विश्वामित्र का राजा दशरथ से Ram राम-लक्ष्मण को माँगना, ताड़का वध

विश्वामित्र का राजा दशरथ से Ram राम-लक्ष्मण को माँगना, ताड़का वध

दोहा :
* ब्यापक अकल अनीह अज निर्गुन नाम न रूप।
भगत हेतु नाना बिधि करत चरित्र अनूप॥205॥
भावार्थ:-जो व्यापक, अकल (निरवयव), इच्छारहित, अजन्मा और निर्गुण है तथा जिनका न नाम है न रूप, वही भगवान भक्तों के लिए नाना प्रकार के अनुपम (अलौकिक) चरित्र करते हैं॥205॥
चौपाई :
* यह सब चरित कहा मैं गाई। आगिलि कथा सुनहु मन लाई॥
बिस्वामित्र महामुनि ग्यानी। बसहिं बिपिन सुभ आश्रम जानी॥1॥
भावार्थ:-यह सब चरित्र मैंने गाकर (बखानकर) कहा। अब आगे की कथा मन लगाकर सुनो। ज्ञानी महामुनि विश्वामित्रजी वन में शुभ आश्रम (पवित्र स्थान) जानकर बसते थे,॥1॥
* जहँ जप जग्य जोग मुनि करहीं। अति मारीच सुबाहुहि डरहीं॥
देखत जग्य निसाचर धावहिं। करहिं उपद्रव मुनि दुख पावहिं॥2॥
भावार्थ:-जहाँ वे मुनि जप, यज्ञ और योग करते थे, परन्तु मारीच और सुबाहु से बहुत डरते थे। यज्ञ देखते ही राक्षस दौड़ पड़ते थे और उपद्रव मचाते थे, जिससे मुनि (बहुत) दुःख पाते थे॥2॥
* गाधितनय मन चिंता ब्यापी। हरि बिनु मरहिं न निसिचर पापी॥
तब मुनिबर मन कीन्ह बिचारा। प्रभु अवतरेउ हरन महि भारा॥3॥
भावार्थ:-गाधि के पुत्र विश्वामित्रजी के मन में चिन्ता छा गई कि ये पापी राक्षस भगवान के (मारे) बिना न मरेंगे। तब श्रेष्ठ मुनि ने मन में विचार किया कि प्रभु ने पृथ्वी का भार हरने के लिए अवतार लिया है॥3॥
*एहूँ मिस देखौं पद जाई। करि बिनती आनौं दोउ भाई॥
ग्यान बिराग सकल गुन अयना। सो प्रभु मैं देखब भरि नयना॥4॥
भावार्थ:-इसी बहाने जाकर मैं उनके चरणों का दर्शन करूँ और विनती करके दोनों भाइयों को ले आऊँ। (अहा!) जो ज्ञान, वैराग्य और सब गुणों के धाम हैं, उन प्रभु को मैं नेत्र भरकर देखूँगा॥4॥
दोहा :
* बहुबिधि करत मनोरथ जात लागि नहिं बार।
करि मज्जन सरऊ जल गए भूप दरबार॥206॥
भावार्थ:-बहुत प्रकार से मनोरथ करते हुए जाने में देर नहीं लगी। सरयूजी के जल में स्नान करके वे राजा के दरवाजे पर पहुँचे॥206॥
चौपाई :
* मुनि आगमन सुना जब राजा। मिलन गयउ लै बिप्र समाजा॥
करि दंडवत मुनिहि सनमानी। निज आसन बैठारेन्हि आनी॥1॥
भावार्थ:-राजा ने जब मुनि का आना सुना, तब वे ब्राह्मणों के समाज को साथ लेकर मिलने गए और दण्डवत्‌ करके मुनि का सम्मान करते हुए उन्हें लाकर अपने आसन पर बैठाया॥1॥
* चरन पखारि कीन्हि अति पूजा। मो सम आजु धन्य नहिं दूजा॥
बिबिध भाँति भोजन करवावा। मुनिबर हृदयँ हरष अति पावा॥2॥
भावार्थ:-चरणों को धोकर बहुत पूजा की और कहा- मेरे समान धन्य आज दूसरा कोई नहीं है। फिर अनेक प्रकार के भोजन करवाए, जिससे श्रेष्ठ मुनि ने अपने हृदय में बहुत ही हर्ष प्राप्त किया॥2॥
*पुनि चरननि मेले सुत चारी। राम देखि मुनि देह बिसारी॥
भए मगन देखत मुख सोभा। जनु चकोर पूरन ससि लोभा॥3॥
