द्रोण पर्व ~ महाभारत | Dron Parv ~ Mahabharat Stories In Hindi

द्रोण पर्व ~ महाभारत | Dron Parv ~ Mahabharat Stories In Hindi

द्रोण पर्व में भीष्म के धराशायी होने पर कर्ण का आगमन और युद्ध करना, सेनापति पद पर द्रोणाचार्य का अभिषेक, द्रोणाचार्य द्वारा भयंकर युद्ध, अर्जुन का संशप्तकों से युद्ध, द्रोणाचार्य द्वारा चक्रव्यूह का निर्माण, अभिमन्यु द्वारा पराक्रम और व्यूह में फँसे हुए अकेले नि:शस्त्र अभिमन्यु का कौरव महारथियों द्वारा वध, षोडशराजकीयोपाख्यान, अभिमन्यु के वध से पाण्डव-पक्ष में शोक, संशप्तकों के साथ युद्ध करके लौटे हुए अर्जुन द्वारा जयद्रथवध की प्रतिज्ञा, कृष्ण द्वारा सहयोग का आश्वासन, अर्जुन का द्रोणाचार्य तथा कौरव-सेना से भयानक युद्ध, अर्जुन द्वारा जयद्रथ का वध, दोनों पक्षों के वीर योद्धाओं के बीच भीषण रण, कर्ण द्वारा घटोत्कच का वध, धृष्टद्युम्न द्वारा द्रोणाचार्य का वध |

द्रोणाचार्य के सेनापतित्व में अगले पाँच दिन के युद्ध का निर्णय

पितामह भीष्म के आहत होने पर आचार्य द्रोण को सेनापति बनाया गया | सेनापति बनने के बाद द्रोण ने प्रतिज्ञा की कि मैं भीष्म की तरह ही कौरव-सेना की रक्षा तथा पांडव-सेना का संहार करूँगा | मुझे केवल धृष्टद्युम्न की चिंता है, क्योंकि उसकी उत्पत्ति ही मेरी मृत्यु के लिए हुई है | दुर्योधन ने द्रोणाचार्य से प्रार्थना की कि यदि आप केवल युधिष्ठिर को पकड़ लें | तो युद्ध भी रुक जाएगा और जनसंहार भी न होगा|

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Category Badisoch
Written by Dr.PS,yadav
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युधिष्ठिर को पकड़ने का षड्यंत्र

द्रोणाचार्य ने वचन दिया कि मैं पूरी शक्ति से युधिष्ठिर को बंदी बनाने की कोशिश करूँगा पर इसके लिए अर्जुन को युधिष्ठिर के पास से हटाना होगा | इस पर त्रिगर्त देश के राजा सुशर्मा तथा संसप्तकों ने विश्वास दिलाया कि युद्ध के लिए अर्जुन को चुनौती देंगे और लड़ते-लड़ते अर्जुन को दूर ले जाएँगे | उधर पांडवों को कृष्ण ने कहा कि कल कर्ण भी युद्ध में भाग लेगा | अतः अब युद्ध छल-प्रधान होगा, इसलिए युधिष्ठिर की रक्षा का पूरा प्रबंध होना चाहिए | इस प्रकार ग्याहरवें दिन प्रातः काल दोनों सेनाएँ आमने-सामने आ डटीं |

ग्याहरवें दिन का युद्ध

आज के युद्ध में आचार्य द्रोणाचार्य सेनापति थे | इन्हीं के साथ दुर्योधन, दुशासन, जयद्रथ, कृतवर्मा, कृपाचार्य, अश्वत्थामा और कर्ण भी थे | पांडव-सेना में सबसे आगे अर्जुन थे | अर्जुन को देखकर त्रिगर्तराज सुशर्मा आगे बढ़े | अर्जुन ने सात्यकि को बुलाकर कहा कि आचार्य द्रोण की पूर्व रचना युधिष्ठिर को पकड़ने के लिए की गई है | तुम सावधान रहना | हमारी सेना का सेनापतित्व धृष्टद्युम्न कर रहे हैं, इससे आचार्य द्रोण डरे हुए हैं |

