भरतजी का अयोध्या लौटना, भरतजी द्वारा पादुका की स्थापना, नन्दिग्राम में निवास और श्री भरतजी के चरित्र श्रवण की महिमा

भरतजी का अयोध्या लौटना, भरतजी द्वारा पादुका की स्थापना, नन्दिग्राम में निवास और श्री

भरतजी के चरित्र श्रवण की महिमा

दोहा :

* सानुज सीय समेत प्रभु राजत परन कुटीर।
भगति ग्यानु बैराग्य जनु सोहत धरें सरीर॥321॥

भावार्थ:-छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजी समेत प्रभु श्री रामचंद्रजी पर्णकुटी में ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो वैराग्य, भक्ति और ज्ञान शरीर धारण कर के शोभित हो रहे हों॥321॥
चौपाई :
* मुनि महिसुर गुर भरत भुआलू। राम बिरहँ सबु साजु बिहालू।
प्रभु गुन ग्राम गनत मन माहीं। सब चुपचाप चले मग जाहीं॥1॥
भावार्थ:-मुनि, ब्राह्मण, गुरु वशिष्ठजी, भरतजी और राजा जनकजी सारा समाज श्री रामचन्द्रजी के विरह में विह्वल है। प्रभु के गुण समूहों का मन में स्मरण करते हुए सब लोग मार्ग में चुपचाप चले जा रहे हैं॥1॥
* जमुना उतरि पार सबु भयऊ। सो बासरु बिनु भोजन गयऊ॥
उतरि देवसरि दूसर बासू। रामसखाँ सब कीन्ह सुपासू॥2॥
भावार्थ:-(पहले दिन) सब लोग यमुनाजी उतरकर पार हुए। वह दिन बिना भोजन के ही बीत गया। दूसरा मुकाम गंगाजी उतरकर (गंगापार श्रृंगवेरपुर में) हुआ। वहाँ राम सखा निषादराज ने सब सुप्रबंध कर दिया॥2॥
* सई उतरि गोमतीं नहाए। चौथें दिवस अवधपुर आए॥
जनकु रहे पुर बासर चारी। राज काज सब साज सँभारी॥3॥
भावार्थ:-फिर सई उतरकर गोमतीजी में स्नान किया और चौथे दिन सब अयोध्याजी जा पहुँचे। जनकजी चार दिन अयोध्याजी में रहे और राजकाज एवं सब साज-सामान को सम्हालकर,॥3॥
* सौंपि सचिव गुर भरतहिं राजू। तेरहुति चले साजि सबु साजू॥
नगर नारि नर गुर सिख मानी। बसे सुखेन राम रजधानी॥4॥
भावार्थ:-तथा मंत्री, गुरुजी तथा भरतजी को राज्य सौंपकर, सारा साज-सामान ठीक करके तिरहुत को चले। नगर के स्त्री-पुरुष गुरुजी की शिक्षा मानकर श्री रामजी की राजधानी अयोध्याजी में सुखपूर्वक रहने लगे॥4॥
दोहा :
* राम दरस लगि लोग सब करत नेम उपबास।
तजि तजि भूषन भोग सुख जिअत अवधि कीं आस॥322॥
भावार्थ:-सब लोग श्री रामचन्द्रजी के दर्शन के लिए नियम और उपवास करने लगे। वे भूषण और भोग-सुखों को छोड़-छाड़कर अवधि की आशा पर जी रहे हैं॥322॥
चौपाई :
* सचिव सुसेवक भरत प्रबोधे। निज निज काज पाइ सिख ओधे॥
पुनि सिख दीन्हि बोलि लघु भाई। सौंपी सकल मातु सेवकाई॥1॥
भावार्थ:-भरतजी ने मंत्रियों और विश्वासी सेवकों को समझाकर उद्यत किया। वे सब सीख पाकर अपने-अपने काम में लग गए। फिर छोटे भाई शत्रुघ्नजी को बुलाकर शिक्षा दी और सब माताओं की सेवा उनको सौंपी॥1॥
* भूसुर बोलि भरत कर जोरे। करि प्रनाम बय बिनय निहोरे॥
ऊँच नीच कारजु भल पोचू। आयसु देब न करब सँकोचू॥2॥
भावार्थ:-ब्राह्मणों को बुलाकर भरतजी ने हाथ जोड़कर प्रणाम कर अवस्था के अनुसार विनय और निहोरा किया कि आप लोग ऊँचा-नीचा (छोटा-बड़ा), अच्छा-मन्दा जो कुछ भी कार्य हो, उसके लिए आज्ञा दीजिएगा। संकोच न कीजिएगा॥2॥
* परिजन पुरजन प्रजा बोलाए। समाधानु करि सुबस बसाए॥
सानुज गे गुर गेहँ बहोरी। करि दंडवत कहत कर जोरी॥3॥
भावार्थ:-भरतजी ने फिर परिवार के लोगों को, नागरिकों को तथा अन्य प्रजा को बुलाकर, उनका समाधान करके उनको सुखपूर्वक बसाया। फिर छोटे भाई शत्रुघ्नजी सहित वे गुरुजी के घर गए और दंडवत करके हाथ जोड़कर बोले-॥3॥
