Sunday, April 14, 2024
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श्री रामगुण और श्री रामचरित्‌ की महिमा

श्री रामगुण और श्री रामचरित्‌ की महिमा

श्री रामगुण और श्री रामचरित्‌ की महिमा   –  * मोरि सुधारिहि सो सब भाँती। जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती॥
राम सुस्वामि कुसेवकु मोसो। निज दिसि देखि दयानिधि पोसो॥2॥
भावार्थ:-वे (श्री रामजी) मेरी (बिगड़ी) सब तरह से सुधार लेंगे, जिनकी कृपा कृपा करने से नहीं अघाती। राम से उत्तम स्वामी और मुझ सरीखा बुरा सेवक! इतने पर भी उन दयानिधि ने अपनी ओर देखकर मेरा पालन किया है॥2॥
* लोकहुँ बेद सुसाहिब रीती। बिनय सुनत पहिचानत प्रीती॥
गनी गरीब ग्राम नर नागर। पंडित मूढ़ मलीन उजागर॥3॥
भावार्थ:-लोक और वेद में भी अच्छे स्वामी की यही रीति प्रसिद्ध है कि वह विनय सुनते ही प्रेम को पहचान लेता है। अमीर-गरीब, गँवार-नगर निवासी, पण्डित-मूर्ख, बदनाम-यशस्वी॥3॥
* सुकबि कुकबि निज मति अनुहारी। नृपहि सराहत सब नर नारी॥
साधु सुजान सुसील नृपाला। ईस अंस भव परम कृपाला॥4॥
भावार्थ:-सुकवि-कुकवि, सभी नर-नारी अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार राजा की सराहना करते हैं और साधु, बुद्धिमान, सुशील, ईश्वर के अंश से उत्पन्न कृपालु राजा-॥4॥
* सुनि सनमानहिं सबहि सुबानी। भनिति भगति नति गति पहिचानी॥
यह प्राकृत महिपाल सुभाऊ। जान सिरोमनि कोसलराऊ॥5॥
भावार्थ:-सबकी सुनकर और उनकी वाणी, भक्ति, विनय और चाल को पहचानकर सुंदर (मीठी) वाणी से सबका यथायोग्य सम्मान करते हैं। यह स्वभाव तो संसारी राजाओं का है, कोसलनाथ श्री रामचन्द्रजी तो चतुरशिरोमणि हैं॥5॥
* रीझत राम सनेह निसोतें। को जग मंद मलिनमति मोतें॥6॥
भावार्थ:-श्री रामजी तो विशुद्ध प्रेम से ही रीझते हैं, पर जगत में मुझसे बढ़कर मूर्ख और मलिन बुद्धि और कौन होगा?॥6॥
दोहा :
* सठ सेवक की प्रीति रुचि रखिहहिं राम कृपालु।
उपल किए जलजान जेहिं सचिव सुमति कपि भालु॥28 क॥
भावार्थ:-तथापि कृपालु श्री रामचन्द्रजी मुझ दुष्ट सेवक की प्रीति और रुचि को अवश्य रखेंगे, जिन्होंने पत्थरों को जहाज और बंदर-भालुओं को बुद्धिमान मंत्री बना लिया॥28 (क)॥
* हौंहु कहावत सबु कहत राम सहत उपहास।
साहिब सीतानाथ सो सेवक तुलसीदास॥28 ख॥
भावार्थ:-सब लोग मुझे श्री रामजी का सेवक कहते हैं और मैं भी (बिना लज्जा-संकोच के) कहलाता हूँ (कहने वालों का विरोध नहीं करता), कृपालु श्री रामजी इस निन्दा को सहते हैं कि श्री सीतानाथजी, जैसे स्वामी का तुलसीदास सा सेवक है॥28 (ख)॥
चौपाई :
* अति बड़ि मोरि ढिठाई खोरी। सुनि अघ नरकहुँ नाक सकोरी॥
समुझि सहम मोहि अपडर अपनें। सो सुधि राम कीन्हि नहिं सपनें॥1॥
भावार्थ:-यह मेरी बहुत बड़ी ढिठाई और दोष है, मेरे पाप को सुनकर नरक ने भी नाक सिकोड़ ली है (अर्थात नरक में भी मेरे लिए ठौर नहीं है)। यह समझकर मुझे अपने ही कल्पित डर से डर हो रहा है, किन्तु भगवान श्री रामचन्द्रजी ने तो स्वप्न में भी इस पर (मेरी इस ढिठाई और दोष पर) ध्यान नहीं दिया॥1॥
* सुनि अवलोकि सुचित चख चाही। भगति मोरि मति स्वामि सराही॥
कहत नसाइ होइ हियँ नीकी। रीझत राम जानि जन जी की॥2॥
भावार्थ:-वरन मेरे प्रभु श्री रामचन्द्रजी ने तो इस बात को सुनकर, देखकर और अपने सुचित्त रूपी चक्षु से निरीक्षण कर मेरी भक्ति और बुद्धि की (उलटे) सराहना की, क्योंकि कहने में चाहे बिगड़ जाए (अर्थात्‌ मैं चाहे अपने को भगवान का सेवक कहता-कहलाता रहूँ), परन्तु हृदय में अच्छापन होना चाहिए। (हृदय में तो अपने को उनका सेवक बनने योग्य नहीं मानकर पापी और दीन ही मानता हूँ, यह अच्छापन है।) श्री रामचन्द्रजी भी दास के हृदय की (अच्छी) स्थिति जानकर रीझ जाते हैं॥2॥