भावार्थ:-फिर राजा ने चारों पुत्रों को मुनि के चरणों पर डाल दिया (उनसे प्रणाम कराया)। श्री रामचन्द्रजी को देखकर मुनि अपनी देह की सुधि भूल गए। वे श्री रामजी के मुख की शोभा देखते ही ऐसे मग्न हो गए, मानो चकोर पूर्ण चन्द्रमा को देखकर लुभा गया हो॥3॥
* तब मन हरषि बचन कह राऊ। मुनि अस कृपा न कीन्हिहु काऊ॥
केहि कारन आगमन तुम्हारा। कहहु सो करत न लावउँ बारा॥4॥
भावार्थ:-तब राजा ने मन में हर्षित होकर ये वचन कहे- हे मुनि! इस प्रकार कृपा तो आपने कभी नहीं की। आज किस कारण से आपका शुभागमन हुआ? कहिए, मैं उसे पूरा करने में देर नहीं लगाऊँगा॥4॥
* असुर समूह सतावहिं मोही। मैं जाचन आयउँ नृप तोही॥
अनुज समेत देहु रघुनाथा। निसिचर बध मैं होब सनाथा॥5॥
भावार्थ:-(मुनि ने कहा-) हे राजन्‌! राक्षसों के समूह मुझे बहुत सताते हैं, इसीलिए मैं तुमसे कुछ माँगने आया हूँ। छोटे भाई सहित श्री रघुनाथजी को मुझे दो। राक्षसों के मारे जाने पर मैं सनाथ (सुरक्षित) हो जाऊँगा॥5॥
दोहा :
* देहु भूप मन हरषित तजहु मोह अग्यान।
धर्म सुजस प्रभु तुम्ह कौं इन्ह कहँ अति कल्यान॥207॥
भावार्थ:-हे राजन्‌! प्रसन्न मन से इनको दो, मोह और अज्ञान को छोड़ दो। हे स्वामी! इससे तुमको धर्म और सुयश की प्राप्ति होगी और इनका परम कल्याण होगा॥207॥
चौपाई :
* सुनि राजा अति अप्रिय बानी। हृदय कंप मुख दुति कुमुलानी॥
चौथेंपन पायउँ सुत चारी। बिप्र बचन नहिं कहेहु बिचारी॥1॥
भावार्थ:-इस अत्यन्त अप्रिय वाणी को सुनकर राजा का हृदय काँप उठा और उनके मुख की कांति फीकी पड़ गई। (उन्होंने कहा-) हे ब्राह्मण! मैंने चौथेपन में चार पुत्र पाए हैं, आपने विचार कर बात नहीं कही॥1॥
* मागहु भूमि धेनु धन कोसा। सर्बस देउँ आजु सहरोसा॥
देह प्रान तें प्रिय कछु नाहीं। सोउ मुनि देउँ निमिष एक माहीं॥2॥
भावार्थ:-हे मुनि! आप पृथ्वी, गो, धन और खजाना माँग लीजिए, मैं आज बड़े हर्ष के साथ अपना सर्वस्व दे दूँगा। देह और प्राण से अधिक प्यारा कुछ भी नहीं होता, मैं उसे भी एक पल में दे दूँगा॥2॥
* सब सुत प्रिय मोहि प्रान की नाईं। राम देत नहिं बनइ गोसाईं॥
कहँ निसिचर अति घोर कठोरा। कहँ सुंदर सुत परम किसोरा॥3॥
भावार्थ:-सभी पुत्र मुझे प्राणों के समान प्यारे हैं, उनमें भी हे प्रभो! राम को तो (किसी प्रकार भी) देते नहीं बनता। कहाँ अत्यन्त डरावने और क्रूर राक्षस और कहाँ परम किशोर अवस्था के (बिलकुल सुकुमार) मेरे सुंदर पुत्र! ॥3॥
* सुनि नृप गिरा प्रेम रस सानी। हृदयँ हरष माना मुनि ग्यानी॥
तब बसिष्ट बहुबिधि समुझावा। नृप संदेह नास कहँ पावा॥4॥
भावार्थ:-प्रेम रस में सनी हुई राजा की वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि विश्वामित्रजी ने हृदय में बड़ा हर्ष माना। तब वशिष्ठजी ने राजा को बहुत प्रकार से समझाया, जिससे राजा का संदेह नाश को प्राप्त हुआ॥4॥