* आयसु होइ त रहौं सनेमा। बोले मुनि तन पुलकि सपेमा॥
समुझब कहब करब तुम्ह जोई। धरम सारु जग होइहि सोई॥4॥
भावार्थ:-आज्ञा हो तो मैं नियमपूर्वक रहूँ! मुनि वशिष्ठजी पुलकित शरीर हो प्रेम के साथ बोले- हे भरत! तुम जो कुछ समझोगे, कहोगे और करोगे, वही जगत में धर्म का सार होगा॥4॥
दोहा :
* सुनि सिख पाइ असीस बड़ि गनक बोलि दिनु साधि।
सिंघासन प्रभु पादुका बैठारे निरुपाधि॥323॥
भावार्थ:-भरतजी ने यह सुनकर और शिक्षा तथा बड़ा आशीर्वाद पाकर ज्योतिषियों को बुलाया और दिन (अच्छा मुहूर्त) साधकर प्रभु की चरणपादुकाओं को निर्विघ्नतापूर्वक सिंहासन पर विराजित कराया॥323॥
चौपाई :
* राम मातु गुर पद सिरु नाई। प्रभु पद पीठ रजायसु पाई॥
नंदिगाँव करि परन कुटीरा। कीन्ह निवासु धरम धुर धीरा॥1॥
भावार्थ:-फिर श्री रामजी की माता कौसल्याजी और गुरुजी के चरणों में सिर नवाकर और प्रभु की चरणपादुकाओं की आज्ञा पाकर धर्म की धुरी धारण करने में धीर भरतजी ने नन्दिग्राम में पर्णकुटी बनाकर उसी में निवास किया॥1॥
* जटाजूट सिर मुनिपट धारी। महि खनि कुस साँथरी सँवारी॥
असन बसन बासन ब्रत नेमा। करत कठिन रिषिधरम सप्रेमा॥2॥
भावार्थ:-सिर पर जटाजूट और शरीर में मुनियों के (वल्कल) वस्त्र धारण कर, पृथ्वी को खोदकर उसके अंदर कुश की आसनी बिछाई। भोजन, वस्त्र, बरतन, व्रत, नियम सभी बातों में वे ऋषियों के कठिन धर्म का प्रेम सहित आचरण करने लगे॥2॥
* भूषन बसन भोग सुख भूरी। मन तन बचन तजे तिन तूरी॥
अवध राजु सुर राजु सिहाई। दसरथ धनु सुनि धनदु लजाई॥3॥
भावार्थ:-गहने-कपड़े और अनेकों प्रकार के भोग-सुखों को मन, तन और वचन से तृण तोड़कर (प्रतिज्ञा करके) त्याग दिया। जिस अयोध्या के राज्य को देवराज इन्द्र सिहाते थे और (जहाँ के राजा) दशरथजी की सम्पत्ति सुनकर कुबेर भी लजा जाते थे,॥3॥
* तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा। चंचरीक जिमि चंपक बागा॥
रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी॥4॥
भावार्थ:-उसी अयोध्यापुरी में भरतजी अनासक्त होकर इस प्रकार निवास कर रहे हैं, जैसे चम्पा के बाग में भौंरा। श्री रामचन्द्रजी के प्रेमी बड़भागी पुरुष लक्ष्मी के विलास (भोगैश्वर्य) को वमन की भाँति त्याग देते हैं (फिर उसकी ओर ताकते भी नहीं)॥4॥
दोहा :
* राम प्रेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति।
चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति॥324॥
भावार्थ:-फिर भरतजी तो (स्वयं) श्री रामचन्द्रजी के प्रेम के पात्र हैं। वे इस (भोगैश्वर्य त्याग रूप) करनी से बड़े नहीं हुए (अर्थात उनके लिए यह कोई बड़ी बात नहीं है)। (पृथ्वी पर का जल न पीने की) टेक से चातक की और नीर-क्षीर-विवेक की विभूति (शक्ति) से हंस की भी सराहना होती है॥324॥
चौपाई :
* देह दिनहुँ दिन दूबरि होई। घटइ तेजु बलु मुखछबि सोई॥
नित नव राम प्रेम पनु पीना। बढ़त धरम दलु मनु न मलीना॥1॥
भावार्थ:-भरतजी का शरीर दिनों-दिन दुबला होता जाता है। तेज (अन्न, घृत आदि से उत्पन्न होने वाला मेद*) घट रहा है। बल और मुख छबि (मुख की कान्ति अथवा शोभा) वैसी ही बनी हुई है। राम प्रेम का प्रण नित्य नया और पुष्ट होता है, धर्म का दल बढ़ता है और मन उदास नहीं है (अर्थात प्रसन्न है)॥1॥
* संस्कृत कोष में ‘तेज’ का अर्थ मेद मिलता है और यह अर्थ लेने से ‘घटइ’ के अर्थ में भी किसी प्रकार की खींच-तान नहीं करनी पड़ती।
