पहला अध्याय – Chapter First – Durga Saptashati

ऊँ नमश्चण्डिकायै नम:

अथ श्री दुर्गा सप्तशती भाषा

Durga Saptashati

पहला अध्याय – Chapter First – Durga Saptashati

(महर्षि मेधा ऋषि का राजा सुरथ और समाधि को देवी की महिमा बताना)

महर्षि मार्कण्डेय बोले – सूर्य के पुत्र सावर्णि की उत्पत्ति की कथा विस्तारपूर्वक कहता हूँ सुनो, सावर्णि महामाया की कृपा से जिस प्रकार मन्वन्तर के स्वामी हुए, उसका भी हाल सुनो। पहले स्वारोचिष नामक राज्य था। वहाँ  के सुरथ नाम के चैत्रवंशी    राजा थे | वह प्रजा को अपने पुत्र के समान मानते थे तो भी कोलाविध्वंशी राजा उनके शत्रु बन गये। दुष्टों को दण्ड देने वाले राजा सुरथ की उनके साथ लड़ाई हुई, कोलाविध्वंसियों के संख्या में कम होने पर भी राजा सुरथ युद्ध में उनसे हार गए। तब वह अपने नगर में आ गये, केवल अपने देश का राज्य ही उनके पास रह गया और वह उसी देश के राजा होकर राज्य करने लगे किन्तु उनके शत्रुओं ने उन पर वहाँ आक्रमण किया।

राजा को बलहीन देखकर उसके दुष्ट मंत्रियों ने राजा की सेना और खजाना अपने अधिकार में कर लिया। राजा सुरथ अपने राज्याधिकार को हार कर शिकार खेलने के बहाने घोड़े पर सवार होकर वहाँ से एक घने  वन की ओर चले गये। उस वन में उन्होंने महर्षि मेधा का आश्रम देखा, वहाँ मेधा महर्षि अपने शिष्यों तथा मुनियों से सुशोभित बैठे हुए थे और वहाँ कितने ही हिंसक जीव परम शान्ति भाव से रहते थे। राजा सुरथ ने महर्षि मेधा को प्रणाम किया और महर्षि ने भी उनका उचित सत्कार किया। राजा सुरथ महर्षि के आश्रम में कुछ समय तक ठहरे।

अपने नगर की ममता के आकर्षण से राजा अपने मन में सोचने लगे – पूर्वकाल में पूर्वजों ने जिस नगर का पालन किया था वह आज मेरे हाथ से निकल गया। मेरे दुष्ट एवं दुरात्मा मंत्री मेरे नगर की अब धर्म से रक्षा कर रहे होंगे या नहीं? मेरा प्रधान हाथी जो कि सदा मद की वर्षा करने वाला और शूरवीर था, मेरे वैरियों के वश में होकर न जाने क्या दुख भोग रहा होगा? मेरे आज्ञाकारी नौकर जो मेरी कृपा से धन और भोजन पाने से सदैव सुखी रहते थे और मेरे पीछे-पीछे चलते थे, वह अब निश्चय ही दुष्ट राजाओं का अनुसरण करते होगें तथा मेरे दुष्ट एवं दुरात्मा मंत्रियों द्वारा व्यर्थ ही धन को व्यय करने से संचित किया हुआ मेरा खजाना एक दिन अवश्य खाली हो जाएगा। इस प्रकार की बहुत सी बातें सोचता हुआ राजा निरन्तर दुखी रहने लगा।

एक दिन राजा सुरथ ने महर्षि मेधा के आश्रम के निकट एक वैश्य को देखा, राजा ने उससे पूछा-भाई, तुम कौन हो? यहाँ तुम्हारे आने का क्या कारण है और तुम मुझे शोकग्रस्त अनमने से दिखाई देते हो इसका क्या कारण है? राजा के यह नम्र वचन सुन वैश्य ने महाराज सुरथ को प्रणाम करके कहा, वैश्य बोला- राजन! मेरा नाम समाधि है, मैं धनियों के कुल में उत्पन्न एक वैश्य हूँ, मेरे दुष्ट स्त्री-पुत्रादिकों ने लोभ से मेरा सब धन छीन लिया है और मुझे घर से निकाल दिया है। मैं इस तरह से दुखी होकर इस वन में चला आया हूँ और यहाँ रहता हुआ मैं इस बात को भी नहीं जानता कि अब घर में इस समय सब कुशल हैं या नहीं।