महाभारत की सम्पूर्ण कथा पढ़ें :

महाभारत की सम्पूर्ण कथा! Complete Mahabharata Story In Hindi

सुशर्मा और संसप्तकों ने तेज़ी से आगे बढ़कर अर्जुन को चुनौती दी | अर्जुन ने आचार्य द्रोण को नमस्कार करने के लिए दो तीर छोड़े | आचार्य ने अपने शिष्य को आशीर्वाद दिया | सुशर्मा अर्जुन को लड़ते-लड़ते काफ़ी दूर ले गए | शल्य ने भीम को रोका, कर्ण सात्यकि से जूझ पड़े तथा शकुनि ने सहदेव को ललकारा | युधिष्ठिर के साथ केवल नकुल रह गए | तभी यह अफवाह उड़ गई कि युधिष्ठिर पकड़े गए | धर्मराज के पकड़े जाने की खबर सुनकर अर्जुन तेज़ी से युधिष्ठिर के पास पहुँचे, अर्जुन ने देखा युधिष्ठिर सुरक्षित हैं | अर्जुन के आते ही आचार्य द्रोण ने युधिष्ठिर को पकड़ने की आशा छोड़ दी |

बारहवें दिन का युद्ध

आज फिर त्रिगर्तों ने अर्जुन को ललकारा और लड़ते-लड़ते उन्हें दूर ले गए | जब अर्जुन लड़ते-लड़ते उन्हें दूर ले गए | जब अर्जुन युधिष्ठिर की ओर लौटने लगे तो रास्ते में राजा भगदत्त ने हाथी पर सवार होकर अर्जुन का रास्ता रोक लिया और अपशब्द भी कहे | भगदत्त को मार डाला | इधर द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर को पकड़ने की बहुत कोशिश की | सत्यजित युधिष्ठिर के रक्षक थे | सत्यजित ने द्रोणाचार्य के घोड़े मार दिए तथा रथ के पहिए काट दिए | द्रोणाचार्य ने अर्धचंद्र बाण से सत्यजित का सिर काट दिया | सत्यजित के मरने पर युधिष्ठिर रण-क्षेत्र से लौट आए रात को दुर्योधन ने द्रोण से कहा कि आपकी प्रतिज्ञा पूरी नहीं हुई | लगता है पांडवों के प्रति आपका स्नेह है, नहीं तो युधिष्ठिर को पकड़ लेना आपके लिए कोई बड़ी बात नहीं |

चक्रव्यूह की रचना

दुर्योधन की बात से द्रोणाचार्य क्षोभ से भर उठे | उन्होंने कहा कि हमने कोई कसर नहीं उठा रखी, पर अर्जुन अजेय है | कल हम चक्रव्यूह की रचना करेंगे | यदि अर्जुन को दूर ले जाया जाए तो युधिष्ठिर को पकड़ा जा सकता है, क्योंकि चक्रव्यूह का भेद केवल अर्जुन को ही पता है |

दुर्गा सप्तशती पाँचवाँ अध्याय – Chapter five.

