Tuesday, May 21, 2024
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श्री राम-लक्ष्मण सहित विश्वामित्र का जनकपुर में प्रवेश

श्री राम-लक्ष्मण सहित विश्वामित्र का जनकपुर में प्रवेश

चौपाई :
* चले राम लछिमन मुनि संगा। गए जहाँ जग पावनि गंगा॥
गाधिसूनु सब कथा सुनाई। जेहि प्रकार सुरसरि महि आई॥1॥
भावार्थ:-श्री रामजी और लक्ष्मणजी मुनि के साथ चले। वे वहाँ गए, जहाँ जगत को पवित्र करने वाली गंगाजी थीं। महाराज गाधि के पुत्र विश्वामित्रजी ने वह सब कथा कह सुनाई जिस प्रकार देवनदी गंगाजी पृथ्वी पर आई थीं॥1॥
* तब प्रभु रिषिन्ह समेत नहाए। बिबिध दान महिदेवन्हि पाए॥
हरषि चले मुनि बृंद सहाया। बेगि बिदेह नगर निअराया॥2॥
भावार्थ:-तब प्रभु ने ऋषियों सहित (गंगाजी में) स्नान किया। ब्राह्मणों ने भाँति-भाँति के दान पाए। फिर मुनिवृन्द के साथ वे प्रसन्न होकर चले और शीघ्र ही जनकपुर के निकट पहुँच गए॥2॥
* पुर रम्यता राम जब देखी। हरषे अनुज समेत बिसेषी॥
बापीं कूप सरित सर नाना। सलिल सुधासम मनि सोपाना॥3॥
भावार्थ:-श्री रामजी ने जब जनकपुर की शोभा देखी, तब वे छोटे भाई लक्ष्मण सहित अत्यन्त हर्षित हुए। वहाँ अनेकों बावलियाँ, कुएँ, नदी और तालाब हैं, जिनमें अमृत के समान जल है और मणियों की सीढ़ियाँ (बनी हुई) हैं॥3॥
* गुंजत मंजु मत्त रस भृंगा। कूजत कल बहुबरन बिहंगा॥
बरन बरन बिकसे बनजाता। त्रिबिध समीर सदा सुखदाता॥4॥
भावार्थ:-मकरंद रस से मतवाले होकर भौंरे सुंदर गुंजार कर रहे हैं। रंग-बिरंगे (बहुत से) पक्षी मधुर शब्द कर रहे हैं। रंग-रंग के कमल खिले हैं। सदा (सब ऋतुओं में) सुख देने वाला शीतल, मंद, सुगंध पवन बह रहा है॥4॥

Overview

दोहा :