* अति आदर दोउ तनय बोलाए। हृदयँ लाइ बहु भाँति सिखाए॥
मेरे प्रान नाथ सुत दोऊ। तुम्ह मुनि पिता आन नहिं कोऊ॥5॥
भावार्थ:-राजा ने बड़े ही आदर से दोनों पुत्रों को बुलाया और हृदय से लगाकर बहुत प्रकार से उन्हें शिक्षा दी। (फिर कहा-) हे नाथ! ये दोनों पुत्र मेरे प्राण हैं। हे मुनि! (अब) आप ही इनके पिता हैं, दूसरा कोई नहीं॥5॥
दोहा :
* सौंपे भूप रिषिहि सुत बहुबिधि देइ असीस।
जननी भवन गए प्रभु चले नाइ पद सीस॥208 क ॥
भावार्थ:-राजा ने बहुत प्रकार से आशीर्वाद देकर पुत्रों को ऋषि के हवाले कर दिया। फिर प्रभु माता के महल में गए और उनके चरणों में सिर नवाकर चले॥208 (क)॥
सोरठा :
* पुरुष सिंह दोउ बीर हरषि चले मुनि भय हरन।
कृपासिंधु मतिधीर अखिल बिस्व कारन करन॥208 ख॥
भावार्थ:-पुरुषों में सिंह रूप दोनों भाई (राम-लक्ष्मण) मुनि का भय हरने के लिए प्रसन्न होकर चले। वे कृपा के समुद्र, धीर बुद्धि और सम्पूर्ण विश्व के कारण के भी कारण हैं॥208 (ख)॥
चौपाई :
* अरुन नयन उर बाहु बिसाला। नील जलज तनु स्याम तमाला॥
कटि पट पीत कसें बर भाथा। रुचिर चाप सायक दुहुँ हाथा॥1॥
भावार्थ:-भगवान के लाल नेत्र हैं, चौड़ी छाती और विशाल भुजाएँ हैं, नील कमल और तमाल के वृक्ष की तरह श्याम शरीर है, कमर में पीताम्बर (पहने) और सुंदर तरकस कसे हुए हैं। दोनों हाथों में (क्रमशः) सुंदर धनुष और बाण हैं॥1॥
* स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। बिस्वामित्र महानिधि पाई॥
प्रभु ब्रह्मन्यदेव मैं जाना। मोहि निति पिता तजेउ भगवाना॥2॥
भावार्थ:-श्याम और गौर वर्ण के दोनों भाई परम सुंदर हैं। विश्वामित्रजी को महान निधि प्राप्त हो गई। (वे सोचने लगे-) मैं जान गया कि प्रभु ब्रह्मण्यदेव (ब्राह्मणों के भक्त) हैं। मेरे लिए भगवान ने अपने पिता को भी छोड़ दिया॥2॥
* चले जात मुनि दीन्हि देखाई। सुनि ताड़का क्रोध करि धाई॥
एकहिं बान प्रान हरि लीन्हा। दीन जानि तेहि निज पद दीन्हा॥3॥
भावार्थ:-मार्ग में चले जाते हुए मुनि ने ताड़का को दिखलाया। शब्द सुनते ही वह क्रोध करके दौड़ी। श्री रामजी ने एक ही बाण से उसके प्राण हर लिए और दीन जानकर उसको निजपद (अपना दिव्य स्वरूप) दिया॥3॥
* तब रिषि निज नाथहि जियँ चीन्ही। बिद्यानिधि कहुँ बिद्या दीन्ही॥
जाते लाग न छुधा पिपासा। अतुलित बल तनु तेज प्रकासा॥4॥
भावार्थ:-तब ऋषि विश्वामित्र ने प्रभु को मन में विद्या का भंडार समझते हुए भी (लीला को पूर्ण करने के लिए) ऐसी विद्या दी, जिससे भूख-प्यास न लगे और शरीर में अतुलित बल और तेज का प्रकाश हो॥4॥

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(king) राजा दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ, रानियों का गर्भवती होना

 

 


Vishwamitra’s King Dasaratha asks Ram-Lakshmana, Tadka slaughter

Doha:
* Bypak aqal anih aj nirgun nam na roop.
