विश्वामित्र-यज्ञ की रक्षा (raksha) श्री रामचरितमानस बालकाण्ड 2023

विश्वामित्र-यज्ञ की रक्षा raksha 

दोहा :
* आयुध सर्ब समर्पि कै प्रभु निज आश्रम आनि।
कंद मूल फल भोजन दीन्ह भगति हित जानि॥209॥
भावार्थ:-सब अस्त्र-शस्त्र समर्पण करके मुनि प्रभु श्री रामजी को अपने आश्रम में ले आए और उन्हें परम हितू जानकर भक्तिपूर्वक कंद, मूल और फल का भोजन कराया॥209॥
चौपाई :
*प्रात कहा मुनि सन रघुराई। निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाई॥
होम करन लागे मुनि झारी। आपु रहे मख कीं रखवारी॥1॥
भावार्थ:-सबेरे श्री रघुनाथजी ने मुनि से कहा- आप जाकर निडर होकर यज्ञ कीजिए। यह सुनकर सब मुनि हवन करने लगे। आप (श्री रामजी) यज्ञ की रखवाली पर रहे॥1॥
* सुनि मारीच निसाचर क्रोही। लै सहाय धावा मुनिद्रोही॥
बिनु फर बान राम तेहि मारा। सत जोजन गा सागर पारा॥2॥
भावार्थ:-यह समाचार सुनकर मुनियों का शत्रु कोरथी राक्षस मारीच अपने सहायकों को लेकर दौड़ा। श्री रामजी ने बिना फल वाला बाण उसको मारा, जिससे वह सौ योजन के विस्तार वाले समुद्र के पार जा गिरा॥2॥

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* पावक सर सुबाहु पुनि मारा। अनुज निसाचर कटकु सँघारा॥
मारि असुर द्विज निर्भयकारी। अस्तुति करहिं देव मुनि झारी॥3॥
भावार्थ:-फिर सुबाहु को अग्निबाण मारा। इधर छोटे भाई लक्ष्मणजी ने राक्षसों की सेना का संहार कर डाला। इस प्रकार श्री रामजी ने राक्षसों को मारकर ब्राह्मणों को निर्भय कर दिया। तब सारे देवता और मुनि स्तुति करने लगे॥3॥
* तहँ पुनि कछुक दिवस रघुराया। रहे कीन्हि बिप्रन्ह पर दाया॥
भगति हेतु बहुत कथा पुराना। कहे बिप्र जद्यपि प्रभु जाना॥4॥
भावार्थ:-श्री रघुनाथजी ने वहाँ कुछ दिन और रहकर ब्राह्मणों पर दया की। भक्ति के कारण ब्राह्मणों ने उन्हें पुराणों की बहुत सी कथाएँ कहीं, यद्यपि प्रभु सब जानते थे॥4॥

* तब मुनि सादर कहा बुझाई। चरित एक प्रभु देखिअ जाई॥                                                                                           धनुषजग्य सुनि रघुकुल नाथा। हरषि चले मुनिबर के साथा॥5॥

भावार्थ:-तदन्तर मुनि ने आदरपूर्वक समझाकर कहा- हे प्रभो! चलकर एक चरित्र देखिए। रघुकुल के स्वामी श्री रामचन्द्रजी धनुषयज्ञ (की बात) सुनकर मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रजी के साथ प्रसन्न होकर चले॥5॥

Raksha protecting Vishwamitra-yagya

Doha:
* Ordnance Serb dedicated Cai Prabhu Nija Ashram.
Kand original fruit food Dinh Bhagati Hita Jani 9209॥
Meaning: – After surrendering all the weapons and weapons, the sage brought Lord Ram to his ashram, and knowing him as the supreme benefactor, made him eat devotional tubers, roots and fruits.

Bunk:
* Morning said, Muni Sun Raghurai. Nirbhay Jagya Karhu, you go
Muni Jhari came home You are the main guard of Makha ॥1॥
Meaning: – In the morning Mr. Raghunathji said to the sage- You go and perform the yagna fearlessly. Hearing this, all the sages started doing havan. You (Shri Ramji) be on guard of the yajna ॥1॥

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* Suni Marich Nisachar Crohi. Lai Sahai Attack Munidrohi॥
Binu fur baan Ram tehi Mara. Sat Jojan Ga Sagar Para ॥2॥

Bhaartarth: – Hearing this news, the enemy of the monks ran away with their helpers, the demon Marich. Shri Ramji hit the arrow with no fruit so that he fell across the sea extending to a hundred plan.
* Pavak Sir Subahu hit Puni. Anuj Nisachar Katku Sangha॥
Mari Asura Dwij Fearless. Astuti Karhin Dev Muni Jhari ॥3॥
Bhartarth: – Then fire Subahu. Here, younger brother Laxmanji killed the army of demons. In this way, Shri Ramji made the Brahmins fearless by killing the demons. Then all the gods and sages started praising ॥3॥
* The Puni Kachhuk Day Raghuraya. Stay right on Biparnh
Very old story for Bhagi. Say Bipra Jyadipi Prabhu Jana ॥4॥

Meaning: Shri Raghunath Ji stayed a few days there and took pity on the Brahmins. Due to devotion, the Brahmins told him many stories of Puranas, even though God knew everything.
* Then said Muni Regards extinguished. Look at one God
Dhanushjagya Suni Raghukul Natha. Harshi Chalein with Munibar ॥5॥
Meaning: – Tadantar Muni respectfully explained and said – O Lord! Let’s see a character. Listening to the lord of Raghukul, Shri Ramchandraji Dhanushyajna (speaking of), went delighted with Munishrestha Vishwamitra.

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