* रहति न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की॥
जेहिं अघ बधेउ ब्याध जिमि बाली। फिरि सुकंठ सोइ कीन्हि कुचाली॥3॥
भावार्थ:-प्रभु के चित्त में अपने भक्तों की हुई भूल-चूक याद नहीं रहती (वे उसे भूल जाते हैं) और उनके हृदय (की अच्छाई-नेकी) को सौ-सौ बार याद करते रहते हैं। जिस पाप के कारण उन्होंने बालि को व्याध की तरह मारा था, वैसी ही कुचाल फिर सुग्रीव ने चली॥3॥
* सोइ करतूति बिभीषन केरी। सपनेहूँ सो न राम हियँ हेरी॥
ते भरतहि भेंटत सनमाने। राजसभाँ रघुबीर बखाने॥4॥
भावार्थ:-वही करनी विभीषण की थी, परन्तु श्री रामचन्द्रजी ने स्वप्न में भी उसका मन में विचार नहीं किया। उलटे भरतजी से मिलने के समय श्री रघुनाथजी ने उनका सम्मान किया और राजसभा में भी उनके गुणों का बखान किया॥4॥
दोहा :
* प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आपु समान।
तुलसी कहूँ न राम से साहिब सील निधान॥29 क॥
भावार्थ:-प्रभु (श्री रामचन्द्रजी) तो वृक्ष के नीचे और बंदर डाली पर (अर्थात कहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम सच्चिदानन्दघन परमात्मा श्री रामजी और कहाँ पेड़ों की शाखाओं पर कूदने वाले बंदर), परन्तु ऐसे बंदरों को भी उन्होंने अपने समान बना लिया। तुलसीदासजी कहते हैं कि श्री रामचन्द्रजी सरीखे शीलनिधान स्वामी कहीं भी नहीं हैं॥29 (क)॥
* राम निकाईं रावरी है सबही को नीक।
जौं यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक॥29 ख॥
भावार्थ:-हे श्री रामजी! आपकी अच्छाई से सभी का भला है (अर्थात आपका कल्याणमय स्वभाव सभी का कल्याण करने वाला है) यदि यह बात सच है तो तुलसीदास का भी सदा कल्याण ही होगा॥29 (ख)॥
* एहि बिधि निज गुन दोष कहि सबहि बहुरि सिरु नाइ।
बरनउँ रघुबर बिसद जसु सुनि कलि कलुष नसाइ॥29 ग॥
भावार्थ:-इस प्रकार अपने गुण-दोषों को कहकर और सबको फिर सिर नवाकर मैं श्री रघुनाथजी का निर्मल यश वर्णन करता हूँ, जिसके सुनने से कलियुग के पाप नष्ट हो जाते हैं॥29 (ग)॥
चौपाई :
* जागबलिक जो कथा सुहाई। भरद्वाज मुनिबरहि सुनाई॥
कहिहउँ सोइ संबाद बखानी। सुनहुँ सकल सज्जन सुखु मानी॥1॥
भावार्थ:-मुनि याज्ञवल्क्यजी ने जो सुहावनी कथा मुनिश्रेष्ठ भरद्वाजजी को सुनाई थी, उसी संवाद को मैं बखानकर कहूँगा, सब सज्जन सुख का अनुभव करते हुए उसे सुनें॥1॥
* संभु कीन्ह यह चरित सुहावा। बहुरि कृपा करि उमहि सुनावा॥
सोइ सिव कागभुसुंडिहि दीन्हा। राम भगत अधिकारी चीन्हा॥2॥
भावार्थ:-शिवजी ने पहले इस सुहावने चरित्र को रचा, फिर कृपा करके पार्वतीजी को सुनाया। वही चरित्र शिवजी ने काकभुशुण्डिजी को रामभक्त और अधिकारी पहचानकर दिया॥2॥
* तेहि सन जागबलिक पुनि पावा। तिन्ह पुनि भरद्वाज प्रति गावा॥
ते श्रोता बकता समसीला। सवँदरसी जानहिं हरिलीला॥3॥
भावार्थ:-उन काकभुशुण्डिजी से फिर याज्ञवल्क्यजी ने पाया और उन्होंने फिर उसे भरद्वाजजी को गाकर सुनाया। वे दोनों वक्ता और श्रोता (याज्ञवल्क्य और भरद्वाज) समान शील वाले और समदर्शी हैं और श्री हरि की लीला को जानते हैं॥3॥
* जानहिं तीनि काल निज ग्याना। करतल गत आमलक समाना॥
औरउ जे हरिभगत सुजाना। कहहिं सुनहिं समुझहिं बिधि नाना॥4॥
भावार्थ:-वे अपने ज्ञान से तीनों कालों की बातों को हथेली पर रखे हुए आँवले के समान (प्रत्यक्ष) जानते हैं। और भी जो सुजान (भगवान की लीलाओं का रहस्य जानने वाले) हरि भक्त हैं, वे इस चरित्र को नाना प्रकार से कहते, सुनते और समझते हैं॥4॥
दोहा :
* मैं पुनि निज गुर सन सुनी कथा सो सूकरखेत।
समुझी नहिं तसि बालपन तब अति रहेउँ अचेत॥30 क॥