* जिमि जलु निघटत सरद प्रकासे। बिलसत बेतस बनज बिकासे॥
सम दम संजम नियम उपासा। नखत भरत हिय बिमल अकासा॥2॥
भावार्थ:-जैसे शरद ऋतु के प्रकाश (विकास) से जल घटता है, किन्तु बेंत शोभा पाते हैं और कमल विकसित होते हैं। शम, दम, संयम, नियम और उपवास आदि भरतजी के हृदयरूपी निर्मल आकाश के नक्षत्र (तारागण) हैं॥2॥
* ध्रुव बिस्वासु अवधि राका सी। स्वामि सुरति सुरबीथि बिकासी॥
राम पेम बिधु अचल अदोषा। सहित समाज सोह नित चोखा॥3॥
भावार्थ:-विश्वास ही (उस आकाश में) ध्रुव तारा है, चौदह वर्ष की अवधि (का ध्यान) पूर्णिमा के समान है और स्वामी श्री रामजी की सुरति (स्मृति) आकाशगंगा सरीखी प्रकाशित है। राम प्रेम ही अचल (सदा रहने वाला) और कलंकरहित चन्द्रमा है। वह अपने समाज (नक्षत्रों) सहित नित्य सुंदर सुशोभित है॥3॥
* भरत रहनि समुझनि करतूती। भगति बिरति गुन बिमल बिभूती॥
बरनत सकल सुकबि सकुचाहीं। सेस गनेस गिरा गमु नाहीं॥4॥
भावार्थ:-भरतजी की रहनी, समझ, करनी, भक्ति, वैराग्य, निर्मल, गुण और ऐश्वर्य का वर्णन करने में सभी सुकवि सकुचाते हैं, क्योंकि वहाँ (औरों की तो बात ही क्या) स्वयं शेष, गणेश और सरस्वती की भी पहुँच नहीं है॥4॥
दोहा :
* नित पूजत प्रभु पाँवरी प्रीति न हृदयँ समाति।
मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति॥325॥
भावार्थ:-वे नित्य प्रति प्रभु की पादुकाओं का पूजन करते हैं, हृदय में प्रेम समाता नहीं है। पादुकाओं से आज्ञा माँग-माँगकर वे बहुत प्रकार (सब प्रकार के) राज-काज करते हैं॥325॥
चौपाई :
* पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू। जीह नामु जप लोचन नीरू॥
लखन राम सिय कानन बसहीं। भरतु भवन बसि तप तनु कसहीं॥1॥
भावार्थ:-शरीर पुलकित है, हृदय में श्री सीता-रामजी हैं। जीभ राम नाम जप रही है, नेत्रों में प्रेम का जल भरा है। लक्ष्मणजी, श्री रामजी और सीताजी तो वन में बसते हैं, परन्तु भरतजी घर ही में रहकर तप के द्वारा शरीर को कस रहे हैं॥1॥
* दोउ दिसि समुझि कहत सबु लोगू। सब बिधि भरत सराहन जोगू॥
सुनि ब्रत नेम साधु सकुचाहीं। देखि दसा मुनिराज लजाहीं॥2॥
भावार्थ:-दोनों ओर की स्थिति समझकर सब लोग कहते हैं कि भरतजी सब प्रकार से सराहने योग्य हैं। उनके व्रत और नियमों को सुनकर साधु-संत भी सकुचा जाते हैं और उनकी स्थिति देखकर मुनिराज भी लज्जित होते हैं॥2॥
* परम पुनीत भरत आचरनू। मधुर मंजु मुद मंगल करनू॥
हरन कठिन कलि कलुष कलेसू। महामोह निसि दलन दिनेसू॥3॥
भावार्थ:-भरतजी का परम पवित्र आचरण (चरित्र) मधुर, सुंदर और आनंद-मंगलों का करने वाला है। कलियुग के कठिन पापों और क्लेशों को हरने वाला है। महामोह रूपी रात्रि को नष्ट करने के लिए सूर्य के समान है॥3॥
* पाप पुंज कुंजर मृगराजू। समन सकल संताप समाजू॥
जन रंजन भंजन भव भारू। राम सनेह सुधाकर सारू॥4॥
भावार्थ:-पाप समूह रूपी हाथी के लिए सिंह है। सारे संतापों के दल का नाश करने वाला है। भक्तों को आनंद देने वाला और भव के भार (संसार के दुःख) का भंजन करने वाला तथा श्री राम प्रेम रूपी चन्द्रमा का सार (अमृत) है॥4॥
छन्द :
* सिय राम प्रेम पियूष पूरन होत जनमु न भरत को।
मुनि मन अगम जम नियम सम दम बिषम ब्रत आचरत को॥
दुख दाह दारिद दंभ दूषन सुजस मिस अपहरत को।
कलिकाल तुलसी से सठन्हि हठि राम सनमुख करत को॥