तेरहवें दिन का युद्ध, अभिमन्यु का वध

आज फिर त्रिगर्तों और संसप्तकों ने अर्जुन को ललकारा | अर्जुन उनका पीछा करते हुए बहुत दूर चले गए | उसी समय कौरवों के दूत ने युधिष्ठिर को चक्रव्यूह के युद्ध का संदेश पत्र दिया | युधिष्ठिर चिंतित हो गए |इसी समय अभिमन्यु ने आकर युधिष्ठिर को प्रणाम किया तथा बताया कि जब मैं माँ के गर्भ में था, पिताजी ने चक्रव्यूह के युद्ध का वर्णन किया था | मैं गर्भ से ही सुन रहा था | छः द्वारों तक के युद्ध का वर्णन मैंने सुना | सातवें द्वार के युद्ध सुनते-सुनते माँ को नींद आ गई | मैं इस युद्ध के लिए तैयार हूँ |युधिष्ठिर ने चक्रव्यूह भेदन का निमंत्रण स्वीकार कर लिया | माता सुभद्रा ने स्वयं अपने पुत्र को अस्त्र-शस्त्रों से सजाया पर अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा ने उन्हें रण-क्षेत्र में जाने को मना किया | अभिमन्यु ने अपनी पत्नी उत्तरा को समझाया और चक्रव्यूह के द्वार गए | चक्रव्यूह के पहले द्वार पर जयद्रथ थे | अभिमन्यु ने जयद्रथ पर बाण चलाया तथा व्यूह को भेदकर भीतर पहुँच गया | भीम तथा अन्य पांडव वीर भीतर न जा सके | अभिमन्यु ने दूसरे द्वार पर द्रोणाचार्य को, तीसरे पर कर्ण को तथा चौथे द्वार पर अश्वत्थामा को हटाकर पाँचवें द्वार पर बढ़ गया | कर्ण की सलाह पर सातों रथियों ने अभिमन्यु को घेर लिया | अभिमन्यु ने घोर संग्राम किया, पर चारों ओर से प्रहार होने पर वह घायल हो गया, उसका सारथी मारा गया, घोड़े भी घायल होकर गिर पड़े | वह तलवार लेकर आगे बढ़ा, पर उसकी तलवार कट गई | अब वह रथ का चक्र लेकर टूट पड़ा | तभी दुर्योधन- के पुत्र लक्ष्मण ने अभिमन्यु के सिर पर गदा फेंककर मारी | अभिमन्यु घायल हो गया, पर उसने वही गदा लक्ष्मण की ओर फेंकी | अभिमन्यु तथा लक्ष्मण दोनों के प्राण एक साथ निकल गए | कौरवों को अभिमन्यु के वध का हर्ष तथा लक्ष्मण की मृत्यु का शोक हुआ | अभिमन्यु की मृत्यु से पांडव शोक में डूब गए | यह समाचार पाकर सुभद्रा और उत्तरा विलाप करती हुई चक्रव्यूह के सातवें द्वार पर पहुँच गईं | सुभद्रा अपने पुत्र का सिर गोद में लेकर बिलख-बिलखकर रो पड़ी | उत्तरा ने सती होने की इच्छा प्रकट की पर उसके गर्भवती होने के कारण सुभद्रा ने मना कर दिया |

उस दिन के युद्ध त्रिगर्तों और संसप्तकों को पूरी तरह नष्ट करके अर्जुन लौटे तो चक्रव्यूह के युद्ध में अभिमन्यु के मारे जाने का समाचार मिला | वे अत्यंत व्याकुल हो उठे | श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सांत्वना दी तथा कहा कि अभिमन्यु की मृत्यु का कारण जयद्रथ है, क्योंकि उसे शंकर से यह वरदान मिला हुआ है कि अर्जुन को छोड़कर बाकी चारों पांडव तुम्हें नहीं जीत सकते | इसीलिए उसे पहले द्वार पर रखा गया था कि भीम आदि चक्रव्यूह में प्रवेश न कर सकें | तब अर्जुन ने प्रतिज्ञा की कि कल सूर्यास्त से पहले यदि जयद्रथ का वध मैं नहीं कर सका तो अपना शरीर भी अग्नि को समर्पित कर दूँगा | अर्जुन की प्रतिज्ञा सुनकर जयद्रथ काँपने लगा | द्रोणाचार्य ने आश्वासन दिया कि वे ऐसा व्यूह बनाएँगे कि अर्जुन जयद्रथ को न देख सकेगा | वे स्वयं अर्जुन से लड़ते रहेंगे तथा व्यूह के द्वार पर स्वयं रहेंगे |