भावार्थ:-फिर वही कथा मैंने वाराह क्षेत्र में अपने गुरुजी से सुनी, परन्तु उस समय मैं लड़कपन के कारण बहुत बेसमझ था, इससे उसको उस प्रकार (अच्छी तरह) समझा नहीं॥30 (क)॥

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* श्रोता बकता ग्याननिधि कथा राम कै गूढ़।
किमि समुझौं मैं जीव जड़ कलि मल ग्रसित बिमूढ़॥30ख॥
भावार्थ:-श्री रामजी की गूढ़ कथा के वक्ता (कहने वाले) और श्रोता (सुनने वाले) दोनों ज्ञान के खजाने (पूरे ज्ञानी) होते हैं। मैं कलियुग के पापों से ग्रसा हुआ महामूढ़ जड़ जीव भला उसको कैसे समझ सकता था?॥30 ख॥
चौपाई :
* तदपि कही गुर बारहिं बारा। समुझि परी कछु मति अनुसारा॥
भाषाबद्ध करबि मैं सोई। मोरें मन प्रबोध जेहिं होई॥1॥
भावार्थ:-तो भी गुरुजी ने जब बार-बार कथा कही, तब बुद्धि के अनुसार कुछ समझ में आई। वही अब मेरे द्वारा भाषा में रची जाएगी, जिससे मेरे मन को संतोष हो॥1॥
* जस कछु बुधि बिबेक बल मेरें। तस कहिहउँ हियँ हरि के प्रेरें॥
निज संदेह मोह भ्रम हरनी। करउँ कथा भव सरिता तरनी॥2॥
भावार्थ:-जैसा कुछ मुझमें बुद्धि और विवेक का बल है, मैं हृदय में हरि की प्रेरणा से उसी के अनुसार कहूँगा। मैं अपने संदेह, अज्ञान और भ्रम को हरने वाली कथा रचता हूँ, जो संसार रूपी नदी के पार करने के लिए नाव है॥2॥
* बुध बिश्राम सकल जन रंजनि। रामकथा कलि कलुष बिभंजनि॥
रामकथा कलि पंनग भरनी। पुनि बिबेक पावक कहुँ अरनी॥3॥
भावार्थ:-रामकथा पण्डितों को विश्राम देने वाली, सब मनुष्यों को प्रसन्न करने वाली और कलियुग के पापों का नाश करने वाली है। रामकथा कलियुग रूपी साँप के लिए मोरनी है और विवेक रूपी अग्नि के प्रकट करने के लिए अरणि (मंथन की जाने वाली लकड़ी) है, (अर्थात इस कथा से ज्ञान की प्राप्ति होती है)॥3॥
* रामकथा कलि कामद गाई। सुजन सजीवनि मूरि सुहाई॥
सोइ बसुधातल सुधा तरंगिनि। भय भंजनि भ्रम भेक भुअंगिनि॥4॥
भावार्थ:-रामकथा कलियुग में सब मनोरथों को पूर्ण करने वाली कामधेनु गौ है और सज्जनों के लिए सुंदर संजीवनी जड़ी है। पृथ्वी पर यही अमृत की नदी है, जन्म-मरण रूपी भय का नाश करने वाली और भ्रम रूपी मेंढकों को खाने के लिए सर्पिणी है॥4॥
* असुर सेन सम नरक निकंदिनि। साधु बिबुध कुल हित गिरिनंदिनि॥
संत समाज पयोधि रमा सी। बिस्व भार भर अचल छमा सी॥5॥
भावार्थ:-यह रामकथा असुरों की सेना के समान नरकों का नाश करने वाली और साधु रूप देवताओं के कुल का हित करने वाली पार्वती (दुर्गा) है। यह संत-समाज रूपी क्षीर समुद्र के लिए लक्ष्मीजी के समान है और सम्पूर्ण विश्व का भार उठाने में अचल पृथ्वी के समान है॥5॥
* जम गन मुहँ मसि जग जमुना सी। जीवन मुकुति हेतु जनु कासी॥
रामहि प्रिय पावनि तुलसी सी। तुलसिदास हित हियँ हुलसी सी॥6॥
भावार्थ:-यमदूतों के मुख पर कालिख लगाने के लिए यह जगत में यमुनाजी के समान है और जीवों को मुक्ति देने के लिए मानो काशी ही है। यह श्री रामजी को पवित्र तुलसी के समान प्रिय है और तुलसीदास के लिए हुलसी (तुलसीदासजी की माता) के समान हृदय से हित करने वाली है॥6॥
* सिवप्रिय मेकल सैल सुता सी। सकल सिद्धि सुख संपति रासी॥
सदगुन सुरगन अंब अदिति सी। रघुबर भगति प्रेम परमिति सी॥7॥
भावार्थ:-यह रामकथा शिवजी को नर्मदाजी के समान प्यारी है, यह सब सिद्धियों की तथा सुख-सम्पत्ति की राशि है। सद्गुण रूपी देवताओं के उत्पन्न और पालन-पोषण करने के लिए माता अदिति के समान है। श्री रघुनाथजी की भक्ति और प्रेम की परम सीमा सी है॥7॥
दोहा :
* रामकथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारु।
तुलसी सुभग सनेह बन सिय रघुबीर बिहारु॥31॥