यहाँ मैं अपने परिवार का आचरण संबंधी कोई समाचार भी नहीं पा सकता कि वह घर में इस समय कुशलपूर्वक हैं या नहीं। मैं अपने पुत्रों के संबंध में यह भी नहीं जानता कि वह सदाचारी हैं या दुराचार में फँसे हुए हैं। राजा बोले-जिस धन के लोभी स्त्री, पुत्रों ने तुम्हेंं घर से निकाल दिया है, फिर भी तुम्हारा चित्त उनसे क्यों प्रेम करता है। वैश्य ने कहा-मेरे विषय में आपका ऎसा कहना ठीक है, किंतु मेरा मन इतना कठोर नहीं है। यद्यपि उन्होंने धन के लोभ में पड़कर पितृस्नेह को त्यागकर मुझे घर से निकाल दिया है, तो भी मेरे मन में उनके लिए कठोरता नहीं आती।

हे महामते! मेरा मन फिर भी उनमें क्यों फँस रहा है, इस बात को जानता हुआ भी मैं नहीं जान रहा, मेरा चित्त उनके लिए दुखी है। मैं उनके लिए लंबी-लंबी साँसे ले रहा हूँ, उन लोगों में प्रेम नाम को नहीं है, फिर भी ऎसे नि:स्नेहियों के लिए मेरा हृदय कठोर नहीं होता । महर्षि मार्कण्डेयजी ने कहा-हे ब्रह्मन्! इसके पश्चात महाराज सुरथ और वह वैश्य दोनों महर्षि मेधा के समीप गये और उनके साथ यथायोग्य न्याय सम्भाषण करके दोनों ने वार्ता आरम्भ की। राजा बोले-हे भगवन! मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ, सो आप कृपा करके मुझे बताइए, मेरा मन अधीन नहीं है, इससे मैं बहुत दुखी हूँ, राज्य, धनादिक की चिंता अभी तक मुझे बनी हुई है और मेरी यह ममता अज्ञानियों की तरह बढ़ती ही जा रही है और यह समाधि नामक वैश्य भी अपने घर से अपमानित होकर आया है, इसके स्वजनों ने भी इसे त्याग दिया है, स्वजनों से त्यागा हुआ भी यह उनसे हार्दिक प्रेम रखता है, इस तरह हम दोनों ही दुखी हैं।

हे महाभाग! उन लोगों के अवगुणों को देखकर भी हम दोनों के मन में उनके लिए ममता-जनित आकर्षण उत्पन्न हो रहा है। हमें ज्ञान रहते हुए भी ऎसा क्यों है? अज्ञानी मनुष्यों की तरह हम दोनों में यह मूर्खता क्यों है? महर्षि मेधा ने कहा – विषम मार्ग का ज्ञान सब जन्तुओं को है, सबों के लिए विषय पृथक-पृथक होते हैं, कुछ प्राणी दिन में नहीं देखते और कुछ रात को, परन्तु कई जीव ऎसे हैं जो दिन तथा रात दोनों में देख सकते हैं। यह सत्य है कि मनुष्यों में ज्ञान प्रधान है किंतु केवल मनुष्य ही ज्ञानी नहीं होता, पशु पक्षी आदि भी ज्ञान रखते हैं। जैसे यह पशु पक्षी ज्ञानी हैं, वैसे ही मनुष्यों का ज्ञान है और जो ज्ञान मनुष्यों में वैसे ही पशु पक्षियों में है तथा अन्य बातें भी दोनों में एक जैसी पाई जाती है।

ज्ञान होने पर भी इन पक्षियों की ओर देखो कि अपने भूख से पीड़ित बच्चों की चोंच में कितने प्रेम से अन्न के दाने डालते हैं। हे राजन! ऎसा ही प्रेम मनुष्यों में अपनी संतान के प्रति भी पाया जाता है। लोभ के कारण अपने उपकार का बदला पाने के लिए मनुष्य पुत्रों की इच्छा करते हैं |और इस प्रकार मोह के गढ्ढे में गिरा करते हैँ। भगवान श्रीहरि की जो माया है, उसी से यह संसार मोहित हो रहा है। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं | क्योंकि वह भगवान विष्णु की योगनिन्द्रा है, यह माया ही तो है जिसके कारण संसार मोह में जकड़ा हुआ है | यही महामाया भगवती देवी ज्ञानियों के चित्त को बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती है और उसी के द्वारा सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति होती है।