Character anoop for Bhagat Anup ॥205॥
Bhartartha: -who is pervasive, unintelligent (nirvayava), wishless, unborn and nirguna and who has no name nor form, is the same kind of unique (supernatural) character for the devotees. 5205॥
Bunk:
* I said all this character. Agili Katha Sunhu Mana Lai
Biswamitra Mahamuni Gyani. Basahin Bipin Subh Ashram Jani ॥1॥
Meaning: I sang all this character (Bakhankar). Now listen to the story ahead Giani Mahamuni Vishwamitra used to live in the forest knowing the auspicious ashram (holy place), ॥1॥
* Do not chant Jagya Jog Muni. Do not be afraid.
Dekhat Jagya Nisachar Dhavahin Karhin nuisance muni Dukh Pavhan िं2॥
Meaning: Where they used to chant Muni, Yagya and Yoga, but were very afraid of Maricha and Subahu. On seeing the yajna, the demons used to run and create trouble, due to which the sages used to get (a lot) of sorrow ॥2॥.
* Gandhinaya Mana Chinta School. Hari Binu Marhin Nisichar Papi
Then Munir Mana Keenh Bichara. Prabhu Avatreau Haran Mahi Bhara ॥3॥
Meaning: – There was a worry in the mind of Vishwamitra, the son of Gadhi, that these sinful demons would not die without (being) killed by God. Then the exalted sage thought in his mind that God had incarnated to defeat the weight of the earth ॥3॥
* I went to see Miss Miss. I pray for my brother
Gian Birag Sakal Gunn Ayana. So I am looking at God, Bhari Nayana ॥4॥
Meaning: After making excuses, I see his feet and beg and bring both brothers. (Aha!) I will look at the Lord with eyes full of knowledge, disinterest and all virtues.
Doha:
* Multibarrious works do not cost.
Kari Majjan Sarau burnt Bhup Darbar ॥206॥
Meaning: It did not take long to go in a very entertaining way. After bathing in the water of Saryuji, he reached the king’s door.
Bunk:
* When the king heard the arrival. Milan Gayu Lai Bipra Samaja 4
Kari Dandawat Munih Sanmani. Personal seat sitareni ani ॥1॥
Meaning: When Raja heard the arrival of Muni, then he went to meet with the society of Brahmins, and worshiped and honored the Muni and brought him to sit on his seat ॥1॥.
* Charan Pakhari is very much worshiped. Mo sam aaju blessed nahin duja दू
Get food done without any means. Munir Hridayan Harsha Ati Pawa ॥2॥
Meaning: After washing the steps, he worshiped a lot and said – Blessed today there is no one like me. Then got many types of food, from which the great sage took great joy in his heart. ॥2॥
* Puni Charanni Fair Sut Chari. Ram dekh muni deh bisari॥
Look at your face Janu Chakor Puran Sasi Lobha ॥3॥
Meaning: – Then the king put the four sons on the feet of the muni (bowed to them). On seeing Shri Ramachandraji, the sage forgot his body. He was so engrossed upon seeing the beauty of Shri Ramji’s face, as if Chakor was tempted by seeing the full moon.
