अहल्या उद्धार | श्री रामचरितमानस बालकाण्ड

अहल्या उद्धार –

* आश्रम एक दीख मग माहीं। खग मृग जीव जंतु तहँ नाहीं॥
पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी। सकल कथा मुनि कहा बिसेषी॥6॥

भावार्थ:-मार्ग में एक आश्रम दिखाई पड़ा। वहाँ पशु-पक्षी, को भी जीव-जन्तु नहीं था। पत्थर की एक शिला को देखकर प्रभु ने पूछा, तब मुनि ने विस्तारपूर्वक सब कथा कही॥6॥

दोहा :
* गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर।
चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर॥210॥
भावार्थ:-गौतम मुनि की स्त्री अहल्या शापवश पत्थर की देह धारण किए बड़े धीरज से आपके चरणकमलों की धूलि चाहती है। हे रघुवीर! इस पर कृपा कीजिए॥210॥
छन्द :
* परसत पद पावन सोकनसावन प्रगट भई तपपुंज सही।
देखत रघुनायक जन सुखदायक सनमुख होइ कर जोरि रही॥
अति प्रेम अधीरा पुलक शरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही।
अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही॥1॥
भावार्थ:-श्री रामजी के पवित्र और शोक को नाश करने वाले चरणों का स्पर्श पाते ही सचमुच वह तपोमूर्ति अहल्या प्रकट हो गई। भक्तों को सुख देने वाले श्री रघुनाथजी को देखकर वह हाथ जोड़कर सामने खड़ी रह गई। अत्यन्त प्रेम के कारण वह अधीर हो गई। उसका शरीर पुलकित हो उठा, मुख से वचन कहने में नहीं आते थे। वह अत्यन्त बड़भागिनी अहल्या प्रभु के चरणों से लिपट गई और उसके दोनों नेत्रों से जल (प्रेम और आनंद के आँसुओं) की धारा बहने लगी॥1॥
* धीरजु मन कीन्हा प्रभु कहुँ चीन्हा रघुपति कृपाँ भगति पाई।
अति निर्मल बानी अस्तुति ठानी ग्यानगम्य जय रघुराई॥
मैं नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन रिपु जन सुखदाई।
राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई॥2॥
भावार्थ:-फिर उसने मन में धीरज धरकर प्रभु को पहचाना और श्री रघुनाथजी की कृपा से भक्ति प्राप्त की। तब अत्यन्त निर्मल वाणी से उसने (इस प्रकार) स्तुति प्रारंभ की- हे ज्ञान से जानने योग्य श्री रघुनाथजी! आपकी जय हो! मैं (सहज ही) अपवित्र स्त्री हूँ, और हे प्रभो! आप जगत को पवित्र करने वाले, भक्तों को सुख देने वाले और रावण के शत्रु हैं। हे कमलनयन! हे संसार (जन्म-मृत्यु) के भय से छुड़ाने वाले! मैं आपकी शरण आई हूँ, (मेरी) रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए॥2॥
* मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना।
देखेउँ भरि लोचन हरि भव मोचन इहइ लाभ संकर जाना॥
बिनती प्रभु मोरी मैं मति भोरी नाथ न मागउँ बर आना।
पद कमल परागा रस अनुरागा मम मन मधुप करै पाना॥3॥
भावार्थ:-मुनि ने जो मुझे शाप दिया, सो बहुत ही अच्छा किया। मैं उसे अत्यन्त अनुग्रह (करके) मानती हूँ कि जिसके कारण मैंने संसार से छुड़ाने वाले श्री हरि (आप) को नेत्र भरकर देखा। इसी (आपके दर्शन) को शंकरजी सबसे बड़ा लाभ समझते हैं। हे प्रभो! मैं बुद्धि की बड़ी भोली हूँ, मेरी एक विनती है। हे नाथ ! मैं और कोई वर नहीं माँगती, केवल यही चाहती हूँ कि मेरा मन रूपी भौंरा आपके चरण-कमल की रज के प्रेमरूपी रस का सदा पान करता रहे॥3॥
* जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भई सिव सीस धरी।
सोई पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी॥
एहि भाँति सिधारी गौतम नारी बार बार हरि चरन परी।
जो अति मन भावा सो बरु पावा गै पति लोक अनंद भरी॥4॥
भावार्थ:-जिन चरणों से परमपवित्र देवनदी गंगाजी प्रकट हुईं, जिन्हें शिवजी ने सिर पर धारण किया और जिन चरणकमलों को ब्रह्माजी पूजते हैं, कृपालु हरि (आप) ने उन्हीं को मेरे सिर पर रखा। इस प्रकार (स्तुति करती हुई) बार-बार भगवान के चरणों में गिरकर, जो मन को बहुत ही अच्छा लगा, उस वर को पाकर गौतम की स्त्री अहल्या आनंद में भरी हुई पतिलोक को चली गई॥4॥
दोहा :
* अस प्रभु दीनबंधु हरि कारन रहित दयाल।
तुलसिदास सठ तेहि भजु छाड़ि कपट जंजाल॥211॥
भावार्थ:-प्रभु श्री रामचन्द्रजी ऐसे दीनबंधु और बिना ही कारण दया करने वाले हैं। तुलसीदासजी कहते हैं, हे शठ (मन)! तू कपट-जंजाल छोड़कर उन्हीं का भजन कर॥211॥
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Ahalya Salvation | Shri Ramcharitmanas Balkand

