याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद तथा प्रयाग माहात्म्य

याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद तथा प्रयाग माहात्म्य

याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद तथा प्रयाग माहात्म्य

* अब रघुपति पद पंकरुह हियँ धरि पाइ प्रसाद।
कहउँ जुगल मुनिबर्य कर मिलन सुभग संबाद ॥43 ख॥
भावार्थ:-मैं अब श्री रघुनाथजी के चरण कमलों को हृदय में धारण कर और उनका प्रसाद पाकर दोनों श्रेष्ठ मुनियों के मिलन का सुंदर संवाद वर्णन करता हूँ॥43 (ख)॥
चौपाई :
* भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा। तिन्हहि राम पद अति अनुरागा॥
तापस सम दम दया निधाना। परमारथ पथ परम सुजाना॥1॥
भावार्थ:-भरद्वाज मुनि प्रयाग में बसते हैं, उनका श्री रामजी के चरणों में अत्यंत प्रेम है। वे तपस्वी, निगृहीत चित्त, जितेन्द्रिय, दया के निधान और परमार्थ के मार्ग में बड़े ही चतुर हैं॥1॥
* माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई॥
देव दनुज किंनर नर श्रेनीं। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं॥2॥
भावार्थ:-माघ में जब सूर्य मकर राशि पर जाते हैं, तब सब लोग तीर्थराज प्रयाग को आते हैं। देवता, दैत्य, किन्नर और मनुष्यों के समूह सब आदरपूर्वक त्रिवेणी में स्नान करते हैं॥।2॥
* पूजहिं माधव पद जलजाता। परसि अखय बटु हरषहिं गाता॥
भरद्वाज आश्रम अति पावन। परम रम्य मुनिबर मन भावन॥3॥
भावार्थ:-श्री वेणीमाधवजी के चरणकमलों को पूजते हैं और अक्षयवट का स्पर्श कर उनके शरीर पुलकित होते हैं। भरद्वाजजी का आश्रम बहुत ही पवित्र, परम रमणीय और श्रेष्ठ मुनियों के मन को भाने वाला है॥3॥
* तहाँ होइ मुनि रिषय समाजा। जाहिं जे मज्जन तीरथराजा॥
मज्जहिं प्रात समेत उछाहा। कहहिं परसपर हरि गुन गाहा॥4॥
भावार्थ:-तीर्थराज प्रयाग में जो स्नान करने जाते हैं, उन ऋषि-मुनियों का समाज वहाँ (भरद्वाज के आश्रम में) जुटता है। प्रातःकाल सब उत्साहपूर्वक स्नान करते हैं और फिर परस्पर भगवान्‌ के गुणों की कथाएँ कहते हैं॥4॥
दोहा :
* ब्रह्म निरूपन धरम बिधि बरनहिं तत्त्व बिभाग।
ककहिं भगति भगवंत कै संजुत ग्यान बिराग॥44॥
भावार्थ:-ब्रह्म का निरूपण, धर्म का विधान और तत्त्वों के विभाग का वर्णन करते हैं तथा ज्ञान-वैराग्य से युक्त भगवान्‌ की भक्ति का कथन करते हैं॥44॥
चौपाई :
* एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं। पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं॥
प्रति संबत अति होइ अनंदा। मकर मज्जि गवनहिं मुनिबृंदा॥1॥
भावार्थ:-इसी प्रकार माघ के महीनेभर स्नान करते हैं और फिर सब अपने-अपने आश्रमों को चले जाते हैं। हर साल वहाँ इसी तरह बड़ा आनंद होता है। मकर में स्नान करके मुनिगण चले जाते हैं॥1॥
* एक बार भरि मकर नहाए। सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए॥
जागबलिक मुनि परम बिबेकी। भरद्वाज राखे पद टेकी॥2॥
भावार्थ:-एक बार पूरे मकरभर स्नान करके सब मुनीश्वर अपने-अपने आश्रमों को लौट गए। परम ज्ञानी याज्ञवल्क्य मुनि को चरण पकड़कर भरद्वाजजी ने रख लिया॥2॥
* सादर चरन सरोज पखारे। अति पुनीत आसन बैठारे॥
करि पूजा मुनि सुजसु बखानी। बोले अति पुनीत मृदु बानी॥3॥
भावार्थ:-आदरपूर्वक उनके चरण कमल धोए और बड़े ही पवित्र आसन पर उन्हें बैठाया। पूजा करके मुनि याज्ञवल्क्यजी के सुयश का वर्णन किया और फिर अत्यंत पवित्र और कोमल वाणी से बोले-॥3॥
* नाथ एक संसउ बड़ मोरें। करगत बेदतत्त्व सबु तोरें॥
कहत सो मोहि लागत भय लाजा। जौं न कहउँ बड़ होइ अकाजा॥4॥
