नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं संदेश नव संवत्सर २०७९

नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं संदेश : नव संवत्सर २०७९ भारत में हिन्दू नव वर्ष का त्यौहार  श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता हैं। हिंदू नव वर्ष की शुरुआत चैत्र नवरात्र से होती है। इस दिन को लोग नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं संदेश के रूप में श्रधा और भाईचारे के साथ मनाते है। इस बार हिंदू नववर्ष नवसंवत्सर २०७९, 2अप्रैल 2022 को आरंभ हो रहा है। हिंदू नववर्ष का आरंभ चैत्र माह शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा यानी पहली तिथि से होता है।

नव वर्ष (नव संवत्सर २०७९) की हार्दिक शुभकामनाएं संदेश

चलो अब हम भी शुभकामनाएँ देना शुरू करे। 🍁”रिद्धि दे, सिद्धि दे,
वंश में वृद्धि दे, ह्रदय में ज्ञान दे,
चित्त में ध्यान दे, अभय वरदान दे,
दुःख को दूर कर, सुख भरपूर कर, आशा को संपूर्ण कर,
सज्जन जो हित दे, कुटुंब में प्रीत दे,
जग में जीत दे, माया दे, साया दे, और निरोगी काया दे,
मान-सम्मान दे, सुख समृद्धि और ज्ञान दे,
शान्ति दे, शक्ति दे, भक्ति भरपूर दें…”🍁
🍁आप को 2 अप्रैल से शुरू होने वाले नव वर्ष विक्रम संवत 2079 के लिए अग्रिम शुभकामनाएं।
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नव संवत्सर २०७९ : नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं संदेश 

पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक इस दिन भगवान् ब्रह्मा ने इस पूरी सृष्टि की रचना की थी। कई पौराणिक गाथाओ में इस बात का जिक्र हैं की इस दिन मानव, राक्षस,पेड़, पौधों, आकाश और  समंदर की रचना हुई थी। नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं संदेश आप अपने मित्रो एवं रिश्तेदारों को व्हाट्सप्प या फेसबुक के ज़रिये शेयर कर सकते हैं।

चैत्र नवरात्रि और नव संवत्सर की सभी को शुभकामनाएं.
हिन्दू नव वर्ष की भारतवंशियों को मंगलकामनाएं.
आर्य संस्कृति अमर रहे, विक्रम संवत २०७९ अथवा नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं संदेश : नव संवत्सर २०७९  की अनंत शुभकामनाएं।

बसंत की बहार हो, खुशियों का संचार हो,
नव वर्ष की पावन बेला में नेह हो, सत्कार हो।
स्वर्णिम सूरज की बेला में विक्रम संवत २०७९ की हार्दिक शुभकामनाएं।।
देवी के नौ रूपों सा दिव्य हो नूतन संवत्सर।।

नव संवत्सर (नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं संदेश)

नया संवत प्रारंभ करने के लिए महाराजा विक्रमादित्य ने परंपरानुसार अपने राज्य की प्रजा के सभी बकाया करों को माफ  कर दिया और राज्यकोष से धन देकर दीन-दु:खियों को साहूकारों के कर्ज से मुक्त किया था। इस दिन संवत की शुरुआत मानी जाती है।

सृष्टि का निर्माण

महाराजा विक्रमादित्य ने भारत की तमाम कालगणना, परम्पराओं को ध्यान में रखते हुए  ‘विक्रम संवतÓ का शुभारंभ चैत्र मास के शुक्ल पक्ष, तिथि प्रतिपदा से इसलिए किया क्योंकि पुराणों के अनुसार इसी दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि का निर्माण किया था।

सूर्य मेष राशि में करता है प्रवेश

संवत्सर-चक्र के अनुसार सूर्य इसी दिन अपने राशि-चक्र की प्रथम राशि मेष में प्रवेश करता है। इस पावन तिथि को नव संवत्सर पर्व के रूप में मनाया जाता है। वसंत ऋतु में आने वाले ‘नवरात्रÓ का प्रारंभ भी सदा इसी पुण्य तिथि से होता है।

विक्रम संवत के बारह महीने

संवत् के 12 महीने चैत्र, बैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्ग शीर्ष, पौष, माघ, फाल्गुन। दो मास मिला कर ही एक ऋतु बनती है।

संवत् पर मतांतर

विक्रमादित्य ने विक्रम संवत् की स्थापना की। इसको लेकर भी विद्वान एक मत नहीं है। वैसे पूर्व के तथ्य और अनेक शोध ने विक्रम संवत् को पूर्ण रूप से मान्यता प्रदान कर दी है। इसके बाद भी अनेक विद्वानों का कथन है, कि 57 ई.पू. के लेखों पर संवत् का प्रयोग अवश्य हुआ है,पर संवत् नाम विक्रम नहीं था। संवत् की स्थापना तो ई.पू. 57 में हुई, वैसे सबसे पहले 794 के लेख पर विक्रमादित्य का ही नाम है। इतिहासकार यह भी मानते हैं कि संवत् तो ई.पू. 57 में शुरू किया गया। इसका नाम मालवागण स्थिति और कृत-संवत् था, लेकिन मालवागण की पूर्ण स्थापना होने से उसी संवत् का नाम मालवा और प्रर्वतक विक्रमादित्य होने से वही संवत् विक्रम नाम से विख्यात हुआ।

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