कौरवों का कपट ~ महाभारत Shakuni Cheated Pandavas In Gambling Story Mahabharat |

Shakuni Cheated Pandavas In Gambling Story Mahabharat | कौरवों का कपट ~ महाभारत

कुछ काल पश्चात धर्मराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ का सफलतापूर्वक आयोजन किया। इस यज्ञ के आयोजन के पहले ही भीम द्वारा जरासंध का एवं यज्ञ के दौरान श्रीकृष्ण द्वारा शिशुपाल का वध हुआ। (कौरवों का कपट)
यज्ञ के समाप्त हो जाने के बाद भी कौरव दुर्योधन आदि अन्य भाइयों के साथ युधिष्ठिर के अतिथि बने रहे। एक दिन दुर्योधन ने मय दानव के द्वारा निर्मित राजसभा को देखने की इच्छा प्रदर्शित की, जिसे युधिष्ठिर ने सहर्ष स्वीकार किया। (कौरवों का कपट)
दुर्योधन उस सभा भवन के शिल्पकला को देखकर आश्चर्यचकित रह गया। मय दानव ने उस सभा भवन का निर्माण इस प्रकार से किया था कि वहाँ पर अनेक प्रकार के भ्रम उत्पन्न हो जाते थे, जैसे कि स्थल के स्थान पर जल, जल के स्थान पर स्थल, द्वार के स्थान पर दीवार तथा दीवार के स्थान पर द्वार दृष्टिगत होता था। (कौरवों का कपट)
दुर्योधन को भी उस भवन के अनेक स्थानों में भ्रम हुआ, जिस कारण उसे कई बार पाण्डवों आदि का उपहास का पात्र बनना पड़ा। यहाँ तक कि उसका उपहास करते हुए द्रौपदी ने यह भी कह दिया कि “अन्धों के पुत्र अन्धे ही होते हैं।” दुर्योधन अपने उपहास से पहले से ही जला-भुना था, किन्तु द्रौपदी के कहे गये वचन उसे शूल से भी अधिक चुभन दे रहे थे।
हस्तिनापुर लौटते समय शकुनि ने दुर्योधन से कहा- “भाँजे! इन्द्रप्रस्थ के सभा भवन में तुम्हारा जो अपमान हुआ है, उससे मुझे अत्यन्त दुःख हुआ है। तुम यदि अपने इस अपमान का प्रतिशोध लेना चाहते हो तो अपने पिता धृतराष्ट्र से अनुमति लेकर युधिष्ठिर को द्यूत-क्रीड़ा (जुआ खेलने) के लिये आमन्त्रित कर लो।
युधिष्ठिर द्यूत-क्रीड़ा का प्रेमी है, अत: वह तुम्हारे निमन्त्रण पर अवश्य ही आयेगा और तुम तो जानते ही हो कि पासे के खेल में मुझ पर विजय पाने वाला त्रिलोक में भी कोई नहीं है। पासे के दाँव में हम पाण्डवों का सब कुछ जीतकर उन्हें पुनः दरिद्र बना देंगे।”
हस्तिनापुर पहुँच कर दुर्योधन सीधे अपने पिता धृतराष्ट्र के पास गया और उन्हें अपने अपमान के विषय में विस्तारपूर्वक बताकर अपनी तथा मामा शकुनि की योजना के विषय में भी बताया। उसने युधिष्ठिर को द्यूत-क्रीड़ा के लिये आमन्त्रित करने की अनुमति भी माँगी। थोड़ा-बहुत आनाकनी करने के पश्चात धृतराष्ट्र ने दुर्योधन को अपनी अनुमति दे दी।
युधिष्ठिर को उनके भाइयों तथा द्रौपदी के साथ हस्तिनापुर बुलवा लिया गया। अवसर पाकर दुर्योधन ने युधिष्ठिर के साथ द्यूत-क्रीड़ा का प्रस्ताव रखा, जिसे युधिष्ठिर ने स्वीकार कर लिया। पासे का खेल आरम्भ हुआ। दुर्योधन की ओर से मामा शकुनि पासे फेंकने लगे। युधिष्ठिर जो कुछ भी दाँव पर लगाते थे, उसे हार जाते थे। अपना समस्त राज्य तक हार जाने के बाद युधिष्ठिर ने अपने भाइयों को भी दाँव पर लगा दिया और शकुनि धूर्तता करके इस दाँव को भी जीत गया।
यह देखकर भीष्म, द्रोणाचार्य, विदुर आदि ने इस जुए का बन्द कराने का प्रयास किया, किन्तु असफल रहे। अब युधिष्ठिर ने स्वयं अपने आप को भी दाँव पर लगा दिया और शकुनि की धूर्तता से फिर हार गये।
राज-पाट तथा भाइयों सहित स्वयं को भी हार जाने पर युधिष्ठिर कान्तिहीन होकर उठने लगे तो शकुनि ने कहा- “युधिष्ठिर! अभी भी तुम अपना सब कुछ वापस जीत सकते हो। अभी द्रौपदी तुम्हारे पास दाँव में लगाने के लिये शेष है।
यदि तुम द्रौपदी को दाँव में लगाकर जीत गये तो मैं तुम्हारा हारा हुआ सब कुछ तुम्हें लौटा दूँगा।” सभी तरह से निराश युधिष्ठिर ने अब द्रौपदी को भी दाँव पर लगा दिया और हमेशा की तरह हार गये। अपनी इस विजय को देखकर दुर्योधन उन्मत्त हो उठा और विदुर से बोला- “द्रौपदी अब हमारी दासी है, आप उसे तत्काल यहाँ ले आइये।”

