awe sad Linhi Boli Giriskumari ॥3॥
Meaning: She ran into the house due to fear and went to the place where Shivaji was living. Maina felt very sad in his heart, he called Parvatiji to him ॥3॥
* More than one lap. Syam Saroj Nayan Bhaare Bari
Jehin bidhi tumhi rupu as dinha. Tehin root baru bauer kas kinha ॥4॥
Sense: And sitting in your lap with utmost affection, filled your eyes like tears with tears, and said – How did the fool who gave you such a beautiful look make your groom mad? ॥4॥
Verse:
* Kas kineh baru baurah biddhi jehin tumhi beauty
Which is so beautiful, so long is Baburhin.
With you, you must fall in water, I am going to water.
Gharu jau apajasu ho jug jivat bibahu na hoon karoon
Meaning: The creator who gave you beauty, how did he make you a mad man? The fruit which should be planted in the Kalpavriksha, is forcefully planted in acacia. I will fall from the mountain with you, burn in a fire or jump into the sea. Even if the house goes to ruin and disgrace spreads throughout the world, but I will not marry you with this mad bride.
Doha:
* Brother Bikal Abla is grossly sad to see Girinari.
Kari Bilapu Rodati Badti Suta Sanehu Sambhari ॥96॥.
Meaning: – On seeing Himachala’s woman (Maina) sad, all the women got distraught. Remembering the affection of her daughter, Maina used to mourn, cry and say -96
Bunk:
* Narada Kar I Kah Bigara. Bhawanu peacock jin basat ujara
As upadesu umhi jin dinha. Baur Barhi Lagi Tapu Kinha ॥1॥
Bhaartarth: – I was spoiled by Narada, who ruined my dwellings and who preached to Parvati that he meditated for the mad bride ॥1॥
* True, I do not love them. Neutral Dhanu Dhamu na jaay
But the house was not ashamed Sterile life delivery cumin ॥2॥
Meaning: True, they have no attachment to anyone, neither Maya, nor their wealth, neither house nor woman, they are most indifferent. With this, they are going to destroy the other’s house. He is neither ashamed nor afraid of anyone. Who knows the pain of childless, sterile woman स्त्री2॥
* Jananihi Bikal Biloki Bhavani. Boli jut bibek soft bani॥
As bachari thinking mother Whoever did so was the creator, ॥3॥
Meaning: Parvatiji, seeing the mother as a voice, uttered a soft voice- O mother! The creator who creates, does not stop, do not think by thinking like this! ॥3॥
* Karam wrote Jaun Bauer Nahu. Tau kat dosu lagaiya kahu
I hope that the marks of Bidhi Matu Byrth Jani Lehu Kalanka ॥4॥
Sense: Whoever has written a mad husband in my destiny, so why blame anyone? Hey mother Can the points of the creator be erased from you? Do not take vaccine for stigma ॥4॥
Verse:
* Jani lehu matu kalanku karuna pariharahu not an opportunity.
Dukhu Sukhu which is written Lilaar Humare jahab wherever
Suni Uma Bachaan Binit Komal Sakal Abla Do not think.
Do not put a multi-way bidhion
Meaning: O mother! Do not take stigma, stop crying, this is not an opportunity to gloom. I will find the sadness and happiness written in my destiny, wherever I go! Hearing such soft and gentle words of Parvatiji, all the women started thinking and, after blaming the creator, they started to shed tears.
Doha:
* Teh Avasa Narada including Aru Rishi Sapta.
News Sun Tuhinagiri Gawane Tikt Niket ॥97॥
Meaning: Hearing this news, Himachal at the same time took Naradji and Sapta Rishi along with him to his house ॥97॥
Bunk:
* Then Narada Sabhi Samuzhava. East story story
Mayna satya sunhu mam bani Jagdamba Tava Suta Bhavani ॥1॥
Meaning: Then Naradji narrated to him the story of the previous birth and explained to everyone (and said), O Mena! You listen to my truth, this girl of yours is a true Jagjjani Bhavani ॥1॥
* Aja Anadi Sakti Abinasini. Sada Sambhu Ardhang Niwasi
Jag possible follow rhythm carini. Personal wish leela bapu dharini ॥2॥
Meaning: They are unborn, eternal and Avinashini Shakti. Always lives in Shiva’s ardhanga. They are the origin, nurture and destroyer of the world and wear the Leela body of their own will. ॥2 शरीर
* Janmi went to the first Dacha Griha. Namu Sati Beautiful Tanu Pai॥
Teh Sati Sankarhi is not there. Legend Famous Sakal Jag Mae ॥3॥
Meaning: Before she was born in Daksha’s house, she was named Sati, and found a very beautiful body. Sati Shankarji was married there too. This story is famous in the whole world ॥3॥
* One time Siv Sanga. See Raghukul Kamal Kite
Bhaiu Mohu Siv said neither The illusion just fizzled out and took ॥4॥
Sense: Once he saw Raghukul’s lotus Sun Sri Ramachandra in the form of Raghukul coming with Shivji, then he became fascinated and he confused Sita with the illusion of not believing Shivji.
Verse:
* Sage Beshu Satin who is a crime killer
Har birhan jai bahori pitu ke jagya joganal jari
Now Janmati Tumhare Bhawan is my husband and I have done Darun Tapu.