यही भगवती देवी प्रसन्न होकर मनुष्य को मुक्ति प्रदान करती है। यही संसार के बन्धन का कारण है | तथा सम्पूर्ण ईश्वरों की भी स्वामिनी है। महाराज सुरथ ने पूछा-भगवन! वह देवी कौन सी है, जिसको आप महामाया कहते हैं? हे ब्रह्मन! वह कैसे उत्पन्न हुई और उसका कार्य क्या है? उसके चरित्र कौन-कौन से हैं। प्रभो! उसका जैसा प्रभाव हो, जैसा स्वरूप हो वह सब ही कृपाकर मुझसे कहिये, मैं आपसे सुनना चाहता हूँ। महर्षि मेधा बोले-राजन्! वह देवी तो नित्यस्वरुपा है, उसके द्वारा यह संसार रचा गया है। तब भी उसकी उत्पत्ति अनेक प्रकार से होती है। वह सब आप मुझसे सुनो, वह देवताओ का कार्य सिद्ध करने के लिए प्रकट होती है, उस समय वह उत्पन्न हुई कहलाती है।

Durga sapswati

संसार को जलमय करके जब भगवान विष्णु योगनिद्रा का आश्रय लेकर शेषशैय्या पर सो रहे थे तब मधु-कैटभ नाम के दो असुर उनके कानों के मैल से प्रकट हुए और वह श्रीब्रह्मा जी को मारने के लिए तैयार हो गये। श्रीब्रह्माजी ने जब उन दोनो को अपनी ओर आते देखा और यह भी देखा कि भगवान विष्णु योगनिद्रा का आश्रय लेकर सो रहे हैं तो वह उस समय श्रीभगवान को जगाने के लिये उनके नेत्रों में निवास करने वाली योगनिद्रा की स्तुति करने लगे। श्रीब्रह्मा जी ने कहा-हे देवी! तुम ही स्वाहा, तुम ही स्वधा और तुम ही वषटकार हो। स्वर भी तुम्हारा ही स्वरुप है, तुम ही जीवन देने वाली सुधा हो।

नित्य अक्षर प्रणव में अकार, उकार, मकार इन तीनों में माताओं के रुप में तुम ही स्थित हो। इनके अतिरिक्त जो बिन्दपथ अर्धमात्रा है, जिसका कि विशेष रूप से उच्चारण नहीं किया जाता है | हे देवी! वह भी तुम ही हो। हे देवी! संध्या, सावित्री तथा परमजननी तुम ही हो। तुम इस विश्व को धारण करने वाली हो, तुमने ही इस जगत की रचना की है और तुम ही इस जगत का पालन करने वाली हो। तुम ही कल्प के अन्त में सबको भक्षण करने वाली हो। हे देवी! जगत की उत्पत्ति के समय तुम सृष्टि रूपा होती हो, पालन काल में स्थित रूपा हो और कल्प के अन्त में संहाररूप धारण कर लेती हो। तुम ही महाविद्या, महामाया, महामेधा, महारात्रि और मोहरात्रि हो। श्री, ईश्वरी और बोधस्वरूपा बुद्धि भी तुम ही हो | लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम ही हो।

तुम खड्ग धारिणी, शूल धारिणी घोररूपा तथा गदा, चक्र, शंख और धनुष को धारण करने वाली हो। बाण, भुशुण्डी और परिघ यह भी तुम्हारे ही अस्त्र हैं। तुम सौम्य और सौम्यतर हो-यही नहीं बल्कि जितनी भी सौम्य तथा सुन्दर वस्तुएँ इस संसार में हैं, उन सबसे बढ़कर सुन्दर तुम हो। पर और अपर सबसे पर रहने वाली सुन्दर तुम ही हो। हे सर्वस्वरुपे देवी! जो भी सत ,असत पदार्थ हैं और उनमें जो शक्ति है, वह तुम ही हो। ऎसी अवस्था में भला तुम्हारी स्तुति कौन कर सकता है! इस संसार की सृष्टि, पालन और संहार करने वाले जो भगवान हैं, उनको भी जब तुमने निद्रा के वशीभूत कर दिया है तो फिर तुम्हारी स्तुति कौन कर सकता है? मुझे, भगवान विष्णु तथा भगवान शंकर को भी शरीर धारण कराने वाली तुम ही हो। तुम्हारी स्तुति करने की शक्ति किसमें में है?

