श्री रामजी का शिवजी से विवाह के लिए अनुरोध

श्री रामजी का शिवजी से विवाह के लिए अनुरोध

दोहा :

* अब बिनती मम सुनहु सिव जौं मो पर निज नेहु।
जाइ बिबाहहु सैलजहि यह मोहि मागें देहु॥76॥

भावार्थ:-(फिर उन्होंने शिवजी से कहा-) हे शिवजी! यदि मुझ पर आपका स्नेह है, तो अब आप मेरी विनती सुनिए। मुझे यह माँगें दीजिए कि आप जाकर पार्वती के साथ विवाह कर लें॥76॥
चौपाई :
* कह सिव जदपि उचित अस नाहीं। नाथ बचन पुनि मेटि न जाहीं॥
सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरमु यह नाथ हमारा॥1॥
भावार्थ:-शिवजी ने कहा- यद्यपि ऐसा उचित नहीं है, परन्तु स्वामी की बात भी मेटी नहीं जा सकती। हे नाथ! मेरा यही परम धर्म है कि मैं आपकी आज्ञा को सिर पर रखकर उसका पालन करूँ॥1॥
* मातु पिता गुर प्रभु कै बानी। बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी॥
तुम्ह सब भाँति परम हितकारी। अग्या सिर पर नाथ तुम्हारी॥2॥
भावार्थ:-माता, पिता, गुरु और स्वामी की बात को बिना ही विचारे शुभ समझकर करना (मानना) चाहिए। फिर आप तो सब प्रकार से मेरे परम हितकारी हैं। हे नाथ! आपकी आज्ञा मेरे सिर पर है॥2॥
* प्रभु तोषेउ सुनि संकर बचना। भक्ति बिबेक धर्म जुत रचना॥
कह प्रभु हर तुम्हार पन रहेऊ। अब उर राखेहु जो हम कहेऊ॥3॥
भावार्थ:-शिवजी की भक्ति, ज्ञान और धर्म से युक्त वचन रचना सुनकर प्रभु रामचन्द्रजी संतुष्ट हो गए। प्रभु ने कहा- हे हर! आपकी प्रतिज्ञा पूरी हो गई। अब हमने जो कहा है, उसे हृदय में रखना॥3॥
* अंतरधान भए अस भाषी। संकर सोइ मूरति उर राखी॥
तबहिं सप्तरिषि सिव पहिं आए। बोले प्रभु अति बचन सुहाए॥4॥
भावार्थ:-इस प्रकार कहकर श्री रामचन्द्रजी अन्तर्धान हो गए। शिवजी ने उनकी वह मूर्ति अपने हृदय में रख ली। उसी समय सप्तर्षि शिवजी के पास आए। प्रभु महादेवजी ने उनसे अत्यन्त सुहावने वचन कहे-॥4॥
दोहा :
* पारबती पहिं जाइ तुम्ह प्रेम परिच्छा लेहु।
गिरिहि प्रेरि पठएहु भवन दूरि करेहु संदेहु॥77॥
भावार्थ:-आप लोग पार्वती के पास जाकर उनके प्रेम की परीक्षा लीजिए और हिमाचल को कहकर (उन्हें पार्वती को लिवा लाने के लिए भेजिए तथा) पार्वती को घर भिजवाइए और उनके संदेह को दूर कीजिए॥77॥

Shri Ramji’s request for marriage with Shivji
Doha:
* Now pleading mum sunhu siv jau mo mo niju nehu.
Jai Bibaahu Sailajhi Ye Mohi Margane Dehu ॥76॥
Bhaartarth 🙁 Then he said to Shiva-) O Shiva! If you have affection for me, now you hear my request. Ask me to go and marry Parvati ॥76॥
Bunk:
* Say nothing is appropriate as it is. Nath Bachan Puni Metti
Let your head be yours. Param Dharmu this Nath Our ॥1॥
Meaning: – Shivji said- Although this is not fair, but the talk of Swami cannot be met. Hey Nath! This is my ultimate religion, that I should obey your command on your head ॥1॥
* Matu Father Guru Prabhu Cai Bani. Without thinking, I can feel good
Like you all the best. Nath your ्या2॥ on your head
Sense of meaning: It should be considered (auspicious) to consider the words of mother, father, guru and master without considering it auspicious. Then you are my ultimate benefactor in all respects. Hey Nath! Your command is on my head ॥2॥
* Lord Tosheu Suni Sankar refrain Devotional Bibek Religion
Say, God bless you all. Now Ur Rakhehu, what we say is ॥3॥
Bhaartarth: – Lord Ramchandraji was satisfied after listening to Shivji’s devotion, knowledge and religion. God said – O every! Your promise has been fulfilled. Now what we have said, keep it in the heart ॥3॥
* Interdhan Bhay as speaking. Sankar Soi Murti ur Rakhi॥
Then the Saptarishi Siva arrived. God said that he should be very happy ॥4॥
Meaning: – By saying thus, Shri Ramchandraji became imprisoned. Shivji kept that idol in his heart. Saptarshi came to Shiva at the same time. Lord Mahadevji said very pleasant words to him – 4 4॥
Doha:
* Parbati paahi ji tumh love parish lehu.
Girihi Prairie Patheehu Bhawan will remove the doubt ॥77॥
Meaning: Go to Parvati and test her love and ask Himachal (send her to bring Parvati to Liva) and send Parvati home and clear her doubts.

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