* Then the mind should say ‘save’ Muni as kripa na kinahihu kau॥
Why do you come? Kahhoo so karat na lavoon bara ॥4॥
Meaning: Then the king rejoiced in the mind and said these words- O Muni! In this way you have never been kind. What made you pay today? Say, I will not take long to complete it ॥4॥
* Asura group Satavahin Mohi. I come to check Nripa Tohi
Dehu Raghunatha including Anuj. Nisichar Badh Main Hob Sanatha ॥5॥
Meaning: – (Muni said-) O Rajan! Groups of demons haunt me a lot, that’s why I came to ask you for something. Give me Mr. Raghunathji with younger brother. I will be Sanath (safe) when the demons are killed ॥5॥
Doha:
* Dehu Bhup Mana Harishit Tajhu Moh Agyan.
Religion Sujas Prabhu, who are you saying this? Very Kalyan ॥207॥
Meaning: O king! Give them with a happy heart, leave attachment and ignorance. Hey master! With this you will get religion and happiness and you will have complete welfare. कल्याण207॥
Bunk:
* Suni Raja is very unpleasant. Heart-shaped face, Kumulani
Chauthapan Payon Sut Chari Bipra Bachan Nahin Kehhu Bachari ॥1॥
Meaning: – Hearing this very unpleasant speech, the heart of the king trembled and the face of his face faded. (He said-) O Brahmin! I have got four sons in the fourth, you did not think and talk ॥1॥
* Maghu Bhoomi Dhenu Dhan Kosha. Serbus de Azu Saharosa॥
Dear body, dear dear! Soo muni deoon nimish ek maa ॥2॥
Sense: O monk! You ask for earth, cow, money and treasure, I will give my all with great pleasure today. Nothing is more lovely than body and soul, I will give it to him in a moment ॥2॥
* All sut dear like Mohi Pran. Ram deat nahin banai gosain
Where is Nisichar very harsh. Where is the beautiful thread Param Kisora ​​॥3॥
Sense: All the sons are as dear to me as the souls, O Lord! It is not possible to give Rama (in any way). Where the most frightening and cruel monster and where the ultimate teenage (of course) my beautiful son! ॥3॥
* Suni Nripa Gir Prem Ras Sani. Hriday Harsh means Muni Gyani
Then Basisht Bahubidhi Samuzhava. Nrup Doubt Naas Kahan Paava ॥4॥
Meaning: Hearing the voice of the king, soaked in love juice, the learned sage Vishwamitra felt great joy in his heart. Then Vashisthaji explained to the king in many ways, which caused the king’s suspicion to perish.
* Respectfully, Doy Tanay spoke. Teach the heart in many ways.
My Pran Nath Sut Dou. I wish you a great father.
Meaning: Raja called both sons with great respect and taught them in many ways with a heart. (Then said-) O Nath! These two sons are my life. Hey monkey! (Now) you are his father, no one else ॥5॥
Doha:
* Assigned to Bhup Rishi Vishwamitra’s King Dasaratha asks Ram-Lakshmana, Tadka slaughter

Doha:
* Bypak aqal anih aj nirgun nam na roop.
Character anoop for Bhagat Anup ॥205॥
Bhartartha: -who is pervasive, unintelligent (nirvayava), wishless, unborn and nirguna and who has no name nor form, is the same kind of unique (supernatural) character for the devotees. 5205॥
Bunk:
* I said all this character. Agili Katha Sunhu Mana Lai
Biswamitra Mahamuni Gyani. Basahin Bipin Subh Ashram Jani ॥1॥
Meaning: I sang all this character (Bakhankar). Now listen to the story ahead Giani Mahamuni Vishwamitra used to live in the forest knowing the auspicious ashram (holy place), ॥1॥
* Do not chant Jagya Jog Muni. Do not be afraid.