चौदहवें दिन का युद्ध, जयद्रथ का वध

इस दिन द्रोणाचार्य ने शकट व्यूह बनाया तथा जयद्रथ को बीच में रखा | अर्जुन आज बड़े आवेश में थे | उन्होंने द्रोणाचार्य से घनघोर युद्ध किया, पर जीत की आशा न देखकर उनकी बगल से व्यूह के भीतर प्रवेश कर गए | युधिष्ठिर ने अर्जुन की रक्षा के लिए सात्यकि तथा भीम को भेजा | इसी समय भूरिश्रवा ने सात्यकि पर हमला किया | वह सात्यकि को मारना चाहता था कि अर्जुन के बाणों से उसके हाथ कट गए | वह गिर पड़ा तथा सात्यकि ने उसका सिर काट दिया | |देखते-ही-देखते सूर्य डूब गया | अर्जुन ने अपना गांडीव उतार लिया | दुर्योधन बहुत प्रसन्न था | अर्जुन के भस्म होने के लिए चिता बनाई गई | दुर्योधन ने अर्जुन के चिता में जलने का दृश्य देखने के लिए जयद्रथ को भी बुला लिया | अर्जुन बिना शस्त्रों के चिता पर चढ़ने लगे तो कृष्ण ने कहा कि क्षत्रिय अपने अस्त्र लेकर चिता पर चढ़ते हैं | जैसे ही अर्जुन ने अक्षण-तूणीर बाँधकर अपना धनुष लिया, तभी कृष्ण ने कहा-शत्रु सामने है, वह बादलों में छिपा है | कृष्ण के कहते ही अर्जुन का बाण छूटा तथा जयद्रथ का सिर आकाश में ले गया | कौरवों में गहरा शोक छा गया तथा पांडवों में हर्ष | अब पांडवों में अगले दिन के युद्ध का विचार होने लगा | कृष्ण ने कहा कि कल हो सकता है कर्ण अर्जुन पर इंद्र से मिली अमोघ शक्ति का प्रयोग करे |

घटोत्कच की मृत्यु

कृष्ण ने प्रस्ताव रखा कि भीम का पुत्र घटोत्कच राक्षसी स्वभाव का है | वह अँधेरे में भी भयंकर युद्ध कर सकता है | यदि वह कल रात के समय कौरवों पर आक्रमण करे तो कर्ण को उस पर अमोघ शक्ति चलानी होगी | घटोत्कच ने रात के अँधेरे में ही कौरवों पर हमला कर दिया | धूल से आकाश ढँक गया | वर्षा होने लगी, कंकड़-पत्थर आकाश से गिरने लगे | दुर्योधन घबराकर कर्ण के पास गया | कर्ण पहले तो टालते रहे, पर दुर्योधन को अत्यंत व्याकुल देखकर अमोघ शक्ति लेकर निकला तथा उसने घटोत्कच पर अमोघ शक्ति का प्रयोग कर दिया | घटोत्कच मारा गया, पर कर्ण को यह चिंता हुई कि अब उसके पास अर्जुन के वध के लिए कोई शक्ति नहीं रही |

पंद्रहवें दिन का युद्ध द्रोणाचार्य का निधन

रात के आक्रमण से कौरव बहुत क्रोधित थे | आज द्रोणाचार्य भी बहुत क्रोधित थे | उन्होंने हज़ारों पांडव-सैनिकों को मार डाला तथा युधिष्ठिर की रक्षा में खड़े द्रुपद तथा विराट दोनों को मार दिया | द्रोणाचार्य के इस रूप देखकर कृष्ण भी चिंतित हो उठे | उन्होंने सोचा कि पांडवों की विजय के लिए द्रोणाचार्य की मृत्यु आवश्यक है | उन्होंने अर्जुन से कहा कि आचार्य को यह समाचार देना कि अश्वत्थामा का निधन हो गया है | अर्जुन ने ऐसा झूठ बोलने से इंकार कर दिया | श्रीकृष्ण ने कहा कि अवंतिराज के हाथी का नाम अश्वत्थामा है, जिसे भीम ने अभी मारा डाला है | कृष्ण ने युधिष्ठिर के पास रथ ले जाकर कहा कि यदि द्रोणाचार्य अश्वत्थामा के मरने के बारे में पूछें तो आप हाँ कह दीजिएगा| अभी भीम ने अश्वत्थामा हाथी को मारा है | तभी चारों ओर से शोर मच गया कि अश्वत्थामा मारा गया | द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर से पूछा जिन्होंने कहा-हाँ | पर नर नहीं, कुंजर |