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* सुमन बाटिका बाग बन बिपुल बिहंग निवास।
फूलत फलत सुपल्लवत सोहत पुर चहुँ पास॥212।
भावार्थ:-पुष्प वाटिका (फुलवारी), बाग और वन, जिनमें बहुत से पक्षियों का निवास है, फूलते, फलते और सुंदर पत्तों से लदे हुए नगर के चारों ओर सुशोभित हैं॥212॥
चौपाई :
* बनइ न बरनत नगर निकाई। जहाँ जाइ मन तहँइँ लोभाई॥
चारु बजारु बिचित्र अँबारी। मनिमय बिधि जनु स्वकर सँवारी॥1॥
भावार्थ:-नगर की सुंदरता का वर्णन करते नहीं बनता। मन जहाँ जाता है, वहीं लुभा जाता (रम जाता) है। सुंदर बाजार है, मणियों से बने हुए विचित्र छज्जे हैं, मानो ब्रह्मा ने उन्हें अपने हाथों से बनाया है॥1॥
*धनिक बनिक बर धनद समाना। बैठे सकल बस्तु लै नाना।
चौहट सुंदर गलीं सुहाई। संतत रहहिं सुगंध सिंचाई॥2॥
भावार्थ:-कुबेर के समान श्रेष्ठ धनी व्यापारी सब प्रकार की अनेक वस्तुएँ लेकर (दुकानों में) बैठे हैं। सुंदर चौराहे और सुहावनी गलियाँ सदा सुगंध से सिंची रहती हैं॥2॥
* मंगलमय मंदिर सब केरें। चित्रित जनु रतिनाथ चितेरें॥
पुर नर नारि सुभग सुचि संता। धरमसील ग्यानी गुनवंता॥3॥
भावार्थ:-सबके घर मंगलमय हैं और उन पर चित्र कढ़े हुए हैं, जिन्हें मानो कामदेव रूपी चित्रकार ने अंकित किया है। नगर के (सभी) स्त्री-पुरुष सुंदर, पवित्र, साधु स्वभाव वाले, धर्मात्मा, ज्ञानी और गुणवान हैं॥3॥
*अति अनूप जहँ जनक निवासू। बिथकहिं बिबुध बिलोकि बिलासू॥
होत चकित चित कोट बिलोकी। सकल भुवन सोभा जनु रोकी॥4॥
भावार्थ:-जहाँ जनकजी का अत्यन्त अनुपम (सुंदर) निवास स्थान (महल) है, वहाँ के विलास (ऐश्वर्य) को देखकर देवता भी थकित (स्तम्भित) हो जाते हैं (मनुष्यों की तो बात ही क्या!)। कोट (राजमहल के परकोटे) को देखकर चित्त चकित हो जाता है, (ऐसा मालूम होता है) मानो उसने समस्त लोकों की शोभा को रोक (घेर) रखा है॥4॥
दोहा :
*धवल धाम मनि पुरट पट सुघटित नाना भाँति।
सिय निवास सुंदर सदन सोभा किमि कहि जाति॥213॥
भावार्थ:-उज्ज्वल महलों में अनेक प्रकार के सुंदर रीति से बने हुए मणि जटित सोने की जरी के परदे लगे हैं। सीताजी के रहने के सुंदर महल की शोभा का वर्णन किया ही कैसे जा सकता है॥213॥
चौपाई :
* सुभग द्वार सब कुलिस कपाटा। भूप भीर नट मागध भाटा॥
बनी बिसाल बाजि गज साला। हय गय रख संकुल सब काला॥1॥
भावार्थ:-राजमहल के सब दरवाजे (फाटक) सुंदर हैं, जिनमें वज्र के (मजबूत अथवा हीरों के चमकते हुए) किवाड़ लगे हैं। वहाँ (मातहत) राजाओं, नटों, मागधों और भाटों की भीड़ लगी रहती है। घोड़ों और हाथियों के लिए बहुत बड़ी-बड़ी घुड़सालें और गजशालाएँ (फीलखाने) बनी हुई हैं, जो सब समय घोड़े, हाथी और रथों से भरी रहती हैं॥1॥
* सूर सचिव सेनप बहुतेरे। नृपगृह सरिस सदन सब केरे॥
पुर बाहेर सर सरित समीपा। उतरे जहँ तहँ बिपुल महीपा॥2॥
भावार्थ:-बहुत से शूरवीर, मंत्री और सेनापति हैं। उन सबके घर भी राजमहल सरीखे ही हैं। नगर के बाहर तालाब और नदी के निकट जहाँ-तहाँ बहुत से राजा लोग उतरे हुए (डेरा डाले हुए) हैं॥2॥
* देखि अनूप एक अँवराई। सब सुपास सब भाँति सुहाई।
कौसिक कहेउ मोर मनु माना। इहाँ रहिअ रघुबीर सुजाना॥3॥
भावार्थ:-(वहीं) आमों का एक अनुपम बाग देखकर, जहाँ सब प्रकार के सुभीते थे और जो सब तरह से सुहावना था, विश्वामित्रजी ने कहा- हे सुजान रघुवीर! मेरा मन कहता है कि यहीं रहा जाए॥3॥
* भलेहिं नाथ कहि कृपानिकेता। उतरे तहँ मुनि बृंद समेता॥
बिस्वामित्र महामुनि आए। समाचार मिथिलापति पाए॥4॥
भावार्थ:-कृपा के धाम श्री रामचन्द्रजी ‘बहुत अच्छा स्वामिन्‌!’ कहकर वहीं मुनियों के समूह के साथ ठहर गए। मिथिलापति जनकजी ने जब यह समाचार पाया कि महामुनि विश्वामित्र आए हैं,॥4॥
दोहा :
* संग सचिव सुचि भूरि भट भूसुर बर गुर ग्याति।
चले मिलन मुनिनायकहि मुदित राउ एहि भाँति॥214॥
भावार्थ:-तब उन्होंने पवित्र हृदय के (ईमानदार, स्वामिभक्त) मंत्री बहुत से योद्धा, श्रेष्ठ ब्राह्मण, गुरु (शतानंदजी) और अपनी जाति के श्रेष्ठ लोगों को साथ लिया और इस प्रकार प्रसन्नता के साथ राजा मुनियों के स्वामी विश्वामित्रजी से मिलने चले॥214॥
चौपाई :
* कीन्ह प्रनामु चरन धरि माथा। दीन्हि असीस मुदित मुनिनाथा॥
बिप्रबृंद सब सादर बंदे। जानि भाग्य बड़ राउ अनंदे॥1॥
भावार्थ:-राजा ने मुनि के चरणों पर मस्तक रखकर प्रणाम किया। मुनियों के स्वामी विश्वामित्रजी ने प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया। फिर सारी ब्राह्मणमंडली को आदर सहित प्रणाम किया और अपना बड़ा भाग्य जानकर राजा आनंदित हुए॥1॥
* कुसल प्रस्न कहि बारहिं बारा। बिस्वामित्र नृपहि बैठारा॥
तेहि अवसर आए दोउ भाई। गए रहे देखन फुलवाई॥2॥
भावार्थ:-बार-बार कुशल प्रश्न करके विश्वामित्रजी ने राजा को बैठाया। उसी समय दोनों भाई आ पहुँचे, जो फुलवाड़ी देखने गए थे॥2॥
* स्याम गौर मृदु बयस किसोरा। लोचन सुखद बिस्व चित चोरा॥
उठे सकल जब रघुपति आए। बिस्वामित्र निकट बैठाए॥3॥
भावार्थ:-सुकुमार किशोर अवस्था वाले श्याम और गौर वर्ण के दोनों कुमार नेत्रों को सुख देने वाले और सारे विश्व के चित्त को चुराने वाले हैं। जब रघुनाथजी आए तब सभी (उनके रूप एवं तेज से प्रभावित होकर) उठकर खड़े हो गए विश्वामित्रजी ने उनको अपने पास बैठा लिया॥3॥
* भए सब सुखी देखि दोउ भ्राता। बारि बिलोचन पुलकित गाता॥
मूरति मधुर मनोहर देखी भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी॥4॥
भावार्थ:-दोनों भाइयों को देखकर सभी सुखी हुए। सबके नेत्रों में जल भर आया (आनंद और प्रेम के आँसू उमड़ पड़े) और शरीर रोमांचित हो उठे। रामजी की मधुर मनोहर मूर्ति को देखकर विदेह (जनक) विशेष रूप से विदेह (देह की सुध-बुध से रहित) हो गए॥4॥