भावार्थ:-तुलसीदासजी कहते हैं कि रामकथा मंदाकिनी नदी है, सुंदर (निर्मल) चित्त चित्रकूट है और सुंदर स्नेह ही वन है, जिसमें श्री सीतारामजी विहार करते हैं॥31॥
चौपाई :
* रामचरित चिंतामति चारू। संत सुमति तिय सुभग सिंगारू॥
जग मंगल गुनग्राम राम के। दानि मुकुति धन धरम धाम के॥1॥
भावार्थ:-श्री रामचन्द्रजी का चरित्र सुंदर चिन्तामणि है और संतों की सुबुद्धि रूपी स्त्री का सुंदर श्रंगार है। श्री रामचन्द्रजी के गुण-समूह जगत्‌ का कल्याण करने वाले और मुक्ति, धन, धर्म और परमधाम के देने वाले हैं॥1॥
* सदगुर ग्यान बिराग जोग के। बिबुध बैद भव भीम रोग के॥
जननि जनक सिय राम प्रेम के। बीज सकल ब्रत धरम नेम के॥2॥
भावार्थ:-ज्ञान, वैराग्य और योग के लिए सद्गुरु हैं और संसार रूपी भयंकर रोग का नाश करने के लिए देवताओं के वैद्य (अश्विनीकुमार) के समान हैं। ये श्री सीतारामजी के प्रेम के उत्पन्न करने के लिए माता-पिता हैं और सम्पूर्ण व्रत, धर्म और नियमों के बीज हैं॥2॥
* समन पाप संताप सोक के। प्रिय पालक परलोक लोक के॥
सचिव सुभट भूपति बिचार के। कुंभज लोभ उदधि अपार के॥3॥
भावार्थ:-पाप, संताप और शोक का नाश करने वाले तथा इस लोक और परलोक के प्रिय पालन करने वाले हैं। विचार (ज्ञान) रूपी राजा के शूरवीर मंत्री और लोभ रूपी अपार समुद्र के सोखने के लिए अगस्त्य मुनि हैं॥3॥
* काम कोह कलिमल करिगन के। केहरि सावक जन मन बन के॥
अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के। कामद घन दारिद दवारि के॥4॥
भावार्थ:-भक्तों के मन रूपी वन में बसने वाले काम, क्रोध और कलियुग के पाप रूपी हाथियों को मारने के लिए सिंह के बच्चे हैं। शिवजी के पूज्य और प्रियतम अतिथि हैं और दरिद्रता रूपी दावानल के बुझाने के लिए कामना पूर्ण करने वाले मेघ हैं॥4॥
* मंत्र महामनि बिषय ब्याल के। मेटत कठिन कुअंक भाल के॥
हरन मोह तम दिनकर कर से। सेवक सालि पाल जलधर से॥5॥
भावार्थ:-विषय रूपी साँप का जहर उतारने के लिए मन्त्र और महामणि हैं। ये ललाट पर लिखे हुए कठिनता से मिटने वाले बुरे लेखों (मंद प्रारब्ध) को मिटा देने वाले हैं। अज्ञान रूपी अन्धकार को हरण करने के लिए सूर्य किरणों के समान और सेवक रूपी धान के पालन करने में मेघ के समान हैं॥5॥
* अभिमत दानि देवतरु बर से। सेवत सुलभ सुखद हरि हर से॥
सुकबि सरद नभ मन उडगन से। रामभगत जन जीवन धन से॥6॥
भावार्थ:-मनोवांछित वस्तु देने में श्रेष्ठ कल्पवृक्ष के समान हैं और सेवा करने में हरि-हर के समान सुलभ और सुख देने वाले हैं। सुकवि रूपी शरद् ऋतु के मन रूपी आकाश को सुशोभित करने के लिए तारागण के समान और श्री रामजी के भक्तों के तो जीवन धन ही हैं॥6॥
* सकल सुकृत फल भूरि भोग से। जग हित निरुपधि साधु लोग से॥
सेवक मन मानस मराल से। पावन गंग तरंग माल से॥7॥
भावार्थ:-सम्पूर्ण पुण्यों के फल महान भोगों के समान हैं। जगत का छलरहित (यथार्थ) हित करने में साधु-संतों के समान हैं। सेवकों के मन रूपी मानसरोवर के लिए हंस के समान और पवित्र करने में गंगाजी की तरंगमालाओं के समान हैं॥7॥
दोहा :
* कुपथ कुतरक कुचालि कलि कपट दंभ पाषंड।
दहन राम गुन ग्राम जिमि इंधन अनल प्रचंड॥32 क॥
भावार्थ:-श्री रामजी के गुणों के समूह कुमार्ग, कुतर्क, कुचाल और कलियुग के कपट, दम्भ और पाखण्ड को जलाने के लिए वैसे ही हैं, जैसे ईंधन के लिए प्रचण्ड अग्नि॥32 (क)॥
* रामचरित राकेस कर सरिस सुखद सब काहु।
सज्जन कुमुद चकोर चित हित बिसेषि बड़ लाहु॥32 ख॥
भावार्थ:-रामचरित्र पूर्णिमा के चन्द्रमा की किरणों के समान सभी को सुख देने वाले हैं, परन्तु सज्जन रूपी कुमुदिनी और चकोर के चित्त के लिए तो विशेष हितकारी और महान लाभदायक हैं॥32 (ख)॥