नर कहते ही कृष्ण ने ज़ोर से शंख बजा दिया, द्रोणाचार्य आगे के शब्द न सुन सके | द्रोण ने अस्त्र-शस्त्र फेंक दिए तथा रथ पर ही ध्यान-मग्न होकर बैठ गए | तभी द्रुपद-पुत्र धृष्टद्युम्न ने खड्ग से द्रोणाचार्य का सिर काट दिया | द्रोणाचार्य के निधन से कौरवों में हाहाकार मच गया तथा अश्वत्थामा ने क्रोध में आकर भीषण युद्ध किया, जिसके सामने अर्जुन के अतिरिक्त और कोई न टिक सका | संध्या हो गई थी, अतः लड़ाई बंद हो गई |

द्रोण पर्व के अन्तर्गत 8 (उप) पर्व और 202 अध्याय हैं | इन आठों (उप) पर्वों के नाम हैं-

  • द्रोणाभिषेक पर्व,
  • संशप्तकवध पर्व,
  • अभिमन्युवध पर्व,
  • प्रतिज्ञा पर्व,
  • जयद्रथवध पर्व,
  • घटोत्कचवध पर्व,
  • द्रोणवध पर्व,
  • नारायणास्त्रमोक्ष पर्व |

दुर्गा सप्तशती पाँचवाँ अध्याय – Chapter five.

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Drona festival ~ Mahabharata | Dron Parv ~ Mahabharat Stories In Hindi

The arrival and warfare of Karna when Bhishma collapses in Drona festival, Dronacharya’s consecration to the rank of commander, Dronacharya’s fierce war, Arjuna’s war with the revolvers, Dronacharya building Chakravyuh, Abhimanyu’s might and fear alone Arms Abhimanyu’s slaughter by the Kaurava nobles, mourning in the Pandavas from the Shodashrajakya narrative, Abhimanyu’s slaughter, Jayadrathavadha’s pledge by Arjuna returning from battle with the victors, Krishna’s assurance of cooperation, Arjuna’s terrible war with Dronacharya and the Kaurava army The killing of Jayadratha by Arjuna, the fierce battle between the valiant warriors on both sides, the slaughter of Ghatotkacha by Karna, the slaughter of Dronacharya by Dhritadhyumna.

The decision for the next five days of war under the command of Dronacharya

When Pitamah Bhishma was hurt, Acharya Drona was made the general. After becoming the general, Drona vowed that I would protect the Kaurava-army and kill the Pandava-army like Bhishma. I only worry about Dhrishtadyumna, because she was born to my death. Duryodhana prayed to Dronacharya that if you only hold Yudhishthira. So the war will stop and massacre will not happen.

Conspiracy to capture Yudhishthira

Dronacharya promised that I will try to capture Yudhishthira with full power, but for this Arjuna has to be removed from Yudhishthira. At this, King Susarma and the sorcerers of the country of Trigarta assured them that they would challenge Arjuna for war and take Arjuna away while fighting. On the other hand, Krishna told the Pandavas that tomorrow Karna will also participate in the war. Therefore, now war will be deceitful, so there should be complete management of Yudhishthira’s defense. In this way, both the armies came face to face in the morning on the eleventh day.

Battle on the eleventh day

In today’s war, Acharya Dronacharya was the commander. Along with them were Duryodhana, Dushasana, Jayadratha, Kritavarma, Kripacharya, Ashwatthama, and Karna. Arjuna was at the forefront of the Pandava-army. Seeing Arjuna, Trigartaraja Susarma proceeded. Arjuna called Satyaki and said that Acharya Drona’s earlier creation was done to capture Yudhishthira. You be careful Our military commanders are doing dhristadumun, Acharya Drona is scared of this.

