श्री राम-लक्ष्मण सहित विश्वामित्र का यज्ञशाला में प्रवेश

श्री राम-लक्ष्मण सहित विश्वामित्र का यज्ञशाला में प्रवेश

चौपाई :
* सीय स्वयंबरू देखिअ जाई। ईसु काहि धौं देइ बड़ाई॥
लखन कहा जस भाजनु सोई। नाथ कृपा तव जापर होई॥1॥
भावार्थ:-चलकर सीताजी के स्वयंवर को देखना चाहिए। देखें ईश्वर किसको बड़ाई देते हैं। लक्ष्मणजी ने कहा- हे नाथ! जिस पर आपकी कृपा होगी, वही बड़ाई का पात्र होगा (धनुष तोड़ने का श्रेय उसी को प्राप्त होगा)॥1॥
* हरषे मुनि सब सुनि बर बानी। दीन्हि असीस सबहिं सुखु मानी॥
पुनि मुनिबृंद समेत कृपाला। देखन चले धनुषमख साला॥2॥
भावार्थ:-इस श्रेष्ठ वाणी को सुनकर सब मुनि प्रसन्न हुए। सभी ने सुख मानकर आशीर्वाद दिया। फिर मुनियों के समूह सहित कृपालु श्री रामचन्द्रजी धनुष यज्ञशाला देखने चले॥2॥
* रंगभूमि आए दोउ भाई। असि सुधि सब पुरबासिन्ह पाई॥
चले सकल गृह काज बिसारी। बाल जुबान जरठ नर नारी॥3॥
भावार्थ:-दोनों भाई रंगभूमि में आए हैं, ऐसी खबर जब सब नगर निवासियों ने पाई, तब बालक, जवान, बूढ़े, स्त्री, पुरुष सभी घर और काम-काज को भुलाकर चल दिए॥3॥
* देखी जनक भीर भै भारी। सुचि सेवक सब लिए हँकारी॥
तुरत सकल लोगन्ह पहिं जाहू। आसन उचित देहु सब काहू॥4॥
भावार्थ:-जब जनकजी ने देखा कि बड़ी भीड़ हो गई है, तब उन्होंने सब विश्वासपात्र सेवकों को बुलवा लिया और कहा- तुम लोग तुरंत सब लोगों के पास जाओ और सब किसी को यथायोग्य आसन दो॥4॥
दोहा :
* कहि मृदु बचन बिनीत तिन्ह बैठारे नर नारि।
उत्तम मध्यम नीच लघु निज निज थल अनुहारि॥240॥
भावार्थ:-उन सेवकों ने कोमल और नम्र वचन कहकर उत्तम, मध्यम, नीच और लघु (सभी श्रेणी के) स्त्री-पुरुषों को अपने-अपने योग्य स्थान पर बैठाया॥240॥
चौपाई :
* राजकुअँर तेहि अवसर आए। मनहुँ मनोहरता तन छाए॥
गुन सागर नागर बर बीरा। सुंदर स्यामल गौर सरीरा॥1॥
भावार्थ:-उसी समय राजकुमार (राम और लक्ष्मण) वहाँ आए। (वे ऐसे सुंदर हैं) मानो साक्षात मनोहरता ही उनके शरीरों पर छा रही हो। सुंदर साँवला और गोरा उनका शरीर है। वे गुणों के समुद्र, चतुर और उत्तम वीर हैं॥1॥
* राज समाज बिराजत रूरे। उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे॥
जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी॥2॥
भावार्थ:-वे राजाओं के समाज में ऐसे सुशोभित हो रहे हैं, मानो तारागणों के बीच दो पूर्ण चन्द्रमा हों। जिनकी जैसी भावना थी, प्रभु की मूर्ति उन्होंने वैसी ही देखी॥2॥
* देखहिं रूप महा रनधीरा। मनहुँ बीर रसु धरें सरीरा॥
डरे कुटिल नृप प्रभुहि निहारी। मनहुँ भयानक मूरति भारी॥3॥
भावार्थ:-महान रणधीर (राजा लोग) श्री रामचन्द्रजी के रूप को ऐसा देख रहे हैं, मानो स्वयं वीर रस शरीर धारण किए हुए हों। कुटिल राजा प्रभु को देखकर डर गए, मानो बड़ी भयानक मूर्ति हो॥3॥