चौपाई :
* कीन्हि प्रस्न जेहि भाँति भaवानी। जेहि बिधि संकर कहा बखानी॥
सो सब हेतु कहब मैं गाई। कथा प्रबंध बिचित्र बनाई॥1॥
भावार्थ:-जिस प्रकार श्री पार्वतीजी ने श्री शिवजी से प्रश्न किया और जिस प्रकार से श्री शिवजी ने विस्तार से उसका उत्तर कहा, वह सब कारण मैं विचित्र कथा की रचना करके गाकर कहूँगा॥1॥
* जेहिं यह कथा सुनी नहिं होई। जनि आचरजु करै सुनि सोई॥
कथा अलौकिक सुनहिं जे ग्यानी। नहिं आचरजु करहिं अस जानी॥2॥
रामकथा कै मिति जग नाहीं। असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं॥
नाना भाँति राम अवतारा। रामायन सत कोटि अपारा॥3॥
भावार्थ:-जिसने यह कथा पहले न सुनी हो, वह इसे सुनकर आश्चर्य न करे। जो ज्ञानी इस विचित्र कथा को सुनते हैं, वे यह जानकर आश्चर्य नहीं करते कि संसार में रामकथा की कोई सीमा नहीं है (रामकथा अनंत है)। उनके मन में ऐसा विश्वास रहता है। नाना प्रकार से श्री रामचन्द्रजी के अवतार हुए हैं और सौ करोड़ तथा अपार रामायण हैं॥2-3॥
* कलपभेद हरिचरित सुहाए। भाँति अनेक मुनीसन्ह गाए॥
करिअ न संसय अस उर आनी। सुनिअ कथा सादर रति मानी॥4॥
भावार्थ:-कल्पभेद के अनुसार श्री हरि के सुंदर चरित्रों को मुनीश्वरों ने अनेकों प्रकार से गया है। हृदय में ऐसा विचार कर संदेह न कीजिए और आदर सहित प्रेम से इस कथा को सुनिए॥4॥
दोहा :
* राम अनंत अनंत गुन अमित कथा बिस्तार।
सुनि आचरजु न मानिहहिं जिन्ह कें बिमल बिचार॥33॥
भावार्थ:-श्री रामचन्द्रजी अनन्त हैं, उनके गुण भी अनन्त हैं और उनकी कथाओं का विस्तार भी असीम है। अतएव जिनके विचार निर्मल हैं, वे इस कथा को सुनकर आश्चर्य नहीं मानेंगे॥3॥
चौपाई :
* एहि बिधि सब संसय करि दूरी। सिर धरि गुर पद पंकज धूरी॥
पुनि सबही बिनवउँ कर जोरी। करत कथा जेहिं लाग न खोरी॥1॥
भावार्थ:-इस प्रकार सब संदेहों को दूर करके और श्री गुरुजी के चरणकमलों की रज को सिर पर धारण करके मैं पुनः हाथ जोड़कर सबकी विनती करता हूँ, जिससे कथा की रचना में कोई दोष स्पर्श न करने पावे॥1॥

Glory to Shri Ramgun and Shri Ramcharit
* Mori Sudhihihi is like everything. No grace, no grace
Ram Suswami Kusevaku Moso. Private December Watch Dayanidhi Poso ॥2॥
Meaning: – They (Shri Ramji) will improve me in every way, whose mercy does not go away with kindness. Best master than Rama and a bad servant like me! Even so, those Dayanidhi have followed me looking at me ॥2॥
* Lokhun Bed Susahib Reeti. Binay Sunat Pahichanat Preeti
Gani Poor Village Male Nagar. Pandit Goose Mull Exposed ॥3॥

Bhaartarth: – In Loka and Vedas also the good lord’s tradition is famous that he recognizes love as soon as he hears humility. Rich-poor, resident-city dwellers, wise-fools, infamous-famous श3॥
* Sukbi Kukbi Nige Mati Anuhari. Nrihahi Sarad All male female
Sadhu Sujan Susil Nripala. God bless you grace 4 4

Meaning: Sukavi-kukavi, all male and female, according to their own intelligence, appreciate the king and the sage, wise, gentle, compassionate king arising from the part of God – 4 4॥.
* Suni Sanmanhi Sabhi Subani. Bhaniti Bhagati Nati Pahi Pahchani॥
This Prakrit Mahipal Subhau. Jan Siromani Kosalrau ॥5॥
Meaning: Listening to everyone and recognizing their speech, devotion, humility and chal, respect everyone with a beautiful (sweet) voice. This nature is of the worldly kings, Kosalnath Sri Ramachandraji is a Chatur Shiromani.
