श्री राम-भरत-संवाद, पादुका प्रदान, भरतजी की बिदाई

श्री राम-भरत-संवाद

श्री राम-भरत-संवाद, पादुका प्रदान, भरतजी की बिदाई चौपाई : * भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू। भरत भूमिसुर तेरहुति राजू॥ भल दिन आजु जानि मन माहीं। रामु कृपाल कहत सकुचाहीं॥1॥ भावार्थ:-(अगले छठे दिन) सबेरे स्नान करके भरतजी, ब्राह्मण, राजा जनक और सारा समाज आ जुटा। आज सबको विदा करने के लिए अच्छा दिन है, यह मन … Read more श्री राम-भरत-संवाद, पादुका प्रदान, भरतजी की बिदाई

big thinking या बड़ी सोच से सफल बने | कैसे ?

big thinking

big thinking अथवा बड़ी सोच अपनाओ और सफल इन्सान बनो | क्योंकि आप उतने ही बड़े हो जितनी बड़ी आपकी सोच | अर्थात आपका सोचने का नजरिया ही तय कर देता है, कि आप जीवन में कितनी उचाईयो को छुओगे | इसलिए विदित रहे बड़ा बनना है तो बड़ा सोचो |और अमीर बनना है तो … Read more big thinking या बड़ी सोच से सफल बने | कैसे ?

भरतजी का तीर्थ जल स्थापन तथा चित्रकूट भ्रमण

भरतजी का तीर्थ

भरतजी का तीर्थ जल स्थापन तथा चित्रकूट भ्रमण दोहा : * अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप। राखिअ तीरथ तोय तहँ पावन अमिअ अनूप॥309॥ भावार्थ:-तब अत्रिजी ने भरतजी से कहा- इस पर्वत के समीप ही एक सुंदर कुआँ है। इस पवित्र, अनुपम और अमृत जैसे तीर्थजल को उसी में स्थापित कर दीजिए॥309॥ चौपाई … Read more भरतजी का तीर्थ जल स्थापन तथा चित्रकूट भ्रमण

श्री राम-भरत संवाद

श्री राम-भरत

श्री राम-भरत संवाद दोहा : * राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत। सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न ऊतरु देत॥296॥ भावार्थ:-श्री रामचन्द्रजी की शपथ सुनकर सभा समेत मुनि और जनकजी सकुचा गए (स्तम्भित रह गए)। किसी से उत्तर देते नहीं बनता, सब लोग भरतजी का मुँह ताक रहे हैं॥296॥ चौपाई : * सभा … Read more श्री राम-भरत संवाद

जनक-वशिष्ठादि संवाद, इंद्र की चिंता, सरस्वती का इंद्र को समझाना

जनक-वशिष्ठादि

जनक-वशिष्ठादि संवाद, इंद्र की चिंता, सरस्वती का इंद्र को समझाना * आपु आश्रमहि धारिअ पाऊ। भयउ सनेह सिथिल मुनिराऊ॥ करि प्रनामु तब रामु सिधाए। रिषि धरि धीर जनक पहिं आए॥3॥ भावार्थ:-अतः आप आश्रम को पधारिए। इतना कह मुनिराज स्नेह से शिथिल हो गए। तब श्री रामजी प्रणाम करके चले गए और ऋषि वशिष्ठजी धीरज धरकर … Read more जनक-वशिष्ठादि संवाद, इंद्र की चिंता, सरस्वती का इंद्र को समझाना

जनक-सुनयना संवाद, भरतजी की महिमा

जनक

जनक-सुनयना संवाद, भरतजी की महिमा दोहा : * बार बार मिलि भेंटि सिय बिदा कीन्हि सनमानि। कही समय सिर भरत गति रानि सुबानि सयानि॥287॥ भावार्थ:-राजा-रानी ने बार-बार मिलकर और हृदय से लगाकर तथा सम्मान करके सीताजी को विदा किया। चतुर रानी ने समय पाकर राजा से सुंदर वाणी में भरतजी की दशा का वर्णन किया॥287॥ … Read more जनक-सुनयना संवाद, भरतजी की महिमा