* रहे असुर छल छोनिप बेषा। तिन्ह प्रभु प्रगट कालसम देखा।
पुरबासिन्ह देखे दोउ भाई। नरभूषन लोचन सुखदाई॥4॥
भावार्थ:-छल से जो राक्षस वहाँ राजाओं के वेष में (बैठे) थे, उन्होंने प्रभु को प्रत्यक्ष काल के समान देखा। नगर निवासियों ने दोनों भाइयों को मनुष्यों के भूषण रूप और नेत्रों को सुख देने वाला देखा॥4॥
दोहा :
* नारि बिलोकहिं हरषि हियँ निज-निज रुचि अनुरूप।
जनु सोहत सिंगार धरि मूरति परम अनूप॥241॥
भावार्थ:-स्त्रियाँ हृदय में हर्षित होकर अपनी-अपनी रुचि के अनुसार उन्हें देख रही हैं। मानो श्रृंगार रस ही परम अनुपम मूर्ति धारण किए सुशोभित हो रहा हो॥241॥
चौपाई :
* बिदुषन्ह प्रभु बिराटमय दीसा। बहु मुख कर पग लोचन सीसा॥
जनक जाति अवलोकहिं कैसें। सजन सगे प्रिय लागहिं जैसें॥1॥
भावार्थ:-विद्वानों को प्रभु विराट रूप में दिखाई दिए, जिसके बहुत से मुँह, हाथ, पैर, नेत्र और सिर हैं। जनकजी के सजातीय (कुटुम्बी) प्रभु को किस तरह (कैसे प्रिय रूप में) देख रहे हैं, जैसे सगे सजन (संबंधी) प्रिय लगते हैं॥1॥
* सहित बिदेह बिलोकहिं रानी। सिसु सम प्रीति न जाति बखानी॥
जोगिन्ह परम तत्वमय भासा। सांत सुद्ध सम सहज प्रकासा॥2॥
भावार्थ:-जनक समेत रानियाँ उन्हें अपने बच्चे के समान देख रही हैं, उनकी प्रीति का वर्णन नहीं किया जा सकता। योगियों को वे शांत, शुद्ध, सम और स्वतः प्रकाश परम तत्व के रूप में दिखे॥2॥
* हरिभगतन्ह देखे दोउ भ्राता। इष्टदेव इव सब सुख दाता॥
रामहि चितव भायँ जेहि सीया। सो सनेहु सुखु नहिं कथनीया॥3॥
भावार्थ:-हरि भक्तों ने दोनों भाइयों को सब सुखों के देने वाले इष्ट देव के समान देखा। सीताजी जिस भाव से श्री रामचन्द्रजी को देख रही हैं, वह स्नेह और सुख तो कहने में ही नहीं आता॥3॥
* उर अनुभवति न कहि सक सोऊ। कवन प्रकार कहै कबि कोऊ॥
एहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ। तेहिं तस देखेउ कोसलराऊ॥4॥
भावार्थ:-उस (स्नेह और सुख) का वे हृदय में अनुभव कर रही हैं, पर वे भी उसे कह नहीं सकतीं। फिर कोई कवि उसे किस प्रकार कह सकता है। इस प्रकार जिसका जैसा भाव था, उसने कोसलाधीश श्री रामचन्द्रजी को वैसा ही देखा॥4॥
दोहा :
* राजत राज समाज महुँ कोसलराज किसोर।
सुंदर स्यामल गौर तन बिस्व बिलोचन चोर॥242॥
भावार्थ:-सुंदर साँवले और गोरे शरीर वाले तथा विश्वभर के नेत्रों को चुराने वाले कोसलाधीश के कुमार राज समाज में (इस प्रकार) सुशोभित हो रहे हैं॥242॥
चौपाई :
* सहज मनोहर मूरति दोऊ। कोटि काम उपमा लघु सोऊ॥
सरद चंद निंदक मुख नीके। नीरज नयन भावते जी के॥1॥
भावार्थ:-दोनों मूर्तियाँ स्वभाव से ही (बिना किसी बनाव-श्रृंगार के) मन को हरने वाली हैं। करोड़ों कामदेवों की उपमा भी उनके लिए तुच्छ है। उनके सुंदर मुख शरद् (पूर्णिमा) के चन्द्रमा की भी निंदा करने वाले (उसे नीचा दिखाने वाले) हैं और कमल के समान नेत्र मन को बहुत ही भाते हैं॥1॥
* चितवनि चारु मार मनु हरनी। भावति हृदय जाति नहिं बरनी॥
कल कपोल श्रुति कुंडल लोला। चिबुक अधर सुंदर मृदु बोला॥2॥
भावार्थ:-सुंदर चितवन (सारे संसार के मन को हरने वाले) कामदेव के भी मन को हरने वाली है। वह हृदय को बहुत ही प्यारी लगती है, पर उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। सुंदर गाल हैं, कानों में चंचल (झूमते हुए) कुंडल हैं। ठोड़ और अधर (होठ) सुंदर हैं, कोमल वाणी है॥2॥
* कुमुदबंधु कर निंदक हाँसा। भृकुटी बिकट मनोहर नासा॥
भाल बिसाल तिलक झलकाहीं। कच बिलोकि अलि अवलि लजाहीं॥3॥
भावार्थ:-हँसी, चन्द्रमा की किरणों का तिरस्कार करने वाली है। भौंहें टेढ़ी और नासिका मनोहर है। (ऊँचे) चौड़े ललाट पर तिलक झलक रहे हैं (दीप्तिमान हो रहे हैं)। (काले घुँघराले) बालों को देखकर भौंरों की पंक्तियाँ भी लजा जाती हैं॥3॥
* पीत चौतनीं सिरन्हि सुहाईं। कुसुम कलीं बिच बीच बनाईं॥
रेखें रुचिर कंबु कल गीवाँ। जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवाँ॥4॥
भावार्थ:-पीली चौकोनी टोपियाँ सिरों पर सुशोभित हैं, जिनके बीच-बीच में फूलों की कलियाँ बनाई (काढ़ी) हुई हैं। शंख के समान सुंदर (गोल) गले में मनोहर तीन रेखाएँ हैं, जो मानो तीनों लोकों की सुंदरता की सीमा (को बता रही) हैं॥4॥
दोहा :
* कुंजर मनि कंठा कलित उरन्हि तुलसिका माल।
बृषभ कंध केहरि ठवनि बल निधि बाहु बिसाल॥243॥
भावार्थ:-हृदयों पर गजमुक्ताओं के सुंदर कंठे और तुलसी की मालाएँ सुशोभित हैं। उनके कंधे बैलों के कंधे की तरह (ऊँचे तथा पुष्ट) हैं, ऐंड़ (खड़े होने की शान) सिंह की सी है और भुजाएँ विशाल एवं बल की भंडार हैं॥243॥
चौपाई :
* कटि तूनीर पीत पट बाँधें। कर सर धनुष बाम बर काँधें॥
पीत जग्य उपबीत सुहाए। नख सिख मंजु महाछबि छाए॥1॥
भावार्थ:-कमर में तरकस और पीताम्बर बाँधे हैं। (दाहिने) हाथों में बाण और बाएँ सुंदर कंधों पर धनुष तथा पीले यज्ञोपवीत (जनेऊ) सुशोभित हैं। नख से लेकर शिखा तक सब अंग सुंदर हैं, उन पर महान शोभा छाई हुई है॥1॥
* देखि लोग सब भए सुखारे। एकटक लोचन चलत न तारे॥
हरषे जनकु देखि दोउ भाई। मुनि पद कमल गहे तब जाई॥2॥
भावार्थ:-उन्हें देखकर सब लोग सुखी हुए। नेत्र एकटक (निमेष शून्य) हैं और तारे (पुतलियाँ) भी नहीं चलते। जनकजी दोनों भाइयों को देखकर हर्षित हुए। तब उन्होंने जाकर मुनि के चरण कमल पकड़ लिए॥2॥
* करि बिनती निज कथा सुनाई। रंग अवनि सब मुनिहि देखाई॥
जहँ जहँ जाहिं कुअँर बर दोऊ। तहँ तहँ चकित चितव सबु कोऊ॥3॥
भावार्थ:-विनती करके अपनी कथा सुनाई और मुनि को सारी रंगभूमि (यज्ञशाला) दिखलाई। (मुनि के साथ) दोनों श्रेष्ठ राजकुमार जहाँ-जहाँ जाते हैं, वहाँ-वहाँ सब कोई आश्चर्यचकित हो देखने लगते हैं॥3॥
* निज निज रुख रामहि सबु देखा। कोउ न जान कछु मरमु बिसेषा॥
भलि रचना मुनि नृप सन कहेऊ। राजाँ मुदित महासुख लहेऊ॥4॥
भावार्थ:-सबने रामजी को अपनी-अपनी ओर ही मुख किए हुए देखा, परन्तु इसका कुछ भी विशेष रहस्य कोई नहीं जान सका। मुनि ने राजा से कहा- रंगभूमि की रचना बड़ी सुंदर है (विश्वामित्र- जैसे निःस्पृह, विरक्त और ज्ञानी मुनि से रचना की प्रशंसा सुनकर) राजा प्रसन्न हुए और उन्हें बड़ा सुख मिला॥4॥
दोहा :
* सब मंचन्ह तें मंचु एक सुंदर बिसद बिसाल।
मुनि समेत दोउ बंधु तहँ बैठारे महिपाल॥244॥
भावार्थ:-सब मंचों से एक मंच अधिक सुंदर, उज्ज्वल और विशाल था। (स्वयं) राजा ने मुनि सहित दोनों भाइयों को उस पर बैठाया॥244॥
चौपाई :
* प्रभुहि देखि सब नृप हियँ हारे। जनु राकेश उदय भएँ तारे॥
असि प्रतीति सब के मन माहीं। राम चाप तोरब सक नाहीं॥1॥
भावार्थ:- प्रभु को देखकर सब राजा हृदय में ऐसे हार गए (निराश एवं उत्साहहीन हो गए) जैसे पूर्ण चन्द्रमा के उदय होने पर तारे प्रकाशहीन हो जाते हैं। (उनके तेज को देखकर) सबके मन में ऐसा विश्वास हो गया कि रामचन्द्रजी ही धनुष को तोड़ेंगे, इसमें संदेह नहीं॥1॥
* बिनु भंजेहुँ भव धनुषु बिसाला। मेलिहि सीय राम उर माला॥
अस बिचारि गवनहु घर भाई। जसु प्रतापु बलु तेजु गवाँई॥2॥
भावार्थ:-(इधर उनके रूप को देखकर सबके मन में यह निश्चय हो गया कि) शिवजी के विशाल धनुष को (जो संभव है न टूट सके) बिना तोड़े भी सीताजी श्री रामचन्द्रजी के ही गले में जयमाला डालेंगी (अर्थात दोनों तरह से ही हमारी हार होगी और विजय रामचन्द्रजी के हाथ रहेगी)। (यों सोचकर वे कहने लगे) हे भाई! ऐसा विचारकर यश, प्रताप, बल और तेज गँवाकर अपने-अपने घर चलो॥2॥
* बिहसे अपर भूप सुनि बानी। जे अबिबेक अंध अभिमानी॥
तोरेहुँ धनुषु ब्याहु अवगाहा। बिनु तोरें को कुअँरि बिआहा॥3॥
भावार्थ:-दूसरे राजा, जो अविवेक से अंधे हो रहे थे और अभिमानी थे, यह बात सुनकर बहुत हँसे। (उन्होंने कहा) धनुष तोड़ने पर भी विवाह होना कठिन है (अर्थात सहज ही में हम जानकी को हाथ से जाने नहीं देंगे), फिर बिना तोड़े तो राजकुमारी को ब्याह ही कौन सकता है॥3॥
* एक बार कालउ किन होऊ। सिय हित समर जितब हम सोऊ॥
यह सुनि अवर महिप मुसुकाने। धरमसील हरिभगत सयाने॥4॥
भावार्थ:-काल ही क्यों न हो, एक बार तो सीता के लिए उसे भी हम युद्ध में जीत लेंगे। यह घमंड की बात सुनकर दूसरे राजा, जो धर्मात्मा, हरिभक्त और सयाने थे, मुस्कुराए॥4॥
सोरठा :
* सीय बिआहबि राम गरब दूरि करि नृपन्ह के।
जीति को सक संग्राम दसरथ के रन बाँकुरे॥245॥
भावार्थ:-(उन्होंने कहा-) राजाओं के गर्व दूर करके (जो धनुष किसी से नहीं टूट सकेगा उसे तोड़कर) श्री रामचन्द्रजी सीताजी को ब्याहेंगे। (रही युद्ध की बात, सो) महाराज दशरथ के रण में बाँके पुत्रों को युद्ध में तो जीत ही कौन सकता है॥245॥
चौपाई :
* ब्यर्थ मरहु जनि गाल बजाई। मन मोदकन्हि कि भूख बुताई॥
सिख हमारि सुनि परम पुनीता। जगदंबा जानहु जियँ सीता॥1॥
भावार्थ:-गाल बजाकर व्यर्थ ही मत मरो। मन के लड्डुओं से भी कहीं भूख बुझती है? हमारी परम पवित्र (निष्कपट) सीख को सुनकर सीताजी को अपने जी में साक्षात जगज्जननी समझो (उन्हें पत्नी रूप में पाने की आशा एवं लालसा छोड़ दो),॥1॥
* जगत पिता रघुपतिहि बिचारी। भरि लोचन छबि लेहु निहारी॥
सुंदर सुखद सकल गुन रासी। ए दोउ बंधु संभु उर बासी॥2॥
भावार्थ:-और श्री रघुनाथजी को जगत का पिता (परमेश्वर) विचार कर, नेत्र भरकर उनकी छबि देख लो (ऐसा अवसर बार-बार नहीं मिलेगा)। सुंदर, सुख देने वाले और समस्त गुणों की राशि ये दोनों भाई शिवजी के हृदय में बसने वाले हैं (स्वयं शिवजी भी जिन्हें सदा हृदय में छिपाए रखते हैं, वे तुम्हारे नेत्रों के सामने आ गए हैं)॥2॥
* सुधा समुद्र समीप बिहाई। मृगजलु निरखि मरहु कत धाई॥
करहु जाइ जा कहुँ जोइ भावा। हम तौ आजु जनम फलु पावा॥3॥
भावार्थ:-समीप आए हुए (भगवत्‍दर्शन रूप) अमृत के समुद्र को छोड़कर तुम (जगज्जननी जानकी को पत्नी रूप में पाने की दुराशा रूप मिथ्या) मृगजल को देखकर दौड़कर क्यों मरते हो? फिर (भाई!) जिसको जो अच्छा लगे, वही जाकर करो। हमने तो (श्री रामचन्द्रजी के दर्शन करके) आज जन्म लेने का फल पा लिया (जीवन और जन्म को सफल कर लिया)॥3॥
* अस कहि भले भूप अनुरागे। रूप अनूप बिलोकन लागे॥
देखहिं सुर नभ चढ़े बिमाना। बरषहिं सुमन करहिं कल गाना॥4॥
भावार्थ:-ऐसा कहकर अच्छे राजा प्रेम मग्न होकर श्री रामजी का अनुपम रूप देखने लगे। (मनुष्यों की तो बात ही क्या) देवता लोग भी आकाश से विमानों पर चढ़े हुए दर्शन कर रहे हैं और सुंदर गान करते हुए फूल बरसा रहे हैं॥4॥

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Durga Saptashati दूसरा अध्याय – Chapter Second

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Vishwamitra enters Sri Yagyashala with Sri Rama-Laxman

Bunk:
* See Swayambaru. Jesus is great
Lakhan said as Bhajanu slept. Nath Kripa Tav Jaapar Hoi ॥1॥
Spirituality: – One should see the Swayamvara of Sitaji. See whom God blesses Laxmanji said- O Nath! The one who will be pleased with you, will be the person of praise (he will get credit for breaking the bow) )1॥
* Harshe muni sab suni bar bani Dinhi Asis sabhi sukhu maani
Kripala including Puni Munibrind. Dhanshan Chale Dhanushmakh Sala ॥2॥
Meaning: – Hearing this great voice, all sages were happy. Everyone blessed with happiness. Then along with a group of sages, Kripalu Shri Ram Chandraji went to see the Dhanush Yagyashala.
* Brother came to Rangbhoomi. Assi Sudhi Sab Purbasinh Pai
Chal Ghar Ghar Bisari Bisari Child tongue is male male ॥3॥
Sense: Both brothers have come to the Rangbhoomi, when all the residents of the city got such news, then the children, young, old, women, men all forgot the house and work. 3॥
* Saw Janak Bhir Bhai heavy. Such a servant is happy for everyone.
Quickly logged in first. Asan proper dehu sab kahu ॥4॥
Sense: When Janak ji saw that there was a huge crowd, he called all the faithful servants and said – you immediately go to all the people and give everyone a proper seat ॥4॥.
Doha:
* Kahi soft bachin binit tinh sithare male nari.
Best Medium Low Small Personal Private Trait ॥240॥
Sense: Those servants, by saying soft and meek words, made good, medium, low and small (all category) women and men to sit in their deserving place ॥240॥.
Bunk:
* Rajkumar and this opportunity came. I am beautiful
Gun Sagar Nagar Bar Bira Beautiful Syamal Gaur Sarira ॥1॥
Meaning: – At that time the prince (Rama and Lakshmana) came there. (They are such beautiful) as if their beauty is covering their bodies. His body is beautiful sooty and fair. He is a sea of ​​virtues, clever and perfect hero ॥1॥
* Raj Samaj birajat roure Udgan Mahun Janu Jug Bidhu Complete
Like the spirit that remained. Prabhu Murti Tinh Dekhi Taisi ॥2॥
Meaning: – They are beautifying in the society of kings, as if there are two full moons between stars. He saw the idol of God as it was, ॥2॥
* Dekhin Roop Maha Ranadhira. Manhu Bir Rasu Dhare Sarira॥
Scared crooked Nirup Prabhuhi Nihari. Wretched horoscope heavy ॥3॥
Connotation: – Great Randhir (king people) is seeing the form of Shri Ram Chandraji as if wearing a heroic body of himself. The crooked king was frightened to see the Lord, as if a terrible idol मूर्ति3॥
* Stay Asura trick! Saw Tinh Prabhu Kaalsam.
Look at Purbasinh, brother. Narbhushan Lochan Sukhadai ॥4॥
Connotation: – The demons who were there (sitting) in the guise of kings from the past, saw the Lord like a direct time. Residents of the city saw both brothers as human beings with Bhushan form and pleasing eyes ॥4॥.
Doha:
* Nari Bilokhin Harshi is in personal interest.
Janu Sohat Singar Dhari Murti Param Anoop ॥241॥
Meaning: – Women are delighted in heart and are watching them according to their interest. It is as if you are beautifying yourself by wearing an adorned idol.
Bunk:
* Bidushanh Prabhu Biratmaye Disa. Multi-faced step lead
How are the parent caste observations. Dear beloved beloved people like ॥1॥
Bhartharth: – The Lord appeared to the scholars as Virat, who has many mouths, hands, feet, eyes and heads. How are you looking at Janakji’s consort (Kutumbi) Prabhu (how dearly), as if dear (relative) looks like ॥1॥
* Including Bidhe Bilokhini Rani. Sisu sama preity na jati bakhani॥
Joginha is the ultimate elemental language. Sant suddha sam sahaj prakasa ॥2॥
Meaning: Ranis, including men, are looking at him like their child, their love cannot be described. To the Yogis, they are seen as the ultimate element of calm, pure, even and self-light. ॥2॥
* Look at Haribhagatanh, brother. The presiding deity of all happiness
Ramhi Chitav Bhaiyan So Snehu Sukhu Nahin Kathaniya ॥3॥
Bhartarth: -Hary devotees saw both brothers as the presiding deity of all happiness. The way in which Sitaji is looking at Shri Ramchandraji, he does not come to say affection and happiness.
* Can not say your experience Kavan type is called Kabi Kou
It was like that. Tehintas dekheu kosalrau ॥4॥
Meaning: She is experiencing that (affection and happiness) in her heart, but she also cannot say it. Then how can a poet say that. Thus, he had the same sentiment as he saw Koslamadhish Ramchandraji ॥4॥
Doha:
* Rajat Raj Samaj Maha Kosalraj Kisor.
Beautiful Syamal Gaur Tan Biswa Bilochan Chor ॥242॥
Spirituality: – The beautiful Raja of Kosaladhish, having a beautiful dark and white body and stealing the eyes of the world, is beautifying (thus) ॥242॥
Bunk:
* Sahaj Manohar Murti Dau. Grade work upma small sou॥
Sarad Chand, the cynical mouth. र1॥ of Neeraj Nayan Bhavte Ji
Meaning: – Both idols are going to defeat the mind by nature (without any make-up). The likeness of crores of Kamadevs is also despised for them. His beautiful face is also blasphemous (degrading) of the moon of Sharad (full moon) and like the lotus, the eye is very pleasing to the mind ॥1॥.
* Chitwani Charu Mar Manu Harni. Bhavati Hriday caste nahi barni
Kalpola Shruti Kundal Lola. Chibuk Adhar beautiful soft spoken 2॥
Meaning: Beautiful Chitwan (who defeats the mind of the whole world) is going to defeat the mind of Cupid also. She loves the heart very much, but it cannot be described. There are beautiful cheeks, flickering (swinging) coils in the ears. The chin and the lips are beautiful, soft speech is ॥2॥
* LilyBlasphemous laughter Bhukruti Biket Manohar NASA॥
Bhal Bisal Tilak not glimpsed. Kach billi ali ali awali not ॥3॥
Meaning: – Laughter is the scorn of the rays of the moon. The eyebrows are crooked and the nose is delightful. (High) Tilak is seen on the broad forehead (being radiant). (Black curly) hair lines are also embarrassed by looking at the hair ॥3॥
* Peet Chautin Sreenhi Suhni. Kusum kalin made between
Rekha Ruchir Kambu will be there tomorrow. Janu Tribhuvan Sushma’s Siwan ॥4॥
Meaning: Yellow chowkoni hats are adorned on the ends, with flower buds (kadhi) made in between. There are three beautiful lines in the beautiful (round) neck like a conch, which is as if to tell (limit) the beauty of the three worlds ॥4॥.
Doha:
* Kunjar mani kantha kalit urni tulsika maal.
Brishabh Kandh Kehari Thawni Bal Nidhi Bahu Bisal ॥243॥
Meaning: Beautiful girdles of gajmukas and garlands of basil are adorned on the heart. His shoulders are (high and athletic) like the shoulders of oxen, the heels (pride of standing) are like that of a lion and the arms are huge and the store of strength ॥243॥.
Bunk:
* Tie a cuttings of yellow tape. Please bow your head to the balm.
The yellow jagya upbeet drank. Nakh Sikh Manju Mahachhabi Chhaye ॥1॥
Meaning: Tarakas and Pitambar are tied in Kamar. The arrow in the (right) hands and the bow on the left beautiful shoulders and the yellow yagnopaveet (janeu) are graceful. All the parts from the nail to the crest are beautiful, they have great beauty on them ॥1॥
* Look, all the people are happy. Ektak Lochan Chalat Naa Stars
Harshe Janaku see, brother. Muni padam kamhel gaye jai ॥2॥
Meaning: Everyone was happy to see them. The eyes are unbroken (nimesh void) and the stars (pupils) do not move. Janakji was delighted to see both the brothers. Then he went and grabbed the lotus feet of Muni. ॥2॥
* Narrated the story of love. Rang avni sab muni dekha dehi
Wherever you go Astonishingly Chitav Sabu Kou 3॥
Meaning: – After pleading, narrated his story and showed the whole Rangbhoomi (Yagyashala) to the sage. (With sage) Wherever the two best princes go, everyone starts to see astonishment there ॥3॥
* Saw nij nij stance ramhi sabu. Kou na jaan kachu marmu bisesha॥
Where would you like to write a good composition? Raja Mudit Mahasukh Lheu ॥4॥
Sense: Everyone saw Ramji facing himself, but no one could know any special secret of it. The sage told the king – The creation of the Rangbhoomi is very beautiful (Vishwamitra – like hearing the praise of the composition from the disloyal, detached and knowledgeable sage), the king was pleased and got great happiness.
Doha:
* All stage, Manchu is a beautiful basil.
The two brothers, including the sage, sit in the fold, Mahipal ॥244॥
Meaning: A stage was more beautiful, bright and spacious than all the forums. (Himself) the king seated the two brothers including the sage on it 244॥
Bunk:
* See God, all the creeps are lost. Janu Rakesh Udaya Bhe stars
The real belief is not in everyone’s mind. Ram chap torab na na ॥1॥
Spirituality: – On seeing the Lord, all the kings lost in the heart (became frustrated and uninspired) as the stars become lightless when the full moon rises. (Seeing his glory) It was believed in everyone that Ramchandra would break the bow, no doubt.
* Binu Bhanjehu bhav Dhanushu Bisala. Melihi Siya Ram ur Mala॥
As bachari gawanhu ghar bhai. Jasu Pratapu Balu Teju Gawaini ॥2॥
Senseless :- (Seeing his form here, it was decided in everyone’s mind that) without breaking the huge bow of Shiva (which is not possible), Sita would put Jayamala in the neck of Shri Ramchandraji (ie both of us There will be defeat and Vijay will be in the hands of Ramchandraji). (Thinking this way, he said) O brother! Thinking like this, you lose your glory and glory, strength and strength, and go to your home ॥2॥
* Upper bhup suni bani. J abibek blind arrogant॥
Torehun Dhanushu Bahu Avgaha. Binu Torren ko Quri Biaha ॥3॥
Senseless: – The second king, who was blinded by arrogance and was arrogant, laughed a lot on hearing this. (He said) Marriage is difficult even if the bow is broken (that is, we will not let Janki go by hand), then who can marry the princess without breaking it ॥3॥
* Calou Qin Ho once. Saye Hite Samar Jitab Hum Soo
This sunny smile smiles Dharamseel Haribgat Sayane ॥4॥
Sense: If it is time, we will win it in the war for Sita. Hearing this pride, the other kings, who were righteous, Haribhakta and grown-up, smiled ॥4॥.
Soratha:
* Siya Biahabi Ram Garb Darshi ki Nripanah ki.
Jiti gets run for the battle of Dashrath ॥245॥
Spirituality 🙁 He said-) By removing the pride of the kings (breaking the bow which cannot be broken by anyone), Shri Ramchandraji will marry Sita. (Talk of war, so) Who can win the sons of King Dasharatha in battle?
Bunk:
* Bertha Marhu played her cheek. Soothe the hunger of your heart
Sikh Hamari Suni Param Punita. Jagdamba Janhu Jiya Sita ॥1॥
Meaning: Don’t die in vain by playing the song. Does hunger quench even more than ladders of the mind? Hearing our supremely pure (sincere) lesson, consider Sita as a true Jagjjani (leave the hope and longing for her as a wife),॥ 1॥
* Jagat Father Raghupatihi Bichari. Bhari Lochan Chhabi Lehu Nihari॥
Beautiful pleasant gross gun rasi. A dou bandhu sambhu ur baasi ॥2॥
Meaning: – And considering Shri Raghunathji as the father (God) of the world, fill his eyes and see his image (will not get such an opportunity again and again). The sum of beautiful, pleasing and all the qualities of these two brothers are settled in the heart of Shivji (Shivji himself, who is always hidden in the heart, has come before your eyes) ॥2॥
* Biography near Sudha Samudra. Mrigajlu nirkhi marhu katDhai
Karahu ja ji kahan joi bhava Hum tau aaju janam palu pawa ॥3॥
Bhaarthar: Why do you run away from the sea of ​​nectar while coming to the sea of ​​nectar (bhagavadarshan form) and seeing the mrigajal (mischievous feeling of getting Jagjajnani Janaki as a wife)? Then (brother!) Do what you like, go and do it. We (by seeing Shri Ramachandraji) have reaped the fruits of taking birth today (have succeeded life and birth) ॥3॥
* As Kahi Bhale Bhup Anurag. Roop Anoop Bilokan Lage
Look at the sky Barshahin Suman Karhin Kal song ॥4॥
Meaning: – Saying this, the good king started to see the unique form of Shri Ramji after being engrossed in love. (What about humans) Gods are also seen flying on the planes from the sky and showering flowers singing beautiful songs ॥4॥

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