Read the complete story of Mahabharata:

The complete story of Mahabharata! Complete Mahabharata Story In Hindi

Susharma and Sangeetha challenge Arjun by moving quickly. Arjuna released two arrows to greet Acharya Drona. Acharya blessed his disciple. Sharma took Arjuna far and wide while fighting. Shalya stops Bhima, Karna struggled with Satyaki and Shakuni challenged Sahadeva. Only Nakula remained with Yudhishthira. Then the rumor flew that Yudhishthira was caught. Hearing the news of Dharmaraja being caught, Arjun rushed to Yudhishthira, Arjun saw that Yudhishthira was safe. As soon as Arjuna arrived, Acharya Drona gave up hope to capture Yudhishthira.

Twelfth day war

Today again the triangles challenged Arjuna and took him away while fighting. When Arjuna fought, he took them away. When Arjuna started returning to Yudhishthira, on the way, King Bhagadatta rode on an elephant and stopped Arjuna’s way and even uttered abuses. Killed Bhagadatta. Here Dronacharya tried hard to capture Yudhishthira. Satyajit was the protector of Yudhishthira. Satyajit killed Dronacharya’s horses and cut off the chariot wheels. Dronacharya beheaded Satyajit with a half-moon arrow. On the death of Satyajit, Yudhishthira returned from the battlefield. At night, Duryodhana told Drona that your pledge was not fulfilled. You seem to have affection for the Pandavas, otherwise, it is not a big deal for you to catch Yudhishthira.

Design of cycle

Dronacharya was filled with anger at Duryodhana’s talk. He said that we did not take any chances, but Arjun is invincible. Tomorrow we will create the Chakravyuh. If Arjuna is taken away, Yudhishthira can be captured, because only Arjuna knows the secret of Chakravyuh.

Thirteenth-day war, the slaughter of Abhimanyu

Today again the triangles and the damsel challenged Arjuna. Arjuna went too far chasing them. At the same time, the messenger of the Kauravas gave Yudhishthira the message of the war of Chakravyuh. Yudhishthira became worried. At the same time, Abhimanyu came and bowed to Yudhishthira and told me that while I was in my mother’s womb, my father had described the war of Chakravyuh. I was listening to the womb. I heard the narration of the war up to six gates. Hearing the war of the seventh gate, the mother fell asleep. I am ready for this war. Yudhishthira accepted Chakravyuh’s invitation to penetrate. Mata Subhadra herself decorated her son with weapons, but Abhimanyu’s wife Uttara forbade him to enter the battlefield. Abhimanyu explained to his wife Uttara and went to the door of Chakravyuh. Jayadratha was at the first gate of the Chakravyuh. Abhimanyu shot an arrow at Jayadratha and penetrated the array and reached inside. Bhima and other Pandava heroes could not go inside. Abhimanyu removed Dronacharya at the second gate, Karna at the third, and Ashwatthama at the fourth gate and rose to the fifth gate. On the advice of Karna, seven chariots surrounded Abhimanyu. Abhimanyu staged a fierce battle, but he was injured when he was hit from all sides, his charioteer was killed, the horses also fell injured.

He moved forward with a sword, but his sword was cut. Now he broke with the chariot cycle. Then Duryodhana- son of Lakshman threw the mace on Abhimanyu’s head and killed it. Abhimanyu was injured, but he threw the same mace towards Laxman. The lives of both Abhimanyu and Laxman left together. The Kauravas mourned the killing of Abhimanyu and mourned the death of Laxman. The Pandavas drowned in mourning after Abhimanyu’s death. Subhadra and Uttara mourning this news reached the seventh gate of Chakravyuh. Subhadra wept bitterly with her son’s head in her lap. Uttara wishes to get Sati but Subhadra refuses because she is pregnant.