भावार्थ:-हे नाथ! मेरे मन में एक बड़ा संदेह है, वेदों का तत्त्व सब आपकी मुट्ठी में है (अर्थात्‌ आप ही वेद का तत्त्व जानने वाले होने के कारण मेरा संदेह निवारण कर सकते हैं) पर उस संदेह को कहते मुझे भय और लाज आती है (भय इसलिए कि कहीं आप यह न समझें कि मेरी परीक्षा ले रहा है, लाज इसलिए कि इतनी आयु बीत गई, अब तक ज्ञान न हुआ) और यदि नहीं कहता तो बड़ी हानि होती है (क्योंकि अज्ञानी बना रहता हूँ)॥4॥
दोहा :
* संत कहहिं असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव।
होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किएँ दुराव॥45॥
भावार्थ:-हे प्रभो! संत लोग ऐसी नीति कहते हैं और वेद, पुराण तथा मुनिजन भी यही बतलाते हैं कि गुरु के साथ छिपाव करने से हृदय में निर्मल ज्ञान नहीं होता॥45॥
चौपाई :
* अस बिचारि प्रगटउँ निज मोहू। हरहु नाथ करि जन पर छोहू॥
राम नाम कर अमित प्रभावा। संत पुरान उपनिषद गावा॥1
भावार्थ:-यही सोचकर मैं अपना अज्ञान प्रकट करता हूँ। हे नाथ! सेवक पर कृपा करके इस अज्ञान का नाश कीजिए। संतों, पुराणों और उपनिषदों ने राम नाम के असीम प्रभाव का गान किया है॥1॥
* संतत जपत संभु अबिनासी। सिव भगवान ग्यान गुन रासी॥
आकर चारि जीव जग अहहीं। कासीं मरत परम पद लहहीं॥2॥
भावार्थ:-कल्याण स्वरूप, ज्ञान और गुणों की राशि, अविनाशी भगवान्‌ शम्भु निरंतर राम नाम का जप करते रहते हैं। संसार में चार जाति के जीव हैं, काशी में मरने से सभी परम पद को प्राप्त करते हैं॥2॥
*सोपि राम महिमा मुनिराया। सिव उपदेसु करत करि दाया॥
रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही। कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही॥3॥
भावार्थ:-हे मुनिराज! वह भी राम (नाम) की ही महिमा है, क्योंकि शिवजी महाराज दया करके (काशी में मरने वाले जीव को) राम नाम का ही उपदेश करते हैं (इसी से उनको परम पद मिलता है)। हे प्रभो! मैं आपसे पूछता हूँ कि वे राम कौन हैं? हे कृपानिधान! मुझे समझाकर कहिए॥3॥
* एक राम अवधेस कुमारा। तिन्ह कर चरित बिदित संसारा॥
नारि बिरहँ दुखु लहेउ अपारा। भयउ रोषु रन रावनु मारा॥4॥
भावार्थ:-एक राम तो अवध नरेश दशरथजी के कुमार हैं, उनका चरित्र सारा संसार जानता है। उन्होंने स्त्री के विरह में अपार दुःख उठाया और क्रोध आने पर युद्ध में रावण को मार डाला॥4॥
दोहा :
* प्रभु सोइ राम कि अपर कोउ जाहि जपत त्रिपुरारि।
सत्यधाम सर्बग्य तुम्ह कहहु बिबेकु बिचारि॥46॥
भावार्थ:-हे प्रभो! वही राम हैं या और कोई दूसरे हैं, जिनको शिवजी जपते हैं? आप सत्य के धाम हैं और सब कुछ जानते हैं, ज्ञान विचार कर कहिए॥46॥
* जैसें मिटै मोर भ्रम भारी। कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी॥
जागबलिक बोले मुसुकाई। तुम्हहि बिदित रघुपति प्रभुताई॥1॥
भावार्थ:-हे नाथ! जिस प्रकार से मेरा यह भारी भ्रम मिट जाए, आप वही कथा विस्तारपूर्वक कहिए। इस पर याज्ञवल्क्यजी मुस्कुराकर बोले, श्री रघुनाथजी की प्रभुता को तुम जानते हो॥1॥
* रामभगत तुम्ह मन क्रम बानी। चतुराई तुम्हारि मैं जानी॥
चाहहु सुनै राम गुन गूढ़ा कीन्हिहु प्रस्न मनहुँ अति मूढ़ा॥2॥
भावार्थ:-तुम मन, वचन और कर्म से श्री रामजी के भक्त हो। तुम्हारी चतुराई को मैं जान गया। तुम श्री रामजी के रहस्यमय गुणों को सुनना चाहते हो, इसी से तुमने ऐसा प्रश्न किया है मानो बड़े ही मूढ़ हो॥2॥
* तात सुनहु सादर मनु लाई। कहउँ राम कै कथा सुहाई॥
महामोहु महिषेसु बिसाला। रामकथा कालिका कराला॥3॥
भावार्थ:-हे तात! तुम आदरपूर्वक मन लगाकर सुनो, मैं श्री रामजी की सुंदर कथा कहता हूँ। बड़ा भारी अज्ञान विशाल महिषासुर है और श्री रामजी की कथा (उसे नष्ट कर देने वाली) भयंकर कालीजी हैं॥3