Durga Saptashati दूसरा अध्याय – Chapter Second

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Shakuni Cheated Pandavas In Gambling Story Mahabharat | Kaurava’s treachery ~ Mahabharata

 

At the time of the burning of the Khandava forest, Arjuna had given shelter to the Maya demon. Grateful by this, the Maya demon said to Arjuna – “O Kuntinandan! You have protected my life. So you command, what should I serve you? ”

Arjuna replied – “I do not favor any vengeance, but if you have a sense of service in you, then you serve Shri Krishna.”

On asking for any kind of service by Mayasur, Shri Krishna said to him- “O Dityashreshtha! You should build such an assembly for the meeting of Yudhishthira, as not yet built on this earth. ” By following the orders of Sri Krishna, Mayasura built a unique building. Along with this, he presented the Pandavas with Devdutt’s conch, hardened gems with a thunderbolt and also a beautiful vessel.

Read the complete story of Mahabharata:

Complete story of Mahabharata! Complete Mahabharata Story In Hindi

After some time, Dharmaraja Yudhishthira successfully conducted the Rajasuya Yajna. Jarasandha was killed by Bhima before Shishupala and Shishupala was killed by Shri Krishna during the Yajna.

Even after the yagna was over, the Kaurava Duryodhana, along with other brothers, remained the guests of Yudhishthira. One day Duryodhana expressed a desire to see the Rajya Sabha built by the Maya demon, which Yudhishthira gladly accepted.

Duryodhana was surprised to see the sculpture of that assembly building. Maya demon had constructed that assembly building in such a way that many kinds of confusion would arise there, such as water in place of place, place in place of water, wall in place of door and door in place of wall. Was in sight.

Duryodhana also got confused in many places of that building, due to which he had to be ridiculed by Pandavas etc. many times. Draupadi even ridiculed him, saying that “the sons of the blind are blind.” Duryodhana was already burnt by his ridicule, but the utterances of Draupadi were giving him more prick than shul.

While returning to Hastinapur, Shakuni said to Duryodhana – “Nephew! I am deeply saddened by the insult you have suffered in the house of Indraprastha. If you want to take vengeance for this insult, then invite Yudhishthira to play (gambling) with permission from your father Dhritarashtra.

Yudhishthira is a lover of gaming, so he will definitely come to your invitation and you know that there is no one in Trilok who can conquer me in the game of dice. We will win the Pandavas everything in the stakes of the dice and make them poor again. ”

Upon reaching Hastinapur, Duryodhana went directly to his father Dhritarashtra and told him in detail about his humiliation and also about his and maternal uncle Shakuni’s plan. He also asked for permission to invite Yudhishthira for gaming. After a little hesitation Dhritarashtra gave his permission to Duryodhana.

Yudhishthira was summoned to Hastinapur along with his brothers and Draupadi. Taking the opportunity, Duryodhana proposed a game-play with Yudhishthira, which Yudhishthira accepted. The dice game started. Mama Shakuni started throwing dice on behalf of Duryodhana. Yudhishthira lost whatever he had at stake. After losing all his kingdom, Yudhishthira also staked his brothers and Shakuni slyly won this bet as well.

Seeing this, Bhishma, Dronacharya, Vidur etc. tried to stop this gambling, but failed. Now Yudhishthira staked himself on his own and was again defeated by Shakuni’s slyness.

When Yudhishthira started to get up without losing himself, along with the royal party and his brothers, Shakuni said – “Yudhishthira! You can still win back everything you own. Draupadi is still with you left to stake.

If you win by putting Draupadi at stake, then I will return everything you lost. ” Disappointed in all respects, Yudhishthira also put Draupadi at stake and lost as usual. Seeing this victory, Duryodhana became frantic and said to Vidur – “Draupadi is now our maid, you bring her here immediately.”

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