Vishwamitra enters Sri Janakpur with Shri Ram-Laxman

Bunk:
* Chale Ram Lachhiman Muni Sanga Jahan java Pavani ganga॥
Gadhisunu narrated all the stories. Just like Surashi Mahi came ॥1॥
Meaning: – Shri Ramji and Laxmanji went with the sage. He went to the place where there was Gangaji, who sanctified the world. Vishwamitraji, son of Maharaja Gandhi, narrated all the stories as how Devnadi Gangaji came to earth.
* Then the Lord took a bath with Rishinh. Buddhist Daan Mahdevanhi
Hrishi went to the Muni Brind. Begin Bidhe Nagar Niaraya ॥2॥
Bhaarthar: – Then Prabhu took a bath with sages (in Gangaji). The Brahmins received regular donations. Then he went away happily with the monk and soon reached near Janakpur.
* Pur Ramitya Ram Jab Dekhi. Biseshi including Harshe Anuj
Bapi Kup Sarit Sir Nana. Salil Sudhasam Mani Sopana ॥3॥

Meaning: When Shri Ramji saw the glory of Janakpur, then he was very happy, including younger brother Laxman. There are many bawalis, wells, rivers, and ponds, which have water like nectar and staircases of stones (remains) ॥3॥.
* Gunjat Manju Matt Ras Bhringa. Kujat Kal Bahubaran Bihanga॥
Baran Baran gets sold. Tribidh Sameer Sada Sukhdata ॥4॥
Bhartharth: – Bubbles are making beautiful humming with macaron juice. Colorful (many) birds are making sweet words. Colorful lotus blooms. Always, in all the seasons, the one who gives pleasure, the cool, the soft, the fragrance is blowing the wind ॥4॥

Doha:
Suman Batika Bagh Bipul Bihang Niwas.
Phulat Falat Supallawat Sohat Pur Chahoon Pass ॥212.
Spirituality: – The flower garden (Phulwari), gardens, and forests, which are inhabited by many birds, are adorned around the city with flowers, flowers, and beautiful leaves ॥212॥.
Bunk:
* Made out the city of Bannat. Wherever you go, your heart becomes greedy
Charu Bazaru Bichitra Ambari. Manmidhi Bidhi Janu Swarkar Sanari ॥1॥
Meaning: – It is not made to describe the beauty of the city. Wherever the mind goes, there is lubha jata (rum). There is a beautiful market, a bizarre balcony made of beads, as if Brahma made them with his own hands ॥1॥

* Dhanik Banik Bar Dhanad Samana. Seated gross object.
Chuhat beautiful street Suhai. Sant Rahni Aroma Irrigation ॥2॥
Meaning: Like Kubera, the best wealthy businessmen are sitting (in shops) with all kinds of items. Beautiful crossroads and lush streets are always watered with fragrance ॥2॥
* Mangalmay Mandir all. Painted Janu Ratinath Chittare॥
Pur Nar Nari Subhag Suchi Santa. Dharamseel Gyani Gunvanta ॥3॥
Connotation: – All the houses are auspicious and there are pictures painted on them, as if painted by a painter like Cupid. (All) men and women of the city are beautiful, pious, sane in nature, godly, knowledgeable, and talented.