* Rizhat Ram Sneh Nisote. Ko Jag Mand Malaminati Moten ॥6॥
Meaning: – Shri Ramji only behaves with pure love, but who else would be more foolish and filthy in the world than me? ॥6॥
Doha:
* Love the interest of Sath Sevak Rakhhihin Ram Kripalu.
Available Jaljan Jah Secretary Sumati Kapi Bhalu
Meaning: However, kindly Shri Ramchandraji will definitely keep the kindness and interest of the evil servant, who has made the ship of stones and monkey-bearers a wise minister. (28)
* Hauhanu proverb sabu kahat ram sahat ridicule.
Sahib Seetanath so servant Tulsidas ॥28b॥
Meaning: All people call me a servant of Shri Ramji and I am also (without shyness) (do not oppose those who say), kindly Shri Ramji tolerates the blasphemy that Shri Sitanathji, like Swami’s Tulsidas The servant is ॥28 (b)॥
Bunk:
* Very large Mori Dhithai Khori. Sun agh narkahun nak sakori
Samuzhi Saham Mohi Apadar So Sudhi Ram kineh nahin napne ॥1॥
Sense: It is my great insolence and guilt, after listening to my sin, hell has also shrunk its nose (that is, even in hell, it is not good for me). Realizing this, I am afraid of my own imagined fear, but Lord Ramachandraji did not even pay attention to this (my drudgery and fault) in my dream ॥1॥.
* Suni Avaloki wanted a tasty taste. Bhagati Mori Mati Swami Sarahi 4
Kahat nasi nahi hai niqi Rijat Ram Jani Jan Ji’s ॥2॥
Connotation: -Only my lord Shri Ramchandraji, hearing this, seeing it and inspecting it with his well-informed eye, appreciated my devotion and wisdom (vice versa), because no matter how bad I say (ie, I want to be a servant of God Keep saying), but there should be goodness in the heart. (In the heart, considering myself unworthy to be his servant, I consider myself sinful and humble, this is goodness.) Shri Ramchandraji is also impressed by knowing the (good) position of Das’s heart ॥2॥.
* Oh God, I have not missed any thing. Karat Surti has always been
Jahin agh badehau bahim jimi bali. Phiri Sukanth Soi Keenhi Kuchali ॥3॥
Sense: In the mind of Prabhu, he does not remember the errors and omissions of his devotees (they forget him) and remembers his heart (the goodness of goodness) a hundred times. Because of the sin that he killed Bali like a hunter, Sugriva went on the same path again.
* Soi Kartuti Bibhishan Carey. My dreams are not my dreams
Te Bharathi offering Raj Sabha Sabha Raghubir Bakhane ॥4॥
Meaning: – The same thing was done to Vibhishan, but Shri Ramchandraji did not even consider it in his mind even in his dream. On the contrary, while meeting Bharatji, Shri Raghunathji respected him and also spoke about his qualities in the Rajya Sabha.
Doha:
* Lord like you on the other side.
Tulsi Kahun Ram to Sahib Seal Nidhan
Sense: Prabhu (Shri Ramchandraji) then under the tree and on the monkey Dali (ie where Maryada Purushottam Sachchidanandaghan Paramatma Shri Ramji and where the monkey jumping on the branches of the tree), but he also made such monkeys like him. Tulsidasji says that Shilnidhan Swami like Shri Ramchandraji is nowhere. ॥29 (a)
* Rama extracted Ravari is good for all.
It is always Sanchi Tau Neeko Tulsiq
Meaning: O Shri Ramji! All is well with your goodness (that is, your welfare nature is good for everyone). If this is true, then Tulsidas will also always have welfare ॥29 (b)॥
* Ehi Bidhi nij Gun doshan kahi sabhi bahuri siru nai.
Barnaun Raghubar Bisad Jasu Suni Kali Kalush Nasai ॥29 c.
Sense: In this way, by saying my merits and demerits and then making everyone head again, I describe the pure fame of Shri Raghunathji, by listening to which the sins of the Kaliyuga are destroyed.
Bunk:
* Jagbalik which narrates the story. Bhardwaj Munibarhi narrated
Kahihan Soi Sambad Bakhani. Sunuh gross gentleman Sukhu obey ॥1॥
Bhaartharth: – I will tell you the same dialogue that Muni Yajnavalkyaji had told Munishreshtha Bhardwajji, all gentlemen should feel happy and listen to it ॥1॥
* Sambhu kineh this charit euphoria. Please be kind to me
Soi Sew Kagbhusundihi Dinha. Ram Bhagat Adhikari Chinha ॥2॥
Meaning: – Shivji first created this pleasant character, then kindly narrated it to Parvati. Shivaji gave the same character to Kakabhusundi Ji as a devotee and officer.