When Arjuna returned by completely destroying the war triangles and the saints of that day, there was news of Abhimanyu being killed in the battle of Chakravyuh. He became very distraught. Shri Krishna consoled Arjuna and said that the cause of Abhimanyu’s death is Jayadratha because he has got a boon from Shankar that except Arjuna, the other four Pandavas cannot win you. That is why he was placed at the first gate so that Bhima Adi could not enter the Chakravyuh. Then Arjuna vowed that if I could not kill Jayadratha before sunset tomorrow, I would also surrender my body to Agni. Hearing Arjuna’s promise, Jayadratha trembled. Dronacharya assured that he would create such an array that Arjuna would not be able to see Jayadratha. He himself will continue to fight Arjuna and will himself be at the door of the array.

Battle of the fourteenth day, slaying of Jayadratha

On this day, Dronacharya created a shakat array and placed Jayadratha in the middle. Arjun was in a tizzy today. He fought fiercely with Dronacharya, but not seeing the hope of victory, entered the arsenal from his side. Yudhishthira sent Satyaki and Bhima to protect Arjuna. At the same time, Bhurishrava attacked Satyaki. He wanted to kill Satyaki when Arjun’s arrows cut his hands. He fell and Satyaki cut off his head. The sun sank upon sight. Arjun took off his Gandiva. Duryodhana was very happy. The pyre was made to consume Arjuna. Duryodhana also summoned Jayadratha to watch the scene of Arjuna burning in the pyre. When Arjuna started climbing the pyre without arms, Krishna said that the Kshatriyas climb on the pyre with their weapons. As soon as Arjuna took his bow after tying the Akash-tunir, Krishna said – The enemy is in front, he is hiding in the clouds. As soon as Krishna said, Arjun’s arrow dropped and took Jayadratha’s head into the sky. There was deep mourning among the Kauravas and happiness in the Pandavas. Now the idea of ​​the next day’s war started coming in the Pandavas. Krishna said that tomorrow, Karna may use the power of Indraj from Arjuna.

Death of Ghatotkacha

Krishna proposed that Bhima’s son Ghatotkacha is demonic in nature. He can wage a fierce war even in the dark. If he attacks the Kauravas last night, Karna will have to exert power on him. Ghatotkacha attacked the Kauravas in the dark of night. The dust-covered the sky. It started raining, pebbles and stones started falling from the sky. Duryodhana panicked and went to Karna. Karna postponed at first, but seeing Duryodhana extremely distraught, he came out with immense power and he used immense power on Ghatotkacha. Ghatotkacha was killed, but Karna was worried that he no longer had any power to kill Arjuna.

Fifteenth-day war Dronacharya dies

The Kauravas were very angry with the night’s invasion. Today Dronacharya was also very angry. He killed thousands of Pandava-soldiers and killed both Drupada and Virat standing in defense of Yudhishthira. Krishna also got worried after seeing this form of Dronacharya. He thought that Dronacharya’s death was necessary for the victory of the Pandavas. He told Arjuna to inform Acharya that Ashwatthama had passed away. Arjuna refuses to tell such a lie. Shri Krishna said that the elephant name of Avantiraja is Ashwatthama, which Bhima has just killed. Krishna took the chariot to Yudhishthira and said that if Dronacharya asks about Ashwatthama’s death, then you will say yes. Bhima has killed the Ashwatthama elephant. Then there was noise from all around that Ashwatthama was killed. Dronacharya asked Yudhishthira who said yes. But not a male, but a virgin.

As soon as the male said Krishna, he rang the conch aloud, Dronacharya could not hear the words ahead. Drona threw away weapons and sat on the chariot. Then Drupada-son Dhrishtadyumna cut Dronacharya’s head from the Khadga. The death of Dronacharya caused a ruckus in the Kauravas and Ashwatthama, in a fit of rage, fought a fierce battle, in front of which no one except Arjuna could stand. It was evening, so the fight stopped.

Drona festival has 8 (sub) festivals and 202 chapters. The names of these eight (sub) festivals are-

Dronabhishek festival,
Modified festival,
Abhimanyudhva festival,
Pledge festival
Jayadrathavadh festival,
Festival festival
Dronavadh festival,
Narayanastramoksha festival.

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