Trail Period Film Review 2023 : बिन पापा के मां का अस्तित्व क्यों नहीं?

Trail Period Film Review:- दिल्ली की एक अकेली माँ का किराए के पिता के लिए पुरुषों का ऑडिशन लेना एक दूर की सोच है। और आप जानते हैं कि जब एक शहरी और परिष्कृत एना रॉय चौधरी (जेनेलिया डिसूजा) की नजर उज्जैन के एक देसी, हिंदी भाषी इतिहास शिक्षक, प्रजापति द्विवेदी, उर्फ पीडी (मानव कौल) पर पड़ती है, तो क्या उम्मीद की जानी चाहिए। यह अनोखी व्यवस्था एना के छह साल के बेटे, रोमी (जिदान ब्रेज़) को खुश करने के लिए है, जो स्कूल में दाखिला लेना चाहता है और सभी बच्चों की तरह एक सुपरहीरो पिता की चाहत रखता है।

छोटे लड़के के पास अपने पड़ोसियों, टिम्मी शर्मा (शक्ति कपूर) और उसकी पत्नी (शीबा चड्ढा) के माध्यम से एक मजबूत समर्थन प्रणाली है। टिम्मी टेलीशॉपिंग का आदी है और एक विज्ञापन देखने के दौरान रोमी को यह विचार आता है कि वे परीक्षण अवधि के लिए एक पिता को ऑर्डर कर सकते हैं जिसे अगर वे पसंद नहीं करते हैं तो वापस किया जा सकता है। गुनगुनाने और चिल्लाने के बाद, बुजुर्ग आखिरकार जहाज पर आ गए। अधिकांश उम्मीदवारों द्वारा प्रस्ताव को अस्वीकार करने के बाद, पीडी अनिच्छा से सहमत हो जाता है, शहर में नौकरी पाने में असमर्थ है।

Trail Period Film Review

आधार पूर्वानुमानित है, और कथा समय-समय पर गति खो देती है, लेकिन लेखक-निर्देशक अलेया सेन एक दिल छू लेने वाली और मनोरंजक कहानी पेश करने का सराहनीय काम करते हैं। चरित्र-चित्रण एक और सकारात्मक पहलू है, क्योंकि सभी कलाकार अपनी भूमिकाओं को प्रभावशाली ढंग से चित्रित करते हैं। मानव कौल ने एक पुराने व्यक्तित्व वाले सामाजिक रूप से अजीब, नैतिक और दयालु ग्रामीण व्यक्ति के रूप में शानदार प्रदर्शन किया है। जेनेलिया डिसूज़ा एक परिष्कृत और अपने बेटे को अच्छी परवरिश देने के लिए उत्सुक एकल माँ के रूप में शानदार हैं।

दोनों की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री सहज है और विपरीत होने के बावजूद उनकी जोड़ी स्वाभाविक लगती है। बाल कलाकार ज़िदान ब्रेज़ अच्छा अभिनय करते हैं, ख़ासकर पीडी के साथ संबंध बनाते समय और दृश्य में, वह स्कूल के गुंडों का डटकर मुकाबला करते हैं। शक्ति कपूर, शीबा चड्ढा, गजराज राव (जो पीडी के चाचा की भूमिका निभाते हैं), एना की प्यारी लेकिन सख्त माँ के रूप में स्वरूपा घोष और उसके कलाकार पिता के रूप में बरुण चंदा भी महान हैं।

Trail Period Film Review

Trail Period Film Review Overview

Article Name Trail Period Film Review: बिन पापा के मां का अस्तित्व क्यों नहीं?
Category REVIEWS
Facebook follow-us-on-facebook-e1684427606882.jpeg
Whatsapp badisoch whatsapp
Telegram unknown.jpg
Trail Period Film Review Click here

Trail Period Film Review

एक स्त्री का अकेले रहने का फैसला एक पुरुष के अकेले रहने के फैसले से अलग होता है. यह आसान नहीं होता. खुद की मर्जी से लिया गया हो या परिस्थितिवश. जानते हैं यह मुश्किल फैसला क्यों होता है? इस फैसले को निभाना मुश्किल क्यों होता है? क्योंकि हम सब मिलकर उसे मुश्किल बनाते हैं. हम सब जो उस स्त्री के करीबी हैं, उसके दोस्त हैं, परिवार हैं.  हर वक़्त उसे यह एहसास कराते हैं कि तुमने गलत फैसला लिया है, तुम इसे बदल दो, अब भी देर नहीं हुई.

अगर वो स्त्री लड़खड़ा जाये, कभी उलझ जाय, उदास हो जाय तो ये सारे करीबी मुस्कुराकर कहते हैं, ‘देखा मैंने तो पहले ही कहा था.’ और अगर साथ में बच्चा भी है तब तो कहना ही क्या. सारा का सारा समाज मय परिवार राशन पानी लेकर चढ़ जाएगा यह बताने के लिए कितना गलत फैसला कर लिया है उस स्त्री ने.

लेकिन यह वही दोहरे चरित्र वाला समाज है अगर स्त्री के लिए यह फैसला नियति ने किया हो (पति की मृत्यु या ऐसा कुछ) तब यह नहीं कहता कि आगे बढ़ो नए रिश्ते को अपना लो. तब यही लोग कहते हैं अरे, ‘बच्चे का मुंह देख कर जी लो.’ नियति को स्वीकार कर लो. मतलब सांत्वना देने या ताना देने के सिवा कुछ नहीं आता इन्हें.  एक मजबूत स्त्री जिसने खुद के लिए कुछ फैसले लिए हों, जिसकी आँखों में सिर्फ बच्चे की परवरिश ही नहीं अपने लिए भी कुछ सपने हों, इनसे बर्दाश्त ही नहीं होती. घूम फिरकर उसे गलत साबित करने पर तुल जाते हैं. अगर वो खुश है अकेले तो भी कटघरे में है और अगर वो उदास है तो भी कटघरे में ही है. हंसी आती है इन लोगों पर. क्योंकि दुख तो अब होता नहीं.