* Ashram is a dik magh Kharag deer and animals
Asked, Muni saw Sila Prabhu. Sakha katha muni ka bisishi ॥6॥

Spiritualism: – An ashram appeared in the passage. There were no animals, birds or animals. Seeing a stone rock, the Lord asked, then the sage told the story in detail ॥6॥

Doha:
* Gautam Narai curse bus upal deh dhari deer.
Charan Kamal Raj Chaati Kriti Karhu Raghubir ॥210॥
Meaning: – Ahalya, the woman of Gautama Muni, wishes to dust your feet with great patience while wearing a stone body. Hey Raghuveer! Please bless it ॥210॥
Verse:
* The status of the holy soksavan revealed bhai tapapunj correct.
Seeing Raghunayak, the people were happy and happy.
Ati Prem Adhira Pulak Sharira Mawhi Nahi Bhai Sahan
Jugal Nayan Water Base Book

Spiritualism: As soon as we got the touch of the feet that destroyed the holy and mourning of Shri Ramji, that tapomurti Ahalya really appeared. Seeing Shri Raghunathji, who gave pleasure to the devotees, she stood with folded arms in front. She became impatient due to extreme love. His body got pulsed, he did not come in to say the word. She clung to the feet of the very elder Bhagabhini Ahalya Prabhu and a stream of water (tears of love and bliss) flowed from both her eyes.
* Dheeraju Mana Kinha Prabhu Kahin Chinha Raghupati Kripa Pya Bhagi
Very clean Bani Astuti than Giangamya Jai ​​Raghurai
I am God, my Holiness Lord, Lord, Lord Ravan, Ripu, Jan Sukhadai.
Rajeev Bilochan Bhav Fear Redemption Pahi Pahi Sarnahi I ॥2॥

Bhaarthar: – Then he endured in mind and recognized the Lord and got devotion by the grace of Shri Raghunathji. Then he started praising (thus) with utmost clean voice – O Lord Raghunath ji, who knows from knowledge. We salute you! I am (instinctively) an unholy woman, and O God! You are the one who purifies the world, gives happiness to devotees and is an enemy of Ravana. Hey Kamalnayan! O deliverer from the fear of the world (birth and death)! I have come to you, protect (mine), protect ॥2॥

* Muni curse, which dinha very well, kinaha, I considered the ultimate grace.
See Bhari Lochan Hari Bhavan Mochan Ihai Gain Sankar Jana
Pleading Prabhu Mori, I do not come to my mind.
Pad Kamal Paraga Ras Anuraga Mama Mana Madhup Kare Paana ॥3॥

Meaning: – The Muni who cursed me, did very well. I consider him very gracious (by doing) that because of which I saw Shri Hari (you), who rescued me from the world, with an eye. This (your philosophy) considers Shankarji the biggest benefit. Oh, Lord! I am very innocent of wisdom, I have a request. Hey Nath! I do not ask for any more bridesmaid, but only wish that my bunny like mind should always drink the sweet juices of your Charan Kamal Raja ॥3॥
* Jahin Pad Surasarita Param Punitha Pragat Bhai Siv Sis Dhari.
Soi pad pankaj jehi pujat aaj mam head dhareu kripal hari॥
Like this, Ghari Gautam Nari repeatedly Hari Charan Pari.
The person who is very heartless, Baru Paava Gai Pati Lok Anand Anand Bhari ॥4॥

Spiritualism: From whose feet Parampavitra Devanadi Gangaji appeared, whom Shiva held on his head, and the charanakamalas whom Brahmaji worships, Kripalu Hari (you) placed them on my head. Thus (after praising) repeatedly falling at the feet of God, which the mind felt very good, Gautam’s lady Ahalya, after finding that bridesmaid, went to her husband, filled with joy ॥4॥.
Doha:
* As Prabhu Deenbandhu Hari Karan without Dayal.
Tulsidas Sath Tehi Bhaju Chhadri Fraud Janjal ॥211॥
Spirituality: – Prabhu Shri Ramchandraji is such a deenbandhu and has mercy without any reason. Tulsidas ji says, O Shath (mind)! You leave hymns and worship them only.

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