*

Tehi sun jagbalik puni pawa. Tinh puni bhardwaj per gava॥
Te listener is very good. Soundarasi Janahin Harilila ॥3॥
Bhaartarth: – Yajnavalkyaji found him again from Kakabhushundiji and he again sang it to Bharadwajaji. Both the speaker and the listener (Yajnavalkya and Bhardwaj) are equally modesty and observant and know Sri Hari’s Leela ॥3॥
* Janhini Teeni Kaal Nij Gyana. Kartal Ghat Amalk Samana 4
Aurau J Haribhagat Sujana. Kahhin sunhun samujhin biddhi nana ॥4॥
Meaning: – By their knowledge, they know the things of the three blacks as (direct) like a amla placed on the palm. Even those who are Hari Devotees who know the secrets of God (Leela), they say, hear and understand this character in many ways ॥4॥
Doha:
* I Puni Nija Guru Sun Suni Katha So Sukkhet.
Unusual childish childhood, then it will be very unconscious.
Meaning: – Then I heard the same story from my Guru in Varah region, but at that time I was very unaware because of my boyhood, it did not explain him that way (well) ॥30 (a)॥
* Listener Bakta Gyannidhi Katha Ram Kai esoteric.
Kimi Samuzhon Bivuad, who lives in Jeeva Root Kali Mal, ॥30b॥
Meaning: Both the speaker (the speaker) and the listener (the hearer) of Shri Ramji’s esoteric story are treasures of knowledge (the whole knowledgeable). How could I understand the great root of Jeeva, who was suffering from the sins of Kali Yuga?
Bunk:
* However, Guru Barhin Bara. Samujhi Pari Turku Mati Anusara॥
I slept in language. More mind Prabodh Jehin Hoi ॥1॥
Sense: So when Guruji told the story again and again, then according to intellect, something was understood. The same will now be created in the language by me, so that my mind will be satisfied ॥1॥
* Like Jaschhu Budhi Bibek Bal. How can I say that the prayers of Hari
No doubt doubt confusion Karoon Katha Bhav Sarita Tarani ॥2॥
Sense: As something has the power of wisdom and wisdom in me, I will say it according to the inspiration of Hari in my heart. I create a story to defeat my doubts, ignorance and confusion, which is a boat to cross the river like world ॥2॥
* Mercury Bishram Sakal Jan Ranjini. Ramkatha Kali Kalush Bibhanjani 4
Ramkatha Kali Panang Bharani. Puni bibek pavak kahan arni ॥3॥
Meaning: Ramakatha is going to give rest to the Pandits, to please all human beings and to destroy the sins of Kali Yuga. Ramakatha is a peacock for a snake in the form of Kali Yuga and arani (churning wood) to reveal fire in the form of a vivek, (that is, knowledge is derived from this legend) ॥3॥
* Ramkatha Kali Kamad Gai. Sujan Sajivani Muri Suhai 4
Soi Basudhatal Sudha Tarangini. Fear fear confusion bhek bhuangini ॥4॥
Bhaartarth: – Ramakatha is Kamdhenu cow which fulfills all desires in Kali Yuga and is beautiful Sanjeevani herbal for gentlemen. This is the river of nectar on earth, destroying the fear of birth and death and eating the frogs that are illusory. ॥4॥
* Asura Sen is hellish. Sadhu Bibudh Total interest Girinandini॥
Saint society payodhi rama c. Biswa weight load is fixed at ॥5॥
Bhartharth: – This Ramkatha is Parvati (Durga), destroying the hell like the army of Asuras and benefiting the family of sages. It is like Lakshmiji for the sea of ​​the saint-like community and is like a real earth in carrying the weight of the whole world.
* Jam gun muh masi jag jamuna c. Janu kasi for life
Ramhi Dear Holiness Tulsi c. Tulsidas Hitti Hulasi C6 6
Sense: It is like Yamunaji in the world to put soot on the face of the angels and as if Kashi is there to liberate the living beings. It is as dear to Shri Ramji as the holy Tulsi, and is as good to Tulsidas as the heart of Hulasi (mother of Tulsidas) ॥6॥.
Sri Sitaram-Dham-Parikar Vandana Ramcharitmanas Balkand
* Sivapri Mekal Sal Suta c. Gross accomplishment wealth property
Sadgun Surgan Amb Aditi c. Raghubar Bhagati Prem Paramati C ॥7॥
Connotation: – This Ramkatha is as beloved to Shiva as Narmadaji, it is the sum of all siddhis and pleasures. Mata is similar to Aditi to generate and nurture deities in virtue. The ultimate limit of devotion and love of Shri Raghunathji is ॥7॥.
Doha:
* Ramakatha Mandakini Chitrakoot Chit Charu.
Tulsi Subhag Saneh Ban Siyi Raghubir Biharu ॥31॥
Bhaartarth: – Tulsidasji says that the Ramakatha is the Mandakini river, the beautiful (serene) Chitta Chitrakoot and the beautiful affection is the forest, in which Shri Sitaramji Vihar performs ॥31॥.
Bunk:
* Ramcharit Chintamati Charu. Sant Sumati Ti Subhash Singaru
Jag Mangal Gunagram Ram Dani Mukuti Dhan Dharam Dham ॥1॥

Meaning: – The character of Shri Ramchandraji is a beautiful chintamani and the beautiful decoration of a woman like the saint of saints. The virtues of Shri Ramchandraji are the welfare of the world and the liberator of wealth, religion and the supreme abode.