As Jani Sansay Tajhu Girija Sarbada Sankarpriya॥
Meaning: Sankaraji renounced her due to the same crime that Sita took on Seth. Then in the disconnection of Shivji, she went to her father’s yajna and consumed the yogagni there. Now, after taking birth in your home, she has done austerities for her husband and leave it in doubt, Parvati is always Shiva’s Priya (Ardhangini).
Doha:
* Suni Narada’s child then wiped all taxes
मह98 ब98
Meaning: After hearing Narada’s words, the grief of everyone disappeared and in a moment this news spread from house to house ॥98॥.
Bunk:
* Then Myna Himwantu was undefeated. Puni pun paribati post bande
Nari men Sisu Juba Sayane. All the people of the city are very angry ॥1॥
Sense: Then Maina and Himwan became engrossed in bliss and repeatedly worshiped the feet of Parvati. Women, men, children, young and old people of the city were very happy ॥1॥
* Lage Hon Pur Mangal Gaana. Dressed Sabahin Hatak Ghat Nana 4
Like many brothers Soupsastra Jas Turku Behavior ॥2॥
Bhaartarth: – Mangal songs started to be sung in the city and everyone decorated the urns of the golden form. According to the tradition in Pak Shastra, according to many ways, there were many kinds of Jyonar (kitchen made) ॥2॥
* So go to the banquet. Basahin Bhawan Jehin Matu Bhavani
Regards said Sakal Barati. Bishnu Birnchi Dev Sab Jaati जाती3॥
Meaning: How can one describe the Jionar (food stuff) in the house where Mata Bhavani herself lives? Himachal reverently summoned all the Baratis, Vishnu, Brahma and all caste deities ॥3॥
* Jevonara sitting on Bibidhi line. Lage Parusan Nipun Suara॥
Naribrind Sur Jeanti Jani. Lage was lost soft heart ॥4॥
Sense: A lot of the satires of food (doers) sat. The clever cook started serving. Knowing the food of the Gods, the congregations of women started abusing with soft speech ॥4॥
Verse:
* Gari sweet melody deh Sundari Bingya Bachchan Sunnavon Nahin.
Khanu Karhin Sur Ati Bilambu Binodu Suni Sachu Pavhi
Say the jewelery that grows up and the face is not there
Achwain dinhe paan gavne baas bahan jaho jako raho
Meaning: All the beautiful women started abusing in sweet tone and started uttering sarcastic words. Gods feel very happy after listening to Vinod, so they are taking too long to eat. The pleasure that was increased during the meal can not be said with crores of mouth. (After paying food) everyone was washed hands and mouth and fed. Then everyone went to the place where they stayed.
Doha:
* Bahuri Muninh Himwant Kahun Lagan Aaya
Dev Boli read without worrying about time ॥99॥
Meaning: – Then the sages returned and heard the lord (Lagna Patrika) on Himavan and seeing the time of marriage, they called the gods.
Bunk:
* Speak to the tune. Sabhi Jathochit Asan Dinhe
Bedi Bedi Bidhan Sanwari Subhag Sumangal Gavahin Nari ॥1॥
Sense: Calling all the gods with respect and giving them proper postures. The altar was decorated in the manner of Vedas and the women started singing beautiful beautiful songs ॥1॥
* Singhasanu Ati Dibya Suhawa. Jai Barani Birnchi is made
Sitting sewBarber Siru Barber. Hriday Sumiri nij Prabhu Raghurai ॥2॥
Bhaartarth: – There was a very beautiful divine throne on the Vedika, whose beauty (cannot be described), because it was made by Brahma himself. Shivaji sat on the throne by bringing Brahmins to his head and remembering his master Sri Raghunathji in the heart.
* Bahuri Munisanh Uma spoke. Kari Singaru Sakhi came
Dekhut Rupu Sakal Sur Mohe Bernai Chhabi As Jag Kabi Hai ॥3॥
Bhaarthar: – Then the Munisvaras called Parvatiji. Sakhis brought them up after makeup. On seeing the form of Parvatiji, all the gods were fascinated. Who is such a poet in the world who can describe that beauty? ॥3॥
* Jagdambika Jani Bhava Bhama. Suranh manhin man kinah pranama
Beauty Marjad Bhavani. Jai na kotihu badan bakhani ॥4॥
Connotation: The gods bowed down to their hearts considering Parvati ji as Jagadamba and Shiva’s wife. Bhawaniji is the limit of beauty. Even with crores of faces they cannot be beautified ॥4॥
Verse:
* Kotihu badan nahin banaayat jag janani sobha maha.
Sakuchhin Kahat Shruti Sesh Sarad Mandamati Tulsikha
Chhabikhani Matu Bhawani Gawin Madhya Mandap Siv Jahan.
Avaloki can not be safe husband post Kamal Manu Madhukaru
Meaning: – Jagjjnani does not even describe the great beauty of Parvatiji with crores of faces. Vedas, Seshaji and Saraswati ji are compelled to say that, then what is the count of Tulsi, a brainless person? The Khan of beauty and beauty went to the center of Mata Bhavani Mandap, where Shiva was. She could not look at the feet of her husband (Shiva) due to hesitation, but her mind was a bumblebee there (doing raspana).

 

1 thought on “शिवजी की विचित्र बारात और विवाह की तैयारी”

Leave a Comment

%d bloggers like this: