श्री सीताजी का पार्वती पूजन एवं वरदान प्राप्ति तथा राम-लक्ष्मण संवाद

श्री सीताजी का पार्वती पूजन एवं वरदान प्राप्ति तथा राम-लक्ष्मण संवाद

दोहा :
* देखन मिस मृग बिहग तरु फिरइ बहोरि बहोरि।
निरखि निरखि रघुबीर छबि बाढ़इ प्रीति न थोरि॥234॥
भावार्थ:-मृग, पक्षी और वृक्षों को देखने के बहाने सीताजी बार-बार घूम जाती हैं और श्री रामजी की छबि देख-देखकर उनका प्रेम कम नहीं बढ़ रहा है। (अर्थात्‌ बहुत ही बढ़ता जाता है)॥234॥
चौपाई :
* जानि कठिन सिवचाप बिसूरति। चली राखि उर स्यामल मूरति॥
प्रभु जब जात जानकी जानी। सुख सनेह सोभा गुन खानी॥1॥
भावार्थ:-शिवजी के धनुष को कठोर जानकर वे विसूरती (मन में विलाप करती) हुई हृदय में श्री रामजी की साँवली मूर्ति को रखकर चलीं। (शिवजी के धनुष की कठोरता का स्मरण आने से उन्हें चिंता होती थी कि ये सुकुमार रघुनाथजी उसे कैसे तोड़ेंगे, पिता के प्रण की स्मृति से उनके हृदय में क्षोभ था ही, इसलिए मन में विलाप करने लगीं। प्रेमवश ऐश्वर्य की विस्मृति हो जाने से ही ऐसा हुआ, फिर भगवान के बल का स्मरण आते ही वे हर्षित हो गईं और साँवली छबि को हृदय में धारण करके चलीं।) प्रभु श्री रामजी ने जब सुख, स्नेह, शोभा और गुणों की खान श्री जानकीजी को जाती हुई जाना,॥1॥
* परम प्रेममय मृदु मसि कीन्ही। चारु चित्त भीतीं लिखि लीन्ही॥
गई भवानी भवन बहोरी। बंदि चरन बोली कर जोरी॥2॥
भावार्थ:-तब परमप्रेम की कोमल स्याही बनाकर उनके स्वरूप को अपने सुंदर चित्त रूपी भित्ति पर चित्रित कर लिया। सीताजी पुनः भवानीजी के मंदिर में गईं और उनके चरणों की वंदना करके हाथ जोड़कर बोलीं-॥2॥
*जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी॥
जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता॥3॥
भावार्थ:-हे श्रेष्ठ पर्वतों के राजा हिमाचल की पुत्री पार्वती! आपकी जय हो, जय हो, हे महादेवजी के मुख रूपी चन्द्रमा की (ओर टकटकी लगाकर देखने वाली) चकोरी! आपकी जय हो, हे हाथी के मुख वाले गणेशजी और छह मुख वाले स्वामिकार्तिकजी की माता! हे जगज्जननी! हे बिजली की सी कान्तियुक्त शरीर वाली! आपकी जय हो! ॥3॥
* नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना॥
भव भव बिभव पराभव कारिनि। बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि॥4॥
भावार्थ:-आपका न आदि है, न मध्य है और न अंत है। आपके असीम प्रभाव को वेद भी नहीं जानते। आप संसार को उत्पन्न, पालन और नाश करने वाली हैं। विश्व को मोहित करने वाली और स्वतंत्र रूप से विहार करने वाली हैं॥4॥
दोहा :
* पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख।
महिमा अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेष॥235॥
भावार्थ:-पति को इष्टदेव मानने वाली श्रेष्ठ नारियों में हे माता! आपकी प्रथम गणना है। आपकी अपार महिमा को हजारों सरस्वती और शेषजी भी नहीं कह सकते॥235॥
चौपाई :
* सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायनी पुरारि पिआरी॥
देबि पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे॥1॥
भावार्थ:-हे (भक्तों को मुँहमाँगा) वर देने वाली! हे त्रिपुर के शत्रु शिवजी की प्रिय पत्नी! आपकी सेवा करने से चारों फल सुलभ हो जाते हैं। हे देवी! आपके चरण कमलों की पूजा करके देवता, मनुष्य और मुनि सभी सुखी हो जाते हैं॥1॥
* मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबही कें॥
कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं। अस कहि चरन गहे बैदेहीं॥2॥
भावार्थ:-मेरे मनोरथ को आप भलीभाँति जानती हैं, क्योंकि आप सदा सबके हृदय रूपी नगरी में निवास करती हैं। इसी कारण मैंने उसको प्रकट नहीं किया। ऐसा कहकर जानकीजी ने उनके चरण पकड़ लिए॥2॥
* बिनय प्रेम बस भई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी॥
सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ॥3॥
भावार्थ:-गिरिजाजी सीताजी के विनय और प्रेम के वश में हो गईं। उन (के गले) की माला खिसक पड़ी और मूर्ति मुस्कुराई। सीताजी ने आदरपूर्वक उस प्रसाद (माला) को सिर पर धारण किया। गौरीजी का हृदय हर्ष से भर गया और वे बोलीं-॥3॥
* सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी॥
नारद बचन सदा सुचि साचा। सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा॥4॥
भावार्थ:-हे सीता! हमारी सच्ची आसीस सुनो, तुम्हारी मनःकामना पूरी होगी। नारदजी का वचन सदा पवित्र (संशय, भ्रम आदि दोषों से रहित) और सत्य है। जिसमें तुम्हारा मन अनुरक्त हो गया है, वही वर तुमको मिलेगा॥4॥
छन्द :
* मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो।
करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो॥
एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली॥
भावार्थ:-जिसमें तुम्हारा मन अनुरक्त हो गया है, वही स्वभाव से ही सुंदर साँवला वर (श्री रामचन्द्रजी) तुमको मिलेगा। वह दया का खजाना और सुजान (सर्वज्ञ) है, तुम्हारे शील और स्नेह को जानता है। इस प्रकार श्री गौरीजी का आशीर्वाद सुनकर जानकीजी समेत सब सखियाँ हृदय में हर्षित हुईं। तुलसीदासजी कहते हैं- भवानीजी को बार-बार पूजकर सीताजी प्रसन्न मन से राजमहल को लौट चलीं॥
सोरठा :
* जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे॥236॥
भावार्थ:-गौरीजी को अनुकूल जानकर सीताजी के हृदय को जो हर्ष हुआ, वह कहा नहीं जा सकता। सुंदर मंगलों के मूल उनके बाएँ अंग फड़कने लगे॥236॥
चौपाई :
* हृदयँ सराहत सीय लोनाई। गुर समीप गवने दोउ भाई॥
राम कहा सबु कौसिक पाहीं। सरल सुभाउ छुअत छल नाहीं॥1॥
भावार्थ:-हृदय में सीताजी के सौंदर्य की सराहना करते हुए दोनों भाई गुरुजी के पास गए। श्री रामचन्द्रजी ने विश्वामित्र से सब कुछ कह दिया, क्योंकि उनका सरल स्वभाव है, छल तो उसे छूता भी नहीं है॥1॥
* सुमन पाइ मुनि पूजा कीन्ही। पुनि असीस दुहु भाइन्ह दीन्ही॥
सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे। रामु लखनु सुनि भय सुखारे॥2॥
भावार्थ:-फूल पाकर मुनि ने पूजा की। फिर दोनों भाइयों को आशीर्वाद दिया कि तुम्हारे मनोरथ सफल हों। यह सुनकर श्री राम-लक्ष्मण सुखी हुए॥2॥
* करि भोजनु मुनिबर बिग्यानी। लगे कहन कछु कथा पुरानी॥
बिगत दिवसु गुरु आयसु पाई। संध्या करन चले दोउ भाई॥3॥
भावार्थ:-श्रेष्ठ विज्ञानी मुनि विश्वामित्रजी भोजन करके कुछ प्राचीन कथाएँ कहने लगे। (इतने में) दिन बीत गया और गुरु की आज्ञा पाकर दोनों भाई संध्या करने चले॥3॥
* प्राची दिसि ससि उयउ सुहावा। सिय मुख सरिस देखि सुखु पावा॥
बहुरि बिचारु कीन्ह मन माहीं। सीय बदन सम हिमकर नाहीं॥4॥
भावार्थ:-(उधर) पूर्व दिशा में सुंदर चन्द्रमा उदय हुआ। श्री रामचन्द्रजी ने उसे सीता के मुख के समान देखकर सुख पाया। फिर मन में विचार किया कि यह चन्द्रमा सीताजी के मुख के समान नहीं है॥4॥
दोहा :
* जनमु सिंधु पुनि बंधु बिषु दिन मलीन सकलंक।
सिय मुख समता पाव किमि चंदु बापुरो रंक॥237॥
भावार्थ:-खारे समुद्र में तो इसका जन्म, फिर (उसी समुद्र से उत्पन्न होने के कारण) विष इसका भाई, दिन में यह मलिन (शोभाहीन, निस्तेज) रहता है, और कलंकी (काले दाग से युक्त) है। बेचारा गरीब चन्द्रमा सीताजी के मुख की बराबरी कैसे पा सकता है?॥237॥
चौपाई :
* घटइ बढ़इ बिरहिनि दुखदाई। ग्रसइ राहु निज संधिहिं पाई॥
कोक सोकप्रद पंकज द्रोही। अवगुन बहुत चंद्रमा तोही॥1॥
भावार्थ:-फिर यह घटता-बढ़ता है और विरहिणी स्त्रियों को दुःख देने वाला है, राहु अपनी संधि में पाकर इसे ग्रस लेता है। चकवे को (चकवी के वियोग का) शोक देने वाला और कमल का बैरी (उसे मुरझा देने वाला) है। हे चन्द्रमा! तुझमें बहुत से अवगुण हैं (जो सीताजी में नहीं हैं।)॥1॥
* बैदेही मुख पटतर दीन्हे। होइ दोषु बड़ अनुचित कीन्हे॥
सिय मुख छबि बिधु ब्याज बखानी। गुर पहिं चले निसा बड़ि जानी॥2॥
भावार्थ:-अतः जानकीजी के मुख की तुझे उपमा देने में बड़ा अनुचित कर्म करने का दोष लगेगा। इस प्रकार चन्द्रमा के बहाने सीताजी के मुख की छबि का वर्णन करके, बड़ी रात हो गई जान, वे गुरुजी के पास चले॥2॥
* करि मुनि चरन सरोज प्रनामा। आयसु पाइ कीन्ह बिश्रामा॥
बिगत निसा रघुनायक जागे। बंधु बिलोकि कहन अस लागे॥3॥
भावार्थ:-मुनि के चरण कमलों में प्रणाम करके, आज्ञा पाकर उन्होंने विश्राम किया, रात बीतने पर श्री रघुनाथजी जागे और भाई को देखकर ऐसा कहने लगे-॥3॥
* उयउ अरुन अवलोकहु ताता। पंकज कोक लोक सुखदाता॥
बोले लखनु जोरि जुग पानी। प्रभु प्रभाउ सूचक मृदु बानी॥4॥
भावार्थ:-हे तात! देखो, कमल, चक्रवाक और समस्त संसार को सुख देने वाला अरुणोदय हुआ है। लक्ष्मणजी दोनों हाथ जोड़कर प्रभु के प्रभाव को सूचित करने वाली कोमल वाणी बोले-॥4॥
दोहा :
* अरुनोदयँ सकुचे कुमुद उडगन जोति मलीन।
जिमि तुम्हार आगमन सुनि भए नृपति बलहीन॥238॥
भावार्थ:-अरुणोदय होने से कुमुदिनी सकुचा गई और तारागणों का प्रकाश फीका पड़ गया, जिस प्रकार आपका आना सुनकर सब राजा बलहीन हो गए हैं॥238॥
चौपाई :
* नृप सब नखत करहिं उजिआरी। टारि न सकहिं चाप तम भारी॥
कमल कोक मधुकर खग नाना। हरषे सकल निसा अवसाना॥1॥
भावार्थ:-सब राजा रूपी तारे उजाला (मंद प्रकाश) करते हैं, पर वे धनुष रूपी महान अंधकार को हटा नहीं सकते। रात्रि का अंत होने से जैसे कमल, चकवे, भौंरे और नाना प्रकार के पक्षी हर्षित हो रहे हैं॥1॥
* ऐसेहिं प्रभु सब भगत तुम्हारे। होइहहिं टूटें धनुष सुखारे॥
उयउ भानु बिनु श्रम तम नासा। दुरे नखत जग तेजु प्रकासा॥2॥
भावार्थ:-वैसे ही हे प्रभो! आपके सब भक्त धनुष टूटने पर सुखी होंगे। सूर्य उदय हुआ, बिना ही परिश्रम अंधकार नष्ट हो गया। तारे छिप गए, संसार में तेज का प्रकाश हो गया॥2॥
* रबि निज उदय ब्याज रघुराया। प्रभु प्रतापु सब नृपन्ह दिखाया॥
तव भुज बल महिमा उदघाटी। प्रगटी धनु बिघटन परिपाटी।3॥
भावार्थ:-हे रघुनाथजी! सूर्य ने अपने उदय के बहाने सब राजाओं को प्रभु (आप) का प्रताप दिखलाया है। आपकी भुजाओं के बल की महिमा को उद्घाटित करने (खोलकर दिखाने) के लिए ही धनुष तोड़ने की यह पद्धति प्रकट हुई है॥3॥
* बंधु बचन सुनि प्रभु मुसुकाने। होइ सुचि सहज पुनीत नहाने॥
कनित्यक्रिया करि गरु पहिं आए। चरन सरोज सुभग सिर नाए॥4॥
भावार्थ:-भाई के वचन सुनकर प्रभु मुस्कुराए। फिर स्वभाव से ही पवित्र श्री रामजी ने शौच से निवृत्त होकर स्नान किया और नित्यकर्म करके वे गुरुजी के पास आए। आकर उन्होंने गुरुजी के सुंदर चरण कमलों में सिर नवाया॥4॥
* सतानंदु तब जनक बोलाए। कौसिक मुनि पहिं तुरत पठाए॥
जनक बिनय तिन्ह आइ सुनाई। हरषे बोलि लिए दोउ भाई॥5॥
भावार्थ:- तब जनकजी ने शतानंदजी को बुलाया और उन्हें तुरंत ही विश्वामित्र मुनि के पास भेजा। उन्होंने आकर जनकजी की विनती सुनाई। विश्वामित्रजी ने हर्षित होकर दोनों भाइयों को बुलाया॥5॥
दोहा :
* सतानंद पद बंदि प्रभु बैठे गुर पहिं जाइ।
चलहु तात मुनि कहेउ तब पठवा जनक बोलाइ॥239॥
भावार्थ:-शतानन्दजी के चरणों की वंदना करके प्रभु श्री रामचन्द्रजी गुरुजी के पास जा बैठे। तब मुनि ने कहा- हे तात! चलो, जनकजी ने बुला भेजा है॥239॥

मासपारायण, आठवाँ विश्राम
नवाह्न पारायण, दूसरा विश्राम


Parvati worship and boon receipt of Shri Sitaji and Ram-Laxman dialogue

Doha:
* Dekhan Miss Mrig Bihag Taru Firai Bahori Bahori.
Nirkhi Nirkhi Raghubir Chhabi Barhlei Preeti Na Thori ॥234॥
Sense: Sita wanders repeatedly on the pretext of seeing antlers, birds and trees and seeing Shri Ramji’s image, his love is not growing any less. (Ie, increases a lot) ॥234॥
Bunk:
* Learn tough straps. Chali Rashi ur Syamal Murti
God knows when I know Sukh Sneh Sobha Gunn Khani ॥1॥
Meaning: Seeing Shivaji’s bow hard, she walked with a dark idol of Shri Ramji in her heart in a state of disarray (mourning in her mind). (Remembering the hardness of Shiva’s bow, he worried about how this Sukumar Raghunathji would break it, he had an indignation in his heart from the memory of his father’s vow, so she started mourning in the mind. With love being forgotten by Aishwarya This happened, then she was delighted as soon as she remembered the power of God and went on carrying the dark image in her heart.
* Supreme love soft hearted. Charu Chitti Bhiti, Likhi Leenhi
Gaya Bhawani Bhawan Bahori. Bandi charan bid jori ॥2॥
Meaning: Then after making soft ink of the supreme love, he painted his form on his beautiful mind mural. Sitaji again went to Bhavaniji’s temple and worshiped her feet and folded her hands and said -2॥
* Jai Jai Giribaraj Kisori. Jai Mahes Mukh Chand Chakori॥
Jai Gajbadan Sankhanan Mata Jagannathi Damini Duti sings ॥3॥
Bhaarthar: O Parvati, daughter of Himachal, the king of the best mountains! Hail to you, hail, O moon of the face of Mahadevji (looking at you with gaze) Chakori! Hail to you, O mother of elephant-headed Ganesha and six-faced Swamikarthikji! Hey Jagjjanani! O one with a fine body of electricity! We salute you! ॥3॥
* Nahintav etc. Middle Avasana. Amit Prabhau Bedu Nahin Jaana
Bhava bhav bhavab parathav karini. Biswa Bimohani Swabus Biharini ॥4॥
Meaning: You have neither the beginning, the middle nor the end. The Vedas do not even know your immense influence. You are going to create, follow and destroy the world. मो4॥ who fascinates the world and is an independent monk
Doha:
* Patidadevata Sutiya Mahu Matu First Tv Rekha.
Mahima Amit Na Sakhin Kahi Sahas Sarada Sesh ॥235॥
Meaning: O mother among the best women who consider the father as the presiding deity! Is your first count. Thousands of Saraswati and Seshaji cannot call your immense glory ॥235॥
Bunk:
* Sevat tohi Sulabh fruit chari. Bardayani Puri Piari 4
Debbi worship post lotus for you. Sur nar muni sab hohin sukhare ॥1॥
Bhartharth: -He (will give prayers to the devotees) Grooms! O enemy of Tripur, beloved wife of Shivji! All four fruits are accessible by serving you. O Goddess! Gods, humans and sages all become happy by worshiping your lotus feet.
* Peacock Manorathu Januhu Nikane. Bashu sada ur pur sabhi center
Why do they not appear? As kahi charan gaye bedeyhi ॥2॥
Meaning: You know my desire well, because you always live in the city like everyone’s heart. That is why I did not reveal it. Saying this, Janaki ji held his feet ॥2॥
* Binay Prem Bas Bhai Bhavani. Khasi Maal Murti Musukani॥
Best regards, Prasadu beheaded Boli Gauri Harshu Hiyen Bhareu ॥3॥
Meaning: Girijaji fell under the love and affection of Sitaji. The garland of them (the throat) slipped and the idol smiled. Sitaji respectfully held that Prasad (Mala) on the head. Gauriji’s heart was filled with joy and he said -3॥
* Sunu Siya Satya Asis Hamari. Wish you worship
Narada Bachan always listens So Baru Milihi Jahin Manu Racha ॥4॥
Meaning: O Sita! Listen to our true Assis, your wish will be fulfilled. The word of Naradji is always holy (without doubt, confusion, etc.) and truth. In which your mind is enamored, you will get the same groom ॥4॥
Verse:
* Manu jahin racheu milihi so baru sahaja beautiful savanro.
Karuna Nidhan Sujan Sileu Snehu Janat Ravro॥
Harshi Ali including Ghori Asis Suni like this.
Tulsi Bhawanihi Puja Puni Puni Mudit Mana Temple
Meaning: In which your mind has become attached, by the same nature you will get a beautiful little girl (Shri Ramchandraji). He is a treasure of mercy and sujan (omniscient), knows your modesty and affection. In this way, listening to the blessings of Shri Gauriji, Jankiji and all his friends were heartened. Tulsidasji says- After worshiping Bhavaniji again and again, Sitaji returned to the palace with a happy heart.
Soratha:
* Life is very favorable
Manjul Mangal Mool Baam Ang Pharkan Lage ॥236॥
Sense of meaning: The joy of Sitaji’s heart considering Gauriji as favorable, cannot be said. The origins of the beautiful forests started tearing their left limbs ॥236॥
Bunk:
* Heart appreciative sea lonai. Brother close to God, two brothers
Rama said Sabu Kausik Simple Subhau Choot Trick No ॥1॥
Bhartharth: – Appreciating the beauty of Sitaji in the heart, both brothers went to Guruji. Shri Ramchandraji told everything to Vishwamitra, because he has a simple nature, deceit does not even touch him.
* Suman Pai Muni Pooja Kinhi. Puni asis duhu bhinah dinhi॥
I wish you good luck Ramu Lakhanu Suni Bhaya Sukhare ॥2॥
Spirituality: – Muni worshiped after receiving the flowers. Then blessed both brothers so that your desire is successful. Hearing this, Shri Ram-Laxman became happy ॥2॥
* Kari Khanu Munibar Bigyani. Lage kahan kachku tale old॥
The last day Guru Ayusu Pai. Sandhya Karan Chale Dow Bhai ॥3॥
Meaning: -Best scientist Muni Vishwamitra having food and telling some ancient storiesBegan The day passed, and after receiving the Guru’s orders, the two brothers went to the evening.

* Prachi Disi Sasi Uayu Suhawa. Seeing Mukhi Saris, Sukhu Pawa
Bahuri Bicharu is not the only one in mind. No body, not snowy ॥4॥
Meaning: – (there) Beautiful moon emerged in the east. Shri Ramchandraji found happiness on seeing him like Sita’s face. Then I thought in my mind that this moon is not like the face of Sitaji.

Doha:
* Janmu Sindhu Puni Bandhu Bishu Din Malin Sakalank.
Sayi Mukha Samta Pav Kim Chandu Bapuro Rank ॥237॥
Sense: It is born in the sea of ​​salt, then (due to its origin from the same sea) the poison is its brother, in the day it remains malleable (glorified, languid), and is black (with black spots). How can the poor poor moon match the face of Sitaji? ॥237॥

Bunk:
* Decreased increase in birhini sorrow. Grasai Rahu
Coke Shocking Pankaj. Avagun Much Moon Tohi ॥1॥
Meaning: – Then it decreases and increases and Virahini is grieving women, Rahu finds it in his pact and takes it away. Chakve is the mourner (of Chakvi’s separation) and Kamal’s Barry (he withers). Hey Moon! You have many demerits (which are not in Sitaji.)॥ 1॥
* Baidehi mukh pattar dinhe. Hoi khुu very bad inappropriate
Say Mukhi Chhabi Bidhu interest Guru pahin chale nisa badi jani ॥2॥

Sense of meaning: Therefore, you will be accused of doing a lot of improper actions in giving you the likeness of Jankiji’s face. Thus by describing the image of Sitaji’s face on the pretext of the moon, it was a great night, he went to Guruji.
* Kari Muni Charan Saroj Pranama. Ayusu Pai Keinh Bishrama 4
Biga Nisa Raghunayak woke up. Bandhu Biloki Kahan As Lage ॥3॥

Sense: After paying obeisance in the lotus feet of the Muni, he rested on getting the order, at the end of the night Shri Raghunathji woke up and seeing the brother said this – ॥3॥
* Uyau Arun Avalokhu Taita. Pankaj Kok Lok Sukhadata
Bole Lakhanu Jori Jug Pani Prabhu Prabhau Indicator Soft Bani ॥4॥
Meaning: O Tat! Look, Arunodaya has given happiness to Kamal, Chakravak and the whole world. Laxman ji said with a soft voice, informing Lord’s influence with both hands, – 4॥

Doha:
* Arunodayan Sakuche Kumud Udgan Joti Malin.
Jimi, your arrival is sure to come, Nrpati is powerless ॥238॥
Meaning: – Due to the absence of light, Kumudini was shunned and the light of the stars faded, just as all the kings have become weak on hearing your arrival ॥238॥
Bunk:
* Nripe are all written Ujiri. Tarin can not be the least heavy
Lotus Coke Madhukar Khag Nana. Harshe Gross Nisa Avasana ॥1॥

Meaning: All the stars like the king do light (dim light), but they cannot remove the great darkness like a bow. End of night like lotus, chakve, bumblebee and many other types of birds are cheering ॥1॥

* God is like this, all your devotees. Hohihin break Dhanush Sukhare
Uyau Bhanu Binu Shram Tam Nasa. Dure Nakhat Jag Teju Prakasa ॥2॥
Sense: O Lord! All your devotees will be happy when the bow breaks. The sun rose, darkness was destroyed without exertion. The stars hid, the light shone in the world ॥2॥
* Rabi nij uday interest raghuraaya. Lord Pratapu showed all nripanh
Tav Bhuj Bal Mahima Udghati Revealed Dhanu Baghata pattern. 3॥

Meaning: O O Raghunath! The Sun has shown the majesty of the Lord (you) to all the kings on the pretext of his rise. This method of breaking the bow has been revealed to reveal (openly) the glory of the strength of your arms. ॥3॥

* Bandhu Bachaan Suni Prabhu Musukane Hoi Suchi Sahaja Punit Bath
Kanityakriya Karu Garu came first. Charan Saroj Subhag head Nae ॥4॥
Sense: Lord heard the words of brother. Then, by nature, the holy Shri Ramji retired from the toilet and took a bath and after doing routine work, he came to Guruji. He came and gave head in the beautiful Charan Kamal of Guruji ॥4॥

* Satanandu then spoke Janaka. Kausik Muni Pahit read
Janak Binay Tinh Aye narrated. Dow bhai lei bhai ॥5

Bhaartarth: – Then Janakji called Shatanandji and immediately sent him to Vishwamitra Muni. He came and heard Janakji’s request. Vishwamitra jovially called both brothers ॥5॥
Doha:
* Satanand post band Prabhu is seated.
Chaluhu tat muni kahue khenu then pathava janak spoke ॥239॥
Meaning: – After worshiping the feet of Shantanandji, Lord Shri Ramchandraji sat down with Guruji. Then the sage said – O Tat! Come on, Janakji has sent the call ॥239॥

Masparayan, eighth rest
Navah parayan, second rest


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