Yajnavalkya-Bhardwaj Dialogue and Prayag Mahamatya

* Now Raghupati Pad Pankaruh, Dhri Pai Prasad.
Where to say Jugal Munibarya Kar Milan Subhab Sambad
Connotation: – I now hold the beautiful lotus feet of Shri Raghunathji in the heart and receive his offerings and describe the beautiful dialogue of the union of the two great sages ॥43 (b)॥
Bunk:
* Bharadwaj Muni Basahin Prayaga. Tinhhi Ram post is very beautiful
Tapas Sama Dum Daya Nidhana. Paramratha Path Param Sujana ॥1॥
Meaning: Bharadwaj Muni resides in Prayag, he has great love at the feet of Shri Ramji. They are very clever in the path of ascetic, ingested mind, jitendriya, the path of compassion and charity.
* Magha Makargat Rabi Jab Hoi. Everything is available
Dev Danuj Kinner Male Shrenin. Regards Majjhin Gross Tribeni ॥2॥
Meaning: When the Sun goes to Capricorn in Magh, then everyone comes to the pilgrimage Prayag. Gods, demons, eunuchs and groups of human beings all reverently bathe in Triveni. 2
* Poojahin Madhav post burns. Parsi Akhay Batu Harshahin sings
Bharadwaj Ashram very holy. Param Rama Munibar Mana Bhavana ॥3॥
Meaning: – We worship the feet of Shri Venimadhavji and his body is pulsed by the touch of renewable energy. Bharadwajji’s ashram is very holy, supremely delightful and pleasing to the hearts of great sages ॥3॥
* There is a Muni Rishya Samaj. Jahin J Majjan Tirathraja॥
Mjahhin including Pratah. Kahin Paraspar Hari Gun Gaha ॥4॥
Bhaartarth: – In the Tirtharaj Prayag, the community of sages and sages who go to bathe in the ashram of Bharadwaj. Everyone bathes enthusiastically in the morning and then tells stories of mutual qualities of God.
Doha:
* Brahma Nirupan Dharam Bidhi Barnahin Tattva Division.
Kakhi Bhagati Bhagwant Kai Sanjut Gayan Birg ॥44॥
Connotation: – Representation of Brahman, describe the constitution of religion and the department of elements and declare devotion to God with knowledge and disinterest. ॥44॥
Bunk:
* Like this, there is no bath. Puni sab nij nij ashram not go
It is very easy to relate. Makar Majhi Gawanhin Munibrinda ॥1॥
Spirituality: Like this, take bath throughout the month of Magha and then everyone goes to their respective ashrams. Every year there is great joy there. After bathing in Capricorn, the monkeys go away ॥1॥
* Take a bath in Bharri Makar once. Teach all munis ashraman
Jagbalik Muni Param Bibeki. Bharadwaj Rakhe Pad Taki ॥2॥
Meaning: Once after bathing in the full moon, all the munisvaras returned to their respective ashrams. Bharadwajaji kept the paramount knowledgeable Yajnavalkya Muni on the stage ॥2॥
* Regards Charan Saroj Pakhare. Extremely paced postures
Kari Pooja Muni Sujsu Bakhani. Said, very rich and soft, ॥3॥
Spirituality: – Immediately washed their feet lotus and made them sit on a very sacred posture. After performing the puja, he described the suyash of Muni Yajnavalkyaji and then spoke with utmost pious and gentle speech.