भावार्थ:-श्री सीतारामजी के प्रेमरूपी अमृत से परिपूर्ण भरतजी का जन्म यदि न होता, तो मुनियों के मन को भी अगम यम, नियम, शम, दम आदि कठिन व्रतों का आचरण कौन करता? दुःख, संताप, दरिद्रता, दम्भ आदि दोषों को अपने सुयश के बहाने कौन हरण करता? तथा कलिकाल में तुलसीदास जैसे शठों को हठपूर्वक कौन श्री रामजी के सम्मुख करता?
सोरठा :
* भरत चरित करि नेमु तुलसी जो सादर सुनहिं।
सीय राम पद पेमु अवसि होइ भव रस बिरति॥326॥
भावार्थ:-तुलसीदासजी कहते हैं- जो कोई भरतजी के चरित्र को नियम से आदरपूर्वक सुनेंगे, उनको अवश्य ही श्रीसीतारामजी के चरणों में प्रेम होगा और सांसारिक विषय रस से वैराग्य होगा॥326॥
मासपारायण, इक्कीसवाँ विश्राम
इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने द्वितीयः सोपानः समाप्तः। कलियुग के सम्पूर्ण पापों को विध्वंस करने वाले श्री रामचरित मानस का यह दूसरा सोपान समाप्त हुआ॥
(अयोध्याकाण्ड समाप्त)

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Lord Shree Ramachandraji, including younger brothers Lakshmanji and Sitaji, are beautifying in Parnakuti as if they are being beautified by wearing disinterest, devotion and knowledge.
Muni, Brahmin, Guru Vashisthaji, Bharatji and Raja Janakji whole society is feared against Shri Ramchandraji. While remembering the virtues of the Lord, all the people are going silently on the way.
(First day) Everybody descended and crossed the Yamunaji. The day passed without any food. The second stage took place after Gangaji descended (in Gangapar Shringverpur). Rama Sakha Nishad Raj managed everything there.
Then Sayi descended and took a bath in Gomti and on the fourth day everyone reached Ayodhya. Janakji stayed in Ayodhyaji for four days and after handling the government and all the furnishings,
And handing over the kingdom to the minister, Guruji and Bharatji, fixing all the equipment and went to Tirhut. Following the education of the men and women of the city, they started living happily in Ayodhya, the capital of Shri Ram.
Everybody started doing rules and fasting to see Shri Ram Chandraji. They are living on the hope of duration after leaving Bhushan and pleasures.
Bharatji tried to explain to the ministers and believers. They all learned and started doing their work. Then he called his younger brother Shatrughanji and gave education and entrusted the service to all the mothers.
Calling the Brahmins, Bharatji bowed his hands and bowed humbly and stoically according to the condition that you will give permission for whatever work is high-low (small-big), good-mind. Do not hesitate
Bharatji then called the family members, citizens and other subjects, settled them and settled them happily. Then along with younger brother Shatrughanji, he went to Guruji’s house and bowed and folded his hands and said –
If I order, I should live as a rule! Muni Vashistha Pulukit body be with love said – O Bharat! Whatever you understand, say and do will be the essence of religion in the world.