हे देवी! तुम तो अपने इन उदार प्रभावों के कारण ही प्रशंसनीय हो। मधु और कैटभ जो भयंकर असुर है इन्हें मोह में डाल दो और श्रीहरि भगवान विष्णु को भी जल्दी जगा दो और उनमें इनको मार डालने की बुद्धि भी उत्पन्न कर दो। महर्षि मेधा बोले-हे राजन्! जब श्रीब्रह्माजी ने देवी से इस प्रकार स्तुति करके भगवान को जगाने तथा मधु और कैटभ को मारने के लिए कहा तो वह भगवान श्रीविष्णु के नेत्र, मुख, नासिका, बाहु, हृदय और वक्षस्थल से निकल ब्रह्माजी के सामने खड़ी हो गई। उनका ऎसा करना था कि भगवान श्रीहरि तुरन्त जाग उठे और दोनो असुरों को देखा, जो कि अत्यन्त बलवान तथा पराक्रमी थे और मारे क्रोध के जिनके नेत्र लाल हो रहे थे और जो ब्रह्माजी का वध करने के लिए तैयार थे, तब क्रुद्ध हो उन दोनो दुरात्मा असुरों के साथ भगवान श्रीहरि पूरे पाँच हजार वर्ष तक लड़ते रहे।

एक तो वह अत्यन्त बलवान तथा पराक्रमी थे दूसरे महामाया ने भी उन्हें मोह में डाल रखा था। अत: वह श्री भगवान से कहने लगे-हम दोनो तुम्हारी वीरता से अत्यन्त प्रसन्न है, तुम हमसे कोई वर माँगो! भगवान ने कहा-यदि तुम मुझ पर प्रसन्न हो तो अब तुम मेरे हाथों से मर जाओ। बस इतना सा ही वर मैं तुमसे माँगता हूँ। यहाँ दूसरे वर से क्या प्रयोजन है। महर्षि मेधा बोले-इस तरह से जब वह धोखे में आ गये और अपने चारों ओर जल ही जल देखा तो भगवान श्रीहरि से कहने लगे-जहाँ पर जल न हो, सूखी जमीन हो, उसी जगह हमारा वध कीजिए। महर्षि मेधा कहते है, तथास्तु कहकर भगवान श्रीहरि ने उन दोनों को अपनी जाँघ पर लिटाकर उन दोनो के सिर काट डाले। इस तरह से यह देवी श्रीब्रह्माजी के स्तुति करने पर प्रकट हुई थी, अब तुम से उनके प्रभाव का वर्णन करता हूँ | सो सुनो। दूसरा अध्याय पढने के लिए यहाँ क्लिक करें |

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सम्पूर्ण Durga Saptashati

पहला अध्याय – Chapter First – Durga Saptashati

Durga Saptashati दूसरा अध्याय – Chapter Second

Durga Saptashati तीसरा अध्याय – Chapter Third

Durga Saptashati चौथा अध्याय – Chapter Fourth

दुर्गा सप्तशती पाँचवाँ अध्याय – Chapter five.

Durga सप्तशती छठा अध्याय – Chapter six

Durga सप्तशती सातवाँ अध्याय – Chapter seven

Durga सप्तशती आठवाँ अध्याय– Chapter eight

Durga सप्तशती नवाँ अध्याय – Chapter Ninth

Durga सप्तशती दसवाँ अध्याय – Chapter tenth

Durga सप्तशती ग्यारहवां अध्याय– Chapter Eleventh

Durga सप्तशती बारहवा अध्याय– Chapter tweleve

Durga सप्तशती तेरहवां अध्याय– Chapter thirteen


Durga Saptashati*

High welcome:

Ath Shree Durga Saptashati Pathan

Part First – Durga Saptashati

(Maharishi Rishi’s Best Surath and Samadhi tell the brilliance of Goddess)

Maharishi Markandeya said – Tune in to the record of the origination of Savarni, the offspring of Surya, tune in, the order into the way wherein Savarni transformed into the leader of Manvantara by the artfulness of Mahamaya. In advance, there was a domain called Swarochish. Whether or not he considered the subjects like his youngster, the Kolavidhvanshi master transformed into his adversary. Ruler Surath, who repelled the underhanded, had a fight with him, regardless of the way that the amount of Kolavidhvansis was low, Raja Surath lost to him in a battle. By then he went to his city, simply the domain of his country remained with him and he started to control as the leader of that country, in any case, his enemies ambushed him there.