Dekhat Jagya Nisachar Dhavahin Karhin nuisance muni Dukh Pavhan िं2॥
Meaning: Where they used to chant Muni, Yagya and Yoga, but were very afraid of Maricha and Subahu. On seeing the yajna, the demons used to run and create trouble, due to which the sages used to get (a lot) of sorrow ॥2॥.
* Gandhinaya Mana Chinta School. Hari Binu Marhin Nisichar Papi
Then Munir Mana Keenh Bichara. Prabhu Avatreau Haran Mahi Bhara ॥3॥
Meaning: – There was a worry in the mind of Vishwamitra, the son of Gadhi, that these sinful demons would not die without (being) killed by God. Then the exalted sage thought in his mind that God had incarnated to defeat the weight of the earth ॥3॥
* I went to see Miss Miss. I pray for my brother
Gian Birag Sakal Gunn Ayana. So I am looking at God, Bhari Nayana ॥4॥
Meaning: After making excuses, I see his feet and beg and bring both brothers. (Aha!) I will look at the Lord with eyes full of knowledge, disinterest and all virtues.
Doha:
* Multibarrious works do not cost.
Kari Majjan Sarau burnt Bhup Darbar ॥206॥
Meaning: It did not take long to go in a very entertaining way. After bathing in the water of Saryuji, he reached the king’s door.
Bunk:
* When the king heard the arrival. Milan Gayu Lai Bipra Samaja 4
Kari Dandawat Munih Sanmani. Personal seat sitareni ani ॥1॥
Meaning: When Raja heard the arrival of Muni, then he went to meet with the society of Brahmins, and worshiped and honored the Muni and brought him to sit on his seat ॥1॥.
* Charan Pakhari is very much worshiped. Mo sam aaju blessed nahin duja दू
Get food done without any means. Munir Hridayan Harsha Ati Pawa ॥2॥
Meaning: After washing the steps, he worshiped a lot and said – Blessed today there is no one like me. Then got many types of food, from which the great sage took great joy in his heart. ॥2॥
* Puni Charanni Fair Sut Chari. Ram dekh muni deh bisari॥
Look at your face Janu Chakor Puran Sasi Lobha ॥3॥
Meaning: – Then the king put the four sons on the feet of the muni (bowed to them). On seeing Shri Ramachandraji, the sage forgot his body. He was so engrossed upon seeing the beauty of Shri Ramji’s face, as if Chakor was tempted by seeing the full moon.
* Then the mind should say ‘save’ Muni as kripa na kinahihu kau॥
Why do you come? Kahhoo so karat na lavoon bara ॥4॥
Meaning: Then the king rejoiced in the mind and said these words- O Muni! In this way you have never been kind. What made you pay today? Say, I will not take long to complete it ॥4॥
* Asura group Satavahin Mohi. I come to check Nripa Tohi
Dehu Raghunatha including Anuj. Nisichar Badh Main Hob Sanatha ॥5॥
Meaning: – (Muni said-) O Rajan! Groups of demons haunt me a lot, that’s why I came to ask you for something. Give me Mr. Raghunathji with younger brother. I will be Sanath (safe) when the demons are killed ॥5॥
Doha:
* Dehu Bhup Mana Harishit Tajhu Moh Agyan.