Hearing this, Bharata called the astrologers after receiving education and great blessings, and by observing the day (good muhurta), the Lord’s Charanpadukas uninterruptedly enthroned the throne.
Then by placing his head at the feet of Shri Ramji’s mother Kausalyaji and Guruji and obeying the footsteps of the Lord, Dheer Bharati, residing in the Nandigram, made a foliage in Nandigram.
Wearing jaggery on the head and saintly (Valkal) clothes in the body, digging the earth and laying the seat of Kush inside it. In everything, food, clothes, utensils, fasts, rules, they began to practice the difficult religion of the sages with love.
Ornaments and clothes and many kinds of indulgence-pleasures were sacrificed (by pledging) from mind, body and speech. The kingdom of Ayodhya, where Devraj Indra used to live and (where the king) Kubera was also embarrassed after hearing the wealth of Dashrathji.
In the same Ayodhyapuri, Bharatji is staying detached, like a bumblebee in Champa’s garden. Shri Ramachandraji’s lover Bad Bhagabhi leaves Lakshmi’s Vilas (Bhogeshvarya) like vomit (not even looking at him)
Then Bharatji (himself) deserves the love of Shri Ramchandraji. He did not grow up doing this (bhogaishvarya renunciation form) (that is, it is not a big deal for him). (Do not drink water on the earth), with the teat, and with the power of neer-ksheer-vivek, the swan is also appreciated.
Bharatji’s body gets leaner day by day. Tej (fattening * arising from grain, ghee etc.) is decreasing. The force and the mouth (the ear’s ear or charm) remain the same. The vow of Rama love is always new and strong, the party of religion grows and the mind is not sad (that is, happy) ॥1॥
In the Sanskrit corpus, the meaning of ‘Tej’ is fattening and by taking this meaning, there is no need to do any stretching in the meaning of ‘Ghati’.
As the water decreases with the light (growth) of the autumn, but the cane graces and the lotus develops. Sham, dum, sanyam, niyam and fasting etc. are the constellations (stars) of the pure sky of Bharatji.
Faith is the pole star (in that sky), the fourteen-year period (meditation) is similar to the full moon, and Swami Shri Ramji’s Surti (memory) galaxy is illuminated. Ram Prem is the immovable (perpetual) and faint moon. He is eternally beautiful with his society (constellations).
All narrators are reluctant to describe the living, understanding, doing, devotion, disinterest, serene, virtue and opulence of Bharatji, because there is no access to the rest (Ganesha and Saraswati).
They worship Lord’s footprints daily, there is no love in the heart. They do many types of rule by asking for permission from the Padukas.
The body is pulkit, Sri Sita-Ramji is in the heart. The tongue is chanting the name of Rama, the eyes are filled with water of love. Laxmanji, Shri Ramji and Sitaji reside in the forest, but Bharatji is staying at home and tightening the body through tenacity.
Everyone understands the situation on both sides and says that Bharatji is praiseworthy in all respects. Sadhus and saints have also listened to their fast and rules and Muniraj is also ashamed after seeing their situation.
The ultimate sacred conduct (character) of Bharatji is sweet, beautiful and joyful. One is about to defeat the difficult sins and tribulations of the Kali Yuga. To destroy the glorious night is like the sun.
Sin is the lion for the group elephant. He is going to destroy the team of all the suffering. One who gives joy to the devotees and breaks the weight of the house (sorrow of the world) and is the essence (nectar) of the moon in the form of Shri Rama’s love
If the birth of Bharatji, full of the loveliness of Shri Sitaramji’s nectar, would not have taken place in the minds of the monks, who would conduct difficult fasts like Agama Yama, Niyam, Sham, Dum etc. Who would wipe out the faults of sorrow, sorrow, impoverishment, snobbery etc. on the pretext of his sucess And who would stubbornly chant like Tulsidas in Kalikal in front of Shri Ramji?
Tulsidasji says- Whoever will listen respectfully to the character of Bharatji, they will surely have love at the feet of Shri Sitaramji and the worldly subject will be disinterested by the juice.
Masparayan, twenty-first rest
Iti Srimadramacharitmana from Sakalakalikalusvidhvansane Second: Sopan: Finish:. This second step of Shri Ramcharit Manas, who destroyed the entire sins of Kali Yuga, ended.
(Ayodhyak ended)

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