Considering the to be as weak, his malignant ministers got the ruler’s military and treasury. Ensuing to pulverizing his domain, Raja Surath rode riding a pony on the appearance of playing a pursuit and went towards terrible woodland. In that woods, he saw the withdrawal of Maharishi Medha, There Medha Maharishi was arranged with his adherents and sages and what number of savage creatures lived there in preeminent concordance. Ruler Surath bowed to Maharishi Medha and the Maharishi moreover agreed him fitting neighborliness. Ruler Surath stayed in Maharishi’s ashram for a long time.

 

With the enthusiasm of the love for his city, the master started thinking in his mind – the city which the antecedents had followed in the past dropped off my mind today. Will, my guileful and trickery serve to shield my city from religion now or not? My focal elephant, who was reliably the deluge and the knight of the thing, Don’t have the foggiest thought of how abandoned my suffering will be? My dedicated specialists, who were reliably happy to get money and food by my style and followed me, would point of fact follow the malignant rulers and total vain money spent by my insidious and wickedness priests. My fortune will be unfilled one day. The ruler continued being miserable thinking various such things.

One day Ruler Surath saw a Vaishya near the ashram of Maharishi Medha, the master asked him – Sibling, who right? What is the reason behind your coming here and for what reason do you see me with denied? On hearing this unobtrusive articulation of the ruler, Vaishya bowed to Maharaja Surath and expressed, Vaishya said-Rajan! My name is Samadhi, I am a Vaishya imagined in the group of the Dhanis, my malevolent women and young ladies have taken every one of my wealth from insatiability and drove me out of the house. I have brought about these current conditions woodlands lamentably thusly and remembering that living here, I don’t know whether everyone is talented at home starting at now.

Here I can not get any news related to the lead of my family whether he is successful at home or not. I don’t know similar to my youngsters that they are moral or are caught in tragic conduct. The ruler said – the bounty of whose insatiable women and kids has removed you from the house, yet for what reason does your mind love them vaishyas said – It is okay for you to state this with respect to me, be that as it may, my mind isn’t so rigid. In spite of the way that they have given up me from the house as a result of the greed for money and surrendered Pitrisneh, I regardless of everything don’t feel hard for them.

Goodness, dear! Regardless of the way that my mind is getting trapped in them, I haven’t the foggiest about the way, my cerebrum is dreary for them. I am taking long breaths for them, they don’t have the name of worship, yet my heart isn’t cemented for such delicate ones. Maharishi Markandeji said – O Brahman! After this, both Maharaja Surath and Vaishya went near Maharishi Medha and started talking with them with authentic value. The master said – O God! I have to ask you a specific something, so please let me know, my cerebrum isn’t oppressed, I am hopeless thusly, the state, I am so far worried over the Dhanadik, and my worship is creating like deadness. Furthermore, this Vaishya named Samadhi has moreover come out of his home humiliated, his relatives have surrendered it, even he is significantly crippled by the departure from his own, thus we are both pathetic.

 

 

Hi, passage Seeing the flaws of those people, both of us have a Mamata-borne interest for them. For what reason is this disregarding our understanding? For what reason do both of us have this folly like ignorant individuals? Maharishi Medha said – The data on the upside-down path is for all animals, subjects are various for all of, a couple of animals don’t discover in the day and some around night time, be that as it may, there are various such animals who can see both day and night. The realities affirm that data is overpowering among individuals anyway not simply individuals are found out, animals, feathered animals, etc also have data. Also, as these animal fowls are found out, so is the data on individuals and the data that is available in individuals comparatively that animals are in winged creatures, and various things are furthermore found in both.

Extensively ensuing to having data, look at these fowls, how much love they put grains of food in the nose of their eager children. Hi Rajan! A comparable love is in like manner found in individuals towards their children. In order to look for requital for their thoughtfulness in view of unreachability, individuals need kids and thusly fall into the pit of association. This world is interested in the fantasy of Ruler Shrihari. There is nothing amazing in this since she is the Yogendra of Ruler Vishnu, it is Maya that is the inspiration driving why the world is immersed in intrigue, this Mahamaya Bhagwati Goddess moves the cerebrums of the data into intrigue and by that she completes the whole world. Starts.