* Nath a Sansu Bad More. Kareg Bettettva Sabu Torne
Kahat so mohi costs fear. I am not going to say big
Meaning: O O Nath! There is a big doubt in my mind, the essence of the Vedas is all in your fist (ie, you are the one who knows the essence of Vedas and can redress my doubts) but saying that doubt, I am afraid and sorry (fear because Nowhere do you think that you are taking my exams, shame because this age has passed, I have no knowledge yet) and if you do not say then there is great loss (because I remain ignorant) ॥4॥
Doha:
* Sant Kahin Asi Niti Prabhu Shruti Puran Muni Gaav.
Hoi Bimal Bibek Ur Gur Sun Sun Durao ॥45॥
Meaning: Oh God! The saints say such a policy and Vedas, Puranas and Munizans also say that hiding with the Guru does not lead to pure knowledge in the heart.
Bunk:
* As Bachari Prajtun Nij Mohu. Harhu Nath Karhi Jana Chhohu
Amit Prabhava named Ram. Sant Puran Upanishad Gava ॥1॥
Meaning: I express my ignorance by thinking this. Hey Nath! Please destroy this ignorance by blessing the servant. Saints, Puranas and Upanishads have sung the infinite influence of Rama name ॥1॥
* Santat Japat Sambhu Abinasi. Siva Bhagwan Gyan Gun Rasi 4
Come and see the world Kasiin Marat is the ultimate post, not ॥2॥
Meaning: – The form of welfare, amount of knowledge and qualities, the imperishable Lord Shambhu continues to chant the name of Rama. There are four species of creatures in the world, by dying in Kashi, all attain the ultimate rank. ॥2॥
* Sopi Ram Mahima Muniraaya. Only done
Ramu Kavan Prabhu should ask. Kahiya Bujhai Kripanidhi Mohi ॥3॥
Meaning: O Muniraj! That too is the glory of Rama (Naam), because Shivji Maharaj preaches the name of Rama by mercy (to the living creature in Kashi) (from which he gets the ultimate rank). Oh, Lord! I ask you, who is Rama? Hey greed! Explain me ॥3॥
* A Rama Avadhes Kumara. ्ह ्ह ्ह च बि बि बि
Nari Birhan Dukhu Lheu Apara. Bhayu Roshu Ravanu Mara ॥4॥
Bhaartarth: – A Ram is the king of Awadh King Dasarathaji, his character knows the whole world. He took immense grief against the woman and when angry, killed Ravana in the battle ॥4॥
Doha:
* Upper Kau Jahi Japat Tripurari of Prabhu Soi Ram.
Satyadham sarbagya tum kahhu bibeku bichari ॥46॥
Meaning: Oh God! Is he Rama or someone else whom Shivji chants? You are the abode of truth and know everything, consider it knowledge and say ॥46॥
* Like erased peacock confusion. Kahhu So Katha Nath Bistari
Jagbalik said Musukai. You know, Raghupati Prabhutai ॥1॥
Meaning: O O Nath! The way my heavy confusion is erased, you can tell the same story in detail. On this Yajnavalkyaji smiled and said, you know the sovereignty of Shri Raghunathji.
* RambhagatMake you mind Know you cleverly
Chahu Sunai Ram Gun Gudh Keenihu Prasad Manuha Very Silly ॥2॥
Meaning: – You are a devotee of Shri Ramji with mind, words and deeds. I know your cleverness. You want to hear the mysterious qualities of Shri Ramji, that’s why you have asked such a question as if you are very foolish.
* Taat Sunhu Regards Manu Lai. Kahoon Ram Kai Katha Suhai 4
Mahamohu Mahishesu Bisala. Ramkatha Kalika Karala ॥3॥
Sense: O Tat! Listen respectfully and listen, I tell the beautiful story of Shri Ramji. Great ignorance is the great Mahishasura and the story of Shri Ramji (who destroys him) is awful Kaliji. ॥3॥

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