* Very strange where Janak Nivasu. Bithkahin Bibudh Biloki Bilasu॥
Hot amazed Chit Kot Biloki. Sakal Bhuvan Sobha Janu stopped ॥4॥
Spirituality: – While Janakji has a very unique (beautiful) abode (palace), the gods also become tired (stunned) by looking at the luxury (opulence) there (no matter what about humans!). Seeing the coat (palace of the palace), the mind is astonished, (it seems) as if he has held the glory of the whole world ॥4॥
Doha:
* Like Dhaval Dham Mani Purat Pat Sughitit Nana.
Siy Niwas Sundar Sadan Sobha Kimi Kahi Caste ॥213॥
Meaning: In bright palaces, there are many types of beautifully crafted gem-studded gold brocade curtains. How can one describe the beauty of the beautiful palace of Sitaji’s stay ॥213॥

Bunk:
* Subhash Dwar Sub Kulis Kapata. Bhupa Bhir Nut Magadha Bhatta
Bani Baal Baji Gaj Sala Keep the packages all-black ॥1॥
Meaning: All the doors (gates) of the Rajmahal are beautiful, with doors of Vajra (strong or shining diamonds). There are (subordinate) crowds of kings, nuts, Magadhas, and Baths. There are huge horsemen and gazhalas (phalkhana) for horses and elephants, which are full of horses, elephants and chariots all the time ॥1॥
* Sur Secretary, Senp. Nripegriha Saris Sadan Sab Kere
Pur bahir sir sarit nipa. Landed where Bipul Mahipa ॥2॥
Connotation: – Many are knights, ministers and generals. The houses of all of them are also like the palace. Outside the city, near the pond and river, there are many kings descended (camping) ॥2॥.

* See Anoop An Anorai. Everything sounded like everything.
Kausik Kaheu Peacock Manu Stay here Raghubir Sujana ॥3॥
Sense: Seeing a unique garden of mangoes, where there was all kinds of fragrances and everything was pleasant, Vishwamitraji said – O Sujan Raghuvir! My mind says to stay here ॥3॥
* Bhalehin Nath Kahi Kripaniketa. Descended Muni Brind Sameta
Biswamitra Mahamuni came. News Mithilapati found ॥4॥

Meaning: – Shri Ramchandraji of Kripa’s Dham ‘Very good lord!’ Having said that, he stayed there with a group of monks. When Mithilapati Janakji got the news that Mahamuni Vishwamitra had come, ॥4॥
Doha:
* With Secretary Suchi Bhuri Bhat Bhusur Bar Gur Gyati.
Chale milan muninayakhi mudit rau ahi bhi ति214॥
Spiritualism: – Then he took many warriors, superior Brahmins, Gurus (Shatanandji) and superior people of his caste (ministers, honest, loyal) ministers of the Sacred Heart and thus happily went to meet Vishwamitraji, the lord of King Muni. 4

Bunk:
* Keenh Pranamu Charan Dhari Matha. Dinhi Asis Mudit Muninatha॥
Biprbrind all regards Jani Bhagya Bad Rau Anande ॥1॥
Bhaartarth: -Raja bowed with a head on the feet of the sage. Lord Vishwamitra, the lord of the munis, gave his blessing in delight. Then he bowed with respect to all the Brahmanamandali and the king was happy knowing his great fortune.
* Kusal Prashan Kahi Barhin Bara. Biswamitra Nripahee Sitara॥
This opportunity came, brother. Gaya rahe dekhan phulwai ॥2॥
Meaning: Repeatedly by asking efficient questions, Vishwamitra made the king sit. At the same time, both brothers arrived, who went to see Phulwadi. ॥2॥

* Syam Gaur Mridu Bayas Kissora Lochan Pleasant Biswa Chit Chora॥
Woke up when Raghupati came. Biswamitra sits near ॥3॥
Meaning: Both Kumar, a juvenile-aged Shyam, and Gaur Varna, are going to give pleasure to the eyes and steal the mind of the whole world. When Raghunathji came, everyone (impressed by his form and sharpness) got up and stood up. Vishwamitra kept him sitting with him ॥3॥

* Look, everyone is happy, brother. Bari Bilochan Pulkit sings॥
Murti Madhur Manohar Dekha Bhayau Bidheu Bidheu Biseshi ॥4॥
Sense: Everyone was happy to see both brothers. Everybody’s eyes filled with water (tears of joy and love flowed) and the bodies were thrilled. Videha (Janaka) became especially Videha (devoid of body’s repose-mercury) by seeing the beautiful idol of Ramji ॥4॥

parmender yadav
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