हाल ही में आई फिल्म ट्रायल पीरियड ने भी ऐसा ही कुछ परोसने की कोशिश की है. मैंने फिल्म रिलीज के दिन ही देख ली थी लेकिन मुझे फिल्म अच्छी नहीं लगी. मैं अपने एंटरटेनमेंट में भी काफी चूजी हूँ. कुछ भी मुझे खुश नहीं कर सकता.

फिल्म एक एकल स्त्री की कहानी है. जिसका एक छोटा बच्चा है. बच्चा अपने पापा के बारे में पूछता रहता है. यह पूछना उसके पियर प्रेशर से भी ड्राइव होता है. सारे बच्चे पापा के बारे में बातें करते हैं और उसके पापा नहीं हैं. वो अपनी मां से ट्रायल पर पापा लाने के लिए कहता है. आइडिया मजाक वाला है लेकिन ठीक है.

त्रासदी वहाँ से शुरू होती है जहां से कौमेडी शुरू होती है. किराए के पापा सुपर पापा हैं. एक बेरोजगार नवयुवक जो किराए के पापा कि नौकरी पर चल पड़ता है. पापा की सारी भूमिकाएँ निभाता है और बच्चे के भीतर पल रही पापा की कमी को पूरा करता है. लगे हाथ माँ को पैरेंटिंग पर लेक्चर भी पिला देता है. खैर, माँ को पैरेंटिंग पर तो लेक्चर यहाँ कोई भी देकर चला जाता है. सो नथिंग न्यू इन इट.

तो ये नए पापा सब कुछ फिक्स कर देते हैं. खाने से लेकर होमवर्क, स्पोर्ट्स से लेकर एंटरटेंमेट त. कहाँ हैं ऐसे पापा भाई? पापा वो भी तो हैं जो बच्चे के सामने माँ का अपमान करते हैं, घर के काम करते नहीं बढ़ाते हैं, माँ और बच्चे का हौसला नहीं बढ़ाते बल्कि उन्हें बताते हैं उनकी कमियाँ गलतियाँ.  और आखिर में वही हिन्दी फिल्मों का घिसा पिटा फॉरमूला कि हीरो हीरोइन बच्चे के साथ हैपी एंडिंग करते हुए मुसकुराते हुए.

यह फिल्म मिसोजिनी अप्रोच की ही फीडिंग करती है. मेरे लिए यह फिल्म तब बेहतर होती जब हीरो हीरोइन के संघर्ष को सैल्यूट करता, बच्चे को समझाता कि उसकी माँ कितनी शानदार स्त्री है और पापा के न होने से उसका जीवन कम नहीं है बल्कि कुछ मामलों में ज्यादा सुंदर ही है. हीरोइन और मजबूती से खड़ी होती. और किराए के पापा को कोई सचमुच का बढ़िया रोजगार मिल जाता.

फिल्म में मानव को देखना ही सुखद लगा. बाकी लोगों को देखकर तो ऐसा लग रहा था जैसे या तो वो ओवरकान्फिडेंट थे कि क्या ही करना है एक्टिंग जो करेंगे ठीक ही लगेगा. और जेनेलिया की भर भर के क्यूटनेस कितना देखे कोई. कभी तो उन्हें थोड़ी एक्टिंग भी कर लेनी चाहिए. फिल्म रील नहीं है यह बात उन्हें समझनी चाहिए.  फिल्म का संगीत अच्छा है. बिना किसी संकोच के कह सकती हूँ फिल्म सिर्फ मानव के कंधों पर चल रही है. फिल्म का चलना सुखद है लेकिन क्यों उन सवालों पर बात नहीं होनी चाहिए जो सवाल फिल्म छोड़ रही है.

Conclusion

Trail Period” is a captivating film that takes viewers on a thrilling journey through the wilderness. Set against the backdrop of a remote trail, the film follows a group of hikers as they embark on a challenging adventure. The cinematography is stunning, capturing the beauty and vastness of nature in all its glory. The performances by the cast are exceptional, with each actor bringing depth and authenticity to their roles. The suspenseful storyline keeps you on the edge of your seat, as unexpected twists and turns keep you guessing until the very end. “Trail Period” is a must-watch for any fan of adventure films, offering a unique blend of breathtaking visuals, gripping storytelling, and memorable performances.

Trail Period Film Review FAQ’S

How long should a movie review be?

Film reviews, although typically brief (around 600 to 1200 words), necessitate thorough preparation prior to commencing the writing process. It is advisable to familiarize oneself with the previous works of the director, writer, or individual actor before watching the film.

What are common film review mistakes?

It is important to approach the content critically rather than just describing. It is acceptable to introduce the characters and provide an overview of the plot, but revealing all the details from start to finish is not advisable. Moreover, it is particularly problematic if the entire story is copied from Wikipedia, assuming that no one will detect it.

What are the objectives of film review?

Film reviews are typically authored by journalists or other individuals who are not necessarily academics, and they can be found in newspapers, magazines, or online platforms coinciding with the film's release in theaters. Their primary aim is to provide a portrayal of the storyline, characters, directorial aspects, etc., with the intention of assisting readers in making an informed decision about whether or not to watch the film.

Related post:-

The Woman King Movie Review

Run Baby Run Review 

Bheed movie Review 2023

The Pope’s Exorcist movie review 

OMG 2 Teaser Review 

Leave a Comment