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This Bhagwati Devi is fulfilled and offers the opportunity to man. This is the reason behind the holding of the world and the expert of the whole God. Maharaj Surath asked – God! Which goddess would you say you are called Mahamaya? O, Brahman! How might she start and what is her ability? What are his characters? God Whatever sway it has, whatever structure it may have, generously let me know, I have to get a notice from you. Maharishi Medha said – Rajan! That goddess is nityaswarupa, she made this world. Furthermore, still, by the day’s end, it has its origination from different points of view. You hear all that from me, it appears to show made by the perfect creatures, around then it is said to have begun.

Right, when Master Vishnu was napping on Sheshaaiyya taking the sheltered place of Yoganidra by expending the world, two Asuras named Madhu-Catabh appeared with the revoltingness of his ears and he agreed to kill SriBrahma Ji. When Shri Brahmaji saw them two coming towards him and moreover saw that Ruler Vishnu is sitting down with the help of Yojanidra.So around at that point, he started recognizing the Yojanidra living in his eyes to mix Shri Bhagwan. Shri Brahma Ji said – O Goddess! You are basically the, you are oneself and you are the year-old. The voice is furthermore your structure, you are the individual who gives life.

In the steady letters all together Pranav, you are organized as mothers in every one of the three of these structures, alive and well and perfectly healthy. Besides this, which is the Bindpath Ardhamatra, which isn’t unequivocally verbalized, O Goddess! That is you too O Goddess! You are Sandhya, Savitri, and Paramjanani. You are going to wear this world, you have made this world and you are the one to follow this world. You will gobble up everyone close to the completion of the cycle. O, Goddess! At the hour of the creation of the world, you are the sort of the world, you are the kind of life in the acknowledgment, and close to the completion of the cycle, you take the pummeling. You are Mahavidya, Mahamaya, Mahamedha, Maharastra, and Mohratri. You are in like manner Shri Ishwari and Bodhwaroopa Insight, you are moreover a disrespect, confirmation, satisfaction, amicability, and pardon.

You are going to wear the Kharag Dharani, the Shul Dharani Ghorroopa and the mace, the chakra, the conch, and the bow. Arms, bhushundi, and ward are in like manner your weapons. You are fragile and sensitive – this just as all the fragile and awesome things are in this world, generally, you are superb. In any case, you are the amazing one who lives on the most noteworthy. Thoughtful, Goddess of all! Whatever is the persistent substance and the power in it is you who can applaud you in such a state! When you have oppressed the God who made, upheld, and destroyed this world, by then who can commend you? You are the individual who passes on me, Ruler Vishnu and Master Shankar. Who can acclaim you?

O, Goddess! You are acknowledged taking into account these liberal effects. Madhu and Catabh who are wild asuras, tempt them and make Srihari wake up to Ruler Vishnu too soon and make the shrewdness to butcher them. Maharishi Medha said – O Rajan! When SriBrahmaji mentioned that the Goddess mix the Master thusly and murder Madhu and Catabh, by then he got the eyes, mouth, nose of Ruler Sri Vishnu. Brahma, standing separated from the heart and chest, stayed before Brahmaji. He expected to do this that Master Shrihari immediately woke up and saw both the Asuras, who were amazingly strong and determined, and whose eyes of shock were turning red and the people who were set up to kill Brahmaji, by than them two would be incensed. Ace Shrihari struggled with the Asuras for quite a while.

One, he was staggering and convincing, and besides, Mahamaya similarly kept him in intrigue. Thusly, he started to state to Shri Bhagwan – both of us are content with your mental fortitude, you demand a spouse to be from us! God said – if you are content with me, by and by unfathomable my hands. That is all I ask of you. What is the inspiration driving another real thing here? Maharishi Medha said – thusly when he is in guile when he came and saw water encompassing him, he said to Master Shrihari – where there is no water, there is dry land, murder us in a comparable spot. Maharishi Medha says, saying that Master Srihari cut the leader of the two by lying on his thigh. Hence, it appeared on complimenting Goddess ShriBrahmaji, by and by I portray her effect on you, so tune in. Click here to read the second chapter.

 

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