Religion Sujas Prabhu, who are you saying this? Very Kalyan ॥207॥
Meaning: O king! Give them with a happy heart, leave attachment and ignorance. Hey master! With this you will get religion and happiness and you will have complete welfare. कल्याण207॥
Bunk:
* Suni Raja is very unpleasant. Heart-shaped face, Kumulani
Chauthapan Payon Sut Chari Bipra Bachan Nahin Kehhu Bachari ॥1॥
Meaning: – Hearing this very unpleasant speech, the heart of the king trembled and the face of his face faded. (He said-) O Brahmin! I have got four sons in the fourth, you did not think and talk ॥1॥
* Maghu Bhoomi Dhenu Dhan Kosha. Serbus de Azu Saharosa॥
Dear body, dear dear! Soo muni deoon nimish ek maa ॥2॥
Sense: O monk! You ask for earth, cow, money and treasure, I will give my all with great pleasure today. Nothing is more lovely than body and soul, I will give it to him in a moment ॥2॥
* All sut dear like Mohi Pran. Ram deat nahin banai gosain
Where is Nisichar very harsh. Where is the beautiful thread Param Kisora ​​॥3॥
Sense: All the sons are as dear to me as the souls, O Lord! It is not possible to give Rama (in any way). Where the most frightening and cruel monster and where the ultimate teenage (of course) my beautiful son! ॥3॥
* Suni Nripa Gir Prem Ras Sani. Hriday Harsh means Muni Gyani
Then Basisht Bahubidhi Samuzhava. Nrup Doubt Naas Kahan Paava ॥4॥
Meaning: Hearing the voice of the king, soaked in love juice, the learned sage Vishwamitra felt great joy in his heart. Then Vashisthaji explained to the king in many ways, which caused the king’s suspicion to perish.
* Respectfully, Doy Tanay spoke. Teach the heart in many ways.
My Pran Nath Sut Dou. I wish you a great father.
Meaning: Raja called both sons with great respect and taught them in many ways with a heart. (Then said-) O Nath! These two sons are my life. Hey monkey! (Now) you are his father, no one else ॥5॥
Doha:
* Handed Bhup Rishihi Sut Bahubidhi Dei Asis.
Prabhu went to Janani Bhavan, went to Nai Pad Sis208
Bhaartarth: -Raja blessed the sons in many ways and handed them over to the sage. Then went to the palace of Prabhu Mata and walked at her feet with her head ॥208 (a)॥
Soratha:
* Purush Singh Dow Bir Harshi walked Muni Bhav Haran.
Kripasindhu Matidhir Akhil Biswaran Karan208 B
Meaning: In the men, both brothers (Ram-Lakshman), as the lion form, are happy to defeat the fear of Muni. They are also the reason for the sea of ​​grace, patient intelligence and the cause of the whole world 8208 (b)॥
Bunk:
* Arun Nayan ur Bahu Bisala. Neel Jalaj Tanu Syam Tamala॥
Cut the yellow hole tightly Ruchir chap saik duhun hatha ॥1॥
Spirituality: – God has red eyes, broad chest and huge arms, Neel is a black body like lotus and tamal tree, Pitambar (clothed) and beautiful tarkas are tight at the waist. In both hands (respectively) are the beautiful bow and arrow ॥1॥
* Syam Gaur Sundar Dau Bhai. Biswamitra Mahanidhi Pai
I go to Lord Brahmanyadeva. Mohi niti dad tajeau bhagwana ॥2॥
Meaning: Both the brothers of Shyam and Gaur Varna are extremely beautiful. Vishwamitra received great funds. (He started thinking-) I came to know that Lord Brahmanyadeva (devotees of Brahmins). God left my father for me too ॥2॥
* Chale Jaat Muni Dinhi Dekha Dekhi. Suna Tadka Rage Kari Dhai
Ekahin Ban Pran Hari Leenha. Deen jani tehi nij pad deenha ॥3॥
Spirituality: – While walking in the way, the sage showed Tadka. She ran in anger as soon as she heard the word. Shri Ramji took his life with a single arrow and knowing his humility gave him Nijpad (his divine form) ॥3॥
* Then Rishi Nij Nathi Jiya live in China. Bidyanidhi should say Bidya Dinhi
Don’t go and hide Incredible force dilute Tej Prakasa ॥4॥
Sense: Then the sage Vishwamitra, while considering the Lord as the repository of knowledge in the mind (to fulfill the Leela) gave such a learning, which does not cause hunger and thirst, and the body has the power of immeasurable force and glory. ॥4॥

2 thoughts on “विश्वामित्र का राजा दशरथ से Ram राम-लक्ष्मण को माँगना, ताड़का वध”

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