* Sadgur Gyan Birg Jog k. Bibudha Baid Bhav Bhim’s disease
Janani Janak Siy Ram Prem सकल2॥ of seed gross brat dharam name
Bhaartharth: – There is a Sadhguru for knowledge, disinterest and yoga and is similar to Vaidya (Ashvinikumar) of the gods to destroy the terrible disease of the world. They are the parents to generate the love of Shri Sitaramji and are the seeds of complete fast, religion and rules. ॥2॥
* Saman Sin Santap Soc. Dear spinach
Secretary Subhat Bhupathi Bichar. कुंभ3 लो of Kumbhaj greed udhi immense
Spiritualism: – Papa is the destroyer of suffering and grief and the dear follower of this world and the hereafter. The knight minister of the king of thoughts (knowledge) and Agastya is the sage to soak up the vast sea of ​​greed लो3॥
* Kama Koh Kalimal Karigan k. Kehari Savki Jan Man Ban Ke
Guest of Honor Dear Priyam. Kamad cube de

िद4॥ ​​of Arid Dawari
Bhartharth: – The lions have children of lions to kill elephants in the form of work, anger and sin of Kali Yuga. Shiva is the revered and beloved guest and is the cloud to fulfill the wish of extinguishing the impoverished damsel ॥4॥
* Mantra of His Holiness. Mett hard kuank bhal ke॥
Haran Moh Tum Dinkar Kar. साल5 से from servant Sali Pal Jaldhar
Meaning: There are mantras and mahamanis to poison the snake like subject. They are about to eradicate the bad articles (dull destiny) that are hard to get written on the frontal. To remove the darkness of ignorance, like the sun rays and to follow the paddy as a servant, is like the cloud ॥5॥.
* Abhimat dani devataru bar se. Sevat Sulabh Pleasant Hari Har Se 4
Sukbi Sarad Nabh Man Udgan. From Rambhagat Jeevan Jeevan Dhan ॥6॥
Meaning: – Manav is similar to the best Kalpavriksha in giving desired things and in serving he is as accessible and pleasing as Hari Har. In order to beautify the sky in the form of Sukavi, like the stars and the devotees of Shri Ramji, life is wealth.
* Gross sweet fruit from Bhoori Bhoga. A world of ill-prepared and saintly people
From the servant Manas Maral. ग7 से from the holy Gang wave goods
Meaning: The fruits of complete virtue are like great pleasures. Saints are like saints in doing the best (real) interest of the world. For the manasarovar like the mind of the servants, like swan and in purifying it are like the waves of Ganga ji.
Doha:
* Kupath Kutarak Kuchali Kali Fraud Dambh heresy.
Dahan Ram Gunn Village Jimi Fuel Anal Prachanda 3232
Meaning: The grouping of the qualities of Shri Ramji is to burn the treachery, arrogance and hypocrisy of Kumarga, Kutarka, Kuchal and Kaliyug, just like the fiery fire for fuel ॥32 (a)॥
* Ramacharit rakes karis Saris pleasant all kahu.
Sajjan Kumud Chakor Chit Hite Biseshi Bad Laahu ॥32b॥
Sense: Ramacharitra is going to give happiness to everyone, like the rays of the full moon moon, but gentlemen like Kumudini and Chakor are of special benefit and great benefit to the mind ॥32 (b)॥
Bunk:
* Keeni Prashan Jehi Bhanti Bha a Vani. Where is the bread called Sankari ख
So I sang for everything. Storytelling created ॥1॥

Meaning: Just as Shri Parvatiji questioned Shri Shivji and the way in which Shri Shivji replied in detail, I will sing and write a bizarre story for the reason ॥1॥.
* I have not heard this story. Jani Acharju Karei Suni Soi
Katha Supernatural Sunhin Je Gyani. Nahin acharju karhin as jani ॥2॥
Not the Ram Katha Mitti Jag. Not in the mind of Asi Prati Tinh
Nana like Rama Avatara. Ramayan Sat Koti Apara ॥3॥
Meaning: – Anyone who has not heard this story before, should not be surprised to hear it. The wise men who listen to this bizarre story are not surprised to know that Ramkatha has no boundaries in the world (Ramkatha is infinite). He has such confidence in his mind. There are many types of incarnations of Shri Ramchandraji and there are hundred crores and immense Ramayana.
* Kalpabdha Haricharit Suhay. Sang like many sages
Please don’t worry as you come. Suniya Katha Regards Rati obey ॥4॥
Meaning: According to fiction, the beautiful characters of Shri Hari have been gone in many ways. Do not doubt in your heart and listen to this story with love with respect 4॥
Doha:
* Ram Anant Anun Gun Amit Katha Bedar.
Suni Acharaju Manhihin who has Bimal Bichar ॥33॥
Meaning: Shri Ramachandraji is eternal, his qualities are also infinite and the extent of his stories is also infinite. Therefore, those whose views are pure, they will not be surprised to hear this story.
Bunk:
* This is the distance between everyone. Head Pankaj Dhuri
I did not go through everything again. Karat Katha Jehin Lag Na Khori ॥1॥

Meaning: Thus by removing all doubts and holding the clan of Shri Guruji’s feet on his head, I again plead with folded hands, so as not to touch any flaw in the creation of the story.

parmender yadav
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